examcg.com  ·  प्राचीन भारत · अध्याय 01

प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत

Sources of Ancient Indian History — तथ्य-सत्यापित एवं विस्तारित नोट्स

  • UPSC / IAS
  • CGPSC
  • CG TET
  • UGC NET
  • SSC
  • व्यापम
  • रेलवे
  • बैंक
खंड 01

स्रोतों का वर्गीकरण

प्राचीन भारतीय इतिहास की जानकारी मुख्यतः तीन व्यापक वर्गों से प्राप्त होती है, जिन्हें प्रायः चार उपवर्गों में बाँटकर पढ़ाया जाता है।

क्रमस्रोतउपविभाजन
1धार्मिक साहित्यवैदिक (ब्राह्मण), बौद्ध, जैन
2लौकिक / धर्मनिरपेक्ष साहित्यऐतिहासिक ग्रंथ, जीवनचरित, नाटक-काव्य, संगम साहित्य
3पुरातात्विक साक्ष्यअभिलेख, सिक्के, स्मारक, मूर्तियाँ, उत्खनन सामग्री
4विदेशी विवरणयूनानी-रोमन, चीनी-तिब्बती, अरबी-फ़ारसी

↔ तालिका को क्षैतिज रूप से स्क्रॉल किया जा सकता है

शब्दावली: अभिलेखों के अध्ययन को पुरालेखशास्त्र (Epigraphy), लिपियों के अध्ययन को पुरालिपिशास्त्र (Palaeography) तथा सिक्कों के अध्ययन को मुद्राशास्त्र (Numismatics) कहते हैं।

खंड 02

वैदिक साहित्य

प्राचीन काल से भारत में तीन प्रमुख धार्मिक धाराएँ प्रवाहित हुईं — वैदिक, बौद्ध एवं जैन। वैदिक धर्मग्रंथों को ब्राह्मण साहित्य भी कहा जाता है।

वेद — सामान्य परिचय

  • 'वेद' शब्द संस्कृत की 'विद्' धातु से बना है, जिसका अर्थ है जानना
  • वेदों को अपौरुषेय (दैवकृत) तथा श्रुति कहा जाता है।
  • संकलनकर्ता — महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास
  • वेदों की कुल संख्या चार — ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद।
  • वेदत्रयी — ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद (अथर्ववेद बाद का है)।

वेद, पुरोहित एवं उपवेद

वेदसम्बद्ध पुरोहितउपवेदप्रमुख विषय
ऋग्वेदहोतृ / होताआयुर्वेददेवस्तुति, ऋचाएँ
सामवेदउद्गातृगंधर्ववेदसंगीत, गान
यजुर्वेदअध्वर्युधनुर्वेदयज्ञ-विधि
अथर्ववेदब्रह्माशिल्पवेद / स्थापत्यवेदऔषधि, जादू-टोना

(क) ऋग्वेद

  • चारों वेदों में सर्वाधिक प्राचीन; यह भारत ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व की प्राचीनतम उपलब्ध रचना है।
  • रचनाकाल — लगभग 1500–1000 ई.पू.
  • मन्त्रों का उच्चारण यज्ञ के अवसर पर होतृ ऋषि करते थे।
  • संरचना — 10 मण्डल, 8 अष्टक, 1028 सूक्त एवं लगभग 10,462 ऋचाएँ
  • पुरुष रचयिता — गृत्समद, विश्वामित्र, वामदेव, अत्रि, भारद्वाज, वसिष्ठ।
  • स्त्री रचयिता — लोपामुद्रा, घोषा, शची पौलोमी, अपाला, विश्ववारा, सिकता निवावरी, काक्षावृती।

मण्डलों की विशेषताएँ

मण्डलविशेषता
2 से 7वंश / गोत्र मण्डल — सर्वाधिक प्राचीन भाग
1 एवं 10सबसे अन्त में जोड़े गए (नवीनतम)
3गायत्री मन्त्र (ऋ. 3.62.10) — रचयिता विश्वामित्र, देवता सविता (सूर्य); इसे 'सावित्री' भी कहते हैं
8वालखिल्य सूक्त (8.49–8.59) — इन प्रक्षिप्त सूक्तों को 'खिल' कहा गया
9पूर्णतः सोम देवता को समर्पित (सोम एक लता / पौधा था)
10पुरुषसूक्त — शूद्रों का प्रथम उल्लेख; चातुर्वर्ण्य का आदि स्रोत; नासदीय सूक्त (सृष्टि-उत्पत्ति)
  • पाँच शाखाएँ — शाकल, वाष्कल, आश्वलायन, शांखायन, माण्डूक्य।
  • विष्णु के वामनावतार (त्रिविक्रम) के तीन पगों का प्राचीनतम स्रोत ऋग्वेद है।
  • ऋग्वेद में 'गाय' शब्द 176 बार, 'जन' 275 बार तथा 'विश्' 171 बार आया है।
  • गंगा का उल्लेख केवल एक बार (10वें मण्डल में) और यमुना का तीन बार
  • सर्वाधिक उल्लिखित नदी सिन्धु; सर्वाधिक पवित्र नदी सरस्वती ("नदीतमा")।

(ख) सामवेद

  • 'साम' का अर्थ 'गान' — यह गान-प्रधान ग्रंथ है।
  • मन्त्रों का गान सोमयज्ञ के अवसर पर उद्गातृ पुरोहित करते थे।
  • इसमें लगभग 1875 ऋचाएँ हैं, जिनमें 75 को छोड़कर शेष सभी ऋग्वेद से ली गई हैं।
  • प्रमुख देवता — सविता / सूर्य
  • सामवेद को भारतीय संगीत का जनक कहा जाता है।
  • तीन शाखाएँ — कौथुम, जैमिनीय (तल्वकार), राणायनीय।

