अध्यायवार परीक्षोपयोगी तथ्य-श्रृंखला

भारत का इतिहास
महत्वपूर्ण परीक्षोपयोगी तथ्य

अध्याय 1 : प्रागैतिहासिक काल

पाषाण युग से ताम्रपाषाण युग तक — काल-विभाजन • पुरापाषाण • मध्यपाषाण • नवपाषाण • ताम्रपाषाण • शैलचित्र कला

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काल-विभाजन एवं अध्ययन-पद्धतिप्रागैतिहास • आद्य इतिहास • तिथि-निर्धारण विधियाँ

परीक्षा-दृष्टि : इस खण्ड से शब्द-प्रवर्तक विद्वान (किसने कौन-सा शब्द दिया) तथा तिथि-निर्धारण विधियों पर सीधे प्रश्न आते हैं।
मानव-अतीत का अध्ययन तीन चरणों में बाँटा जाता है — प्रागैतिहासिक काल (लिखित साक्ष्य का पूर्ण अभाव), आद्य ऐतिहासिक काल (लेखन उपलब्ध किंतु अपठित — जैसे हड़प्पा सभ्यता) तथा ऐतिहासिक काल (पठित लिखित साक्ष्य उपलब्ध)।
वैदिक काल को भी आद्य ऐतिहासिक काल में रखा जाता है, क्योंकि वेद मौखिक परंपरा से सुरक्षित रहे — समकालीन लिखित अभिलेख नहीं मिलते।
'प्रीहिस्ट्री' (प्रागैतिहास) शब्द को अकादमिक प्रचलन देने का श्रेय डैनियल विल्सन (1851) को दिया जाता है।
भारतीय प्रागितिहास के जनक रॉबर्ट ब्रूस फुट हैं — भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण के इस भूवैज्ञानिक ने 1863 ई. में पल्लवरम (तमिलनाडु) से भारत का पहला पुरापाषाणिक उपकरण (हस्तकुठार) खोजा।
1935 ई. में येल-कैम्ब्रिज अभियान (डी. टेरा एवं पैटरसन) ने कश्मीर व पंजाब की सोहन (सोअन) घाटी में हिमयुगीन अनुक्रम का व्यवस्थित अध्ययन किया।
प्रागैतिहासिक भारत के व्यवस्थित अध्ययन में एच.डी. सांकलिया का योगदान अग्रणी है — इन्हें भारतीय पुरातत्त्व में प्रागितिहास-अध्ययन का प्रमुख स्तंभ माना जाता है।
प्रागैतिहासिक काल के ज्ञान के स्रोत — पाषाण उपकरण, मृद्भांड, अस्थि-अवशेष, शैलचित्र एवं उत्खनन-स्तर; लिखित स्रोत का पूर्ण अभाव।
रेडियोकार्बन (C-14) विधि के जनक विलार्ड लिब्बी हैं; कार्बन-14 की अर्ध-आयु 5730 वर्ष होती है — जैविक अवशेषों की तिथि-गणना का आधार।
अत्यंत प्राचीन (लाखों वर्ष पुराने) स्तरों की तिथि हेतु पोटैशियम-आर्गन (K-Ar) विधि तथा वृक्षों के वलयों से तिथि-गणना हेतु वृक्ष-वलय विधि (डेंड्रोक्रोनोलॉजी) प्रयुक्त होती है।
भारतीय पाषाण युग का त्रि-स्तरीय विभाजन — पुरापाषाण → मध्यपाषाण → नवपाषाण; इसके बाद धातु-प्रवेश के साथ ताम्रपाषाण काल आता है।
भारत में मानव-पूर्वज का एकमात्र प्रमुख जीवाश्म-साक्ष्य — 'नर्मदा मानव' (हथनौरा, नर्मदा घाटी, म.प्र.) — खोपड़ी का यह अवशेष 1982 में अरुण सोनकिया ने खोजा।
भारतीय पुरापाषाणिक उपकरण-परंपराएँ दो प्रमुख शैलियों में बाँटी जाती हैं — उत्तर की सोहन (चॉपर-चॉपिंग/पेबल) परंपरा तथा दक्षिण की मद्रासी (हस्तकुठार) परंपरा
★ अति महत्वपूर्ण

