गुप्त साम्राज्य | The Gupta Empire
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गुप्त साम्राज्य The Gupta Empire

मौर्योत्तर विखंडन के बाद उत्तर भारत में लौटी एक बड़ी सत्ता — पर मौर्यों जैसी केन्द्रीकृत नहीं। इसी काल में कालिदास ने लिखा, आर्यभट ने गणना की, मेहरौली का लौह स्तंभ गढ़ा गया, और भारत के सर्वाधिक कलात्मक स्वर्ण सिक्के ढले। इसे "स्वर्ण युग" कहा जाता है — और इस अध्याय में हम देखेंगे कि यह नाम कहाँ तक ठीक है।

319–20 ई.गुप्त संवत् का आरंभ — चन्द्रगुप्त प्रथम
लगभग 335–375 ई.समुद्रगुप्त — प्रयाग प्रशस्ति
499 ई.आर्यभटीय की रचना
लगभग 510 ई.एरण अभिलेख — हूण संघर्ष एवं सती का प्रथम साक्ष्य

01स्रोत एवं साम्राज्य का उत्थान Sources and the Rise

गुप्त इतिहास मौर्य इतिहास से अधिक विश्वसनीय आधार पर खड़ा है — क्योंकि यहाँ अभिलेख, सिक्के, साहित्य एवं विदेशी विवरण चारों उपलब्ध हैं, और प्रायः एक-दूसरे की पुष्टि करते हैं।

स्रोतप्रकारक्या बताता है
प्रयाग (इलाहाबाद) प्रशस्तिअभिलेख · हरिषेणसमुद्रगुप्त की विजयें; अशोक के ही स्तंभ पर उत्कीर्ण — दो युगों का दुर्लभ संयोग।
जूनागढ़ अभिलेख (स्कंदगुप्त)अभिलेखसुदर्शन झील की पुनः मरम्मत; प्रांतीय प्रशासन की सूचना।
भितरी एवं एरण अभिलेखअभिलेखस्कंदगुप्त का हूण-संघर्ष; एरण (लगभग 510 ई.) से सती का प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य।
मेहरौली लौह स्तंभअभिलेख"चन्द्र" नामक शासक की प्रशंसा — प्रायः चन्द्रगुप्त द्वितीय से समीकृत; धातु-विज्ञान का चमत्कार।
मंदसौर एवं दामोदरपुर अभिलेखअभिलेखरेशम-बुनकर श्रेणी का सूर्य-मंदिर; बंगाल में नगर-परिषद की संरचना।
फ़ाह्यान का यात्रा-विवरणविदेशी · "फ़ो-कुओ-की"चन्द्रगुप्त द्वितीय के काल में भारत-यात्रा; समाज, दंड-व्यवस्था एवं चांडालों की स्थिति।
स्वर्ण सिक्केमुद्राउपाधियाँ, यज्ञ, वाद्य-वादन, आयुध — राजकीय आत्म-छवि का सर्वोत्तम साक्ष्य।
देवीचन्द्रगुप्तम् (विशाखदत्त) एवं पुराणसाहित्यरामगुप्त-प्रसंग; पुराणों से वंशावली एवं क्षेत्र-सूचना।

तालिका दाएँ-बाएँ स्क्रॉल की जा सकती है।

आरंभिक शासक The Early Rulers

वंश का संस्थापक श्रीगुप्त था, जिसकी उपाधि केवल "महाराज" थी — अर्थात् एक सामंत-स्तरीय शासक। उसका उत्तराधिकारी घटोत्कच हुआ। वास्तविक संस्थापक चन्द्रगुप्त प्रथम (लगभग 319–335 ई.) माना जाता है, जिसने पहली बार "महाराजाधिराज" की उपाधि ली और जिसके राज्यारोहण से गुप्त संवत् (319–20 ई.) का आरंभ होता है।

उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि सैन्य नहीं, वैवाहिक थी — लिच्छवि राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह, जिससे वैशाली-क्षेत्र की प्रतिष्ठा एवं समर्थन मिला। इसी गौरव के कारण समुद्रगुप्त स्वयं को "लिच्छवि-दौहित्र" (लिच्छवियों का दौहित्र) कहता है, और इसी काल के राजा-रानी प्रकार के सिक्के मिलते हैं।

