जैन व बौद्ध धर्म Jainism & Buddhism
छठी शताब्दी ई.पू. — वह युग जब गंगा घाटी के नगरों में नई विचारधाराएँ फूट पड़ीं। न तो वैदिक यज्ञों का रक्त, न ब्राह्मणों का एकाधिकार — बल्कि तप, त्याग, अहिंसा और ज्ञान का आवाहन। इस अध्याय में हम जैन और बौद्ध धर्म — दोनों की उत्पत्ति, सिद्धान्त, संघ, संगीतियाँ और तुलना — को एक साथ देखेंगे।
इस पृष्ठ में
- 01ऐतिहासिक पृष्ठभूमि — छठी शताब्दी का भारत
- 02श्रमण आन्दोलन के उदय के कारण
- 03जैन धर्म — महावीर : जीवन एवं त्रिरत्न
- 04जैन धर्म — सिद्धान्त, आगम, दिगम्बर-श्वेताम्बर
- 05बौद्ध धर्म — गौतम बुद्ध : जीवन-यात्रा
- 06बुद्ध के मूल सिद्धान्त — चार आर्यसत्य, अष्टांगिक मार्ग
- 07संघ, त्रिपिटक एवं धर्म-प्रसार
- 08बौद्ध संगीतियाँ — कालक्रम एवं परिणाम
- 09बौद्ध सम्प्रदाय — हीनयान, महायान, वज्रयान
- 10जैन एवं बौद्ध — तुलनात्मक अध्ययन
- 11पतन के कारण एवं ऐतिहासिक योगदान
- 12स्वयं जाँच
01ऐतिहासिक पृष्ठभूमि — छठी शताब्दी का भारत The Sixth Century BCE: Crucible of Ideas
वैदिक काल के बाद भारत द्वितीय नगरीकरण के दौर में प्रवेश कर चुका था। गंगा घाटी में 16 महाजनपद उभरे, नगर फूले-फले, व्यापार बढ़ा — और समाज में नई अस्मिताएँ जन्मीं। यहीं से श्रमण परंपरा का उदय होता है, जिसमें जैन एवं बौद्ध धर्म दो सबसे शक्तिशाली धाराएँ बनीं।
महाजनपद · राजनीतिक परिवेश
- 16 महाजनपद — अंग, मगध, काशी, कोसल, वज्जि, मल्ल, चेदि, वत्स, कुरु, पांचाल, मत्स्य, शूरसेन, अश्मक, अवन्ति, गान्धार, कम्बोज।
- प्रमुख शक्तियाँ — मगध, कोसल, वत्स, अवन्ति; ये ही आगे चलकर साम्राज्य-निर्माण की दिशा में बढ़ीं।
- राज्य-व्यवस्था — कुछ गणतांत्रिक (वज्जि, मल्ल), कुछ राजतांत्रिक (मगध, कोसल)।
- नगरीय केन्द्र — राजगृह, वैशाली, श्रावस्ती, कौशाम्बी, वाराणसी।
आर्थिक एवं सामाजिक परिवर्तन
- कृषि-अधिशेष एवं लोहा — नगरों की रीढ़; व्यापार-मार्ग सक्रिय।
- वैश्य वर्ग की आर्थिक शक्ति में वृद्धि — पर सामाजिक-धार्मिक प्रतिष्ठा में पिछड़ा।
- ब्राह्मण-क्षत्रिय की परंपरागत श्रेष्ठता से असंतोष — नई वैचारिक हवा।
- वैदिक यज्ञ-कांड महँगे, जटिल, एवं ब्राह्मण-केन्द्रित — आमजन से दूर।
- श्रमण = तपस्वी, साधक, जो गृह-त्याग कर ज्ञान-साधना में लगा। वैदिक परंपरा के विपरीत, श्रमणों ने यज्ञ-पुरोहितवाद को अस्वीकार किया।
- श्रमण परंपरा की मुख्य विशेषताएँ — अहिंसा, संसार-त्याग, कर्म-सिद्धान्त, पुनर्जन्म, मोक्ष पर बल।
- जैन एवं बौद्ध धर्म — श्रमण परंपरा की दो प्रमुख धाराएँ; साथ ही आजीविक, संजय, अजित केशकम्बली जैसे नास्तिक/भौतिकवादी मत भी थे।
- इन्हीं श्रमण-विचारधाराओं ने बाद में हिन्दू धर्म के भीतर भी प्रतिक्रिया (उपनिषद) और पुनरुत्थान (भक्ति आंदोलन) को जन्म दिया।
02श्रमण आन्दोलन के उदय के कारण Causes of the Shramana Movement