शब्द / विधि — प्रवर्तक विद्वान (सीधा मिलान प्रश्न)

  • 'प्रीहिस्ट्री' शब्द → डैनियल विल्सन | 'नियोलिथिक' शब्द → जॉन लुब्बॉक
  • 'नवपाषाण क्रांति' → वी. गॉर्डन चाइल्ड | C-14 विधि → विलार्ड लिब्बी
  • भारतीय प्रागितिहास के जनक → रॉबर्ट ब्रूस फुट | नर्मदा मानव की खोज → अरुण सोनकिया (1982)

पुरापाषाण कालनिम्न • मध्य • उच्च — उपकरण, स्थल एवं जीवन-शैली

परीक्षा-दृष्टि : तीनों चरणों के विशिष्ट उपकरण और प्रयुक्त पत्थर का मिलान सर्वाधिक पूछा जाता है — नीचे की तुलनात्मक तालिका अवश्य कंठस्थ करें।
पुरापाषाण काल तीन चरणों में विभक्त है — निम्न पुरापाषाण (लगभग 5 लाख–1 लाख वर्ष पूर्व), मध्य पुरापाषाण (लगभग 1 लाख–40 हज़ार वर्ष पूर्व) तथा उच्च पुरापाषाण (लगभग 40 हज़ार–10 हज़ार वर्ष पूर्व)।
पुरापाषाणकालीन मानव का जीवन शिकार एवं खाद्य-संग्रह पर आधारित था — कृषि, पशुपालन, मृद्भांड और स्थायी निवास का अभाव था।
निम्न पुरापाषाण के प्रमुख उपकरण — हस्तकुठार (हैंड-ऐक्स), विदारणी (क्लीवर) एवं खंडक (चॉपर); ये प्रायः क्वार्टज़ाइट पत्थर से बनते थे, इसीलिए इस काल के मानव को 'क्वार्टज़ाइट मानव' भी कहा गया।
मध्य पुरापाषाण को 'फलक (फ्लेक) संस्कृति' कहा जाता है — प्रमुख उपकरण बेधक (बोरर), खुरचनी (स्क्रेपर) एवं वेधनी; पसंदीदा पत्थर जैस्पर व चर्ट
उच्च पुरापाषाण के विशिष्ट उपकरण — ब्लेड (फलकी) एवं ब्यूरिन (तक्षणी); इसी चरण में आधुनिक मानव (होमो सेपियन्स) का आगमन तथा अस्थि-उपकरणों का प्रचलन माना जाता है।
आग से मानव का परिचय पुरापाषाण काल में हो चुका था, किंतु उसका व्यापक-नियोजित प्रयोग नवपाषाण काल से प्रारंभ हुआ।
बेलन घाटी (मिर्जापुर-प्रयागराज क्षेत्र, उ.प्र.) एकमात्र ऐसा क्षेत्र है जहाँ पुरापाषाण के तीनों चरणों के क्रमबद्ध साक्ष्य एक साथ मिलते हैं।
बेलन घाटी के लोहदा नाला से अस्थि-निर्मित मातृदेवी प्रतिमा मिली है — इसे भारत की प्राचीनतम मूर्तियों में गिना जाता है (उच्च पुरापाषाण)।
अत्तिरम्पक्कम (तमिलनाडु) एवं हुंस्गी घाटी (कर्नाटक) — निम्न पुरापाषाणिक हस्तकुठार परंपरा के अत्यंत प्राचीन एवं समृद्ध स्थल हैं।
16-आर ढिबरी, डीडवाना (राजस्थान) — थार क्षेत्र का प्रसिद्ध बहु-स्तरीय पुरापाषाणिक स्थल है।
नेवासा (महाराष्ट्र) मध्य पुरापाषाणिक संस्कृति का प्रतिनिधि (टाइप) स्थल माना जाता है — इसीलिए मध्य पुरापाषाण को 'नेवासी संस्कृति' भी कहते हैं।
पटने (महाराष्ट्र) से उच्च पुरापाषाणिक स्तर में शुतुरमुर्ग के अंडों के छिलकों पर उत्कीर्ण अलंकरण मिला है — प्राचीनतम कलात्मक अभिव्यक्तियों में से एक।
कुरनूल गुफाएँ (आंध्र प्रदेश) — अस्थि-उपकरण तथा राख के साक्ष्य; भीमबेटका के शैलाश्रयों में भी पुरापाषाणिक निवास के प्रमाण मिले हैं।
पुरापाषाणिक साक्ष्य गंगा के जलोढ़ मैदान तथा केरल के अति-आर्द्र क्षेत्रों में प्रायः नहीं मिलते — प्रमुख क्षेत्र हैं : सोहन घाटी, नर्मदा घाटी, छोटानागपुर पठार, दक्कन का पठार।
चरणअनुमानित अवधिविशिष्ट उपकरणप्रमुख पत्थरप्रमुख स्थल
निम्न पुरापाषाण~5 लाख–1 लाख वर्ष पूर्वहस्तकुठार, विदारणी, खंडकक्वार्टज़ाइटपल्लवरम, अत्तिरम्पक्कम, हुंस्गी, सोहन घाटी
मध्य पुरापाषाण~1 लाख–40 हज़ार वर्ष पूर्वफलक, बेधक, खुरचनीजैस्पर, चर्टनेवासा, भीमबेटका, डीडवाना
उच्च पुरापाषाण~40–10 हज़ार वर्ष पूर्वब्लेड, ब्यूरिन, अस्थि-उपकरणमहीन कणों वाले सिलिका पत्थरबेलन घाटी, पटने, कुरनूल गुफाएँ