02समुद्रगुप्त एवं प्रयाग प्रशस्ति Samudragupta and the Prayag Prashasti

समुद्रगुप्त (लगभग 335–375 ई.) गुप्त साम्राज्य का निर्माता है। उसकी विजयों का पूरा विवरण उसके दरबारी कवि हरिषेण की रचना प्रयाग प्रशस्ति में मिलता है — संस्कृत में, चम्पू शैली (गद्य + पद्य) में, और आश्चर्यजनक रूप से अशोक के ही स्तंभ पर उत्कीर्ण।

प्रयाग प्रशस्ति · पाँच भिन्न नीतियाँ
  • आर्यावर्त (उत्तर भारत) — नौ राजा: नीति "प्रसभोद्धरण" — पूर्ण उन्मूलन एवं राज्य का विलय।
  • दक्षिणापथ — बारह राजा: नीति "ग्रहण-मोक्षानुग्रह" — पकड़ना, फिर छोड़कर अनुग्रह करना; राज्य वापस, अधीनता स्वीकार। कोसल के महेन्द्र से कांची के विष्णुगोप तक।
  • आटविक (वन) राज्य — "परिचारीकृत", अर्थात् सेवक बनाए गए।
  • सीमावर्ती राज्य एवं गणराज्य — कर, आज्ञापालन एवं प्रणाम द्वारा अधीनता (मालव, यौधेय, आर्जुनायन आदि)।
  • विदेशी शक्तियाँ — दैवपुत्र-षाहि-षाहानुषाहि (कुषाण), शक-मुरुण्ड, तथा सिंहल (श्रीलंका) के मेघवर्ण द्वारा मैत्री-सम्बन्ध।

परीक्षा-सूत्र: उत्तर में विलय, दक्षिण में अधीनता — यह भेद सर्वाधिक पूछा जाता है। इसका कारण व्यावहारिक था: दक्षिण के दूरस्थ राज्यों को सीधे शासित करना असंभव था, अतः प्रतिष्ठा एवं कर पर्याप्त माने गए।

उपाधियाँ एवं व्यक्तित्व

  • अश्वमेध-पराक्रम — अश्वमेध यज्ञ का सम्पादन; इस प्रकार के सिक्के भी।
  • कविराज — स्वयं कवि; प्रशस्ति में उसकी विद्वत्ता का उल्लेख।
  • "धरणिबंध" एवं "अप्रतिरथ" जैसी उपाधियाँ।
  • इतिहासकार वी.ए. स्मिथ ने उसे "भारतीय नेपोलियन" कहा — यह तुलना विवादित है, पर परीक्षा में पूछी जाती है।

सिक्कों के प्रकार

  • वीणावादन प्रकार — राजा वीणा बजाते हुए; संगीत-प्रेम का अनूठा प्रमाण।
  • अश्वमेध प्रकार — यज्ञ-स्तंभ से बँधा घोड़ा।
  • धनुर्धर, परशु एवं व्याघ्र-हनन प्रकार।
  • ये सिक्के केवल अर्थ नहीं, राजकीय प्रचार का माध्यम थे।

समुद्रगुप्त एवं चन्द्रगुप्त द्वितीय के बीच रामगुप्त नामक शासक का प्रश्न आता है — जिसका उल्लेख विशाखदत्त के नाटक देवीचन्द्रगुप्तम् में है और जिसके ताँबे के सिक्के एरण-विदिशा क्षेत्र से मिले हैं। कथा के अनुसार उसने शक-आक्रमण के समय अपनी रानी ध्रुवदेवी को समर्पित करना स्वीकार कर लिया था, जिसे चन्द्रगुप्त द्वितीय ने रोका। इसकी ऐतिहासिकता पर विद्वानों में मतभेद है।

03चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य Chandragupta II, c. 375–415 CE

यदि समुद्रगुप्त साम्राज्य का निर्माता है, तो चन्द्रगुप्त द्वितीय उसका चरमोत्कर्ष। उसके काल में गुप्त सत्ता पहली बार अरब सागर तक पहुँची और सांस्कृतिक जीवन अपने शिखर पर आया।