(ग) यजुर्वेद

  • 'यजुष' का अर्थ 'यज्ञ'; मन्त्रोच्चारण अध्वर्यु करते थे।
  • यह एकमात्र वेद है जो गद्य और पद्य दोनों में है। गद्य भाग 'यजुष' कहलाता है।
  • कृष्ण यजुर्वेद — मन्त्र + गद्य मिश्रित। शाखाएँ: तैत्तिरीय, काठक, कपिष्ठल, मैत्रायणी।
  • शुक्ल यजुर्वेद — केवल मन्त्र। शाखाएँ: माध्यन्दिन एवं काण्व। संहिता वाजसनेयी कहलाती है, क्योंकि द्रष्टा वाजसनि के पुत्र याज्ञवल्क्य थे।
  • पतंजलि के अनुसार यजुर्वेद की 101 शाखाएँ थीं; आज केवल पाँच उपलब्ध हैं।
  • मैत्रायणी संहिता में स्त्रियों की सर्वाधिक निम्न स्थिति — जुआ और शराब के बाद स्त्री को पुरुष का तीसरा प्रमुख दोष बताया गया।
  • यजुर्वेद से उत्तर-वैदिक काल की राजनीतिक, सामाजिक व धार्मिक स्थिति ज्ञात होती है; राजसूय, वाजपेय व अश्वमेध यज्ञों का विस्तृत विवरण।

(घ) अथर्ववेद

  • रचयिता अथर्वा ऋषि; दूसरे द्रष्टा आंगिरस — इसीलिए अथर्वाङ्गिरसवेद भी कहते हैं।
  • अन्य नाम — ब्रह्मवेद, भैषज्यवेद, क्षत्रवेद
  • संरचना — 20 काण्ड, 731 सूक्त एवं लगभग 5987 मन्त्र
  • विषय — ब्रह्मज्ञान, औषधि, रोग-निवारण, जादू-टोना, तन्त्र-मन्त्र, विवाह, शाप।
  • इसी वेद में कन्याओं के जन्म की निंदा की गई है।
  • दो शाखाएँ — पिप्पलाद एवं शौनक।
  • सभा और समिति को प्रजापति की दो पुत्रियाँ अथर्ववेद में कहा गया है।
  • परीक्षित को 'कुरुओं का राजा' कहते हुए कुरु-देश की समृद्धि का वर्णन।
  • अथर्ववेद को दीर्घकाल तक वेदत्रयी में स्थान नहीं मिला, क्योंकि इसमें लोक/अनार्य परम्पराओं का समावेश था।
खंड 03

ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद

ब्राह्मण ग्रंथ

यज्ञों एवं कर्मकाण्डों के विधान व क्रियाओं की गद्यात्मक व्याख्या करने वाले ग्रंथ। प्रत्येक वेद के अपने ब्राह्मण होते हैं।

वेदब्राह्मण ग्रंथ
ऋग्वेदऐतरेय, कौषीतकी (शांखायन)
यजुर्वेदशतपथ (वाजसनेयी), तैत्तिरीय
सामवेदपंचविंश (ताण्ड्य महाब्राह्मण), षड्विंश, जैमिनीय
अथर्ववेदगोपथ — अथर्ववेद का एकमात्र ब्राह्मण
  • शतपथ ब्राह्मण — सबसे बड़ा ब्राह्मण; ऋग्वेद के बाद सर्वोच्च ऐतिहासिक महत्व। इसमें विदेह माधव की पूर्व दिशा की आर्य-प्रसार यात्रा, गान्धार-कैकेय-कोसल-विदेह का उल्लेख तथा तीन ऋणों (देव, पितृ, ऋषि) की अवधारणा मिलती है।
  • ऐतरेय ब्राह्मण — राज्याभिषेक विधियाँ तथा साम्राज्य, भौज्य, स्वाराज्य, वैराज्य जैसे शासन-प्रकारों का वर्णन।

आरण्यक

अरण्य (वन) में पढ़े जाने के कारण यह नाम पड़ा। इनमें दार्शनिक एवं रहस्यात्मक विषयों का विवेचन है; ये कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड के बीच सेतु हैं। कुल संख्या सात:

  • ऐतरेय आरण्यक
  • शांखायन आरण्यक
  • तैत्तिरीय आरण्यक
  • मैत्रायणी आरण्यक
  • माध्यन्दिन बृहदारण्यक
  • तल्वकार आरण्यक
  • जैमिनीय आरण्यक

उपनिषद

  • शाब्दिक अर्थ — 'समीप बैठना', अर्थात् ब्रह्मविद्या हेतु गुरु के समीप बैठना।
  • ब्रह्म-विषयक होने से इन्हें ब्रह्मविद्या कहा जाता है।
  • वैदिक साहित्य का अंतिम भाग होने से इन्हें 'वेदान्त' कहा जाता है।
  • रचनाकाल — लगभग 800–500 ई.पू.; कुल संख्या 108 (मुक्तिकोपनिषद के अनुसार)।
  • प्रमुख — ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक, श्वेताश्वतर, कौषीतकी, जाबाल।
तथ्यस्रोत
'सत्यमेव जयते' — भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्यमुण्डकोपनिषद
'असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय'बृहदारण्यक उपनिषद
सबसे प्राचीन एवं सबसे बड़ा उपनिषदबृहदारण्यक
तीन आश्रमों का प्रथम उल्लेखछान्दोग्य उपनिषद
चारों आश्रमों का प्रथम स्पष्ट उल्लेखजाबालोपनिषद
नचिकेता–यम संवाद (आत्मा एवं मृत्यु दर्शन)कठोपनिषद
सत्यकाम जाबाल की कथाछान्दोग्य उपनिषद