📌 तालिका : पुरापाषाण के तीन चरण — "उपकरण–पत्थर–स्थल" मिलान परीक्षा का प्रिय प्रारूप है।

🧠 स्मरण-सूत्र

उपकरण-क्रम : "हाथ से फलक, फलक से ब्लेड" → निम्न = हाथ की कुल्हाड़ी (हस्तकुठार), मध्य = फलक, उच्च = ब्लेड-ब्यूरिन।

मध्यपाषाण काललघु पाषाण उपकरण • धनुष-बाण • पशुपालन के प्रथम संकेत

परीक्षा-दृष्टि : माइक्रोलिथ, धनुष-बाण का प्रथम प्रयोग और गंगाघाटी के कंकाल-स्थल (सराय नाहर राय, महदहा, दमदमा) — तीनों बिंदु अनिवार्य हैं।
मध्यपाषाण काल की अवधि लगभग 10,000–6,000 ई.पू. मानी जाती है — हिमयुग की समाप्ति (होलोसीन आरंभ) के साथ जलवायु उष्ण एवं आर्द्र हुई।
इस काल की पहचान लघु पाषाण उपकरण (माइक्रोलिथ) हैं — प्रमुख आकार : त्रिकोण, नवचंद्राकार (लूनेट), समलंब (ट्रेपीज़); लंबाई प्रायः 1–8 सेमी।
धनुष-बाण का प्रथम प्रयोग मध्यपाषाण काल में हुआ — छोटे-तेज़ शिकार (हिरण, खरगोश, पक्षी, मछली) की ओर संक्रमण का संकेत।
बागोर (भीलवाड़ा, राजस्थान)कोठारी नदी के तट पर स्थित भारत का सबसे बड़ा एवं सर्वाधिक प्रलेखित मध्यपाषाणिक स्थल।
पशुपालन के प्राचीनतम साक्ष्य मध्यपाषाणिक स्तरों से — आदमगढ़ (म.प्र.) एवं बागोर (राजस्थान) से भेड़-बकरी पालन के प्रमाण।
गंगाघाटी के प्रसिद्ध मध्यपाषाणिक स्थल — सराय नाहर राय, महदहा, दमदमा (सभी उ.प्र.) — यहाँ से बड़ी संख्या में मानव कंकाल मिले हैं।
सराय नाहर राय के कुछ कंकालों में बाण-प्रहार के चिह्न मिले हैं — मानव-संघर्ष (हिंसा) का प्राचीनतम भारतीय साक्ष्य माना जाता है।
महदहा से अस्थि-आभूषण तथा युगल शवाधान के साक्ष्य मिले हैं; दमदमा से 41 से अधिक मानव समाधियाँ प्राप्त हुई हैं।
लंघनाज (गुजरात) — पश्चिम भारत का प्रमुख मध्यपाषाणिक स्थल; यहाँ से मानव कंकालों के साथ गैंडे की अस्थियाँ भी मिली हैं।
मध्यपाषाण काल में ही विधिवत शवाधान की परंपरा प्रारंभ हुई — शव के साथ उपकरण व आभूषण रखने की प्रथा परलोक-विश्वास का संकेत देती है।
🧠 स्मरण-सूत्र

