पूर्व मध्यकालीन भारत — राजपूत काल | Early Medieval India
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पूर्व मध्यकालीन भारत — राजपूत काल Early Medieval India — The Rajput Age

हर्ष की मृत्यु से दिल्ली सल्तनत की स्थापना तक के लगभग साढ़े पाँच सौ वर्ष। इसी युग में खजुराहो एवं दिलवाड़ा गढ़े गए, शंकराचार्य ने अद्वैत की व्याख्या की, कल्हण ने भारत का पहला इतिहास-सदृश ग्रंथ लिखा — और इसी युग के अंत में तराइन के मैदान में उत्तर भारत का राजनीतिक भविष्य बदल गया।

712 ई.सिंध पर अरब आक्रमण — मुहम्मद बिन क़ासिम
लगभग 1000–1027 ई.महमूद ग़ज़नवी के आक्रमण
1148–50 ई.कल्हण की राजतरंगिणी
1192 ई.तराइन का द्वितीय युद्ध

01काल-सीमा एवं युग की विशेषताएँ Periodisation and Characteristics

पूर्व मध्यकाल का विस्तार सामान्यतः लगभग 750 से 1200 ई. तक माना जाता है — हर्ष के बाद के बिखराव से लेकर दिल्ली सल्तनत की स्थापना तक। यह "राजपूत काल" कहलाता है क्योंकि उत्तर एवं पश्चिम भारत की राजनीति पर उन कुलों का प्रभुत्व रहा जिन्हें आगे चलकर राजपूत कहा गया।

राजनीतिक विशेषताएँ

  • बहुकेन्द्रीय क्षेत्रीय राज्यों का संसार — कोई सर्वभारतीय सत्ता नहीं।
  • सत्ता का आधार — वंश, कुल एवं भूमि; सामंत-प्रणाली की केन्द्रीयता।
  • कन्नौज पर त्रिपक्षीय संघर्ष — उत्तर भारत की राजनीति की धुरी।
  • युद्ध प्रायः प्रतिष्ठा एवं क्षेत्र के लिए; पराजित को राज्य लौटाने की परंपरा।
  • अंत में उत्तर-पश्चिम से तुर्क आक्रमण — और सत्ता-संरचना का पूर्ण परिवर्तन।

सामाजिक-सांस्कृतिक विशेषताएँ

  • जाति-व्यवस्था की अधिकतम कठोरता एवं उपजातियों का गुणन।
  • मंदिर आर्थिक एवं सामाजिक संस्था के रूप में; विशाल मंदिर-निर्माण का युग।
  • क्षेत्रीय भाषाओं एवं क्षेत्रीय स्थापत्य-शैलियों का उदय।
  • दर्शन का उत्कर्ष — शंकर, रामानुज; भक्ति एवं नाथ-परंपरा का प्रसार।
  • स्त्रियों की स्थिति में गिरावट — जौहर, सती एवं बाल विवाह का प्रसार।

02राजपूतों की उत्पत्ति के सिद्धांत Theories of Rajput Origin

"राजपूत" शब्द संस्कृत "राजपुत्र" से बना है। इनकी उत्पत्ति पर कोई एक सर्वमान्य मत नहीं है — और परीक्षा में प्रायः सिद्धांत एवं प्रस्तावक का मिलान पूछा जाता है।

सिद्धांतप्रस्तावक / स्रोतआधार एवं आलोचना
अग्निकुल सिद्धांतचन्दबरदाई · पृथ्वीराजरासोआबू पर्वत के अग्निकुंड से चार कुलों — प्रतिहार, परमार, चौहान एवं सोलंकी — की उत्पत्ति। आलोचना — काव्यात्मक कथा; रासो स्वयं परवर्ती रचना माना जाता है।
विदेशी उत्पत्तिवी.ए. स्मिथ, विलियम क्रुकशक, कुषाण एवं हूण जैसे आक्रांताओं के वंशज, जो अग्नि-शुद्धि द्वारा क्षत्रिय वर्ण में समाहित हुए। आलोचना — सभी कुलों पर लागू नहीं।
प्राचीन क्षत्रिय वंशगौरीशंकर ओझा, सी.वी. वैद्यये प्राचीन सूर्यवंशी-चन्द्रवंशी क्षत्रियों के ही वंशज हैं। आलोचना — प्रमाणों से अधिक परंपरा पर निर्भर।
मिश्रित / गुर्जर उत्पत्तिडी.आर. भंडारकरगुर्जर मूल से; कुछ कुल विदेशी, कुछ देशी — मिश्रित प्रक्रिया।
जनजातीय उत्पत्तिआधुनिक शोध की एक धारास्थानीय जनजातीय एवं ग्राम-प्रमुख वर्गों का सत्ता प्राप्त कर क्षत्रियीकरण