उपनिषदों में प्रतिपादित निष्काम कर्म एवं भक्ति मार्ग का पूर्ण विकास भगवद्गीता में हुआ।

खंड 04

वेदांग एवं स्मृतियाँ

छह वेदांग

वेदांगविषयप्रमुख ग्रंथ / आचार्य
शिक्षाशुद्ध उच्चारण, स्वरप्रातिशाख्य (प्राचीनतम)
कल्पकर्मकाण्ड की विधिकल्पसूत्र — श्रौत, गृह्य, धर्म एवं शुल्बसूत्र
व्याकरणसन्धि, समास, प्रत्ययपाणिनि — अष्टाध्यायी (संस्कृत व्याकरण का प्रथम ग्रंथ)
निरुक्तशब्द-व्युत्पत्तियास्क — निरुक्त; 'निघण्टु' की व्याख्या; भाषाशास्त्र का प्रथम ग्रंथ
छन्दगायत्री, त्रिष्टुप्, जगती, बृहती, अनुष्टुप्पिंगल — छन्दसूत्र
ज्योतिषकाल-गणना, नक्षत्रलगध — वेदांग ज्योतिष

शुल्बसूत्र — यज्ञ-वेदी निर्माण की ज्यामिति; इसे भारतीय ज्यामिति का प्राचीनतम ग्रंथ माना जाता है।

स्मृतियाँ (धर्मशास्त्र)

  • मनुस्मृति — सबसे प्राचीन एवं महत्वपूर्ण; रचनाकाल लगभग 200 ई.पू. – 200 ई. (शुंग काल); इसे 'मानव धर्मशास्त्र' भी कहते हैं।
  • याज्ञवल्क्य स्मृति — गुप्तकाल; तीन काण्ड — आचार, व्यवहार, प्रायश्चित।
  • नारद स्मृति — गुप्तकालीन सामाजिक-आर्थिक जीवन का प्रमुख स्रोत।
  • अन्य — विष्णु, पराशर एवं बृहस्पति स्मृति।
मूल ग्रंथटीकाकार एवं टीका
मनुस्मृतिमेधातिथि (मनुभाष्य), कुल्लूक भट्ट (मन्वर्थमुक्तावली), भारुचि, गोविन्दराज
याज्ञवल्क्य स्मृतिविज्ञानेश्वर — मिताक्षरा (अत्यंत महत्वपूर्ण), विश्वरूप (बालक्रीड़ा), अपरार्क
खंड 05

महाकाव्य एवं पुराण

रामायण एवं महाभारत — भारत के दो प्राचीनतम महाकाव्य। रचनाकाल लगभग चौथी शती ई.पू. से चौथी शती ई. के मध्य।

रामायण

  • रचयिता महर्षि वाल्मीकि; भाषा संस्कृत। इसे 'आदिकाव्य' एवं वाल्मीकि को 'आदिकवि' कहा जाता है।
  • श्लोक-विकास — 6,000 → 12,000 → 24,000; 24,000 श्लोकों के कारण 'चतुर्विंशति साहस्री संहिता'
  • सात काण्ड — बाल, अयोध्या, अरण्य, किष्किन्धा, सुन्दर, युद्ध, उत्तर।
  • बालकाण्ड एवं उत्तरकाण्ड बाद के प्रक्षेप माने जाते हैं।

महाभारत

  • रचयिता महर्षि वेदव्यास; रामायण से लगभग चार गुना बड़ा — विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य।
  • लगभग 950 ई.पू. के भरत-युद्ध पर आधारित; अंतिम संकलन गुप्तकाल में।
  • प्रारम्भिक उल्लेख आश्वलायन गृह्यसूत्र में।
चरणश्लोक संख्यानाम
प्रारम्भिक8,800जयसंहिता
मध्य24,000भारत
अंतिम1,00,000शतसाहस्री संहिता / महाभारत
  • भगवद्गीता महाभारत के भीष्मपर्व का अंश है (18 अध्याय, 700 श्लोक)।
  • शान्तिपर्व सबसे बड़ा पर्व — राजधर्म एवं आपद्धर्म का विस्तृत विवेचन।
  • हरिवंश पुराण महाभारत का परिशिष्ट (खिलभाग) माना जाता है।

18 पर्व — आदि, सभा, वन (आरण्यक), विराट, उद्योग, भीष्म, द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक, स्त्री, शान्ति, अनुशासन, अश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण।

पुराण

  • शाब्दिक अर्थ — 'प्राचीन आख्यान'; रचयिता परम्परागत रूप से लोमहर्ष एवं उनके पुत्र उग्रश्रवा सौति
  • पंच लक्षण — सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर, वंशानुचरित।
  • कुल 18 महापुराण (तथा 18 उपपुराण)।
  • चार युग — कृत (सत्), त्रेता, द्वापर, कलि; प्रत्येक आगामी युग पूर्व की तुलना में अधिक पतनशील बताया गया।
  • पुराणों की वंशावलियाँ भविष्यकाल (future tense) में लिखी गई हैं — यह इनकी विशिष्ट पहचान है।
पुराणऐतिहासिक जानकारी
मत्स्य पुराणसर्वाधिक प्राचीन एवं प्रामाणिक; आन्ध्र-सातवाहन वंश
विष्णु पुराणमौर्य एवं गुप्त वंश
वायु पुराणगुप्त साम्राज्य की सीमाओं हेतु सर्वाधिक प्रामाणिक; शुंग वंशावली
भागवत पुराणकृष्ण-कथा; वंशानुचरित
भविष्य पुराणसर्वाधिक परवर्ती वंशावलियाँ
ब्रह्माण्ड पुराणगायत्री मन्त्र का विस्तृत विवेचन
खंड 06

