अध्यायवार परीक्षोपयोगी तथ्य-श्रृंखला

भारत का इतिहास
महत्वपूर्ण परीक्षोपयोगी तथ्य

अध्याय 2 : सिंधु घाटी (हड़प्पा) सभ्यता

नगर-योजना • मुहरें एवं लिपि • व्यापार • पतन-सिद्धांत • प्रमुख स्थल एवं साक्ष्य

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परिचय एवं खोजखोजकर्ता • महत्व • नामकरण

परीक्षा-दृष्टि : खोजकर्ता–वर्ष–स्थल मिलान तथा सर जॉन मार्शल की भूमिका प्रायः सीधा प्रश्न है।
हड़प्पा की खोज 1921 ई. में दयाराम साहनी ने की — यह स्थल रावी नदी के तट पर (पंजाब, पाकिस्तान) स्थित है।
मोहनजोदड़ो (अर्थ — 'मृतकों का टीला') की खोज 1922 ई. में राखालदास बनर्जी ने की; यह सिंधु नदी के तट पर (सिंध, पाकिस्तान) है।
खोज के समय भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (ASI) के महानिदेशक सर जॉन मार्शल थे — इन्होंने 1924 में इस सभ्यता की खोज की आधिकारिक घोषणा की तथा इसे मानव-सभ्यता की 'तीसरी महान संस्कृति' कहा।
सभ्यता का नामकरण 'हड़प्पा सभ्यता' रखा गया (जहाँ पहले खोज हुई थी), किंतु बाद में 'सिंधु घाटी सभ्यता' नाम भी प्रचलित हुआ।
समकालीन पश्चिम की मिस्र (OKH) और मेसोपोटामिया (4000–2500 ई.पू.) की संस्कृतियों से तुलना में सिंधु सभ्यता क्षेत्र में सबसे विशाल थी।
यह सभ्यता 'आद्य ऐतिहासिक' (proto-historic) कहलाती है — क्योंकि लेखन उपस्थित था किंतु अपठित है; लिखित अभिलेखों के संदर्भ-ग्रंथ नहीं मिलते।
20वीं-21वीं शताब्दी के महत्वपूर्ण खोजकर्ता — ब्रिटिश काल : मार्शल, व्हीलर | आधुनिक युग : आर.एस. बिष्ट (धौलावीरा), एस.आर. राव (लोथल), यज्ञदत्त शर्मा।
🧠 स्मरण-सूत्र

खोज-त्रयी : "दरा1921 + राखा1922 + मार्शल1924"दायाराम (हड़प्पा), राखालदास (मोहनजोदड़ो), मार्शल (घोषणा)।

काल-निर्धारण एवं चरणपूर्व-हड़प्पा • परिपक्व-हड़प्पा • उत्तर-हड़प्पा

परीक्षा-दृष्टि : "परिपक्व काल" (लगभग 2500–1750 ई.पू.) सर्वाधिक महत्वपूर्ण है — अधिकांश प्रसिद्ध साक्ष्य इसी अवधि के हैं।
C-14 तिथि-निर्धारण एवं पुरातात्त्विक साक्ष्यों के अनुसार सभ्यता के तीन चरण निर्धारित किए गए हैं।
पूर्व-हड़प्पा काल (लगभग 3300–2600 ई.पू.) — कोटदीजी एवं अमरी संस्कृतियाँ; अर्ध-शहरीकृत, आरंभिक कृषि-पशुचारण।
परिपक्व हड़प्पा काल (लगभग 2500–1750 ई.पू.) — सभ्यता का पूर्ण विकसित रूप, सुनियोजित नगर, व्यापार-जाल, मुहरें-लिपि, मानकीकृत भार-माप।
उत्तर-हड़प्पा काल (लगभग 1750–1300 ई.पू.) — अवनति के संकेत, नगर-जीवन का क्षरण, जनसंख्या-विषमता, क्षेत्रीय-परिवर्तन।
कुछ स्थलों (जैसे लोथल, हनुमानगढ़) से 1300 ई.पू. के बाद भी हड़प्पाकालीन सांस्कृतिक तत्वों का मिश्रण मिलता है।
चरणकाल (ई.पू.)विशेषतामुख्य संस्कृति
पूर्व-हड़प्पा~3300–2600अर्ध-शहरीय, संक्रमण-कालकोटदीजी, अमरी
परिपक्व हड़प्पा~2500–1750पूर्ण विकास, नगरीकरण, व्यापार-शिखरहड़प्पा, मोहनजोदड़ो, लोथल
उत्तर-हड़प्पा~1750–1300अवनति, विखंडन, सांस्कृतिक-परिवर्तनस्थानीय प्रकार