सैन्य एवं राजनयिक उपलब्धियाँ

  • शक विजय — पश्चिमी क्षत्रपों का उन्मूलन; उपाधि "शकारि" एवं विक्रमादित्य। परिणाम — मालवा, गुजरात, काठियावाड़ और पश्चिमी बंदरगाहों पर नियंत्रण।
  • उज्जयिनी द्वितीय राजधानी बनी — व्यापार एवं संस्कृति का केन्द्र।
  • वैवाहिक कूटनीति — नाग राजकुमारी कुबेरनागा से विवाह; पुत्री प्रभावतीगुप्ता का विवाह वाकाटक शासक रुद्रसेन द्वितीय से।
  • रुद्रसेन की मृत्यु के बाद प्रभावतीगुप्ता ने वाकाटक राज्य में संरक्षिका के रूप में शासन किया — गुप्त प्रभाव दक्कन तक।

सांस्कृतिक शिखर

  • परंपरा के अनुसार दरबार में नवरत्न — जिनमें कालिदास सर्वप्रमुख (यह परंपरा परवर्ती है, समकालीन अभिलेखीय प्रमाण नहीं)।
  • चीनी यात्री फ़ाह्यान इसी काल में भारत आया (लगभग 399–414 ई.)।
  • मेहरौली लौह स्तंभ — "चन्द्र" की प्रशंसा; लगभग सोलह शताब्दियों से जंग-रहित।
  • सर्वप्रथम रजत सिक्के जारी किए — शक-परंपरा को आत्मसात करते हुए, पश्चिमी क्षेत्रों की आवश्यकता के अनुरूप।
फ़ाह्यान · क्या देखा, क्या नहीं
  • देखा — समृद्ध पाटलिपुत्र एवं मथुरा, धर्मशालाएँ, दान-आधारित चिकित्सालय, मृत्युदंड का अभाव, अपराध पर प्रायः अर्थदंड; लोग समृद्ध एवं यात्रा सुरक्षित।
  • यह भी देखाचांडालों को नगर के बाहर रहना पड़ता था और प्रवेश करते समय ध्वनि करके सूचना देनी पड़ती थी — अस्पृश्यता का स्पष्ट साक्ष्य।
  • नहीं देखा / उल्लेख नहीं किया — शासक का नाम! फ़ाह्यान बौद्ध तीर्थों में रुचि रखता था, राजनीति में नहीं — इसीलिए उसका विवरण राजनीतिक इतिहास के लिए सीमित उपयोग का है।

04कुमारगुप्त एवं स्कंदगुप्त Kumaragupta and Skandagupta

शासककाल (लगभग)प्रमुख तथ्य
कुमारगुप्त प्रथम415–455 ई.उपाधि महेन्द्रादित्य; दीर्घ एवं प्रायः शांत शासन। परंपरा उसे नालंदा महाविहार की स्थापना से जोड़ती है। कार्तिकेय-मयूर प्रकार के सिक्के। अंतिम वर्षों में पुष्यमित्रों का संकट।
स्कंदगुप्त455–467 ई.अंतिम महान गुप्त शासक; हूणों को पराजित किया — भितरी स्तंभ अभिलेख में "पृथ्वी काँप उठी" जैसा वर्णन। जूनागढ़ अभिलेख — सुदर्शन झील की मरम्मत (पर्णदत्त एवं चक्रपालित द्वारा)। उपाधि विक्रमादित्य।
पुरगुप्त, बुद्धगुप्त, नरसिंहगुप्त आदि467 ई. के बाददुर्बल उत्तराधिकारी; उत्तराधिकार-संघर्ष एवं क्रमिक क्षेत्र-हानि।
विष्णुगुप्तछठी सदी ई. आरंभवंश के अंतिम ज्ञात शासकों में; इस समय तक साम्राज्य लगभग मगध तक सीमित।

स्कंदगुप्त की हूण-विजय का ऐतिहासिक महत्त्व यह है कि उसने आक्रमण को टाल दिया, समाप्त नहीं किया — और यही युद्ध साम्राज्य के कोष को खोखला कर गया। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण उसके सिक्कों में है, जिनमें स्वर्ण की मात्रा घटी और वज़न में परिवर्तन दिखता है।