बौद्ध साहित्य

  • आरम्भिक बौद्ध ग्रंथ पालि भाषा में; परवर्ती महायान ग्रंथ संस्कृत में।
  • अंगुत्तर निकाय से छठी शताब्दी ई.पू. के 16 महाजनपदों का उल्लेख मिलता है। जैन ग्रंथ भगवती सूत्र में भी 16 महाजनपदों की सूची है, किन्तु नाम कुछ भिन्न हैं।
  • खुद्दक निकाय में जातक कथाएँ (संख्या 547) संकलित हैं, जो बुद्ध के पूर्वजन्मों से सम्बद्ध हैं।
  • जातकों से गणतन्त्रों, नगर-जीवन, प्रशासन, अस्पृश्यता, दास-व्यवस्था एवं व्यापार-वाणिज्य की मूल्यवान जानकारी मिलती है।

त्रिपिटक

1. सुत्तपिटक — पाँच निकाय

निकायविशेषता
दीघ निकायबौद्ध सिद्धान्तों का समर्थन एवं अन्य मतों का खण्डन; सर्वाधिक महत्वपूर्ण सुत्त — महापरिनिब्बानसुत्त (बुद्ध के अंतिम क्षण)
मज्झिम निकायबुद्ध कहीं साधारण मनुष्य, कहीं अलौकिक दैवी रूप में चित्रित
संयुत्त निकायअनेक 'संयुत्तों' का संकलन; गद्य-पद्य दोनों
अंगुत्तर निकाय11 निपातों में संगठित; भिक्षुओं को उपदेश; 16 महाजनपद
खुद्दक निकायखुद्दकपाठ, धम्मपद, उदान, इतिवुत्तक, सुत्तनिपात, विमानवत्थु, पेतवत्थु, थेरगाथा, थेरीगाथा, जातक

थेरीगाथा — बौद्ध भिक्षुणियों द्वारा रचित; विश्व के प्राचीनतम स्त्री-रचित साहित्य में से एक।

2. विनयपिटक

संघ/मठ के अनुशासन सम्बन्धी नियम। चार भाग — पातिमोक्ख, सुत्तविभंग, खन्धक, परिवार

3. अभिधम्मपिटक

बौद्ध सिद्धान्तों की दार्शनिक व्याख्या; तीनों पिटकों में सबसे बाद का। सात ग्रंथ — धम्मसंगणि, विभंग, धातुकथा, पुग्गलपञ्ञत्ति, कथावत्थु, यमक, पट्ठान। इसका 'कथावत्थु' नामक ग्रंथ अशोक-कालीन तृतीय बौद्ध संगीति (पाटलिपुत्र, 250 ई.पू.) में मोग्गलिपुत्त तिस्स द्वारा रचा गया।

अन्य प्रमुख बौद्ध ग्रंथ

ग्रंथलेखक / विशेषता
मिलिन्दपन्हयूनानी नरेश मिनांडर (मिलिन्द) एवं भिक्षु नागसेन का संवाद
दीपवंश एवं महावंशश्रीलंका में पालि में रचित; अशोक व मौर्य इतिहास
बुद्धचरित, सौन्दरानन्दअश्वघोष (कनिष्क के दरबारी); संस्कृत
महावस्तु एवं ललितविस्तरबुद्ध की जीवनी; महायान
दिव्यावदान, अशोकावदान, अवदानशतकअशोक एवं परवर्ती मौर्य इतिहास
आर्यमंजुश्रीमूलकल्पबौद्ध दृष्टिकोण से राजवंशों का इतिहास
माध्यमिककारिकानागार्जुन — शून्यवाद
विसुद्धिमग्गबुद्धघोष (5वीं सदी)
खंड 07

जैन साहित्य

  • रचना मुख्यतः प्राकृत (अर्धमागधी) भाषा में।
  • जैन साहित्य को 'आगम' कहा जाता है — 12 अंग, 12 उपांग, 10 प्रकीर्ण, 6 छेदसूत्र, 4 मूलसूत्र आदि।

जैन आगमों का अंतिम संकलन 512/513 ई. में वल्लभी (गुजरात) की सभा में देवर्धिगणी क्षमाश्रमण के नेतृत्व में हुआ।

ग्रंथलेखक / विषय
आचारांग सूत्रजैन भिक्षुओं के आचार-विचार व विधि-निषेध; सबसे प्राचीन अंग
भगवती सूत्रमहावीर स्वामी का जीवन व शिक्षाएँ; 16 महाजनपद
कल्पसूत्रभद्रबाहु — तीर्थंकरों की जीवनियाँ
परिशिष्टपर्वहेमचन्द्र — चन्द्रगुप्त मौर्य के जैन धर्म स्वीकार का उल्लेख
त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरितहेमचन्द्र — 63 शलाका पुरुषों का चरित
उवासगदसाओजैन उपासकों (श्रावकों) का वर्णन
भद्रबाहुचरितभद्रबाहु एवं चन्द्रगुप्त मौर्य की दक्षिण-यात्रा
खंड 08