📌 तालिका : हड़प्पा सभ्यता के तीन चरण — "परिपक्व काल" सर्वाधिक महत्वपूर्ण।

नगर-योजना एवं वास्तुकलाजाल-पद्धति • दुर्ग • आवास • जल-निकासी

परीक्षा-दृष्टि : नगर-योजना की विशेषताएँ हर परीक्षा में आती हैं — "भूमिगत नाली" (सबसे बड़ी देन) और "ग्रिड-पद्धति" रटे-रटाए प्रश्न हैं।
नगर-योजना ग्रिड (जाल) पद्धति पर आधारित थी — सड़कें एक-दूसरे को समकोण (90°) पर काटती थीं, सड़कें प्रायः सीधी, चौड़ी एवं नियमित
हड़प्पावासियों की सबसे बड़ी देन विश्व की पहली सुनियोजित भूमिगत जल-निकासी (ड्रेनेज) प्रणाली थी — नालियाँ घरों के अंदर, सड़कों के नीचे, गली-मोहल्लों में क्रमबद्ध।
भवन-निर्माण में पक्की ईंटों का प्रयोग होता था; ईंटों का मानक अनुपात 4 : 2 : 1 था (लंबाई : चौड़ाई : मोटाई)।
प्रत्येक नगर का दुर्ग (citadel) अलग टीले पर बना होता था — इसमें सरकारी भवन, अन्नागार, धार्मिक स्थल, राजकीय आवास।
विशाल स्नानागार मोहनजोदड़ो से मिला — माप 11.88 × 7.01 मी, गहराई 2.43 मी; ईंटों से निर्मित, जलरोधी बिटुमिन-लेप; सीढ़ियाँ दोनों ओर; पार्श्व में कमरे।
स्नानागार के पास के भवन को 'पुरोहितों का महल' कहा जाता है — साझी रसोई, भंडारण कक्ष, आवास।
सबसे बड़ा अन्नागार मोहनजोदड़ो से मिला; हड़प्पा से 6-6 की दो पंक्तियों में 12 कोठार (अन्नागार) मिले हैं — यह राजकीय भंडारण-व्यवस्था दर्शाता है।
आवास-भवन सामान्य ईंटों से बने, बहु-कक्षीय, आँगन-केंद्रित; खिड़कियाँ अलग-अलग दिशा में; सीढ़ियाँ दो या तीन मंजिला इमारतों की।
नालियों में कहीं-कहीं मार्जन-विहीन टॉयलेट-सीटें लगी थीं — इसका जल-प्रणाली से सीधा संबंध, आधुनिक स्वच्छता-मानदंड के अनुरूप।
लोथल में फायरिंग किल्न (ईंट-भट्ठी) के साक्ष्य मिले — मानकीकृत ईंट-उत्पादन का संगठित केंद्र।
नगरों में कोई दुर्ग-दीवार नहीं दिखाई देता — यह संभवतः सभ्यता की शांत प्रकृति (युद्ध-अमेध) का संकेत है।
★ अति महत्वपूर्ण

नगर-योजना की विशेषताएँ — एक नज़र में

  • ग्रिड-पद्धति (समकोण पर सड़कें) | भूमिगत नालियाँ (सबसे बड़ी देन)
  • पक्की ईंटें (मानक अनुपात 4:2:1) | दुर्ग (अलग टीले पर)
  • विशाल स्नानागार (मोहनजोदड़ो) | विशाल अन्नागार (मोहनजोदड़ो, हड़प्पा)
  • कोई दुर्ग-दीवार नहीं | शांतिप्रिय सभ्यता का संकेत
🧠 स्मरण-सूत्र

