पूर्व मध्यकालीन भारत Early Medieval India · The Rajput Era
आठवीं से बारहवीं शताब्दी तक — सामंतवादी संरचना, त्रिपक्षीय संघर्ष, क्षत्रिय राजवंशों का उदय, अरब एवं तुर्क आक्रमण, तथा दिल्ली सल्तनत की नींव।
इस पृष्ठ में
- 01प्रस्तावना — राजपूत काल क्या है?
- 02प्रमुख राजवंश एवं उनके संस्थापक
- 03त्रिपक्षीय संघर्ष — कन्नौज के लिए जंग
- 04अरब आक्रमण — सिंध का विजय-अभियान
- 05महमूद ग़ज़नवी के आक्रमण
- 06मुहम्मद ग़ोरी — दिल्ली सल्तनत की नींव
- 07सामाजिक एवं आर्थिक जीवन
- 08धर्म, दर्शन एवं सांस्कृतिक स्थिति
- 09वास्तुकला — खजुराहो एवं अन्य
- 10चंदेल वंश — खजुराहो का निर्माण
- 11राजपूत युग का पतन एवं उत्तरजीविता
- 12स्वयं जाँच
01प्रस्तावना — राजपूत काल क्या है? Introduction — The Rajput Age
"राजपूत" शब्द राजपुत्र का अपभ्रंश है — अर्थात शासक वर्ग के पुत्र। 8वीं से 12वीं शताब्दी के बीच उत्तर भारत में अनेक क्षत्रिय वंशों का उदय हुआ, जिन्होंने सामंतवादी ढाँचे में शासन किया। यह युग त्रिपक्षीय संघर्ष, अरब-तुर्क आक्रमणों तथा क्षेत्रीय शक्तियों के उत्थान-पतन का साक्षी रहा।
- सामंतवादी व्यवस्था — भूमि के बदले सैन्य सेवा; राजा के अधीन सामंत (ठाकुर, रावत, राणा)।
- क्षत्रिय वंशों का उदय — गुर्जर-प्रतिहार, चौहान, चंदेल, सोलंकी, परमार, कलचुरी, गहड़वाल आदि।
- कन्नौज की प्रतिष्ठा — "गौड़ के शासक" की उपाधि के लिए त्रिपक्षीय संघर्ष (प्रतिहार, पाल, राष्ट्रकूट)।
- सांस्कृतिक स्वर्णिमता — खजुराहो, भुवनेश्वर, माउंट आबू के मंदिर; संस्कृत एवं अपभ्रंश साहित्य का विकास।
- बाहरी आक्रमणों का सिलसिला — 712 में अरब (सिंध), 1000–1026 में ग़ज़नवी, 1175–1206 में ग़ोरी — अंततः दिल्ली सल्तनत की स्थापना।
02प्रमुख राजवंश एवं उनके संस्थापक Major Dynasties and Founders
परीक्षा-दृष्टि से राजवंश-संस्थापक-राजधानी का त्रिकोण सर्वाधिक पूछा जाता है। नीचे की तालिका में प्रमुख वंशों को संक्षिप्त रूप में समेटा गया है।
| वंश | संस्थापक | राजधानी | प्रमुख शासक |
|---|---|---|---|
| गुर्जर-प्रतिहार | नागभट्ट I (730–760 ई.) | कन्नौज (मिहिरभोज के बाद) | वत्सराज, नागभट्ट II, मिहिरभोज, महेन्द्रपाल |
| पाल (बंगाल-बिहार) | गोपाल (750–770 ई.) | मुंगेर, विशालक (बाद में) | धर्मपाल, देवपाल, महीपाल, रामपाल |
| राष्ट्रकूट (दक्कन) | दंतिदुर्ग (735–756 ई.) | मान्यखेत (कर्नाटक) | कृष्ण I, गोविंद III, अमोघवर्ष, इंद्र III |
| चंदेल (बुंदेलखंड) | नन्नुक (लगभग 9वीं शताब्दी) | खजुराहो, बाद में महोबा | यशोवर्मन, धंग, विद्याधर, परमर्दिदेव |
| सोलंकी (गुजरात) | मूलराज (942–995 ई.) | अणहिलवाड़ (पाटण) | भीमदेव, जयसिंह, कुमारपाल, अजयपाल |
| परमार (मालवा) | उपेन्द्र/कृष्णराज (लगभग 9वीं श.) | धार (उज्जैन) | सिन्धुराज, भोज, उदयादित्य, जयवर्मन |