लौकिक / धर्मनिरपेक्ष साहित्य

अर्थशास्त्र

  • रचयिता चाणक्य (अन्य नाम — कौटिल्य, विष्णुगुप्त); मौर्यकाल।
  • लगभग 6,000 श्लोक; 15 अधिकरण एवं 180 प्रकरण। द्वितीय एवं तृतीय अधिकरण सर्वाधिक प्राचीन।
  • चन्द्रगुप्त मौर्य की प्रशासनिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक व्यवस्था का सर्वोत्तम स्रोत।
  • विषयवस्तु की तुलना अरस्तू के पॉलिटिक्स तथा मैकियावेली के द प्रिंस से की जाती है।
  • सप्तांग सिद्धांत (स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोश, दण्ड, मित्र) एवं मण्डल सिद्धांत का प्रतिपादन।

अर्थशास्त्र की पाण्डुलिपि 1905 ई. में आर. शामशास्त्री ने खोजी और 1909 ई. में प्रकाशित की।

राजतरंगिणी

  • रचयिता कल्हण; रचनाकाल 1148–1150 ई.; भाषा संस्कृत; 8 तरंगों में विभाजित।
  • कश्मीर के राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास का विवरण।
  • विद्वानों का एक बड़ा वर्ग इसे प्राचीन भारत का एकमात्र प्रामाणिक ऐतिहासिक ग्रंथ मानता है; कल्हण को 'भारत का प्रथम इतिहासकार' कहा जाता है।
  • कल्हण के बाद जोनराज, श्रीवर, प्राज्यभट्ट एवं शुक ने इसे आगे बढ़ाया।

अन्य प्रमुख लौकिक ग्रंथ

ग्रंथलेखकऐतिहासिक महत्व
अष्टाध्यायीपाणिनिगणतन्त्रात्मक व्यवस्था; तत्कालीन भूगोल
महाभाष्यपतंजलिशुंग वंश एवं पुष्यमित्र के यज्ञ का उल्लेख
गार्गी संहितायवन (यूनानी) आक्रमण का उल्लेख — युगपुराण खण्ड
मालविकाग्निमित्रम्कालिदासपुष्यमित्र शुंग व अग्निमित्र; शुंग-यवन संघर्ष
मुद्राराक्षसविशाखदत्तचन्द्रगुप्त मौर्य व चाणक्य द्वारा नन्दों का उन्मूलन
देवीचन्द्रगुप्तम्विशाखदत्तरामगुप्त एवं चन्द्रगुप्त द्वितीय
मृच्छकटिकम्शूद्रकगुप्त/पूर्व-गुप्त सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन
हर्षचरितबाणभट्टहर्षवर्धन का जीवन; संस्कृत का प्रथम ऐतिहासिक जीवन-चरित
कादम्बरीबाणभट्टहर्षकालीन समाज
नीतिसारकामन्दक7वीं–8वीं सदी; राजनीति एवं आचार
नवसाहसांकचरितपद्मगुप्त परिमल11वीं सदी; परमार वंश, सिन्धुराज नवसाहसांक
गौडवहोवाक्पतिराज (प्राकृत)कन्नौज नरेश यशोवर्मन की विजयें
विक्रमांकदेवचरितबिल्हणकल्याणी के चालुक्य नरेश विक्रमादित्य षष्ठ
कुमारपालचरित (द्व्याश्रयकाव्य)हेमचन्द्रगुजरात के शासक कुमारपाल
प्रबन्धचिन्तामणिमेरुतुंग (1305 ई.)विक्रमांक, सातवाहन, मूलराज, मुंज, भोज, लक्ष्मणसेन, जयचन्द्र
कीर्तिकौमुदीसोमेश्वरचालुक्य (सोलंकी) वंश; वस्तुपाल-तेजपाल
मत्तविलासप्रहसनमहेन्द्रवर्मन प्रथम (पल्लव)तत्कालीन सामाजिक-धार्मिक जीवन का व्यंग्य
अवन्तिसुन्दरी कथादण्डीपल्लव इतिहास
रामचरितसन्ध्याकर नन्दीपाल शासक रामपाल; कैवर्त विद्रोह (द्व्यर्थक काव्य)
पृथ्वीराजविजयजयानक (1191–93)पृथ्वीराज चौहान तृतीय
पृथ्वीराजरासोचन्दबरदाईअपभ्रंश; पृथ्वीराज चौहान
मुषिकवंशअतुल (11वीं सदी)केरल का मुषिक वंश
रसमाला, प्रबन्धकोश, चचनामाक्रमशः गुजरात, जैन-प्रबन्ध एवं सिन्ध का इतिहास
  • विशाखदत्त के दोनों नाटक मौर्य एवं गुप्त इतिहास के लिए अनिवार्य स्रोत हैं।
  • हर्षवर्धन ने स्वयं तीन नाटक लिखे — नागानन्द, रत्नावली, प्रियदर्शिका
  • कालिदास की अन्य रचनाएँ — अभिज्ञानशाकुन्तलम्, रघुवंशम्, कुमारसंभवम्, मेघदूतम्, ऋतुसंहार।
खंड 09

संगम साहित्य (तमिल)