"ग्रिड-नाली-दुर्ग-ईंट" → हड़प्पा की नगर-योजना के चार स्तंभ — ग्रिड (जाल), नाली (जल-निकास), दुर्ग (सत्ता-केंद्र), ईंट (निर्माण-सामग्री)।

मुहरें एवं लिपिसैंधव लिपि • प्रतिकात्मक अर्थ • अपठित-रहस्य

परीक्षा-दृष्टि : मुहरों पर सर्वाधिक चित्रण, लिपि की दिशा, और "अब तक अपठित" — तीनों बिंदु निश्चित प्रश्न हैं।
मुहरें प्रमुखतः सेलखड़ी (स्टीटाइट) के बनी होती थीं, आकार प्रायः चौकोर या आयताकार; उन पर भावचित्रात्मक लिपि उत्कीर्ण होती थी।
मुहरों पर सर्वाधिक अंकन एकश्रृंगी पशु (यूनिकॉर्न/साँड़) का है — मानव-आकृतियों, देवी-देवताओं, और विभिन्न पशु-आकृतियाँ भी मिली हैं।
पशुपति (आद्य-शिव) मुहर — मोहनजोदड़ो से; योगी के चारों ओर हाथी, बाघ, गैंडा, भैंसा तथा आसन के नीचे दो हिरण अंकित हैं।
इस मुहर के योगी को 'प्रोटो-शिव' कहा जाता है — त्रिमुखी, ध्यानमग्न, योग-आसन में; हिंदू देवता से संभावित संबंध।
नृत्यरत नारी की कांस्य प्रतिमा मोहनजोदड़ो से — मधूच्छिष्ट (लॉस्ट-वैक्स) विधि से बनी; नग्न, नृत्य-मुद्रा में, भुजाओं में कंकण।
दाढ़ी वाले पुरोहित (योगी) की सेलखड़ी प्रतिमा मोहनजोदड़ो से — वस्त्र पर तिपतिया (ट्रेफॉइल) अलंकरण; संभवतः धार्मिक प्रधान।
अन्य कलाकृतियाँ — बैलों की कांस्य प्रतिमाएँ, छोटे खिलौने, टेराकोटा की पक्षी-आकृतियाँ
सैंधव लिपि भावचित्रात्मक (pictographic) है; यह बूस्ट्रोफीडन शैली में लिखी जाती थी — पहली पंक्ति दाएँ से बाएँ, दूसरी बाएँ से दाएँ; कहीं-कहीं ऊपर से नीचे।
लिपि अब तक अपठित रही है — हजारों मुहरें एवं अभिलेख मिलने के बाद भी भाषा-विज्ञानी इसका रहस्य नहीं सुलझा सके।
लिपि के आकार-भेद से संभवतः लगभग 400–600 मूल चिह्न थे — न तो बहुत कम (अक्षरात्मक) न बहुत अधिक (पूर्ण चित्रात्मक)।
कुछ विद्वानों ने द्रविड़ भाषा से, कुछ ने आर्य-भाषा से, कुछ ने प्रोटो-इंडो-यूरोपीय से संबंध जोड़ने का प्रयास किया है — सर्वसम्मति नहीं बनी।
★ अति महत्वपूर्ण

प्रमुख मुहरें एवं प्रतिमाएँ — सीधा मिलान प्रश्न

  • पशुपति मुहर — योगी, हाथी-बाघ-गैंडा-भैंसा, दो हिरण | प्रोटो-शिव का प्रतीक माना
  • नृत्यरत नारी (कांस्य) — लॉस्ट-वैक्स विधि, नग्न, नृत्य-मुद्रा
  • दाढ़ी वाला पुरोहित — सेलखड़ी प्रतिमा, तिपतिया-अलंकरण
  • एकश्रृंगी साँड़ — सर्वाधिक प्रचलित मुहर अंकन
🧠 स्मरण-सूत्र

पशुपति के पशु : "हा-बा-गैं-भैं, नीचे हिरण"हाथी, बाघ, गैंडा, भैंसा | नीचे दो हिरण।