| चौहान (राजस्थान-दिल्ली) | अजयराज/वासुदेव | अजमेर, बाद में दिल्ली | अजयराज, विग्रहराज, पृथ्वीराज III (चौहान) |
| तोमर (दिल्ली) | अनंगपाल (लगभग 8वीं श.) | दिल्ली (लाल कोट) | अनंगपाल, महिपाल |
| गहड़वाल (कन्नौज) | चंद्रदेव (1089–1103 ई.) | कन्नौज | मदनपाल, गोविन्दचन्द्र, जयचन्द्र |
| कलचुरी (मध्य भारत) | कोक्कल I (845–885 ई.) | त्रिपुरी (जबलपुर) | लक्ष्मणराज, गंगदेव, युवराजदेव |
- गुर्जर-प्रतिहार → कन्नौज · पाल → बंगाल · राष्ट्रकूट → दक्कन
- चंदेल → खजुराहो · सोलंकी → अणहिलवाड़ · चौहान → अजमेर/दिल्ली
- भोज (परमार) — विद्या का प्रिय; जयचन्द्र (गहड़वाल) — पृथ्वीराज का प्रतिद्वंद्वी।
03त्रिपक्षीय संघर्ष — कन्नौज के लिए जंग The Tripartite Struggle for Kannauj
8वीं–10वीं शताब्दी का यह महासंघर्ष मध्यकालीन भारत का सबसे निर्णायक राजनीतिक अध्याय है। तीन शक्तियाँ — गुर्जर-प्रतिहार, पाल एवं राष्ट्रकूट — उत्तरी भारत के सबसे प्रतिष्ठित नगर कन्नौज पर नियंत्रण के लिए आपस में भिड़ीं।
गुर्जर-प्रतिहार "गौड़ के स्वामी"
- नागभट्ट I (730–760) — अरबों के विरुद्ध आरंभिक सफलता; मालवा एवं गुर्जर क्षेत्र में शक्ति।
- वत्सराज (775–805) — पाल नरेश धर्मपाल को पराजित कर कन्नौज पर अधिकार (लगभग 800)।
- मिहिरभोज (836–885) — प्रतिहार वंश का सबसे शक्तिशाली; कन्नौज को राजधानी बनाया; "आदिवराह" उपाधि।
पाल बंगाल-बिहार
- गोपाल (750–770) — जन-निर्वाचित शासक (मत्स्यन्याय के बाद); पाल वंश की नींव।
- धर्मपाल (770–810) — कन्नौज पर अधिकार हेतु अभियान; परंतु वत्सराज से पराजय।
- देवपाल (810–850) — सबसे महान पाल शासक; असम, उड़ीसा तक विस्तार; बौद्ध मठों का संरक्षक।
राष्ट्रकूट दक्कन की ताकत
- दंतिदुर्ग (735–756) — राष्ट्रकूट वंश के संस्थापक; बादामी के चालुक्यों को परास्त।
- गोविंद III (793–814) — उत्तर भारत पर आक्रमण; प्रतिहारों से कन्नौज छीना (लगभग 810) पर स्थायी नियंत्रण नहीं।
- अमोघवर्ष (836–882) — 64 वर्ष का दीर्घ शासन; जैन विद्वानों का संरक्षक; "कविराज" की उपाधि।
परिणाम: अंततः गुर्जर-प्रतिहार कन्नौज पर स्थायी नियंत्रण स्थापित करने में सफल रहे। मिहिरभोज (836–885) के अधीन प्रतिहार साम्राज्य उत्तर भारत की सबसे बड़ी शक्ति बन गया। परंतु यह संघर्ष एक-दूसरे का शक्ति-क्षय कर गया — जिससे बाद में ग़ज़नवी एवं ग़ोरी के आक्रमण सुगम हुए।
- कन्नौज की प्रतिष्ठा — उत्तर भारत के "साम्राज्य-सिंहासन" के रूप में; "गौड़-स्वामी" उपाधि की प्रतिष्ठा।
- प्रतिहार → कन्नौज पर अंतिम विजेता; पाल → बंगाल-बिहार तक सीमित; राष्ट्रकूट → दक्कन में केन्द्रित।
- इस संघर्ष ने राष्ट्रीय चेतना का नहीं, बल्कि सामंतवादी प्रतिद्वंद्विता का परिचय दिया।