गंगाघाटी कंकाल-त्रयी : "सराय में महदहा का दमदमा"राय नाहर राय, हदहा, मदमा — तीनों उत्तर प्रदेश में, तीनों से मानव कंकाल।

नवपाषाण कालकृषि-क्रांति • स्थायी ग्राम-जीवन • क्षेत्रीय नवपाषाणिक संस्कृतियाँ

परीक्षा-दृष्टि : "किस स्थल से किस फसल/विशेषता का प्राचीनतम साक्ष्य" — मेहरगढ़, कोल्डिहवा, बुर्जहोम, हल्लूर — यही इस खण्ड का प्राण है।
'नियोलिथिक' (नवपाषाण) शब्द का प्रथम प्रयोग जॉन लुब्बॉक (1865) ने किया; 'नवपाषाण क्रांति' की संकल्पना वी. गॉर्डन चाइल्ड की देन है।
नवपाषाण क्रांति के चार स्तंभ — कृषि, पशुपालन, स्थायी ग्राम-जीवन एवं मृद्भांड-निर्माण; उपकरण अब घर्षित-परिष्कृत (पॉलिशदार) बनने लगे।
मेहरगढ़ (बलूचिस्तान, पाकिस्तान) — भारतीय उपमहाद्वीप में कृषि एवं स्थायी ग्राम-जीवन का प्राचीनतम साक्ष्य (गेहूँ-जौ, लगभग 7000 ई.पू.)।
मानव द्वारा उगाई गई आरंभिक फसलों में जौ का स्थान सर्वोपरि है — उपमहाद्वीप के आरंभिक कृषि-स्तरों में जौ गेहूँ से भी अधिक व्यापक है।
कोल्डिहवा (बेलन घाटी, उ.प्र.) से चावल की खेती का प्राचीनतम साक्ष्य — कुछ विद्वान इसे विश्व का प्राचीनतम धान-साक्ष्य (लगभग 6500 ई.पू., विवादित) मानते हैं; निकटवर्ती महगड़ा से पशु-बाड़े का साक्ष्य।
बुर्जहोम (कश्मीर)गर्त-आवास (गड्ढा-घर), हड्डी के उपकरण तथा स्वामी के साथ कुत्ते को दफनाने की विशिष्ट प्रथा।
गुफ्कराल (कश्मीर) (अर्थ — 'कुम्हार की गुफा') — गर्त-आवास एवं आरंभिक कृषि-पशुपालन दोनों के साक्ष्य।
चिरांद (सारण, बिहार)हिरण के सींग से बने अस्थि-उपकरणों के लिए प्रसिद्ध; गंगाघाटी का प्रमुख नवपाषाणिक स्थल।
दक्षिण भारत के नवपाषाणिक स्थलों की विशेषता राख के टीले (ऐश-माउंड) हैं — संगनकल्लू, पिकलीहल, उतनूर, कुपगल — ये मवेशी-पालक समुदायों के बाड़े जलाने से बने।
हल्लूर (कर्नाटक) से रागी तथा दक्षिणी नवपाषाण से कुलथी की खेती के आरंभिक साक्ष्य — दक्षिण की 'मोटा-अनाज' परंपरा।
दक्षिण भारत के अन्य प्रमुख स्थल — ब्रह्मगिरि, मस्की, टेक्कलकोटा, पैयमपल्ली; टेक्कलकोटा से स्वर्ण-आभूषण के आरंभिक संकेत मिले हैं।
दाओजली हैडिंग (असम) — पूर्वोत्तर का प्रमुख नवपाषाणिक स्थल; यहाँ के उपकरण पूर्वी एशियाई परंपरा से संबंध दर्शाते हैं।
नवपाषाण काल में मृद्भांड-निर्माण आरंभ हुआ — पहले हस्तनिर्मित, फिर चाक-निर्मित बर्तन; इसी क्रम में पहिये का आविष्कार क्रांतिकारी सिद्ध हुआ।
मानव द्वारा पालतू बनाया गया पहला पशु कुत्ता था; खाद्य-पशुओं में भेड़-बकरी सबसे पहले पालतू बनाए गए।
नवपाषाणिक स्थलराज्य / क्षेत्रविशिष्ट साक्ष्य
मेहरगढ़बलूचिस्तान (पाकिस्तान)कृषि व ग्राम-जीवन का प्राचीनतम साक्ष्य (गेहूँ-जौ)
कोल्डिहवाउत्तर प्रदेश (बेलन घाटी)चावल का प्राचीनतम साक्ष्य
बुर्जहोमकश्मीरगर्त-आवास, स्वामी संग कुत्ते का शवाधान
गुफ्करालकश्मीर'कुम्हार की गुफा', गर्त-आवास
चिरांदबिहारहिरण-सींग के अस्थि-उपकरण
हल्लूरकर्नाटकरागी का आरंभिक साक्ष्य
संगनकल्लू, उतनूर, पिकलीहलकर्नाटक–आंध्रराख के टीले (मवेशी-बाड़े)
दाओजली हैडिंगअसमपूर्वी एशियाई शैली के उपकरण