जैन और बौद्ध धर्म अचानक नहीं पैदा हुए — वे गहरे सामाजिक, आर्थिक एवं वैचारिक बदलाव की संतान थे। इस अनुभाग में हम उन कारणों को सूचीबद्ध करेंगे जिन्होंने नए धर्मों को जन्म दिया — यह UPSC/स्टेट PSC का अत्यंत प्रिय विषय है।
सामाजिक कारण
- ब्राह्मणों का अत्यधिक प्रभुत्व और यज्ञों की जटिलता।
- वर्ण-व्यवस्था की कठोरता — शूद्र एवं वैश्य वर्ग में असंतोष।
- स्त्रियों की स्थिति में गिरावट — नए आन्दोलनों ने महिलाओं को अपनी शरण दी।
- गणतांत्रिक राज्यों में सामान्य नागरिकों की बढ़ती आवाज़।
आर्थिक कारण
- व्यापार एवं वाणिज्य की वृद्धि — वैश्य वर्ग धनी पर सामाजिक प्रतिष्ठा से वंचित।
- यज्ञों पर अत्यधिक खर्च — व्यापारी वर्ग के लिए बोझ।
- नगरों में जीवन-शैली ने पारंपरिक ग्रामीण मूल्यों को चुनौती दी।
- व्यापार-मार्गों के साथ विचारों का आदान-प्रदान — नई सोच को गति मिली।
धार्मिक एवं वैचारिक
- वैदिक धर्म का यज्ञ-केन्द्रित एवं जटिल होना — आमजन दूर।
- कर्म एवं पुनर्जन्म की अवधारणाएँ पहले से विद्यमान (उपनिषदों में) — श्रमणों ने इसे मुक्ति का आधार बनाया।
- तार्किक चिन्तन का उदय — अजित केशकम्बली, पूरण कस्सप जैसे भौतिकवादी भी सक्रिय।
- उपनिषदों का आत्म-ज्ञान पर बल — श्रमण आन्दोलन को दार्शनिक पृष्ठभूमि।
03जैन धर्म — महावीर : जीवन एवं त्रिरत्न Jainism — Mahavira and the Triratna
जैन धर्म का इतिहास 23 तीर्थंकरों से होकर गुजरता है, पर 24वें तीर्थंकर महावीर को इसका वास्तविक संस्थापक माना जाता है — क्योंकि उन्होंने इसे एक व्यवस्थित धार्मिक-दार्शनिक रूप दिया।
महावीर का जीवन
- जन्म — कुंडग्राम (वैशाली के निकट), लगभग 599 ई.पू. (कुछ मतों में 540 ई.पू.)।
- पिता — सिद्धार्थ (ज्ञातृक क्षत्रिय); माता — त्रिशला (लिच्छवी राजकुमारी)।
- प्रारंभिक नाम — वर्धमान; विवाह से एक पुत्री — अनोज्जा/प्रियदर्शना।
- 30 वर्ष की आयु में गृह-त्याग — 12 वर्षों का कठोर तप (ध्यान, मौन, उपवास) — केवलज्ञान की प्राप्ति (लगभग 42 वर्ष की आयु में)।
- तत्पश्चात जिन (संसार-विजेता), महावीर (महान वीर), तीर्थंकर कहलाए।
- निर्वाण — पावापुरी (बिहार), 527 ई.पू. (72 वर्ष की आयु में) — दीपावली के दिन (जैन परंपरा के अनुसार)।
त्रिरत्न — जैन धर्म का मूल मंत्र
- सम्यक् दर्शन (Right Faith) — तीर्थंकरों के उपदेशों में विश्वास।
- सम्यक् ज्ञान (Right Knowledge) — तत्त्वों का यथार्थ ज्ञान (अस्तिकाय आदि का बोध)।
- सम्यक् चारित्र (Right Conduct) — पाँच व्रत — अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह।
- अहिंसा — जैन धर्म का केंद्रीय सिद्धान्त; जीवन के हर रूप के प्रति अहिंसा — सूक्ष्म जीवों (जल, वायु, अग्नि, पृथ्वी) तक।
- सभी पाँचों व्रत अणुव्रत (सामान्य जन) एवं महाव्रत (साधु) के रूप में विभाजित।