04अरब आक्रमण — सिंध का विजय-अभियान Arab Invasion — Conquest of Sindh
मध्यकालीन भारत पर प्रथम इस्लामी आक्रमण 712 ई. में हुआ, जब मुहम्मद बिन क़ासिम ने सिंध पर अधिकार कर लिया। यह अभियान उमय्यद ख़लीफ़ा अल-वलीद के शासनकाल में भेजा गया था।
अरब आक्रमण के कारण
- व्यापारिक-समुद्री मार्ग — अरब व्यापारी सिंध के बंदरगाहों (दयबुल, भरूच) का उपयोग करते थे; समुद्री डकैती ने व्यापार बाधित किया।
- कराची (दयबुल) की घटना — अरब व्यापारी जहाजों को सिंध के राजा दाहिर ने लूटा; ख़लीफ़ा ने दंडात्मक अभियान भेजा।
- इस्लामी विस्तार की नीति — ख़लीफ़ा का पूर्व की ओर विस्तार का महत्वाकांक्षी लक्ष्य।
विजय अभियान एवं परिणाम
- 712 ई. — मुहम्मद बिन क़ासिम ने दयबुल पर आक्रमण किया; फिर नेरुन, सदुसान, सिविस्तान पर अधिकार।
- राजा दाहिर का पतन — अरोर (रोहड़ी) के निकट युद्ध में दाहिर मारा गया; सिंध पर अरब अधिपत्य।
- सिंध अरब साम्राज्य का प्रांत बना; "मनसूरा" को राजधानी बनाया गया।
- अरबों ने धार्मिक नीति में उदारता दिखाई — ज़िम्मी (हिंदू-बौद्ध) को अपने धर्म में रहने की अनुमति; परन्तु जज़िया कर लगाया।
- मुहम्मद बिन क़ासिम की आयु केवल 17 वर्ष थी — इतिहास के सबसे युवा सेनानायकों में से एक।
- सिंध की विजय के बाद अरबों ने मुल्तान तक अधिकार किया, पर राजस्थान-गुजरात में उन्हें प्रतिहारों ने रोक दिया।
- यह आक्रमण भारत में इस्लामी उपस्थिति की नींव बना — पर सिंध से आगे इस्लामी विस्तार अगली शताब्दियों में हुआ।
05महमूद ग़ज़नवी के आक्रमण Mahmud of Ghazni's Invasions
ग़ज़नवी वंश का महमूद (998–1030) भारत पर 17 आक्रमण करने वाला पहला तुर्क शासक था। उसका मुख्य उद्देश्य धर्म-प्रसार नहीं, बल्कि धन-संपदा (ग़ज़नी की भव्यता के लिए) था — पर उसने मंदिर-विध्वंस को अपनी पहचान बना लिया।
| आक्रमण (ई.) | लक्ष्य | विशेषता |
|---|---|---|
| 1000–1001 | पेशावर, बाजौर | पहला आक्रमण; हिंदू शाही शासक जयपाल से युद्ध। |
| 1004–1005 | मुल्तान | इस्माइली (फ़ातिमी) शासक से नगर छीनकर धन-लूट। |
| 1008–1009 | वैहिंद (हिंदू शाही) | आनंदपाल (जयपाल का पुत्र) से युद्ध; तुर्क सेना विजयी। |
| 1018–1019 | मथुरा · कन्नौज | मथुरा के कृष्ण-मंदिर को तोड़ा; कन्नौज पर आक्रमण (तब प्रतिहार शासकों के अधीन)। |
| 1025–1026 | सोमनाथ (गुजरात) | सबसे प्रसिद्ध आक्रमण; सोमनाथ मंदिर को तोड़कर अपार धन (क़रीब 2 करोड़ दीनार) लूटा। |
| 1027 | सौराष्ट्र | सोमनाथ से लौटते समय अन्य नगरों पर अधिकार। |
- सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण से उसकी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा — उसने 'ग़ाज़ी' (धर्म-योद्धा) की उपाधि धारण की।
- इस आक्रमण ने उत्तर भारत की सैनिक कमज़ोरी उजागर की — राजपूत राज्य आपस में बिखरे हुए थे।