📌 तालिका : नवपाषाणिक स्थल–विशेषता मिलान — प्रत्येक PSC प्रारंभिक परीक्षा का स्थायी प्रश्न।

★ अति महत्वपूर्ण

"प्राचीनतम साक्ष्य" — एक पंक्ति में पूरा खण्ड

  • कृषि (गेहूँ-जौ) → मेहरगढ़ | चावल → कोल्डिहवा | रागी → हल्लूर
  • पशुपालन → आदमगढ़–बागोर (मध्यपाषाण) | पहला पालतू पशु → कुत्ता
  • गर्त-आवास → बुर्जहोम–गुफ्कराल | अस्थि-उपकरण → चिरांद | राख के टीले → दक्षिणी नवपाषाण

ताम्रपाषाण कालप्रथम धातु-प्रयोग • अहाड़, कायथा, मालवा, जोरवे संस्कृतियाँ

परीक्षा-दृष्टि : संस्कृति–क्षेत्र–प्रमुख स्थल का त्रिकोणीय मिलान और दैमाबाद–इनामगाँव–नवदाटोली जैसे स्थलों की विशेषताएँ ही यहाँ से पूछी जाती हैं।
ताम्रपाषाण काल में मानव ने पत्थर के साथ-साथ पहली धातु — ताँबा — का प्रयोग आरंभ किया; पहली मिश्रधातु कांसा (ताँबा + टिन) बनी।
ताम्रपाषाणिक समुदाय ग्रामीण-कृषक थे — ये प्रायः लोहे एवं लेखन-कला से अपरिचित थे तथा नगर-जीवन से दूर थे।
अहाड़ संस्कृति (राजस्थान, बनास घाटी) — अहाड़ का प्राचीन नाम 'ताम्बावती' (ताँबे वाली नगरी); यहाँ के निवासी ताँबा गलाने में दक्ष थे; प्रमुख स्थल — अहाड़, बालाथल, गिलूंद
कायथा संस्कृति (म.प्र., चंबल क्षेत्र) — काली-भूरी चित्रित मृद्भांड परंपरा; कायथा प्रसिद्ध ज्योतिष-ग्रंथकार वराहमिहिर की जन्मस्थली भी मानी जाती है।
मालवा संस्कृति के प्रमुख स्थल — नवदाटोली, एरण, नागदा; नवदाटोली (नर्मदा तट) को भारत के सबसे बड़े ताम्रपाषाणिक ग्रामों में गिना जाता है — उत्खनन एच.डी. सांकलिया ने किया।
जोरवे संस्कृति (महाराष्ट्र) — लाल सतह पर काले चित्रांकन वाले मृद्भांड; प्रमुख स्थल — दैमाबाद, इनामगाँव, नेवासा, चंदोली, सोनगाँव
दैमाबाद (अहमदनगर, महाराष्ट्र) — जोरवे संस्कृति का सबसे बड़ा स्थल; यहीं से प्रसिद्ध कांस्य-संचय मिला — रथी-मानव, साँड़, हाथी एवं गैंडे की ठोस कांस्य प्रतिमाएँ।