तालिका दाएँ-बाएँ स्क्रॉल की जा सकती है।

आधुनिक दृष्टिकोण · संतुलित उत्तर
  • वर्तमान इतिहास-लेखन राजपूतों को किसी एक प्रजाति या रक्त-वंश के बजाय एक सामाजिक-राजनीतिक श्रेणी मानता है, जो सातवीं-बारहवीं सदी के बीच बनी।
  • बी.डी. चट्टोपाध्याय जैसे विद्वानों का मत — यह "राजपूतीकरण" की प्रक्रिया थी: सत्ता पाने वाले विविध समूहों ने वंशावली गढ़वाकर, ब्राह्मणों से मान्यता लेकर एवं आपस में विवाह-सम्बन्ध बनाकर स्वयं को क्षत्रिय स्थापित किया।
  • मुख्य परीक्षा में इसी निष्कर्ष के साथ समाप्त करें — "राजपूत जन्मजात जाति-समूह नहीं, एक बनती हुई सत्ता-श्रेणी थे।"

03त्रिपक्षीय संघर्ष The Tripartite Struggle

आठवीं से नौवीं सदी तक तीन बड़ी शक्तियों ने कन्नौज के लिए संघर्ष किया। कन्नौज महत्वपूर्ण था क्योंकि वह हर्ष के बाद से उत्तर भारत की सर्वोच्चता का प्रतीक तथा गंगा घाटी के उपजाऊ क्षेत्र एवं व्यापार-मार्गों की कुंजी था।

शक्तिक्षेत्र एवं केन्द्रप्रमुख शासक एवं उपलब्धियाँ
गुर्जर-प्रतिहारपश्चिमी भारत · आगे कन्नौजनागभट्ट प्रथम (अरबों को रोका), वत्सराज, नागभट्ट द्वितीय, मिहिरभोज (भोज प्रथम) — सर्वाधिक शक्तिशाली; महेन्द्रपाल प्रथम, जिसके दरबार में राजशेखर (कर्पूरमंजरी)।
पालबंगाल-बिहारगोपाल — संस्थापक, चयन द्वारा सत्ता की परंपरा; धर्मपाल — विक्रमशिला एवं सोमपुर महाविहार; देवपाल — चरम विस्तार। बौद्ध धर्म के अंतिम बड़े संरक्षक।
राष्ट्रकूटदक्कन · मान्यखेटदन्तिदुर्ग — संस्थापक; कृष्ण प्रथम — एलोरा का कैलाश मंदिर; गोविंद तृतीय; अमोघवर्ष — कन्नड़ ग्रंथ कविराजमार्ग। अरब यात्री सुलेमान ने इन्हें भारत की सर्वाधिक शक्तिशाली सत्ता बताया।
त्रिपक्षीय संघर्ष · परिणाम
  • कन्नौज अंततः गुर्जर-प्रतिहारों के हाथ आया — नागभट्ट द्वितीय के बाद यह उनका केन्द्र बना।
  • पर वास्तविक परिणाम यह हुआ कि तीनों शक्तियाँ एक-दूसरे से लड़कर क्षीण हो गईं — और उत्तर-पश्चिम की सीमा-सुरक्षा उपेक्षित रह गई।
  • प्रतिहारों का सबसे बड़ा ऐतिहासिक योगदान — उन्होंने लंबे समय तक अरब विस्तार को सिंध से आगे बढ़ने से रोका
  • दसवीं सदी के बाद प्रतिहार साम्राज्य के विघटन से ही चौहान, परमार, चंदेल एवं सोलंकी जैसे स्वतंत्र राजपूत राज्य निकले।

