पूर्व मध्यकालीन भारत
Early Medieval India · Cholas & South Indian Dynasties
लगभग छठी से तेरहवीं शताब्दी तक दक्षिण भारत में चोल, पल्लव, पांड्य एवं चालुक्य-राष्ट्रकूट जैसे शक्तिशाली राजवंशों का उत्कर्ष। यह युग क्षेत्रीय साम्राज्यों, भव्य मंदिर-स्थापत्य, समुद्री व्यापार और भक्ति आन्दोलन का अद्भुत संगम था — जिसने आधुनिक दक्षिण भारत की सांस्कृतिक नींव रखी।
इस पृष्ठ में
- 01भूमिका · पूर्व मध्यकालीन दक्षिण भारत
- 02पल्लव — मंदिर-स्थापत्य के आधार
- 03चालुक्य एवं राष्ट्रकूट
- 04चोल — विजयालय से परांतक तक
- 05राजराजा प्रथम — महान विजेता
- 06राजेन्द्र प्रथम — समुद्रपार विजेता
- 07चोल प्रशासन — मंडल, नाडु, उर
- 08अर्थव्यवस्था — कृषि, सिंचाई, व्यापार
- 09भक्ति आन्दोलन, समाज एवं धर्म
- 10द्रविड़ स्थापत्य — बृहदेश्वर, गंगैकोंड
- 11पांड्य, चेर तथा साम्राज्य का अंत
- 12स्वयं जाँच
01भूमिका · पूर्व मध्यकालीन दक्षिण भारत Introduction and Sources
उत्तर भारत में हर्ष के पतन के बाद जहाँ राजनीतिक विखंडन बढ़ा, वहीं दक्षिण भारत में चोल, पल्लव, पांड्य और चालुक्य-राष्ट्रकूट ने शक्तिशाली क्षेत्रीय साम्राज्य स्थापित किए। इस काल में नगरीकरण, सिंचाई व्यवस्था, मंदिर-निर्माण, एवं समुद्री व्यापार अपने चरम पर था।
प्रमुख स्रोत
- शिलालेख — तमिल एवं ग्रंथ लिपि में मंदिर-दीवारों पर उत्कीर्ण (चोल, पल्लव, पांड्य)।
- ताम्रपत्र — भू-अनुदान एवं राजनैतिक दस्तावेज़ (जैसे — कोरंड काराड़)।
- विदेशी यात्री — अल-बिरूनी (महमूद गजनवी के साथ), मार्को पोलो (पांड्य काल)।
- स्थापत्य एवं मूर्तिकला — बृहदेश्वर, मामल्लपुरम, एलोरा (कैलाश) – पुरातात्त्विक प्रमाण।
इस युग की मुख्य विशेषताएँ
- मंदिर केन्द्रित सामाजिक-आर्थिक जीवन; देवदान, ब्रह्मदेय भूमि-व्यवस्था।
- तीव्र भक्ति आन्दोलन — आलवार (विष्णु) एवं नयनार (शिव)।
- द्रविड़ शैली में शिखर एवं गोपुरम का विकास।
- कृषि-अधिशेष एवं व्यापार-मंडलियाँ (श्रेणियाँ) – दक्षिण-पूर्व एशिया से घनिष्ठ सम्पर्क।
02पल्लव राजवंश Pallavas — The Architectural Pioneers
लगभग चौथी से नवीं शताब्दी तक दक्षिण-पूर्वी भारत में छाए पल्लव (राजधानी — कांचीपुरम) ने द्रविड़ मंदिर-स्थापत्य की नींव रखी। वे चालुक्यों के प्रतिद्वंद्वी थे और उन्होंने समुद्री व्यापार को बढ़ावा दिया।
प्रमुख शासक
- महेन्द्रवर्मन प्रथम (600-630 ई.) — गुफा मंदिरों का आरंभ; 'विचित्रचित्त' उपाधि।
- नरसिंहवर्मन प्रथम (मामल्ल) (630-668 ई.) — वातापी (चालुक्य राजधानी) पर विजय; मामल्लपुरम (महाबलीपुरम) का निर्माण।
- नरसिंहवर्मन द्वितीय (700-728 ई.) — चेन्नाकेशव मंदिर एवं कैलाशनाथ मंदिर (कांची)।
स्थापत्य विशेषताएँ
- रथ मंदिर (पंचरथ) — एकाश्म शिला पर तराशे गए मंदिर (मामल्लपुरम)।
- तट-मंदिर (Shore Temple) — बंगाल की खाड़ी के किनारे स्थित।
- सिंह-स्तम्भ एवं पल्लव-ग्रेनाइट नक्काशी।