सांस्कृतिक जीवनधर्म • अर्थव्यवस्था • समाज • दैनंदिन-जीवन

परीक्षा-दृष्टि : "मंदिर का कोई साक्ष्य नहीं", "मातृदेवी की पूजा", और "धातु का ज्ञान नहीं" — नकारात्मक कथन प्रश्नों का खजाना।
धार्मिक जीवन में मातृदेवी की उपासना प्रमुख थी — नारी-शक्ति, प्रजनन-शक्ति का प्रतीक; मिट्टी की छोटी मूर्तियाँ व्यापक रूप से मिली हैं।
पीपल वृक्ष पवित्र माना जाता था — पत्तियों और शाखाओं के चित्र मुहरों पर; संभवतः पूजा-स्थल।
कूबड़ वाला साँड़ (जेबू) पूज्य पशु था — मुहरों पर बार-बार अंकित; धार्मिक महत्व संभव।
स्वस्तिक चिह्न कई मुहरों और मृद्भांडों पर मिलता है — संभवतः कल्याण-प्रतीक; हड़प्पा सभ्यता की देन कहा जाता है।
कोई मंदिर का स्पष्ट साक्ष्य नहीं मिला है — धार्मिक अनुष्ठान घरों में या खुली जगहों पर होते थे।
हड़प्पावासी सोना, चाँदी, ताँबा, कांसा से परिचित थे, किंतु लोहे का ज्ञान नहीं था — लोहे का आविष्कार उत्तर वैदिक काल में हुआ।
मुख्य फसलें गेहूँ एवं जौ थीं; विश्व में कपास की खेती सर्वप्रथम यहीं हुई — यूनानियों ने कपास को 'सिंडन' कहा।
पशुओं में भैंस, बैल, भेड़, बकरी, सूअर, गैंडा पालतू थे; घोड़े का कोई प्रमाण नहीं (एकमात्र अस्थि-साक्ष्य सुरकोटदा से)।
व्यापार वस्तु-विनिमय पर आधारित था — धातु-मुद्रा का प्रयोग नहीं होता था।
माप-तौल की इकाइयाँ 16 के गुणकों (16, 32, 64...) में थीं; बाट प्रायः घनाकार चर्ट पत्थर के बने होते थे।
समाज संभवतः मातृसत्तात्मक था तथा शासन-सूत्र वणिक (व्यापारी) वर्ग के हाथों में थे।
शवाधान की तीन विधियाँपूर्ण समाधिकरण, आंशिक समाधिकरण एवं दाह-संस्कार
लोथल से युगल शवाधान (स्त्री-पुरुष एक साथ) के साक्ष्य मिले हैं — विवाह-संबंध का संकेत।
🧠 स्मरण-सूत्र

"मातृ-पीपल-साँड़-स्वस्तिक" → हड़प्पा धर्म के चार तत्व — मातृदेवी, पीपल वृक्ष, कूबड़ साँड़, स्वस्तिक-चिह्न।

व्यापार एवं अंतर्राष्ट्रीय-संपर्कव्यापार-मार्ग • मेसोपोटामिया • पड़ाव-नगर

परीक्षा-दृष्टि : मेलुहा, दिलमुन, मकान (मेसोपोटामिया के अभिलेखों में सिंधु क्षेत्र के नाम) — यह त्रिकोण लगभग निश्चित प्रश्न है।
लोथल को हड़प्पा सभ्यता का सबसे महत्वपूर्ण व्यापार-केंद्र माना जाता है — भोगवा नदी के तट पर; यहाँ से फारस की मुहरें एवं चावल-भूसी की मिट्टी मिली है।
विश्व का प्राचीनतम कृत्रिम गोदीबाड़ा (डॉकयार्ड) लोथल से मिला — मापित जलाशय, ताले-वाली नहरें, नाव-मरम्मत के साक्ष्य।
व्यापार के मार्ग तीन थे — स्थल मार्ग (पश्चिम की ओर), जल मार्ग (सिंधु-नदी तथा अरब-सागर), अंतः-सिंधु व्यापार
मेसोपोटामियाई अभिलेखों में सिंधु क्षेत्र को संभवतः 'मेलुहा' कहा गया है; दिलमुन (बहरीन, मध्य-पड़ाव) और मकान (ओमान) व्यापारिक पड़ाव थे।
आयात-निर्यात की वस्तुएँ — निर्यात: कपास, मनके, सील, हड्डी-उपकरण | आयात: टिन (कांसा बनाने के लिए), अरोमा-तेल, विदेशी मणि।
हड़प्पा से सीधे तिहामा तट (फारस) का संपर्क दिखाई देता है — फारसी आभूषण, मणि-शृंखलाएँ मिली हैं।
अफ़ग़ानिस्तान की लाजवर्द मणि (लापिस लाजुली) के साक्ष्य लोथल से मिले हैं।
हड़प्पा सभ्यता का भारत के अन्य भागों से व्यापार-संपर्क — गुजरात के साथ नियमित, दक्षिण भारत के साथ सीमित।
★ अति महत्वपूर्ण