  • दक्षिण भारत के प्रारम्भिक इतिहास का प्रमुख स्रोत; यह धर्मनिरपेक्ष साहित्य है।
  • काल — ईसा की प्रथम चार शताब्दियाँ (लगभग 300 ई.पू. – 300 ई.)।
  • तीन संगम आयोजित हुए, संरक्षक पाण्ड्य शासक; तीसरा एवं सर्वाधिक महत्वपूर्ण संगम मदुरै में। केवल तीसरे संगम का साहित्य उपलब्ध है।
कृतिविवरण
तोल्काप्पियम्तोल्काप्पियर कृत; तमिल का प्राचीनतम व्याकरण ग्रंथ
एट्टुटोगैआठ संग्रह — इसमें पुरनानूरु, अहनानूरु आदि
पत्तुप्पाट्टुदस गीत / काव्य
पदिनेनकीलकणक्कु18 लघु ग्रंथ — इसमें तिरुक्कुरल (तिरुवल्लुवर) — 'तमिल का वेद'

संगम साहित्य में दक्षिण के तीन प्रमुख राजवंशों — चेर, चोल एवं पाण्ड्य के आरम्भिक इतिहास, समाज-व्यवस्था, उद्योग-धन्धों तथा रोम के साथ विदेशी व्यापार की जानकारी मिलती है।

संगमोत्तर (Post-Sangam) महाकाव्य

  • शिलप्पादिकारम् — रचयिता इलंगो आडिगल; तमिल का प्रथम महाकाव्य।
  • मणिमेकलै — रचयिता सत्तनार; बौद्ध धर्म से प्रभावित।

पल्लव-चोल इतिहास के अन्य स्रोत — नन्दिक्कलम्बकम्, कलिंगत्तुपरणि, चोलचरित

खंड 10

पुरातात्विक साक्ष्य

अभिलेख (Inscriptions)

सर्वाधिक प्रामाणिक पुरातात्विक स्रोत, क्योंकि इनमें बाद में परिवर्तन सम्भव नहीं। ये स्तम्भों, शिलाओं, ताम्रपत्रों, मुद्राओं, पात्रों, मूर्तियों एवं गुफाओं पर उत्कीर्ण मिलते हैं।

भारत के बाहर प्राप्त अभिलेख

  • बोगजकोई अभिलेख (एशिया माइनर, लगभग 1400 ई.पू.) — हित्ती व मितन्नी राजाओं की सन्धि; वैदिक देवताओं इन्द्र, मित्र, वरुण एवं नासत्य का उल्लेख। आर्यों के मूल निवास सम्बन्धी विवाद का प्रमुख साक्ष्य।
  • सुमेर / मेसोपोटामिया से प्राप्त मुहरें — सिन्धु घाटी एवं सुमेर के व्यापारिक सम्बन्धों का प्रमाण।

अशोक के अभिलेख

  • हड़प्पाई मुहरों की लिपि अब तक अपठित है; अतः पठित अभिलेखों में प्राचीनतम अशोक के अभिलेख हैं।
  • प्रकार — 14 वृहत् शिलालेख, लघु शिलालेख, 7 स्तम्भलेख, लघु स्तम्भलेख, गुहालेख (बराबर की गुफाएँ — आजीवकों को दान)।
  • भाषा प्रायः प्राकृत; लिपि ब्राह्मी; उत्तर-पश्चिम (शाहबाजगढ़ी, मानसेहरा) में खरोष्ठी; कन्धार में यूनानी एवं आरामाइक
  • अशोक के नाम 'अशोक' का स्पष्ट उल्लेख मास्की, गुर्जरा, नेत्तूर एवं उडेगोलम लघु शिलालेखों में; अन्यत्र वह 'देवानांपिय पियदस्सी' कहलाता है।

अशोक के अभिलेखों की जानकारी सर्वप्रथम 1750 ई. में पादरी टीफेन्थैलर ने दी, और 1837 ई. में जेम्स प्रिंसेप ने ब्राह्मी लिपि का वाचन कर इन्हें पढ़ा।

अन्य प्रमुख अभिलेख

अभिलेखशासक / विवरण
पिपरहवा अस्थिकलश अभिलेखबुद्ध के अवशेषों से सम्बन्धित; प्राचीनतम अभिलेखों में
सोहगौरा ताम्रपत्र एवं महास्थान अभिलेखमौर्यकाल; अकाल राहत व्यवस्था का उल्लेख
हाथीगुम्फा अभिलेख (उदयगिरि, ओडिशा)कलिंग नरेश खारवेल; प्राकृत; जैन धर्म
बेसनगर (विदिशा) गरुड़ स्तम्भ लेखहेलियोडोरस — तक्षशिला के यूनानी नरेश एण्टियालकिडस का राजदूत, शुंग नरेश भागभद्र के दरबार में; भागवत धर्म का प्रमाण (लगभग 113 ई.पू.)
जूनागढ़ / गिरनार अभिलेख (150 ई.)शक क्षत्रप रुद्रदामन; प्रथम विशुद्ध संस्कृत अभिलेख; सुदर्शन झील की मरम्मत
नासिक गुहालेखगौतमी बलश्री (गौतमीपुत्र सातकर्णि की माता) द्वारा, वासिष्ठीपुत्र पुलुमावी के 19वें वर्ष में उत्कीर्ण
प्रयाग (इलाहाबाद) स्तम्भ प्रशस्तिहरिषेण रचित; समुद्रगुप्त की विजयें; चम्पू शैली; अशोक के स्तम्भ पर उत्कीर्ण
भितरी एवं जूनागढ़ अभिलेखस्कन्दगुप्त; हूण आक्रमण का उल्लेख
एरण अभिलेख (मध्य प्रदेश)वराह प्रतिमा पर हूण राजा तोरमाण का लेख; तथा भानुगुप्त का 510 ई. का लेख — सती प्रथा का प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य
मन्दसौर स्तम्भ अभिलेखयशोधर्मन — जिसने हूण नरेश मिहिरकुल को पराजित किया
मन्दसौर अभिलेख (473 ई.)वत्सभट्टि रचित; कुमारगुप्त / बन्धुवर्मन काल; रेशम बुनकर श्रेणी का उल्लेख
ऐहोल अभिलेख (634 ई.)चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय; जैन कवि रविकीर्ति रचित; हर्ष की पराजय
ग्वालियर अभिलेखप्रतिहार नरेश मिहिरभोज
देवपाड़ा प्रशस्तिबंगाल के विजयसेन; उमापतिधर रचित