05साम्राज्य का पतन The Decline

बाह्य कारण
  • हूण आक्रमण — तोरमाण एवं उसका पुत्र मिहिरकुल (मालवा-ग्वालियर तक); ग्वालियर अभिलेख से सूचना।
  • मिहिरकुल को यशोधर्मन (मंदसौर अभिलेख) एवं नरसिंहगुप्त बालादित्य से पराजय — पर गुप्त प्रतिष्ठा तब तक टूट चुकी थी।
  • निरंतर युद्धों से कोष का क्षय
  • पश्चिम एशिया की अस्थिरता से रोम-व्यापार का ह्रास — स्वर्ण की आपूर्ति घटी।
आंतरिक कारण
  • दुर्बल उत्तराधिकारी एवं बार-बार उत्तराधिकार-संघर्ष
  • भूमि-अनुदानों का विस्तार — कर एवं प्रशासनिक अधिकार तक हस्तांतरित होने से केन्द्र कमज़ोर; सामंतीकरण की प्रक्रिया।
  • प्रांतीय शासकों एवं सामंतों का स्वतंत्र होना — वाकाटक, वल्लभी (मैत्रक), बंगाल के गौड़
  • स्थायी विशाल सेना का अभाव; सामंतों की सैन्य-टुकड़ियों पर निर्भरता।
  • परिणाम — छठी सदी के मध्य तक साम्राज्य अनेक क्षेत्रीय राज्यों में बिखर गया।

06प्रशासनिक व्यवस्था Administration

गुप्त प्रशासन की कुंजी एक शब्द है — विकेन्द्रीकरण। मौर्य राज्य गाँव तक अपने अधिकारी भेजता था; गुप्त राज्य स्थानीय शक्तियों, श्रेणियों एवं भू-स्वामियों के माध्यम से शासन करता था। इसीलिए इसे प्रायः "अधिक उदार पर कम गहरा" शासन कहा जाता है।

केन्द्रीय अधिकारी

  • राजा की उपाधियाँ — महाराजाधिराज, परमभट्टारक, परमेश्वर, चक्रवर्तिन्; दैवी गुणों का आरोपण।
  • कुमारामात्य — सर्वोच्च श्रेणी के अधिकारी; प्रांतीय पदों पर भी नियुक्त।
  • सन्धिविग्रहिक — युद्ध एवं शांति (विदेश) मंत्री।
  • महाबलाधिकृत (सेना), महादण्डनायक (न्याय), महाप्रतिहार (राजप्रासाद), विनयस्थितिस्थापक (धार्मिक-नैतिक व्यवस्था)।
  • पद प्रायः वंशानुगत होते गए — यह भी विकेन्द्रीकरण का लक्षण।

प्रांतीय एवं स्थानीय इकाइयाँ

  • भुक्ति (प्रांत) → अधिकारी उपरिक
  • विषय (ज़िला) → विषयपति; कार्यालय "अधिकरण"।
  • वीथी एवं ग्राम — ग्रामिक तथा ग्राम-सभा (पंचमंडली/ग्रामवृद्ध)।
  • नगर-परिषद (दामोदरपुर ताम्रपत्रों से) — नगरश्रेष्ठी (प्रमुख व्यापारी), सार्थवाह (कारवाँ-नेता), प्रथम कुलिक (शिल्पी-प्रमुख), प्रथम कायस्थ (लेखक-प्रमुख)।
  • यही परिषद-संरचना बताती है कि नगर-शासन में व्यापारी एवं शिल्पी वर्ग की औपचारिक भागीदारी थी।

07अर्थव्यवस्था, भूमि एवं मुद्रा Economy, Land and Coinage

क · भूमि एवं कर Land and Taxation

शब्दअर्थमहत्त्व
क्षेत्र · खिल · अप्रहत · वास्तिकृषि-भूमि · परती · वन-भूमि · आवास-भूमिभूमि-वर्गीकरण की विकसित शब्दावली — अभिलेखों से ज्ञात।
भागउपज का राजकीय अंशप्रायः छठा भाग; मुख्य कर।
भोग · हिरण्य · उपरिकरउपहार · नकद कर · अतिरिक्त करकर-व्यवस्था का विस्तार।
विष्टिबेगार (अनिवार्य श्रम)"स्वर्ण युग" की आलोचना का एक प्रमुख आधार।
अग्रहारब्राह्मणों को कर-मुक्त भूमि-अनुदानप्रायः स्थायी एवं वंशानुगत; इसी से सामंती प्रवृत्ति बढ़ी।
देवाग्रहारमंदिर-देवालय को अनुदानमंदिर आर्थिक इकाई बनने लगे।