- वर्धमान (जन्म-नाम) · महावीर (महान वीर) · जिन (विजेता) · तीर्थंकर (मार्ग-प्रदर्शक) · निर्ग्रंथ (बंधन-मुक्त) · वीर · सन्मति — ये सभी प्रायः प्रश्नों में पूछे जाते हैं।
04जैन धर्म — सिद्धान्त, आगम, दिगम्बर-श्वेताम्बर Jainism — Doctrine, Agamas, Sects
जैन धर्म की दार्शनिक इमारत अनेकान्तवाद (सापेक्षवाद) और स्याद्वाद पर खड़ी है — यह मान्यता कि सत्य को अनेक पक्षों से देखा जाना चाहिए। यही जैन धर्म को अद्वितीय दार्शनिक गहराई देता है।
प्रमुख सिद्धान्त
- अनेकान्तवाद — वास्तविकता अनेक पहलुओं वाली है; एकांत दृष्टि अपूर्ण।
- स्याद्वाद — "स्यात्" = "शायद" / "कुछ दृष्टि से" — सापेक्षतावादी तर्क-पद्धति; प्रत्येक कथन के सात भेद।
- कर्म-सिद्धान्त — कर्म सूक्ष्म पुद्गल (द्रव्य) है जो आत्मा से चिपकता है; मोक्ष के लिए कर्मों का पूर्ण नाश।
- आत्मा का शाश्वत, चेतन एवं स्वतंत्र अस्तित्व — ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय आदि आठ कर्म-प्रकृतियाँ।
आगम · साहित्य
- प्राचीनतम जैन ग्रंथ — 12 अंग (आगम); महावीर के उपदेशों का संकलन।
- श्वेताम्बर मान्यता — 12 अंग + 12 उपांग + 10 प्रकीर्णक आदि — कुल 45 आगम।
- दिगम्बर मान्यता — मूल आगमों का लोप; स्वीकार्य ग्रंथ — षट्खण्डागम, कसायपाहुड़ आदि।
- भगवती सूत्र, उत्तराध्ययन सूत्र, दशवैकालिक सूत्र — प्रमुख सूत्र।
दिगम्बर (आकाश-वस्त्र)
- — भद्रबाहु के अनुयायी; दक्षिण भारत में प्रभावी।
- — वस्त्र-त्याग (दिगम्बर = दिशाएँ ही वस्त्र)।
- — स्त्रियाँ मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकतीं; पुरुष के रूप में पुनर्जन्म आवश्यक।
- — 12 अंगों के लोप की मान्यता।
श्वेताम्बर (श्वेत-वस्त्र)
- — स्थूलभद्र के अनुयायी; गुजरात-राजस्थान में प्रभावी।
- — श्वेत वस्त्र धारण करते हैं।
- — स्त्रियाँ मोक्ष प्राप्त कर सकती हैं — विशेष अन्तर।
- — 12 अंगों की प्रामाणिकता स्वीकार।
विभाजन का कारण: पार्श्वनाथ की शिक्षाओं में चार व्रत (ब्रह्मचर्य का स्थान नहीं), महावीर ने पाँचवाँ व्रत (ब्रह्मचर्य) जोड़ा। दिगम्बर-श्वेताम्बर विभाजन का मूल कारण — महावीर के बाद लगभग 200 वर्षों में वस्त्र-सम्बन्धी एवं साहित्यिक मतभेद।
05बौद्ध धर्म — गौतम बुद्ध : जीवन-यात्रा Buddhism — Gautama Buddha: The Journey
सिद्धार्थ से बुद्ध तक की यात्रा — एक राजकुमार जिसने अपना राज्य, पत्नी, पुत्र त्याग दिया, क्योंकि उसने एक बूढ़े, एक रोगी, एक मृत व्यक्ति और एक साधु को देखा। बोधगया में बोधि-वृक्ष के नीचे उसे वह ज्ञान मिला जिसने विश्व-इतिहास बदल दिया।
जीवन-घटनाएँ
- जन्म — लुम्बिनी (नेपाल), 563 ई.पू. (कुछ मतों में 566/483) — शाक्य क्षत्रिय कुल।
- माता — महामाया (देवदह); पिता — शुद्धोधन; पत्नी — यशोधरा; पुत्र — राहुल।