लिपियाँ

  • ब्राह्मी लिपिबाएँ से दाएँ लिखी जाती थी; भारत की अधिकांश आधुनिक लिपियों की जननी।
  • खरोष्ठी लिपिदाएँ से बाएँ; प्रयोग मुख्यतः उत्तर-पश्चिम भारत में।
  • आरामाइक एवं यूनानी — अशोक के कुछ अफ़ग़ानिस्तान-क्षेत्र के अभिलेखों में।
  • आरम्भिक अभिलेख प्राकृत में; बाद में संस्कृत तथा तेलुगु-तमिल आदि क्षेत्रीय भाषाओं में।

सिक्के / मुद्राएँ

  • मुद्राओं से लगभग 206 ई.पू. से 300 ई. तक के इतिहास पर विशेष प्रकाश पड़ता है।
  • आहत सिक्के (Punch Marked) — भारत के प्राचीनतम सिक्के; लेख नहीं, केवल चिह्न (पहाड़, वृक्ष, मछली, हाथी); मुख्यतः चाँदी-ताँबे के; कार्षापण / पण कहलाते थे।
  • सर्वप्रथम लेख एवं तिथि युक्त सिक्के तथा प्रथम स्वर्ण मुद्राहिन्द-यवन (Indo-Greek) शासकों ने चलाए।
  • सर्वाधिक सिक्के उत्तर-मौर्यकाल के — सीसा, पोटीन, ताँबा, काँसा, चाँदी एवं सोने के।
  • कुषाणों ने सर्वाधिक शुद्ध सोने के सिक्के चलाए; सर्वाधिक संख्या में सोने के सिक्के गुप्तकाल में — इन्हें 'दीनार' कहा जाता था।
  • सर्वाधिक सीसे (lead) के सिक्के सातवाहनों ने चलाए।
  • गुप्तकालीन सिक्कों से समुद्रगुप्त की वीणावादन एवं अश्वमेध यज्ञ जैसी जानकारियाँ मिलती हैं।

स्मारक, मूर्तियाँ एवं उत्खनन

  • हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, तक्षशिला, मथुरा, कौशाम्बी, पाटलिपुत्र के भवन-अवशेषों से नगर-निर्माण शैली का ज्ञान।
  • नालन्दा एवं विक्रमशिला के खण्डहरों से इन विश्वविद्यालयों की गरिमा प्रकट होती है।
  • गान्धार शैली (यूनानी प्रभाव) एवं मथुरा शैली (देशी, लाल बलुआ पत्थर)।
  • साँची, भरहुत, अमरावती के स्तूप तथा अजन्ता, एलोरा, एलिफेण्टा, बाघ की गुफाएँ।
  • मन्दिर स्थापत्य की तीन शैलियाँ — नागर (उत्तर), द्रविड़ (दक्षिण), वेसर (मिश्रित)

वैज्ञानिक तिथि-निर्धारण पद्धतियाँ

पद्धतिउपयोग
कार्बन-14 (रेडियोकार्बन)जैविक अवशेषों (लकड़ी, हड्डी, अनाज) की तिथि; खोजकर्ता विलार्ड लिब्बी
डेण्ड्रोक्रोनोलॉजीवृक्षों के वलयों (tree rings) द्वारा तिथि निर्धारण
थर्मोल्युमिनिसेन्स (TL)मृद्भाण्ड (pottery) की तिथि
पुरावनस्पति / पुराजन्तु विज्ञानकृषि एवं पशुपालन का स्वरूप

भारतीय पुरातत्व का विकास

वर्षघटना
1784सर विलियम जोन्सएशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल (कलकत्ता) की स्थापना
1837जेम्स प्रिंसेपब्राह्मी एवं खरोष्ठी लिपि का वाचन
1861भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की स्थापना; अलेक्जेंडर कनिंघम प्रथम महानिदेशक — 'भारतीय पुरातत्व के जनक'
1902–28जॉन मार्शल महानिदेशक; इनके काल में हड़प्पा व मोहनजोदड़ो की खोज (1921–22)
1944–48सर मॉर्टिमर व्हीलर — वैज्ञानिक उत्खनन पद्धति के प्रवर्तक
खंड 11

विदेशी विवरण

यूनानी-रोमन लेखक

(क) सिकन्दर के पूर्व

लेखकयोगदान
हेकेटियस ऑफ़ मिलेटसभूगोल की पुस्तक; सिन्धु प्रदेश का प्राचीनतम विवरण
हेरोडोटस ('इतिहास का पिता')5वीं शती ई.पू. में 'हिस्टोरिका'; भारत-ईरान (फ़ारस) सम्बन्ध
स्काईलैक्सडेरियस के आदेश पर सिन्धु नदी की खोजयात्रा
टेसियस (Ctesias)फ़ारसी सम्राट अर्तक्षत्र द्वितीय का चिकित्सक; भारत सम्बन्धी अतिरंजित विवरण