निर्णायक परिवर्तन: सातवाहनों ने भूमि-अनुदान आरंभ किया था, पर गुप्त काल में इनके साथ प्रशासनिक एवं न्यायिक अधिकार भी हस्तांतरित होने लगे। इतिहासकार आर.एस. शर्मा ने इसे भारतीय सामंतवाद के उदय का प्रारंभ-बिंदु माना है।

ख · मुद्रा एवं व्यापार Coinage and Trade

सिक्के

  • स्वर्ण मुद्रा — "दीनार"; भारतीय इतिहास की सर्वाधिक कलात्मक स्वर्ण मुद्राएँ। परंपरा कुषाणों से ली गई।
  • रजत सिक्के — चन्द्रगुप्त द्वितीय से, शक-विजय के बाद पश्चिमी क्षेत्रों हेतु।
  • ताम्र सिक्के अल्प — इसका अर्थ यह निकाला जाता है कि दैनिक-स्तरीय मुद्रा-प्रचलन सीमित था।
  • परवर्ती गुप्त स्वर्ण सिक्कों में स्वर्ण-मात्रा घटती गई — आर्थिक दबाव का प्रत्यक्ष प्रमाण।

शिल्प एवं व्यापार

  • श्रेणियाँ प्रभावी; मंदसौर अभिलेख — रेशम-बुनकर श्रेणी द्वारा सूर्य-मंदिर का निर्माण एवं मरम्मत।
  • श्रेणियाँ बैंक-कार्य भी करती थीं — स्थायी निक्षेप एवं ब्याज से मंदिर-दीप जलाने की व्यवस्था।
  • वस्त्र, हाथीदाँत, धातु-कर्म, मोती एवं नील प्रमुख उत्पाद।
  • धातु-विज्ञान का शिखर — मेहरौली लौह स्तंभ एवं सुल्तानगंज की विशाल कांस्य बुद्ध-प्रतिमा।
  • रोम-व्यापार क्षीण; पूर्व में दक्षिण-पूर्व एशिया से सम्पर्क बढ़ा — ताम्रलिप्ति प्रमुख बंदरगाह।

08सामाजिक स्थिति Society

गुप्त काल की सामाजिक तस्वीर दोहरी है — उच्च वर्गों के लिए यह वास्तव में समृद्धि एवं संस्कार का युग था; निचले वर्गों एवं स्त्रियों के लिए बंधन कसने का।

व्यवस्था एवं सुविधा
  • वर्ण-व्यवस्था स्थिर; ब्राह्मणों को भूमि-अनुदान से आर्थिक शक्ति।
  • श्रेणियों के कारण शिल्पी एवं व्यापारी वर्ग की नगर-शासन में भागीदारी।
  • फ़ाह्यान के अनुसार — धर्मशालाएँ, दान-आधारित चिकित्सालय, सुरक्षित मार्ग, कठोर दंड का अभाव।
  • विदेशी समूहों का समाज में समावेश जारी।
  • शिक्षा-केन्द्र — नालंदा, वल्लभी, तक्षशिला-परंपरा।
कठोरता एवं गिरावट
  • अस्पृश्यता का स्पष्ट रूप — फ़ाह्यान: चांडाल नगर के बाहर, प्रवेश पर ध्वनि-संकेत अनिवार्य।
  • सती का प्रथम अभिलेखीय साक्ष्यएरण अभिलेख, लगभग 510 ई. (भानुगुप्त के काल में गोपराज की पत्नी)।
  • स्त्रियों की विवाह-आयु घटी; सम्पत्ति-अधिकार सीमित (स्त्रीधन तक); पुनर्विवाह पर निषेध कड़े।
  • देवदासी प्रथा के संकेत मंदिर-संस्कृति के साथ।
  • विष्टि (बेगार) एवं दास-प्रथा की उपस्थिति।
  • अपवाद भी स्मरण रखें — प्रभावतीगुप्ता का वाकाटक-शासन दिखाता है कि उच्च कुलों की स्त्रियाँ सत्ता में आ सकती थीं।