- सोमनाथ के लूटे गए धन से ग़ज़नी में भव्य मस्जिदें एवं महल बने; अल-बिरूनी सहित विद्वानों को संरक्षण मिला।
- नकारात्मक प्रभाव — उत्तर भारत के मंदिरों का विध्वंस; सांस्कृतिक संपदा का ह्रास; पर राजनीतिक रूप से कोई स्थायी विजय नहीं।
06मुहम्मद ग़ोरी — दिल्ली सल्तनत की नींव Muhammad Ghori — Foundation of Delhi Sultanate
ग़ज़नवी की तुलना में मुहम्मद ग़ोरी (1173–1206) भारत में स्थायी इस्लामी शासन स्थापित करने वाला पहला शासक था। उसने 1192 के तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज चौहान को पराजित कर दिल्ली-अजमेर पर अधिकार किया, जिससे दिल्ली सल्तनत की नींव पड़ी।
तराइन के युद्ध
- प्रथम युद्ध (1191) — पृथ्वीराज चौहान ने ग़ोरी को भारी पराजय दी; ग़ोरी घायल हुआ पर बच निकला।
- द्वितीय युद्ध (1192) — ग़ोरी ने बेहतर रणनीति (घुड़सवार सेना, तीरंदाजी) से पृथ्वीराज को हराया; पृथ्वीराज बंदी बनाए गए (बाद में मृत्यु)।
- पृथ्वीराज के पतन से दिल्ली-अजमेर का मार्ग प्रशस्त हुआ; राजपूत शक्ति का केन्द्र टूटा।
दिल्ली सल्तनत की स्थापना
- ग़ोरी ने भारत में तुर्क-अफ़ग़ान सेना तैनात की; अपने ग़ुलाम सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक को भारत का शासक नियुक्त किया।
- 1206 — ग़ोरी की हत्या (हिंदू असंतोष/मुल्तान में) के बाद ऐबक ने दिल्ली में स्वतंत्र सल्तनत की स्थापना की — ग़ुलाम वंश (मामलुक) का आरंभ।
- इस प्रकार राजपूत युग का अंत हुआ और दिल्ली सल्तनत (1206–1526) का आरंभ।
- ग़ोरी की सेना में तुर्क-अफ़ग़ान घुड़सवार एवं तीरंदाज़ थे — जो राजपूत भारी पैदल सेना पर भारी पड़े।
- ग़ोरी ने हिंदू शासकों की आपसी दुश्मनी (जयचन्द्र गहड़वाल व पृथ्वीराज) का लाभ उठाया।
- पृथ्वीराज चौहान के पतन के साथ चौहान वंश का अंत नहीं हुआ — पर उसकी सत्ता समाप्त हो गई।
07सामाजिक एवं आर्थिक जीवन Social and Economic Life
सामाजिक संरचना
- वर्ण-व्यवस्था — ब्राह्मणों का उच्च स्थान; क्षत्रिय (राजपूत) शासक वर्ग; वैश्य-शूद्र कृषि-व्यापार में।
- सामंतवाद — भूमि के बदले सैन्य सेवा; राजा, सामंत, ठाकुर, रावत का पदानुक्रम।
- जाति-प्रथा — क्षत्रिय राजपूत वंशों में अनेक शाखाएँ: सूर्यवंशी, चंद्रवंशी, अग्निवंशी (परमार, सोलंकी, चौहान, प्रतिहार)।
- स्त्रियों की स्थिति — सामान्यतः पुरुष-प्रधान; पर कुछ क्षेत्रों में जौहर (सती) की प्रथा का प्रारंभ (राजपूत स्वाभिमान से जुड़ी)।
आर्थिक जीवन
- कृषि — मुख्य आर्थिक आधार; गेहूँ, जौ, धान, कपास, गन्ना; सिंचाई — नहरें, बावड़ियाँ।
- व्यापार — आंतरिक (मंडियाँ) एवं बाह्य (अरब, मध्य एशिया, चीन) समुद्री मार्ग से।
- मुद्रा — चाँदी-ताँबे के सिक्के; राजवंशों के नाम पर; गद्य-पद्य अंकन।
- भू-राजस्व — उपज का 1/6 (भाग) से 1/4 तक; 'भूमिकार' (भू-स्वामी) एवं 'कृषक' वर्ग।