मेसोपोटामिया-त्रिकोण — पूछे जाने वाले त्रिकोण

  • मेलुहा = सिंधु क्षेत्र (हड़प्पा) | दिलमुन = बहरीन (मध्य-पड़ाव) | मकान = ओमान
  • लोथल = विश्व का प्राचीनतम कृत्रिम गोदीबाड़ा
  • प्राचीन व्यापार-नेटवर्क, जलमार्ग पर आधारित

पतन-सिद्धांतप्राकृतिक-आपदा • जलवायु-परिवर्तन • आक्रमण-सिद्धांत

परीक्षा-दृष्टि : तीन मुख्य सिद्धांत (बाढ़, आर्य-आक्रमण, जलवायु-परिवर्तन) को तुलनात्मक रूप से समझना आवश्यक है।
बाढ़ का सिद्धांतसर जॉन मार्शल (1931) तथा मैके ने दिया; मोहनजोदड़ो में कई बाढ़-स्तर मिले हैं, किंतु सभी स्थलों पर बाढ़-साक्ष्य नहीं।
आर्य-आक्रमण सिद्धांतमॉर्टिमर व्हीलर द्वारा प्रस्तावित; कुछ कंकालों पर हिंसा-चिह्न, किंतु यह अधिकांश स्थलों पर नहीं देखे गए।
जलवायु-परिवर्तन / नदी-मार्ग परिवर्तनलैम्ब्रिक, अमलानंद घोष आदि का मत; सरस्वती नदी के सूखने से प्रमुख कृषि-क्षेत्र नष्ट हुआ।
आधुनिक शोध (2000 के बाद) पर्यावरणीय कारणों को प्राथमिक मानते हैं — बाढ़, सूखा, नदी-विस्थापन का संयुक्त प्रभाव।
सरस्वती नदी का क्रमिक सूखना (लगभग 1900 ई.पू. तक) — इससे कालीबंगा, बनास-घाटी क्षेत्र प्रभावित हुए।
कालीबंगा में भूकंप का प्राचीनतम पुरातात्त्विक साक्ष्य मिलने का दावा किया जाता है (लगभग 2600 ई.पू.) — दीवारें टेढ़ी-मेढ़ी, नींव-विस्थापन।
पतन अचानक नहीं, बल्कि क्रमिक-प्रक्रिया थी — 200-300 वर्षों में नगर-जीवन क्षीण हुआ।
उत्तर-हड़प्पा काल में जनसंख्या में गिरावट, नगरों का विखंडन, कृषि पर पुनः निर्भरता दिखाई देता है।
पतन के बाद की निरंतरता — कुछ स्थलों पर (जैसे लोथल, हनुमानगढ़) 1300 ई.पू. के बाद भी हड़प्पाकालीन सांस्कृतिक तत्व दिखते हैं।
🧠 स्मरण-सूत्र

"मार्शल की बाढ़, व्हीलर का आक्रमण, घोष की जलवायु" → तीनों सिद्धांत, आधुनिक मत = पर्यावरण-कारण प्राथमिक।