- चार दृश्य — वृद्ध, रोगी, मृत, साधु — ने उसे गृह-त्याग के लिए प्रेरित किया (29 वर्ष की आयु में)।
- महाभिनिष्क्रमण — कपिलवस्तु से चन्द्रक (घोड़ा) पर सवार होकर।
- ज्ञान-प्राप्ति — 35 वर्ष की आयु में बोधगया (बिहार) में बोधि-वृक्ष के नीचे।
- प्रथम धर्मचक्रप्रवर्तन — सारनाथ (वाराणसी) में पाँच भिक्षुओं (पंचवर्गीय) के समक्ष।
- महापरिनिर्वाण — कुशीनगर (उत्तर प्रदेश), 483 ई.पू. (80 वर्ष की आयु में)।
परीक्षा-प्रिय · बुद्ध के नाम एवं उपाधियाँ
- सिद्धार्थ (जन्म-नाम) · गौतम (गोत्र) · शाक्यमुनि (शाक्य कुल के मुनि)।
- तथागत (जो तथ्य को प्राप्त हो गया) — बुद्ध स्वयं को यही कहते थे।
- भगवान · जिन (विजेता) · सर्वज्ञ · बोधिसत्त्व (ज्ञान-प्राप्ति से पूर्व)।
- दशबल (दस शक्तियों वाला) — परवर्ती उपाधि।
- जन्म — पद्म/हाथी (लुम्बिनी) · महाभिनिष्क्रमण — घोड़ा (चन्द्रक) · ज्ञान — बोधि-वृक्ष (बोधगया) · धर्मचक्रप्रवर्तन — धर्मचक्र (सारनाथ) · महापरिनिर्वाण — स्तूप (कुशीनगर)।
06बुद्ध के मूल सिद्धान्त — चार आर्यसत्य, अष्टांगिक मार्ग The Core: Four Noble Truths & Eightfold Path
बुद्ध का सम्पूर्ण उपदेश चार आर्यसत्य और अष्टांगिक मार्ग में समाहित है — न तो अत्यधिक यज्ञ-जटिलता, न कठोर तप, बल्कि "मध्यम मार्ग" (Majjhima Patipada) — अति-त्याग और इन्द्रिय-भोग के बीच का संतुलित पथ।
चार आर्यसत्य Four Noble Truths
- दुःख — जीवन दुःखमय है (जन्म, वृद्धि, रोग, मृत्यु, प्रिय-वियोग, अप्रिय-संयोग — सभी दुःख)।
- दुःख-समुदय — दुःख का कारण तृष्णा (काम-भोग, भव-तृष्णा, विभव-तृष्णा)।
- दुःख-निरोध — तृष्णा का अंत ही दुःख का अंत (निर्वाण)।
- दुःख-निरोध-गामिनी प्रतिपदा — दुःख-निरोध का मार्ग = अष्टांगिक मार्ग।
अष्टांगिक मार्ग Eightfold Path
- प्रज्ञा (विवेक) — सम्यक् दृष्टि · सम्यक् संकल्प।
- शील (सदाचार) — सम्यक् वाक् · सम्यक् कर्म · सम्यक् आजीविका।
- समाधि (एकाग्रता) — सम्यक् व्यायाम · सम्यक् स्मृति · सम्यक् समाधि।
- मध्यम मार्ग — कठोर तप एवं भोग-विलास के बीच संतुलन — बुद्ध के उपदेश की कुंजी।
- बुद्ध (आदर्श, ज्ञानी) · धर्म (उपदेश, मार्ग) · संघ (भिक्षु-समुदाय) — इन तीनों की शरण लेना बौद्ध होने की पहली शर्त है।
- प्रत्येक बौद्ध प्रतिदिन उच्चारण करता है — "बुद्धं शरणं गच्छामि, धर्मं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि"।
धर्म के अन्य प्रमुख सिद्धान्त
- अनात्मवाद (अनत्त) — आत्मा का कोई स्थायी, शाश्वत अस्तित्व नहीं; स्कन्धों का समूह मात्र।
- प्रतीत्यसमुत्पाद — कार्य-कारण की शृंखला; सब कुछ परस्पर-आश्रित।
- क्षणिकवाद — सब क्षण-भंगुर, निरंतर परिवर्तनशील।
- बुद्ध ने ईश्वर-अस्तित्व, आत्मा, शाश्वतवाद — इन मेटाफिजिकल प्रश्नों पर मौन धारण किया (अव्याकृत प्रश्न)।
बुद्ध की नीतियाँ
- अहिंसा — जैन की तरह अति-नहीं, पर सामान्य अहिंसा का पालन।