इनामगाँव (महाराष्ट्र) — विशाल ताम्रपाषाणिक बस्ती; यहाँ से अन्न-कोठार, मातृदेवी की मृण्मूर्तियाँ तथा नियोजित घरों के साक्ष्य मिले हैं।
महाराष्ट्र की ताम्रपाषाणिक परंपरा में शिशुओं-मृतकों को घर के फर्श के नीचे कलशों में (उत्तर-दक्षिण दिशा में) दफनाया जाता था।
गैरिक मृद्भांड (OCP) संस्कृति — गंगा-यमुना दोआब में; इसी क्षेत्र से ताम्र-निधियाँ (कॉपर होर्ड्स) — मानवाकृतियाँ, हार्पून, बाली-कुल्हाड़ियाँ — मिली हैं।
ताम्र-निधियों का सबसे बड़ा संचय गुंगेरिया (म.प्र.) से प्राप्त हुआ है।
गणेश्वर (सीकर, राजस्थान)खेतड़ी ताम्र-क्षेत्र से जुड़ा ताम्र-उपकरण निर्माण का विशाल केंद्र; इसे हड़प्पा सभ्यता को ताँबा आपूर्ति करने वाला स्रोत माना जाता है।
ताम्रपाषाण काल में काले-लाल मृद्भांड (BRW) तथा चित्रित परंपराओं का विकास हुआ — मृद्भांड-शैली ही संस्कृतियों की पहचान का मुख्य आधार है।
संस्कृतिक्षेत्रप्रमुख स्थलविशेषता
अहाड़ संस्कृतिराजस्थान (बनास घाटी)अहाड़, बालाथल, गिलूंदताँबा गलाने में दक्षता; 'ताम्बावती'
कायथा संस्कृतिमध्य प्रदेश (चंबल)कायथाकाली-भूरी चित्रित मृद्भांड
मालवा संस्कृतिमध्य प्रदेशनवदाटोली, एरण, नागदाविशालतम ताम्रपाषाणिक ग्राम (नवदाटोली)
जोरवे संस्कृतिमहाराष्ट्रदैमाबाद, इनामगाँव, नेवासा, चंदोलीलाल पर काला चित्रांकन; दैमाबाद कांस्य-संचय
गैरिक मृद्भांड (OCP)गंगा-यमुना दोआबताम्र-निधियों से संबद्ध

📌 तालिका : ताम्रपाषाणिक संस्कृतियाँ — "संस्कृति–क्षेत्र–स्थल" का त्रिकोणीय मिलान।

★ अति महत्वपूर्ण

ताम्रपाषाण — 'नहीं' वाले तथ्य (नकारात्मक कथन प्रश्नों हेतु)

  • ताम्रपाषाणिक लोग लोहे से अपरिचित | लेखन-कला नहीं | नगर-जीवन नहीं
  • ये हड़प्पा जैसी पकी ईंटों व नियोजित जल-निकासी से अनभिज्ञ थे
  • अधिकांश क्षेत्रों में हल का प्रत्यक्ष साक्ष्य दुर्लभ — कुदाल-खेती प्रधान
🧠 स्मरण-सूत्र

जोरवे के स्थल : "दैने चसो इन"दैमाबाद, नेवासा, ंदोली, सोनगाँव, इनामगाँव — पाँचों महाराष्ट्र में।