09धार्मिक विकास Religious Developments

भागवत/वैष्णव धर्म का उत्कर्ष

  • गुप्त शासक स्वयं "परमभागवत"; राजचिह्न गरुड़
  • अवतारवाद का व्यवस्थित रूप; वराह, नृसिंह एवं विष्णु-प्रतिमाओं का प्रचुर निर्माण।
  • उदयगिरि (विदिशा) एवं एरण के वराह पैनल इसी विचार की कला-अभिव्यक्ति।
  • पुराणों का वर्तमान रूप में संकलन; भक्ति एवं मंदिर-पूजा मुख्यधारा में।

अन्य धाराएँ

  • शैव धर्म — शिवलिंग-पूजा एवं एकमुखी लिंग; कुमारगुप्त के सिक्कों पर कार्तिकेय।
  • बौद्ध धर्म — राजकीय संरक्षण घटा, पर संस्थागत रूप से सशक्त: नालंदा, अजंता की चित्रकला, सारनाथ-मथुरा की बुद्ध-प्रतिमाएँ। वसुबन्धु, असंग एवं दिङ्नाग जैसे दार्शनिक।
  • जैन धर्म — मथुरा एवं उदयगिरि में सक्रिय; वल्लभी संगीति (देवर्धिगणि) में आगमों का लेखन।
  • सूर्य-पूजा — मंदसौर का सूर्य-मंदिर; परवर्ती काल में मुल्तान-मोढेरा परंपरा।

धार्मिक दृष्टि से गुप्त काल का सार यह है — यह वैदिक कर्मकांड की वापसी नहीं, पौराणिक-भक्ति हिंदू धर्म का जन्म है: मूर्ति, मंदिर, अवतार एवं व्यक्तिगत भक्ति। यज्ञ (अश्वमेध) प्रतीकात्मक रह गया।

10साहित्य एवं विज्ञान Literature and Science

विद्वानकृतियोगदान
कालिदासअभिज्ञानशाकुन्तलम्, मेघदूत, रघुवंश, कुमारसम्भवसंस्कृत काव्य-नाटक का शिखर; विलियम जोन्स के अनुवाद से यूरोप तक प्रसिद्धि।
अमरसिंहअमरकोशसंस्कृत का प्रसिद्धतम कोश; तत्कालीन सामाजिक श्रेणियों की सूचना।
वात्स्यायनकामसूत्रनागरिक जीवन एवं शहरी संस्कृति का स्रोत।
विष्णु शर्मापंचतंत्रविश्व की सर्वाधिक अनूदित कथा-कृतियों में।
शूद्रक · विशाखदत्तमृच्छकटिकम् · मुद्राराक्षसनगर-जीवन का यथार्थ; नन्द-मौर्य संक्रमण का नाट्य-रूप।
आर्यभटआर्यभटीय (499 ई.)पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूमना; ग्रहण का वैज्ञानिक कारण; π का सन्निकट मान; स्थानीय-मान पद्धति।
वराहमिहिरपंचसिद्धांतिका, बृहत्संहिता, बृहज्जातकखगोल एवं ज्योतिष; बृहत्संहिता तत्कालीन ज्ञान का विश्वकोश।
धन्वंतरिआयुर्वेद परंपरानवरत्न-परंपरा में उल्लिखित चिकित्सक।
पालकाप्य · हस्तिकलाहस्त्यायुर्वेदपशु-चिकित्सा का ग्रंथ।
देवर्धिगणि क्षमाश्रमणजैन आगमों का लेखनवल्लभी में आगमों का अंतिम लिखित संकलन।

सावधानी: ब्रह्मगुप्त (ब्रह्मस्फुटसिद्धांत, शून्य के नियम) एवं भास्कराचार्य द्वितीय गुप्तकाल के बाद के हैं — विकल्पों में ये गुप्त विद्वानों के साथ मिलाकर पूछे जाते हैं।

11कला, स्थापत्य एवं "स्वर्ण युग" की बहस Art, Architecture and the Golden Age Debate