प्रमुख हड़प्पाई स्थलनदी • खोजकर्ता • विशेषताएँ • साक्ष्य

परीक्षा-दृष्टि : स्थल–नदी–खोजकर्ता–विशिष्ट-साक्ष्य चारों का मिलान हर परीक्षा में पूछा जाता है।
हड़प्पा (पंजाब, पाकिस्तान) — नदी: रावी | खोजकर्ता: दयाराम साहनी (1921) | साक्ष्य: 12 कोठार, R-37 कब्रिस्तान।
मोहनजोदड़ो (सिंध, पाकिस्तान) — नदी: सिंधु | खोजकर्ता: राखालदास बनर्जी (1922) | साक्ष्य: विशाल स्नानागार, पशुपति मुहर, कांस्य-नर्तकी।
कालीबंगा (हनुमानगढ़, राजस्थान) — नदी: घग्घर (सरस्वती) | खोजकर्ता: अमलानंद घोष (1953), बी.बी. लाल | साक्ष्य: जुता हुआ खेत, अग्निवेदिकाएँ, भूकंप-साक्ष्य।
लोथल (गुजरात) — नदी: भोगवा | खोजकर्ता: एस.आर. राव (1954) | साक्ष्य: गोदीबाड़ा (डॉकयार्ड), युगल-शवाधान, फारसी मुहरें, चावल-भूसी।
धौलावीरा (कच्छ, गुजरात) — नदी: मानहर-मानसर | खोजकर्ता: जे.पी. जोशी (1967, खोज), आर.एस. बिष्ट (1990s, व्यवस्थित उत्खनन) | साक्ष्य: तीन भागों में विभाजित नगर, जल-संचयन प्रणाली, 1985 म्यूजियम, 2021 यूनेस्को धरोहर।
बनावली (हरियाणा) — नदी: सरस्वती (शुष्क) | खोजकर्ता: आर.एस. बिष्ट (1974) | साक्ष्य: मिट्टी का हल-खिलौना, उत्तम गुणवत्ता का जौ।
सुरकोटदा (गुजरात) — खोजकर्ता: जगपति जोशी (1964) | साक्ष्य: घोड़े की अस्थियाँ (एकमात्र अस्थि-साक्ष्य), दुर्ग, मृद्भांड।
चन्हूदड़ो (सिंध, पाकिस्तान) — साक्ष्य: मनका-निर्माण कारखाना, सुइयों और मंजरों के उत्पादन के साक्ष्य, एकमात्र प्रमुख नगर जहाँ दुर्ग (citadel) नहीं मिला।
रोपड़ (पंजाब) — नदी: सतलज | खोजकर्ता: यज्ञदत्त शर्मा (1953) | साक्ष्य: मानव के साथ कुत्ते का शवाधान, स्वतंत्रता के बाद भारत में उत्खनित पहला हड़प्पाई स्थल।
राखीगढ़ी (हिसार, हरियाणा) — वर्तमान भारत में सबसे बड़ा हड़प्पाई स्थल; महिला कंकाल का डीएनए विश्लेषण (2019) किया गया।
आलमगीरपुर (मेरठ, उ.प्र.) — नदी: हिंडन | साक्ष्य: सभ्यता की पूर्वी सीमा का सूचक
सोथी-सिसवाल (हरियाणा) — प्राक्-हड़प्पा संस्कृति का प्रमुख स्थल।
स्थलराज्य/देशनदीखोजकर्ताविशिष्ट साक्ष्य
हड़प्पापंजाब (पा.)रावीदयाराम साहनी (1921)12 कोठार, R-37 कब्रिस्तान
मोहनजोदड़ोसिंध (पा.)सिंधुराखालदास बनर्जी (1922)विशाल स्नानागार, पशुपति मुहर, कांस्य-नर्तकी
कालीबंगाहनुमानगढ़ (राज.)घग्घरअमलानंद घोष (1953)जुता खेत, अग्निवेदिकाएँ
लोथलगुजरातभोगवाएस.आर. राव (1954)विश्व का प्राचीनतम गोदीबाड़ा
धौलावीराकच्छ (गु.)मानहर-मानसरजे.पी. जोशी / आर.एस. बिष्टत्रिस्तरीय नगर, जल-संचयन, यूनेस्को 2021
सुरकोटदागुजरातजगपति जोशी (1964)घोड़े की अस्थियाँ (एकमात्र)
चन्हूदड़ोसिंध (पा.)मनका-कारखाना, दुर्ग नहीं
रोपड़पंजाबसतलजयज्ञदत्त शर्मा (1953)मानव-कुत्ता-शवाधान
राखीगढ़ीहिसार (हरि.)भारत में सबसे बड़ा स्थल