- स्वर्गीय द्वार (महाबलीपुरम) — रामायण-महाभारत की कथाएँ उत्कीर्ण।
03चालुक्य एवं राष्ट्रकूट Chalukyas & Rashtrakutas
पश्चिमी एवं मध्य दक्कन में बादामी चालुक्य (543-753 ई.) तथा उनके उत्तराधिकारी राष्ट्रकूट (753-973 ई.) ने शक्तिशाली राज्य स्थापित किए। एलोरा की कैलाश गुफा राष्ट्रकूट कला का अद्वितीय उदाहरण है।
| वंश | काल | प्रमुख शासक | विशेषता |
|---|---|---|---|
| बादामी चालुक्य | 543–753 ई. | पुलकेशिन प्रथम, पुलकेशिन द्वितीय | वातापी राजधानी; हर्ष को पराजित किया (नर्मदा तट)। |
| राष्ट्रकूट | 753–973 ई. | दन्तिदुर्ग, अमोघवर्ष प्रथम, कृष्ण प्रथम | एलोरा (गुफा 16) — कैलाश मंदिर; संस्कृत-प्राकृत साहित्य को संरक्षण। |
| पश्चिमी चालुक्य | 973–1189 ई. | तैलप द्वितीय, विक्रमादित्य षष्ठ | चोलों के प्रतिद्वंद्वी; कल्याणी राजधानी। |
राष्ट्रकूटों ने कन्नड़ एवं संस्कृत साहित्य को विशेष संरक्षण दिया; 'कविराजमार्ग' प्रथम कन्नड़ काव्य-ग्रंथ।
04चोल — विजयालय से परांतक तक Rise of the Cholas — Vijayalaya to Parantaka
पल्लवों के पतन के बाद विजयालय (लगभग 850 ई.) ने तंजावुर पर अधिकार कर चोल वंश की पुनः स्थापना की। उसके पुत्र आदित्य प्रथम ने पल्लवों का अंत किया, और परांतक प्रथम (907-955 ई.) ने श्रीलंका तक अभियान भेजा, जो चोल साम्राज्य की नींव बना।
- विजयालय — चोल राजवंश का पुनर्संस्थापक; तंजावुर में विजयालयेश्वर मंदिर का निर्माण।
- आदित्य प्रथम — पल्लवों को पराजित कर कांची पर अधिकार; 'कोप्परकेशरि' उपाधि।
- परांतक प्रथम — मदुराई (पांड्य राजधानी) पर विजय; तंजावुर में कोरकई एवं गोल्डन लोटस मंडप का निर्माण।
- इन्हीं शासकों ने सिंचाई-तालाबों (कावेरी डेल्टा) का जाल बिछाकर चोल अर्थव्यवस्था को मजबूत किया।
05राजराजा प्रथम — महान विजेता Rajaraja I — The Great Conqueror
राजराजा प्रथम (985-1014 ई.) चोल साम्राज्य का सबसे महानतम शासक था। उसने पूरे दक्षिण भारत (चेर, पांड्य, श्रीलंका, लक्षद्वीप) को एक सूत्र में बाँधा। उसका बृहदेश्वर मंदिर (तंजावुर) द्रविड़ स्थापत्य का अद्वितीय नमूना है।
सैन्य उपलब्धियाँ
- श्रीलंका विजय — पोलोन्नारुवा पर अधिकार, अनुराधापुरम में चोल-राजधानी स्थापित।
- चेर (केरल), पांड्य (मदुराई) को अपने साम्राज्य में मिलाया।
- पश्चिमी चालुक्यों (सत्याश्रय) को पराजित कर दक्कन में चोल प्रभाव स्थापित किया।
- लक्षद्वीप, मालदीव तक नौसेना अभियान।
बृहदेश्वर मंदिर (तंजावुर)
- निर्माण — 1009-1010 ई.; 66 मीटर ऊँचा विमान (गर्भगृह के ऊपर शिखर)।
- एकाश्म (monolithic) शिखर — 80 टन का पत्थर; किसी चरखी/ढलान से चढ़ाया गया।
- दीवारों पर राजराजा के अभिलेख — देवदान, प्रशासन, नर्तकी, ब्यौरे।
- यह मंदिर यूनेस्को विश्व धरोहर (ग्रेट लिविंग चोल टेम्पल्स) का भाग है।
06राजेन्द्र प्रथम — समुद्रपार विजेता Rajendra I — The Victor of Kadaram