क · मंदिर-स्थापत्य का जन्म Birth of Temple Architecture

गुप्त काल की सबसे स्थायी देन यही है — भारत में संरचनात्मक (structural) मंदिर का आरंभ। इससे पूर्व पूजा-स्थल प्रायः शैलकृत गुफाएँ या स्तूप थे। गुप्त मंदिर सादा वर्गाकार गर्भगृह, स्तंभ-युक्त मंडप एवं प्रारंभिक शिखर से बने — और यही नागर शैली का बीज बना।

स्मारकस्थानविशेषता
दशावतार मंदिरदेवगढ़ (उत्तर प्रदेश)गुप्त मंदिर-कला का सर्वोत्तम उदाहरण; पंचायतन योजना एवं शिखर; शेषशायी विष्णु का पैनल।
भीतरगाँव मंदिरकानपुर के निकटईंटों से निर्मित प्राचीनतम मंदिरों में; शिखर-युक्त।
तिगवा, नचना-कुठारा, भूमरा, साँची मंदिर-17मध्य भारतसपाट छत वाले सरल आरंभिक मंदिर — विकास-क्रम के प्रारंभिक चरण।
सारनाथ एवं मथुरा की बुद्ध-प्रतिमाएँसारनाथ, मथुरागुप्त शैली की परिपक्वता — अर्धनिमीलित नेत्र, प्रशांत मुखमुद्रा, पारदर्शी वस्त्र-अंकन।
अजंता की चित्रकलामहाराष्ट्र (वाकाटक संरक्षण)गुफा 16 एवं 17 की भित्ति-चित्रकला; "फ़्रेस्को-सेक्को" तकनीक; बाघ गुफाएँ भी।
उदयगिरि वराह पैनल एवं एरणविदिशा क्षेत्रअवतारवाद की भव्य शिला-अभिव्यक्ति।
मेहरौली लौह स्तंभ एवं सुल्तानगंज बुद्धदिल्ली · बिहारधातु-विज्ञान का चरम — जंग-प्रतिरोधी लोहा तथा विशाल कांस्य ढलाई।

ख · "स्वर्ण युग" — कितना सही, कितना अतिरंजित The Golden Age Debate

पक्ष में तर्क
  • साहित्य — कालिदास; विज्ञान — आर्यभट, वराहमिहिर।
  • कला — मंदिर-स्थापत्य का जन्म, सारनाथ बुद्ध, अजंता।
  • सर्वाधिक कलात्मक स्वर्ण मुद्राएँ; धातु-विज्ञान का चमत्कार।
  • दीर्घ सापेक्ष शांति; फ़ाह्यान का समृद्धि-विवरण।
  • संस्कृत का पुनरुत्थान एवं अभिलेखीय भाषा बनना।
विपक्ष में तर्क
  • यह उत्कर्ष मुख्यतः उच्च वर्गों एवं दरबारी संस्कृति तक सीमित।
  • अस्पृश्यता का सुदृढ़ रूप (फ़ाह्यान) एवं विष्टि (बेगार)।
  • स्त्रियों की स्थिति में गिरावट; सती का प्रथम साक्ष्य इसी काल का।
  • भूमि-अनुदानों से सामंतीकरण एवं किसान की अधीनता बढ़ी।
  • भौगोलिक असंतुलन — दक्षिण भारत इस "स्वर्ण युग" के बाहर था।
  • व्यापार एवं ताम्र-मुद्रा का ह्रास — आर्थिक चित्र एकरूप समृद्ध नहीं।
परीक्षा-दृष्टि · संतुलित निष्कर्ष
  • सर्वाधिक स्वीकार्य निष्कर्ष — गुप्त काल सांस्कृतिक एवं बौद्धिक दृष्टि से स्वर्ण युग था, किन्तु सामाजिक समता एवं व्यापक जन-कल्याण की दृष्टि से नहीं
  • मौर्य-गुप्त भेद एक पंक्ति में — मौर्य = केन्द्रीकृत, नौकरशाही-आधारित; गुप्त = विकेन्द्रीकृत, सामंत-आधारित
  • इस काल की देनें आगे तक गईं — नागर मंदिर-शैली, पौराणिक भक्ति-धर्म, दशमलव-स्थानीय मान पद्धति एवं संस्कृत-प्रधान अभिलेख-परंपरा।

12स्वयं जाँच Self Test — 15 Questions

प्रत्येक प्रश्न का एक ही प्रयास मिलेगा। अंक 0 / 15
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