- पाँच शील (Panchashila) — अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, मद्य-त्याग — सामान्य जन के लिए।
- भिक्षुओं के लिए 10 शील (दशशील) — अतिरिक्त अनुशासन।
- वर्ण-व्यवस्था का विरोध — सभी वर्णों के लिए संघ में प्रवेश (शूद्र, स्त्रियाँ सहित)।
07संघ, त्रिपिटक एवं धर्म-प्रसार Sangha, Tripitaka and Expansion
बुद्ध की सबसे बड़ी सांगठनिक उपलब्धि संघ थी — भिक्षुओं और भिक्षुणियों का एक लोकतांत्रिक समुदाय, जहाँ सभी वर्ण, सभी स्तर के लोग समान थे। यह संघ ही बौद्ध धर्म का प्रसार-इंजन बना।
संघ · विनय
- प्रथम संघ — सारनाथ में पाँच भिक्षु (अज्ञात कौण्डिन्य, वप्प, भद्दिय, महानाम, अस्सजि) — पंचवर्गीय।
- भिक्षुणी-संघ — बुद्ध ने अपनी मौसी महाप्रजापती गौतमी को भिक्षुणी बनने की अनुमति दी (आनन्द के आग्रह पर)।
- विनय पिटक — संघ के नियम; 227 शिक्षापद (भिक्षु) एवं 311 (भिक्षुणी)।
- संघ में प्रवेश — उपसम्पदा (दीक्षा) से; न्यूनतम आयु 20 वर्ष।
त्रिपिटक · बौद्ध साहित्य
- सुत्त पिटक — बुद्ध के उपदेश (धर्म-वार्ताएँ); 5 निकाय — दीघ, मज्झिम, संयुत्त, अंगुत्तर, खुद्दक।
- विनय पिटक — संघ-अनुशासन एवं आचार-संहिता।
- अभिधम्म पिटक — दार्शनिक विश्लेषण; धर्म-सिद्धान्तों की व्यवस्थित व्याख्या।
- त्रिपिटक पालि भाषा में लिखा गया — प्राकृत/लोकभाषा, संस्कृत नहीं — बौद्ध धर्म की जन-अभिमुखता का प्रमाण।
- सारिपुत्त (प्रज्ञा में प्रथम) · मौद्गल्यायन (ऋद्धि/शक्ति में प्रथम) · आनन्द (सुत्त-धारी, बुद्ध के निकटतम सेवक) · काश्यप (महाकाश्यप — प्रथम संगीति के नेता) · उपालि (विनय-धारी) · राहुल (बुद्ध के पुत्र) · महाप्रजापती गौतमी (प्रथम भिक्षुणी)।
- बुद्ध ने कोई लिखित ग्रंथ नहीं छोड़ा — उनके उपदेशों को शिष्यों ने कंठस्थ किया; बाद में संगीतियों में संकलित किया गया।
08बौद्ध संगीतियाँ — कालक्रम एवं परिणाम Buddhist Councils — Chronology and Outcomes
बुद्ध की मृत्यु के बाद उनके उपदेशों के संकलन, संरक्षण एवं प्रामाणिकता के लिए चार प्रमुख संगीतियाँ (परिषदें) हुईं। इन संगीतियों में ही बौद्ध धर्म का विभाजन एवं विकास — दोनों घटित हुए।
| संगीति | स्थान · संरक्षक | प्रमुख परिणाम |
|---|---|---|
| प्रथम · 483 ई.पू. | राजगृह · अजातशत्रु (राजा) · महाकाश्यप (अध्यक्ष) | सुत्त पिटक एवं विनय पिटक का संकलन; उपालि (विनय) एवं आनन्द (सुत्त) — मुख्य वाचक। |
| द्वितीय · 383 ई.पू. | वैशाली · कालाशोक (राजा) · सब्बकामी (अध्यक्ष) | स्थविरवाद एवं महासांघिक का प्रथम विभाजन — विनय के 10 नियमों पर विवाद। |
| तृतीय · लगभग 250 ई.पू. | पाटलिपुत्र · अशोक (राजा) · मोग्गलिपुत्त तिस्स (अध्यक्ष) | अभिधम्म पिटक का अंतिम रूप; धर्म-प्रसार के लिए मिशनरियों का भेजा जाना — श्रीलंका, बर्मा, गांधार आदि। |