04प्रमुख राजपूत राजवंश Major Rajput Dynasties

वंश एवं क्षेत्रप्रमुख शासकउपलब्धियाँ एवं स्मारक
चौहान (चाहमान) · अजमेर-दिल्लीअजयराज, विग्रहराज चतुर्थ, पृथ्वीराज तृतीयविग्रहराज — संस्कृत नाटक "हरकेलि"; पृथ्वीराज तृतीय — तराइन के दोनों युद्ध। दरबारी — चन्दबरदाई एवं जयानक (पृथ्वीराजविजय)।
परमार · मालवा (धार)मुंज, राजा भोजभोज — विद्वान-शासक; समरांगणसूत्रधार (वास्तु-ग्रंथ), भोजशाला, भोजपुर का शिव मंदिर एवं विशाल ताल।
चंदेल · बुंदेलखंड (खजुराहो-कालिंजर)धंग, विद्याधर, कीर्तिवर्मनखजुराहो के मंदिर — कंदरिया महादेव सर्वोत्तम; विद्याधर ने महमूद ग़ज़नवी का प्रतिरोध किया।
सोलंकी (चौलुक्य) · गुजरात (अन्हिलवाड़)मूलराज, भीम प्रथम, सिद्धराज जयसिंह, कुमारपालभीम प्रथम के काल में सोमनाथ पर आक्रमण; मोढेरा सूर्य मंदिर, रानी की वाव एवं दिलवाड़ा (विमल शाह)। कुमारपाल के दरबार में हेमचन्द्र
गहड़वाल · कन्नौज-वाराणसीचन्द्रदेव, गोविन्दचन्द्र, जयचन्दजयचन्द — चंदावर युद्ध (1194) में पराजित एवं मृत। दरबार में श्रीहर्ष (नैषधीयचरित)।
कलचुरि · त्रिपुरीगांगेयदेव, लक्ष्मीकर्णमध्य भारत की प्रमुख शक्ति; शैव मत का संरक्षण।
तोमर · दिल्लीअनंगपाललाल कोट — दिल्ली का प्राचीनतम दुर्ग; बाद में चौहानों ने अधिकार किया।
गुहिल (आगे सिसोदिया) · मेवाड़बप्पा रावलचित्तौड़ केन्द्रित; आगे चलकर राणा कुम्भा एवं राणा प्रताप की परंपरा।
सेन · बंगालविजयसेन, बल्लालसेन, लक्ष्मणसेनपालों के बाद बंगाल में; लक्ष्मणसेन के दरबार में जयदेव (गीतगोविन्द)। बख़्तियार ख़लजी से पराजय।

05समकालीन दक्षिण भारत Contemporary South India

यह स्मरण रखना आवश्यक है कि जिस समय उत्तर भारत राजपूत राज्यों में बँटा था, दक्षिण में चोल साम्राज्य अपने चरम पर था — और अनेक दृष्टियों से वह समकालीन उत्तर भारत से अधिक संगठित था।

चोल (लगभग 850–1279 ई.)

  • संस्थापक विजयालय; महान शासक राजराज प्रथम एवं राजेन्द्र प्रथम
  • राजराज — तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर
  • राजेन्द्र — गंगा-अभियान एवं उपाधि गंगैकोंडचोल; श्रीविजय पर नौसैनिक अभियान।
  • उत्तरमेरूर अभिलेख — ग्राम-सभा की निर्वाचन-प्रणाली; कुडवोलै पद्धति। स्थानीय स्वशासन का सर्वोत्तम प्राचीन साक्ष्य।
  • चोल कांस्य प्रतिमाएँ — विशेषतः नटराज

अन्य दक्षिणी शक्तियाँ

  • पश्चिमी चालुक्य (कल्याणी) — विक्रमादित्य षष्ठ; दरबार में बिल्हण एवं विज्ञानेश्वर (मिताक्षरा)।
  • होयसल (द्वारसमुद्र) — बेलूर एवं हलेबिड के अलंकृत मंदिर।
  • यादव (देवगिरि) एवं काकतीय (वारंगल) — तेरहवीं सदी की प्रमुख शक्तियाँ।
  • पूर्वी गंग (ओडिशा) — लिंगराज एवं जगन्नाथ मंदिर की परंपरा।

06अरब आक्रमण एवं सिंध विजय The Arab Conquest of Sindh, 712 CE

भारत पर प्रथम इस्लामी आक्रमण 712 ई. में हुआ, जब उमय्यद ख़लीफ़ा के अधीन मुहम्मद बिन क़ासिम ने सिंध के शासक दाहिर को पराजित किया। तात्कालिक कारण था — देवल के निकट अरब जहाज़ों की लूट।