08धर्म, दर्शन एवं सांस्कृतिक स्थिति Religion, Philosophy and Culture
धार्मिक परिदृश्य
- हिंदू धर्म — ब्राह्मण धर्म का पुनरुत्थान; विष्णु-शिव-दुर्गा की पूजा; मंदिर निर्माण का स्वर्णयुग।
- बौद्ध धर्म — पाल वंश के संरक्षण में बिहार-बंगाल में स्थित; नालंदा, विक्रमशिला विश्वविद्यालयों का उत्कर्ष।
- जैन धर्म — राष्ट्रकूट, चालुक्य, सोलंकी संरक्षक; अमोघवर्ष, कुमारपाल (सोलंकी) जैन संप्रदायों के पोषक।
- इस्लाम — सिंध में 712 से; ग़ज़नवी-ग़ोरी अभियानों से उत्तर भारत में प्रसार; पर बड़ी संख्या में नहीं।
संस्कृति एवं साहित्य
- संस्कृत साहित्य — कल्हण की 'राजतरंगिणी' (कश्मीर); भोज (परमार) ने 'सरस्वतीकंठाभरण' की रचना।
- अपभ्रंश साहित्य — जैन विद्वानों ने अपभ्रंश में काव्य-रचना; हेमचंद्र ने 'सिद्धहेमशब्दानुशासन'।
- दर्शन — शंकराचार्य (अद्वैत), रामानुज (विशिष्टाद्वैत) — 8वीं-11वीं शताब्दी में वेदांत का विकास।
- कला — मंदिर-वास्तुकला, मूर्तिकला, चित्रकला (पाल-बंगाल की पुस्तक-चित्रण परंपरा)।
09वास्तुकला — खजुराहो एवं अन्य Architecture — Khajuraho and Beyond
राजपूत काल की वास्तुकला नागर शैली का उत्कर्ष है — ऊँचे शिखर (रेखा-शिखर), मंडप, गर्भगृह, बाह्य मूर्तियाँ एवं अलंकरण। प्रमुख उदाहरण — खजुराहो, भुवनेश्वर, माउंट आबू, सोमनाथ (पुनर्निर्मित), एवं काली-माता मंदिर (चित्तौड़गढ़)।
| स्थल | निर्माता | शैली · विशेषता |
|---|---|---|
| खजुराहो (मध्य प्रदेश) | चंदेल (लगभग 950–1050 ई.) | नागर शैली; 85 मंदिरों में से 25 शेष; काम-कला की मूर्तियाँ; लिंगराज (भगवान शिव) — विशालतम; UNESCO विश्व धरोहर। |
| लिंगराज मंदिर (भुवनेश्वर) | गंग वंश (लगभग 11वीं श.) | उड़ीसा शैली; 180 फ़ीट ऊँचा शिखर; खंडागिरि-उदयगिरि के गुफा-मंदिर भी। |
| दिलवाड़ा जैन मंदिर (माउंट आबू) | सोलंकी (11वीं–13वीं श.) | सफ़ेद संगमरमर; सूक्ष्म नक्काशी; भीमदेव, कुमारपाल के संरक्षण में। |
| सोमनाथ मंदिर (गुजरात) | सोलंकी (पुनर्निर्माण) | मूल मंदिर प्राचीन; महमूद ग़ज़नवी ने 1025 में तोड़ा; सोलंकी शासकों ने पुनः बनवाया। |
| विष्णु मंदिर (ग्वालियर) | गुर्जर-प्रतिहार (9वीं श.) | तेलहरा मंदिर के नाम से; उत्तर भारत के सर्वोत्तम नागर उदाहरणों में। |
- नागर शैली (उत्तर भारत) — ऊँचा वक्र शिखर, मंडप, अलंकृत प्रवेश द्वार; खजुराहो, भुवनेश्वर।
- द्रविड़ शैली (दक्षिण) — सोपान-शिखर (विमान), बड़ा मंडप; इस काल में चोल-मंदिर (तंजावुर)।
- वेसर शैली — मध्य भारत में नागर-द्रविड़ का मिश्रण; कुछ राष्ट्रकूट-चालुक्य मंदिर।
10चंदेल वंश — खजुराहो का निर्माण The Chandela Dynasty — Builders of Khajuraho
राजपूत युग के सबसे रोचक वंशों में चंदेल प्रमुख हैं — न केवल अपनी शौर्य-गाथाओं (आल्हा-ऊदल) के लिए, बल्कि खजुराहो के मंदिरों के लिए, जिन्होंने विश्व-कला को अमूल्य देन दी।