राजेन्द्र प्रथम (1014-1044 ई.) ने चोल साम्राज्य को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाई। उसने श्रीविजय (कादारम) पर समुद्री अभियान चलाकर भारत-दक्षिण पूर्व एशिया व्यापार पर अधिकार किया और अपनी नई राजधानी गंगैकोंडचोलपुरम बसाई।
प्रमुख अभियान
- कादारम (श्रीविजय) अभियान (1025 ई.) — मलय द्वीपसमूह (सुमात्रा, मलाया) तक चोल नौसेना पहुँची।
- श्रीलंका की पूर्ण विजय; उत्तर भारत (गंगा-तट) तक अभियान — 'गंगैकोंड' (गंगा-विजेता) की उपाधि।
- पांड्य, चेर, एवं पश्चिमी चालुक्यों के विरुद्ध निर्णायक विजय।
गंगैकोंडचोलपुरम
- राजेन्द्र ने गंगा-जल लाकर एक विशाल सिंचाई-तालाब (चोलगंगा) का निर्माण किया।
- यहाँ का बृहदेश्वर मंदिर (राजेन्द्रकेश्वर) — तंजावुर से भी बड़ा विमान; लेकिन आज खंडहर।
- यह नई राजधानी थी, जो चोल साम्राज्य की असीम शक्ति का प्रतीक थी।
07चोल प्रशासन — मंडल, नाडु, उर Chola Administration — Mandalams, Nadus, Urs
चोल प्रशासन विकेंद्रीकृत था, पर नियंत्रण की बागडोर राजा के पास ही थी। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि स्थानीय स्वायत्तता (ग्राम-सभाएँ) थी — जो प्रशासनिक इतिहास में अद्वितीय है।
| इकाई | प्रभारी | विशेषता |
|---|---|---|
| मंडलम (प्रान्त) | राजकुमार / महामण्डलेश्वर | 7-8 मंडल; साम्राज्य विस्तार के साथ बढ़े। |
| नाडु (जिला) | नाडुप्रमुख | कर-संग्रह, न्याय, सिंचाई का प्रबंध। |
| उर / कुर्रम (ग्राम) | ग्राम-सभा (सभा) | स्थानीय स्वशासन — 'उर' (ग्राम), 'सभा' (ब्राह्मण ग्राम), 'नगरम' (व्यापारिक केन्द्र)। |
| कुडोलवई (निर्वाचन) | सभा सदस्य | उत्खननों में मिले उत्तमेरूर शिलालेख से ज्ञात होता है कि सदस्यों का चुनाव पर्ची-प्रणाली (lottery) से होता था। |
08अर्थव्यवस्था — कृषि, सिंचाई, व्यापार Economy — Agriculture, Irrigation, Trade
चोल अर्थव्यवस्था की रीढ़ था कावेरी डेल्टा — जहाँ राज्य द्वारा निर्मित तालाबों एवं नहरों (कलिंगरायन, चोलगंगा) ने कृषि-उत्पादन को अभूतपूर्व बढ़ाया। व्यापार-मंडलियाँ (श्रेणियाँ) और समुद्री-व्यापार ने साम्राज्य को विश्व-बाजार से जोड़ा।
कृषि एवं भू-राजस्व
- भूमि तीन प्रकार की — पदयम् (सिंचित), पूंजेय (सूखी), तरुनी (जंगल/बंजर)।
- राजस्व — उपज का 1/3 (मौर्यों की तुलना में अधिक) — तीव्र सिंचाई के कारण अधिक उत्पादन।
- मंदिरों को देवदान भूमि; ब्राह्मणों को ब्रह्मदेय; सैनिकों को क्षत्रिय-भोग।
व्यापार एवं श्रेणियाँ
- व्यापार-मंडलियाँ — 'मणिग्राम', 'अय्यावोल' (500 स्वामी) — दक्षिण-पूर्व एशिया से व्यापार।
- निर्यात — वस्त्र, हाथीदाँत, मसाले, मोती; आयात — रेशम, चीनी मिट्टी (चीन से), घोड़े (अरब से)।
- कर — व्यापार-कर (शुल्क), नौका-कर, पेशेवर-कर; सिक्के — 'कलंजु' (स्वर्ण), 'काशु' (ताँबा)।
09भक्ति आन्दोलन, समाज एवं धर्म Bhakti Movement, Society and Religion