📌 तालिका : प्रमुख हड़प्पाई स्थल — "स्थल–नदी–खोजकर्ता–साक्ष्य" सभी परीक्षाओं का प्रिय प्रश्न-प्रारूप।

★ अति महत्वपूर्ण

हड़प्पा सभ्यता — "प्रथम / सबसे बड़ा / एकमात्र" तथ्य

  • पहली खोज: हड़प्पा (दयाराम साहनी, 1921) | सबसे बड़ा स्थल (भारत): राखीगढ़ी
  • गोदीबाड़ा: लोथल (विश्व का प्राचीनतम कृत्रिम) | जुता खेत: कालीबंगा (एकमात्र साक्ष्य)
  • घोड़ा: सुरकोटदा (एकमात्र अस्थि-साक्ष्य) | मनका-कारखाना: चन्हूदड़ो (विशेषीकृत)
  • कोई दुर्ग नहीं: चन्हूदड़ो (एकमात्र प्रमुख नगर)

⚡ एक नज़र में — अध्याय 2 के 15 अमोघ तथ्य

  • खोज-त्रयी: हड़प्पा (दयाराम, 1921)मोहनजोदड़ो (राखालदास, 1922)मार्शल (घोषणा, 1924)
  • काल: परिपक्व (2500–1750 ई.पू.) सर्वाधिक महत्वपूर्ण
  • नगर-योजना: ग्रिड-पद्धतिभूमिगत नालियाँ (सबसे बड़ी देन) • पक्की ईंटें (4:2:1)दुर्ग (अलग टीले पर)
  • पाषणी: सेलखड़ी, भावचित्रात्मक लिपि, अब तक अपठित
  • मुहरें: एकश्रृंगी साँड় (सर्वाधिक) • पशुपति मुहर (हाथी-बाघ-गैंडा-भैंसा-हिरण)
  • प्रतिमाएँ: नृत्यरत नारी (कांस्य, लॉस्ट-वैक्स) • दाढ़ी वाला पुरोहित (सेलखड़ी)
  • धर्म: मातृदेवी-पूजापीपल-पवित्रसाँड़-पूज्यस्वस्तिक-चिह्न • कोई मंदिर नहीं
  • अर्थव्यवस्था: वस्तु-विनिमयकोई मुद्रा नहीं16 के गुणक (माप-तौल)
  • अनाज: गेहूँ, जौकपास (विश्व में पहली बार)
  • पशु: भैंस, बैल, भेड़, बकरी, गैंडा • घोड़ा सुरकोटदा में (एकमात्र) • लोहा नहीं
  • व्यापार: लोथल गोदीबाड़ामेलुहा–दिलमुन–मकान (मेसोपोटामिया त्रिकोण)
  • पतन-सिद्धांत: मार्शल (बाढ़)व्हीलर (आक्रमण)घोष (जलवायु–सरस्वती सूखा) — आधुनिक मत = पर्यावरण प्राथमिक
  • प्रमुख स्थल: हड़प्पा, मोहनजोदड़ो (परिपक्व काल के प्रतीक) • कालीबंगा (जुता खेत) • धौलावीरा (2021 यूनेस्को)
  • भारत के भीतर: राखीगढ़ी (सबसे बड़ा)लोथल (गोदीबाड़ा) • कालीबंगा (सर्वप्राचीन साक्ष्य)
  • सभ्यता का विस्तार: 12,99,600 वर्ग किमी (मिस्र-मेसोपोटामिया से बड़ा)

भारत का इतिहास : महत्वपूर्ण परीक्षोपयोगी तथ्य • अध्याय 2 — सिंधु घाटी (हड़प्पा) सभ्यता • UPSC | State PSC | UGC NET | SSC

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