राजनीतिक दृष्टि से सीमित
  • अरब सत्ता सिंध एवं मुल्तान तक ही सीमित रही।
  • प्रतिहारों ने आगे बढ़ने से रोका।
  • मुहम्मद बिन क़ासिम शीघ्र वापस बुला लिया गया।
  • इतिहासकार इसे "परिणामरहित विजय" कहते हैं — भारतीय राजनीति पर स्थायी प्रभाव नहीं।
  • प्रमुख स्रोत — चचनामा
सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण
  • भारतीय अंक एवं दशमलव पद्धति अरबों के माध्यम से यूरोप पहुँची — इसीलिए वहाँ ये "अरबी अंक" कहलाए।
  • ब्रह्मगुप्त का ब्रह्मस्फुटसिद्धांत अरबी में "सिंदहिंद" नाम से अनूदित।
  • चरक-सुश्रुत की चिकित्सा-परंपरा तथा पंचतंत्र का अरबी-फ़ारसी में प्रसार।
  • व्यापारिक सम्पर्क सुदृढ़ हुए — मालाबार तट पर अरब व्यापारियों की बस्तियाँ।

07तुर्क आक्रमण — ग़ज़नवी एवं ग़ोरी The Turkish Invasions

क · महमूद ग़ज़नवी (लगभग 1000–1027 ई.) Mahmud of Ghazni

ग़ज़नी के शासक महमूद ने भारत पर लगभग सत्रह आक्रमण किए। उसका उद्देश्य साम्राज्य-स्थापना नहीं, धन-लूट था — इसीलिए वह विजित क्षेत्रों में स्थायी शासन-तंत्र नहीं बनाता था। केवल पंजाब उसके साम्राज्य में स्थायी रूप से जुड़ा।

प्रसंगवर्ष (लगभग)तथ्य
वैहिंद का युद्ध1001शाही शासक जयपाल पराजित।
आनंदपाल का संघ1008–09अनेक राजपूत राजाओं का संयुक्त मोर्चा — फिर भी पराजय।
सोमनाथ पर आक्रमण1025–26गुजरात; सर्वाधिक चर्चित एवं विनाशकारी अभियान। तत्कालीन सोलंकी शासक भीम प्रथम।
दरबारी विद्वानफ़िरदौसी — शाहनामा; उत्बी — किताब-उल-यामिनी।
अलबरूनीमहमूद के साथ भारत आयाकिताब-उल-हिन्द (तहक़ीक़-ए-हिन्द) — भारतीय समाज, विज्ञान, धर्म एवं जाति का गंभीर एवं अपेक्षाकृत निष्पक्ष अध्ययन; उसने संस्कृत सीखी।

ख · मुहम्मद ग़ोरी Muhammad Ghori

ग़ोरी का उद्देश्य महमूद से भिन्न था — वह स्थायी साम्राज्य चाहता था, और यही अंतर भारतीय इतिहास की दिशा बदल गया।

1178आबू के निकट सोलंकियों से पराजय
1191तराइन प्रथम — पृथ्वीराज तृतीय विजयी
1192तराइन द्वितीय — ग़ोरी विजयी, निर्णायक मोड़
1194चंदावर — जयचन्द पराजित एवं मृत
1206ग़ोरी की हत्या; ऐबक से सल्तनत का आरंभ

बंगाल-बिहार में ग़ोरी के सेनापति बख़्तियार ख़लजी ने अभियान चलाया, जिसमें नालंदा एवं विक्रमशिला जैसे विहार-विश्वविद्यालय नष्ट हुए — इसे भारत में संस्थागत बौद्ध धर्म के लगभग अंत का बिंदु माना जाता है।

08राजपूतों की पराजय के कारण Why the Rajputs Lost

यह प्रश्न मुख्य परीक्षा में सर्वाधिक पूछा जाता है। ध्यान रखें — कारण साहस का अभाव नहीं, बल्कि संगठन, तकनीक एवं दृष्टिकोण का था।

राजनीतिक एवं सामाजिक कारण

  • राजनीतिक विघटन — दर्जनों स्वतंत्र राज्य एवं आपसी शत्रुता; संयुक्त मोर्चा प्रायः विफल।
  • सामंती ढाँचा — सेना सामंतों की टुकड़ियों का जोड़; एकीकृत कमान का अभाव।
  • जाति-कठोरता — युद्ध केवल एक वर्ग का कार्य; व्यापक भर्ती एवं जन-भागीदारी नहीं।
  • बाहरी दुनिया की जानकारी क्षीण — अलबरूनी ने भारतीयों के आत्म-केन्द्रित दृष्टिकोण की स्पष्ट आलोचना की।