दक्षिण भारत में भक्ति आन्दोलन (शैव-वैष्णव) का उदय पल्लव-चोल काल में हुआ। आलवार (विष्णु के 12 भक्त) और नयनार (शिव के 63 भक्त) ने तमिल में अमर भक्ति-पद रचे; इन्हीं के प्रभाव में मंदिर-निर्माण एवं पूजा-पद्धति का विकास हुआ।
समाज
- वर्ण-व्यवस्था कठोर; पर ब्राह्मणों (भू-स्वामित्व) और वैश्यों (व्यापार) का प्रभुत्व।
- शूद्रों (कृषक) की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर; अछूत-वर्ग अलग-थलग।
- मंदिर सामाजिक-आर्थिक केन्द्र — वितरण, स्कूल, अस्पताल, धर्मशाला।
- सती, बाल-विवाह के साक्ष्य (विशेषकर राजवंशों में), पर सामान्य जन में अधिक स्वतंत्रता।
धर्म · भक्ति
- राजा मंदिरों का प्रमुख संरक्षक; राजराज-राजेन्द्र ने शैव मंदिरों को विशेष दान दिया।
- आलवार — नम्मालवार, थिरुमंगई, पेरियालवार; उनके गीत 'दिव्य प्रबंध'।
- नयनार — थिरुज्ञान संबंधर, अप्पर, सुंदरर; उनका 'तेवारम' (शैव तमिल भक्ति-संग्रह)।
- बौद्ध-जैन धर्म का प्रभाव घटा; मंदिर-हिन्दू धर्म सर्वोपरि हो गया।
10द्रविड़ स्थापत्य — बृहदेश्वर, गंगैकोंड Dravidian Architecture — Brihadeeswara, Gangaikondacholapuram
चोल-कालीन वास्तुकला द्रविड़ शैली का शिखर है। विमान (शिखर), गोपुरम (प्रवेश-द्वार), मंडप, एवं विशाल प्रांगण — सभी ग्रेनाइट पत्थर से बने, बिना चूना/मसाले के। कांस्य मूर्तियाँ (विशेषकर नटराज) चोल कला की पहचान हैं।
- बृहदेश्वर (तंजावुर) — 66 मीटर ऊँचा विमान; एकाश्म शिखर; दीवारों पर 1000 से अधिक शिलालेख।
- गंगैकोंडचोलपुरम — राजेन्द्र प्रथम का मंदिर; तंजावुर से 3 गुना बड़ा आकार, पर अब खंडहर।
- कांस्य मूर्तियाँ — 'लॉस्ट-वैक्स' (मोम-विधि) से बनी; नटराज (शिव-तांडव) चोल कला की सर्वोत्कृष्ट कृति।
- दारु-लिखित शिल्प-ग्रंथ, मंडपों में रामायण-महाभारत के दृश्य।
11पांड्य, चेर तथा साम्राज्य का अंत Pandyas, Cheras and the Decline
राजेन्द्र के बाद चोल साम्राज्य धीरे-धीरे कमजोर पड़ा। पांड्य और चेर (केरल) ने फिर से शक्ति प्राप्त की। मार्को पोलो (1293 ई.) ने पांड्य राज्य की समृद्धि का वर्णन किया। 1279 ई. में पांड्य शासक जटावर्मन सुंदर पांड्य ने अन्तिम चोल सम्राट राजेन्द्र तृतीय को पराजित कर चोल वंश का अंत कर दिया।
पांड्य एवं चेर
- पांड्य — राजधानी मदुराई; ताम्रपर्णी घाटी; प्राचीन तमिल साहित्य के संरक्षक।
- चेर — राजधानी वंजी (केरल); कालीकट, कोच्चि व्यापार-केन्द्र।
- मार्को पोलो ने पांड्य राज्य को "विश्व का सबसे धनी राज्य" कहा (मोती, रत्न, मसालों का व्यापार)।
पतन के कारण
- दुर्बल उत्तराधिकारी — कुलोत्तुंग प्रथम (1070-1120) के बाद शासक अयोग्य।
- सामन्तों का उदय — स्थानीय सरदार (सामन्त) स्वतंत्र होने लगे।
- पांड्यों का पुनरुत्थान — निरंतर युद्धों ने चोल खजाने को खाली किया।
- व्यापार-मार्गों का बदलना — उत्तरी भारत के मुस्लिम राज्यों के उदय से व्यापार पुनर्निर्देशित हुआ।