| चतुर्थ · प्रथम शताब्दी ई. | कश्मीर (कुंडलवन) · कनिष्क (राजा) · वसुमित्र/अश्वघोष (अध्यक्ष) | महायान का औपचारिक रूप; विभाषा-शास्त्र का संकलन — सर्वास्तिवाद संप्रदाय की प्रमुखता। |
सभी चार संगीतियाँ परीक्षा में अत्यंत महत्वपूर्ण — विशेष रूप से स्थान, संरक्षक एवं परिणाम।
- द्वितीय संगीति में विनय के 10 नियमों (अनुज्ञप्ति) पर विवाद — वैशाली के भिक्षुओं ने कुछ शिथिल नियमों का पक्ष किया, पाटलिपुत्र/पश्चिमी भिक्षु कठोरता के पक्ष में।
- स्थविरवाद (कठोर, परंपरागत) → आगे चलकर थेरवाद (श्रीलंका, बर्मा, थाईलैंड)।
- महासांघिक (उदार, जन-अभिमुख) → आगे चलकर महायान का बीज (चीन, जापान, कोरिया, तिब्बत)।
- तृतीय संगीति तक यह विभाजन स्पष्ट हो चुका था; अशोक ने स्थविरवाद (थेरवाद) को संरक्षण दिया।
09बौद्ध सम्प्रदाय — हीनयान, महायान, वज्रयान Buddhist Sects — Theravada, Mahayana, Vajrayana
बौद्ध धर्म तीन प्रमुख धाराओं में विकसित हुआ — हीनयान/थेरवाद, महायान, और वज्रयान। प्रत्येक की अपनी दार्शनिकता, पूजा-पद्धति एवं भौगोलिक क्षेत्र है।
हीनयान / थेरवाद
- "थेर" = स्थविर/बुज़ुर्ग — प्राचीनतम शाखा।
- केवल बुद्ध को आदर्श; बोधिसत्त्व की अवधारणा गौण।
- व्यक्ति-मुक्ति (अर्हत) पर बल — स्वयं के प्रयास से निर्वाण।
- पालि साहित्य प्रामाणिक; मूर्ति-पूजा न्यूनतम।
- क्षेत्र — श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड, कंबोडिया, लाओस।
महायान "बड़ा वाहन"
- चौथी शताब्दी ई.पू. से उदय; कनिष्क के समय प्रमुखता।
- बोधिसत्त्व — केंद्रीय आदर्श; सभी प्राणियों की मुक्ति के लिए कार्य।
- बुद्ध को दिव्य/ईश्वरीय रूप में पूजा; मूर्ति-पूजा एवं स्तोत्र-पाठ।
- संस्कृत साहित्य — लोटस सूत्र, प्रज्ञापारमिता आदि।
- क्षेत्र — चीन, जापान, कोरिया, वियतनाम, तिब्बत (प्रभाव)।
वज्रयान "वज्र-वाहन"
- तांत्रिक बौद्ध धर्म; लगभग 7वीं शताब्दी ई. से।
- मंत्र, धारणी, मुद्रा, मंडल, यन्त्र — पर आधारित।
- सहजयान — एक प्रमुख उपशाखा (सिद्ध-परंपरा)।
- बुद्ध को आदिबुद्ध के रूप में; पाँच ध्यानी बुद्ध।
- क्षेत्र — तिब्बत, मंगोलिया, भूटान, नेपाल के हिमालयी भाग; जापान में शिंगोन।
नामकरण की उत्पत्ति: "हीनयान" (छोटा वाहन) शब्द महायानियों द्वारा दिया गया; थेरवादी स्वयं को "हीनयान" नहीं कहते — परीक्षा में थेरवाद शब्द का प्रयोग करें।
10जैन एवं बौद्ध — तुलनात्मक अध्ययन Jainism vs Buddhism — A Comparative Study
जैन और बौद्ध धर्म — दोनों श्रमण परंपरा की संतानें, फिर भी उनके दर्शन, आचार, मोक्ष-मार्ग एवं संगठन में गहरे अन्तर हैं। यह तुलना UPSC में बार-बार पूछी जाती है।
| आयाम | जैन धर्म | बौद्ध धर्म |
|---|---|---|
| संस्थापक | महावीर (24वें तीर्थंकर) | गौतम बुद्ध |
| आत्मा का अस्तित्व | हाँ — शाश्वत, चेतन, स्वतंत्र | नहीं — अनात्मवाद (अनत्त) |