सैन्य कारण

  • घुड़सवार तीरंदाज़ बनाम हाथी — तुर्कों की गतिशील अश्वारोही सेना एवं रकाब-नाल तकनीक श्रेष्ठ थी।
  • राजपूत रणनीति रक्षात्मक एवं दुर्ग-केन्द्रित; तुर्क आक्रामक एवं गतिशील।
  • पीछा न करने की परंपरा — तराइन प्रथम के बाद ग़ोरी जीवित लौट गया; तुर्कों ने ऐसी उदारता नहीं दिखाई।
  • गुप्तचर-तंत्र एवं युद्ध-नियोजन में पिछड़ापन; आचार-संहिता-बद्ध युद्ध बनाम पूर्ण-युद्ध की नीति।

09प्रशासन एवं सामंतवाद की बहस Administration and the Feudalism Debate

राजपूत राज्यों का प्रशासन एक शब्द में समझा जा सकता है — सामंती। राजा सीधे शासन नहीं करता था; वह सामंतों की शृंखला के माध्यम से शासन करता था, जो भूमि के बदले सेना एवं कर देते थे।

प्रशासनिक ढाँचा

  • उपाधियाँ — महाराजाधिराज, परमेश्वर, परमभट्टारक।
  • सामंत-श्रेणियाँ — महासामंत, सामंत, राणक, ठक्कुर, राउत
  • इकाइयाँ — मंडल/भुक्ति → विषय → पत्तला → ग्राम।
  • भूमि-अनुदान वंशानुगत; अनुदान-पत्र ताम्रपत्रों पर।
  • ग्राम-स्तर पर पंचायत-सदृश संस्थाएँ; दक्षिण में ग्राम-सभा कहीं अधिक विकसित।

"भारतीय सामंतवाद" — तीन मत

  • आर.एस. शर्मा — भूमि-अनुदान, व्यापार एवं सिक्कों का ह्रास, नगरों का पतन एवं किसान की अधीनता; अर्थात् यूरोप-सदृश सामंतवाद
  • हरबंस मुखिया — भारत में स्वतंत्र किसान-उत्पादन बना रहा; भूदास-प्रथा नहीं थी, अतः यूरोपीय प्रतिमान लागू नहीं होता।
  • बी.डी. चट्टोपाध्याय — यह पतन नहीं, एकीकरणकारी प्रक्रिया थी: नए क्षेत्रों में कृषि-विस्तार तथा नए राज्यों एवं जातियों का निर्माण।
  • परीक्षा-सूत्र — तीनों मत लिखें, फिर निष्कर्ष: "सामंतीकरण की प्रवृत्ति स्पष्ट है, पर यूरोपीय सामंतवाद से पूर्ण समीकरण समस्याजनक है।"

10समाज एवं अर्थव्यवस्था Society and Economy

समाज — कठोरता का शिखर
  • जातियों-उपजातियों का अत्यधिक गुणन; कायस्थ जैसे नए वर्गों का उदय।
  • अस्पृश्यता कठोर; अलबरूनी ने चार वर्ण एवं अंत्यज संरचना का विस्तृत वर्णन किया।
  • स्त्रियों की स्थिति में गिरावट — बाल विवाह, सती, जौहर एवं पर्दा-प्रथा का प्रसार।
  • जौहर राजपूत युद्ध-संस्कृति की विशिष्ट परिघटना; देवदासी प्रथा मंदिरों के साथ।
  • अपवाद — कुछ रानियों की शासन-भूमिका तथा जैन परिवारों में स्त्री-शिक्षा।
अर्थव्यवस्था
  • कृषि-प्रधान एवं आत्मनिर्भर ग्राम; भूमि ही मुख्य सम्पत्ति एवं वेतन।
  • सिक्कों की अल्पता एवं शुद्धता में गिरावट — विनिमय सीमित।
  • मंदिर आर्थिक इकाई — भूमि, दान, ऋण एवं रोज़गार का केन्द्र।
  • व्यापार — उत्तर में क्षीण, पर पश्चिमी तट पर अरब व्यापार तथा दक्षिण में चोल-कालीन समुद्री व्यापार सक्रिय।
  • दक्षिण में व्यापारी संघ सशक्त — मणिग्रामम् एवं अंजुवण्णम्