चंदेल वंश का उत्कर्ष
- संस्थापक नन्नुक (9वीं शताब्दी) — प्रतिहारों के सामंत के रूप में आरंभ; बाद में स्वतंत्र।
- यशोवर्मन (925–950) — खजुराहो के प्रथम विशाल मंदिर (लक्ष्मण-मंदिर) का निर्माण; चंदेल शक्ति का आरंभ।
- धंग (950–1002) — चंदेल वंश का सबसे महान शासक; विद्याधर (1020–1030) — ग़ज़नवी के समकालीन, सोमनाथ के बाद ग़ज़नवी को रोका।
खजुराहो के मंदिर
- निर्माण-काल — 950 से 1050 ई. के बीच; कुल 85 मंदिर (अब 25 शेष)।
- प्रमुख मंदिर — कंदरिया महादेव (शिव), लक्ष्मण (विष्णु), विश्वनाथ, देवी जगदंबा, चतुर्भुज।
- विशेषता — नागर शैली में ऊँचे शिखर, अत्यंत सूक्ष्म नक्काशी; काम-कला की मूर्तियाँ (प्रेम-जीवन के दृश्य) — जिन्हें "काम-कला" या "मैथुन-कला" कहा जाता है; पर वे धार्मिक-प्रतीकात्मक (शक्ति-तत्त्व) मानी जाती हैं।
- UNESCO विश्व धरोहर — 1986 में सम्मिलित।
- "आल्हा-ऊदल" — परमर्दिदेव (चंदेल शासक) के सेनापति; युद्ध-गाथा प्रसिद्ध।
- विद्याधर (11वीं शताब्दी) — महमूद ग़ज़नवी से संघर्ष; ग़ज़नवी को अपने क्षेत्र में आगे नहीं बढ़ने दिया।
- चंदेल वंश का अंत — 13वीं शताब्दी में गोरखा-तुर्क आक्रमणों से; कालांतर में बुंदेलखंड में विलीन।
11राजपूत युग का पतन एवं उत्तरजीविता Decline of the Rajput Era and Legacy
राजपूत युग का पतन बाहरी आक्रमण एवं आंतरिक कमज़ोरी का परिणाम था — पर "पतन" का अर्थ समाज का अंत नहीं, बल्कि शासन-व्यवस्था का परिवर्तन था।
| कारण | विवरण |
|---|---|
| आंतरिक विभाजन | राजपूत वंश आपस में निरंतर युद्धरत; पृथ्वीराज–जयचन्द्र की दुश्मनी ने ग़ोरी को मौका दिया। |
| सामंतवादी कमज़ोरी | केन्द्रीय शक्ति कमज़ोर; सामंत स्वतंत्र होते गए; एक-जुट सेना का अभाव। |
| सैनिक तकनीक में पिछड़ापन | तुर्क-अफ़ग़ान सेना के घुड़सवार तीरंदाज़ एवं रण-कौशल से भारी पैदल सेना हारी; गोरी की घुड़सवार-रणनीति निर्णायक। |
| गज़नवी–ग़ोरी आक्रमण | गज़नवी ने आर्थिक-सांस्कृतिक क्षति पहुँचाई; ग़ोरी ने स्थायी शासन स्थापित किया; 1192 के बाद उत्तर भारत में तुर्क शक्ति। |
| आर्थिक स्त्रोतों का ह्रास | मंदिर-लूट, युद्ध-व्यय, कृषि-उत्पादन में गिरावट; राजकोष कमज़ोर। |
- राजपूत वंश क्षत्रिय समाज का एक महत्वपूर्ण अंग बने रहे; मेवाड़ (सिसोदिया), मारवाड़, बूँदी, जयपुर आदि रियासतों ने मुग़ल काल में भी शासन जारी रखा।
- राजपूत वीरता, स्वाभिमान, सती-जौहर की परंपरा — लोक-स्मृति में अमर।
- मध्यकालीन राजपूत वास्तुकला, साहित्य, संगीत का प्रभाव आज भी विद्यमान है; राजस्थान की लोक-कला इस विरासत को संजोए हुए है।
- राजपूत युग की सामंतवादी व्यवस्था का अंत — पर क्षत्रिय चेतना आज भी भारतीय समाज में जीवित है।