| ईश्वर | अस्वीकार (नास्तिक) | अस्वीकार (ईश्वर-प्रश्न पर मौन) |
| मोक्ष-मार्ग | कठोर तप एवं कर्म-नाश | मध्यम मार्ग — अष्टांगिक मार्ग |
| अहिंसा | अत्यन्त कठोर — सूक्ष्म जीवों तक | सामान्य अहिंसा (अति नहीं) |
| वर्ण-व्यवस्था | स्वीकार (पर कर्म पर बल) | पूर्ण अस्वीकार — सभी वर्णों को संघ में प्रवेश |
| स्त्री-मोक्ष | दिगम्बर — नहीं; श्वेताम्बर — हाँ | हाँ (भिक्षुणी-संघ) |
| भाषा | प्राकृत (अर्धमागधी) | पालि |
| प्रमुख ग्रंथ | 12 आगम (श्वेताम्बर); षट्खण्डागम (दिगम्बर) | त्रिपिटक (सुत्त, विनय, अभिधम्म) |
| सम्प्रदाय | दिगम्बर · श्वेताम्बर | थेरवाद · महायान · वज्रयान |
- दोनों श्रमण परंपरा से · वैदिक यज्ञ-पुरोहितवाद का विरोध · कर्म एवं पुनर्जन्म में विश्वास · अहिंसा पर बल · वर्ण-भेद का विरोध (बौद्ध अधिक, जैन अपेक्षाकृत) · संघ/गण का निर्माण।
11पतन के कारण एवं ऐतिहासिक योगदान Decline and Lasting Contributions
भारत से बौद्ध धर्म का लगभग पूर्ण लोप (लगभग 12वीं–13वीं शताब्दी) और जैन धर्म का अल्पसंख्यक बन जाना — यह बाहरी आक्रमणों, आन्तरिक दुर्बलताओं एवं हिन्दू पुनरुत्थान का संयुक्त परिणाम था। पर उनका योगदान अमिट है।
पतन के कारण
- हिन्दू पुनरुत्थान — शंकराचार्य (अद्वैत), रामानुज (भक्ति) ने बौद्ध-तर्क को आत्मसात कर पुनः स्थापित किया।
- बौद्ध-संघों का भ्रष्टाचार — सुख-सुविधाओं की ओर झुकाव; अनुशासन-शिथिलता।
- तांत्रिक प्रभाव — वज्रयान के अत्यधिक रहस्यवाद ने आमजन से दूरी बनाई।
- मुस्लिम आक्रमण — 12वीं शताब्दी में बिहार-बंगाल के विहारों (नालन्दा, विक्रमशिला, ओदंतपुरी) का विनाश।
- जैन धर्म — अहिंसा की अति ने कृषि/व्यापार आदि को सीमित किया; संख्या में ह्रास।
योगदान · अमिट प्रभाव
- अहिंसा — भारतीय विचार का केंद्रीय मूल्य; गाँधी तक जीवित।
- समानता — वर्ण-भेद का सबसे प्रारंभिक और प्रभावी विरोध।
- स्त्री-शिक्षा — भिक्षुणी-संघ ने महिलाओं को धार्मिक-सामाजिक स्थान दिया।
- साहित्य — पालि एवं प्राकृत भाषाओं का संरक्षण; संस्कृत-प्रधानता का संतुलन।
- कला-वास्तु — स्तूप, चैत्य, विहार, अजंता-एलोरा, साँची — भारतीय कला की अमूल्य धरोहर।
- वैश्विक प्रसार — बौद्ध धर्म ने भारत को एशिया के आध्यात्मिक-सांस्कृतिक केन्द्र के रूप में स्थापित किया।
- जैन एवं बौद्ध धर्म ने वैदिक धर्म को बदलने के लिए मजबूर किया — उपनिषदों से लेकर पुराणों-भक्ति तक हिन्दू धर्म ने अपने आपको पुनर्परिभाषित किया।
- ये धर्म भारत की बहुलतावादी परंपरा के आधार-स्तंभ हैं — सह-अस्तित्व, अहिंसा एवं तार्किक-आलोचनात्मक चिन्तन की परंपरा।
- आगे का सूत्र — इन्हीं विचारधाराओं की बदौलत गुप्त-काल में हिन्दू-बौद्ध-जैन का समन्वय; और मध्यकाल में भक्ति-आन्दोलन में पुनः अहिंसा एवं समानता की गूँज।