प्रागैतिहासिक शैलचित्र कलाभीमबेटका • रंग-सामग्री • प्रमुख शैलचित्र-स्थल

परीक्षा-दृष्टि : कला एवं संस्कृति खण्ड में भीमबेटका से जुड़े तथ्य (खोजकर्ता, राज्य, यूनेस्को-वर्ष) लगभग निश्चित प्रश्न हैं।
भीमबेटका शैलाश्रय (रायसेन, म.प्र.) — लगभग 700 से अधिक शैलाश्रय, जिनमें सैकड़ों चित्रित हैं; खोज डॉ. वी.एस. वाकणकर (1957-58); यूनेस्को विश्व धरोहर — 2003
भीमबेटका के चित्र उच्च पुरापाषाण से मध्यकाल तक की सतत चित्रण-परंपरा दर्शाते हैं — विषय : सामूहिक शिकार, नृत्य, पशु-आकृतियाँ, युद्ध-दृश्य।
शैलचित्रों में सर्वाधिक प्रयुक्त रंग लाल (गेरू/हेमेटाइट) एवं सफेद हैं; हरे व पीले रंगों का प्रयोग अपेक्षाकृत प्राचीन चरणों में मिलता है।
भीमबेटका का प्रसिद्ध 'ज़ू रॉक' (चिड़ियाघर शिला) — एक ही शिला-फलक पर हाथी, हिरण, बारहसिंगा समेत दर्जनों पशु-आकृतियाँ चित्रित हैं।
लखुडियार (अल्मोड़ा, उत्तराखंड) — नदी-तट का प्रसिद्ध चित्रित शैलाश्रय; मानव, पशु एवं लहरदार रेखांकन।
अन्य प्रमुख शैलचित्र-स्थल — आदमगढ़ (म.प्र.), चतुर्भुजनाथ नाला (म.प्र.), मिर्जापुर क्षेत्र (उ.प्र.), कुपगल (कर्नाटक)
मध्यपाषाणिक चित्रों में छोटे पशु व शिकार-दल प्रमुख हैं, जबकि परवर्ती चित्रों में घुड़सवार व युद्ध-दृश्य दिखने लगते हैं — यह कालक्रम-निर्धारण का सूत्र है।
शैलचित्र प्रागैतिहासिक मानव के सामाजिक-धार्मिक जीवन के एकमात्र 'दृश्य-दस्तावेज़' हैं — इसीलिए इन्हें 'पाषाणकालीन मानव की चित्र-डायरी' कहा जाता है।

⚡ एक नज़र में — अध्याय 1 के 12 अमोघ तथ्य

  • भारतीय प्रागितिहास के जनक — रॉबर्ट ब्रूस फुट (पल्लवरम, 1863)
  • 'नर्मदा मानव' — हथनौरा (अरुण सोनकिया, 1982)
  • C-14 विधि — विलार्ड लिब्बी; अर्ध-आयु 5730 वर्ष
  • निम्न पुरापाषाण = हस्तकुठार, मध्य = फलक, उच्च = ब्लेड-ब्यूरिन
  • तीनों चरणों का क्रमबद्ध साक्ष्य — बेलन घाटी
  • माइक्रोलिथ व धनुष-बाण का प्रथम प्रयोग — मध्यपाषाण
  • पशुपालन का प्राचीनतम साक्ष्य — आदमगढ़–बागोर
  • कृषि का प्राचीनतम साक्ष्य — मेहरगढ़; चावल — कोल्डिहवा; रागी — हल्लूर
  • गर्त-आवास व कुत्ते की समाधि — बुर्जहोम
  • सबसे बड़ा जोरवे स्थल — दैमाबाद (कांस्य-संचय)
  • ताम्र-निधियों का सबसे बड़ा संचय — गुंगेरिया
  • भीमबेटका — वाकणकर (1957-58), यूनेस्को धरोहर 2003

भारत का इतिहास : महत्वपूर्ण परीक्षोपयोगी तथ्य • अध्याय 1 — प्रागैतिहासिक काल • UPSC | State PSC | UGC NET | SSC

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