11धर्म, साहित्य एवं कला Religion, Literature and Art

क · धर्म एवं दर्शन Religion and Philosophy

आचार्य / परंपराकाल (लगभग)सिद्धांत एवं योगदान
शंकराचार्यआठवीं सदीअद्वैत वेदांत; ब्रह्मसूत्र-गीता-उपनिषद पर भाष्य; चार मठ — शृंगेरी, द्वारका, पुरी एवं ज्योतिर्मठ।
रामानुजाचार्यग्यारहवीं-बारहवीं सदीविशिष्टाद्वैत; भक्ति को दार्शनिक आधार; श्रीरंगम केन्द्र।
बसवण्णाबारहवीं सदीवीरशैव/लिंगायत आंदोलन (कर्नाटक); जाति एवं कर्मकांड का विरोध; कन्नड़ वचन साहित्य।
नाथ सम्प्रदायगोरखनाथ; हठयोग एवं सिद्ध-परंपरा — आगे की निर्गुण संत-परंपरा का पूर्वरूप।
तंत्र एवं शाक्त परंपरापूर्वी भारत में प्रबल; पाल-कालीन वज्रयान से भी जुड़ाव।
सूफ़ी मत का आगमनबारहवीं सदी उत्तरार्ध सेमुईनुद्दीन चिश्ती का अजमेर आगमन — आगे के भक्ति-सूफ़ी समन्वय की भूमिका।

ख · साहित्य एवं मंदिर-स्थापत्य Literature and Temple Architecture

साहित्य

  • राजतरंगिणी — कल्हण (1148–50), कश्मीर; आठ तरंगों में — भारत का प्रथम इतिहास-सदृश ग्रंथ
  • पृथ्वीराजरासो — चन्दबरदाई; वीरगाथा-काल की प्रतिनिधि रचना (ऐतिहासिकता विवादित)।
  • गीतगोविन्द — जयदेव, लक्ष्मणसेन का दरबार।
  • कथासरित्सागर — सोमदेव; विक्रमांकदेवचरित — बिल्हण; नैषधीयचरित — श्रीहर्ष।
  • मिताक्षरा — विज्ञानेश्वर; उत्तराधिकार-विधि का आधार।
  • हेमचन्द्र — गुजरात, व्याकरण एवं जैन ग्रंथ; राजशेखर — कर्पूरमंजरी।

मंदिर-स्थापत्य

  • खजुराहो (चंदेल) — कंदरिया महादेव; नागर शैली का शिखर।
  • दिलवाड़ा (आबू) — संगमरमर की जैन उत्कीर्णन-कला; विमल शाह तथा वस्तुपाल-तेजपाल।
  • मोढेरा सूर्य मंदिर एवं रानी की वाव, पाटण (सोलंकी)।
  • लिंगराज मंदिर, भुवनेश्वर तथा जगन्नाथ मंदिर, पुरी (कलिंग शैली)।
  • कैलाश मंदिर, एलोरा (राष्ट्रकूट) — एक ही चट्टान से तराशा गया।
  • दक्षिण — बृहदेश्वर, तंजावुर (द्रविड़ शैली); बेलूर-हलेबिड (होयसल)।
परीक्षा-दृष्टि · निष्कर्ष
  • पूर्व मध्यकाल को "पतन का युग" कहना एकपक्षीय है — राजनीतिक एकता नहीं थी, पर मंदिर-कला, दर्शन एवं क्षेत्रीय भाषाओं का यह उत्कर्ष-काल था।
  • तीन स्थापत्य-शैलियाँ याद रखें — नागर (उत्तर, शिखर), द्रविड़ (दक्षिण, विमान-गोपुरम्), वेसर (दक्कन, मिश्रित)।
  • इस युग की सबसे बड़ी विडंबना — जो शक्तियाँ कन्नौज के लिए आपस में लड़ती रहीं, वे उत्तर-पश्चिम की सीमा पर एकजुट नहीं हो सकीं; और 1192 के बाद उत्तर भारत की सत्ता-संरचना पूरी तरह बदल गई।

12स्वयं जाँच Self Test — 15 Questions

प्रत्येक प्रश्न का एक ही प्रयास मिलेगा। अंक 0 / 15
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