(ख) सिकन्दर के समकालीन

  • नियार्कस — सिकन्दर का नौसेनापति; सिन्धु से फ़ारस की खाड़ी तक की यात्रा।
  • ओनेसिक्रिटस — सिकन्दर की जीवनी; भारतीय नग्न साधुओं का वर्णन।
  • अरिस्टोबुलस — सिकन्दर के अभियान का इतिहास।
  • यूमेनीस, चारस — सिकन्दर के अभिलेखागार अधिकारी।

(ग) सिकन्दर के बाद

लेखककृति एवं महत्व
मेगास्थनीजसेल्यूकस निकेटर का राजदूत, चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में। कृति 'इण्डिका' — मौर्य प्रशासन, पाटलिपुत्र ('पालिबोथ्रा'), समाज का सात वर्गों में विभाजन। मूल कृति अनुपलब्ध; उसका दासप्रथा के अभाव सम्बन्धी कथन त्रुटिपूर्ण है
डाइमेकससीरियन नरेश एण्टियोकस का राजदूत, बिन्दुसार के दरबार में
डायोनिसियसमिस्र नरेश टॉलेमी फिलाडेल्फस का राजदूत, अशोक के दरबार में
एरियन'इण्डिका' एवं 'अनाबासिस' — सिकन्दर के आक्रमण का सर्वाधिक विश्वसनीय विवरण
प्लूटार्कसिकन्दर एवं चन्द्रगुप्त मौर्य की भेंट का उल्लेख
जस्टिनचन्द्रगुप्त मौर्य ('सैण्ड्रोकोट्स') सम्बन्धी विवरण
कर्टियस, डायोडोरस, पोलिबियस, स्ट्रैबोसिकन्दर-कालीन भारत एवं भूगोल
प्लिनी (द एल्डर)प्रथम शती ई., लैटिन में 'नेचुरल हिस्ट्री'; भारत-रोम व्यापार से रोम के स्वर्ण-निकास की शिकायत
टॉलेमीलगभग 150 ई., यूनानी में 'ज्योग्राफी'
अज्ञात नाविकलगभग 80 ई., यूनानी में 'पेरिप्लस ऑफ़ द एरिथ्रियन सी' — समुद्री व्यापार-मार्गदर्शिका; भारतीय बन्दरगाहों एवं आयात-निर्यात का विवरण

एरियन, जस्टिन एवं प्लूटार्क — सिकन्दर के आक्रमण तथा चन्द्रगुप्त मौर्य से सम्बन्धित प्रश्नों के लिए अनिवार्य नाम।

चीनी एवं तिब्बती लेखक

सभी प्रमुख चीनी यात्री बौद्ध मतानुयायी थे और मुख्यतः बौद्ध धर्म के अध्ययन हेतु भारत आए।

यात्रीकाल / शासककृति एवं विवरण
फ़ाह्यानचन्द्रगुप्त द्वितीयकृति 'फ़ो-क्यो-की'। यात्रा 399–414 ई.; भारत में लगभग 6 वर्ष। मध्यदेश की जनता को सुखी एवं समृद्ध बताया; चाण्डालों की दयनीय स्थिति का वर्णन। राजनीतिक विवरण अत्यल्प
सुंगयुन518 ई.तीन वर्ष की यात्रा; बौद्ध ग्रंथों की प्रतियाँ एकत्र कीं
ह्वेनसांग ('यात्रियों का राजकुमार')हर्षवर्धन (606–647 ई.)629/630 ई. में प्रस्थान; प्रथम भारतीय राज्य कपिशा; भारत में लगभग 15 वर्ष; 645 ई. में लौटा। कृति 'सी-यू-की'138 देशों का विवरण। नालन्दा में आचार्य शीलभद्र से अध्ययन। उसके अनुसार सिन्ध का राजा शूद्र था; कन्नौज सभा एवं प्रयाग महामोक्षपरिषद का वर्णन
ह्वी-लीह्वेनसांग का शिष्य/मित्रह्वेनसांग की जीवनी
इत्सिंग671–695 ई.नालन्दा विश्वविद्यालय एवं तत्कालीन बौद्ध संघ-जीवन का विस्तृत विवरण
मा-त्वान-लिनहर्ष के पूर्वी अभियान पर प्रकाश
चाऊ-जू-कुआचोलकालीन इतिहास एवं व्यापार

ध्यान रहे: विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना 8वीं शताब्दी में पाल शासक धर्मपाल ने की थी। अतः 7वीं शताब्दी में आए इत्सिंग के विवरण में केवल नालन्दा का उल्लेख है, विक्रमशिला का नहीं।

तिब्बती लेखक

  • लामा तारानाथ — 'कंग्युर' एवं 'तंग्युर' तथा 'History of Buddhism' (1608 ई.) — पूर्व-मध्यकालीन भारतीय इतिहास का महत्वपूर्ण स्रोत।
  • धर्मस्वामी — 13वीं शताब्दी में भारत आया; उसके विवरण से स्पष्ट है कि 13वीं सदी के पूर्वार्ध तक नालन्दा महाविहार पूर्णतः नष्ट नहीं हुआ था

अरबी एवं फ़ारसी लेखक

712 ई. में मुहम्मद बिन कासिम की सिन्ध विजय के बाद भारत के अरब जगत से सम्पर्क बढ़े।

लेखककृति एवं विवरण
अलबरूनी'तहक़ीक़-ए-हिन्द' (किताब-उल-हिन्द) — 11वीं सदी के भारत का सर्वाधिक प्रामाणिक विवरण। महमूद ग़ज़नवी के साथ भारत आया (1017–1030 ई.); मूलतः ख़्वारिज़्म का निवासी; संस्कृत सीखी। उसे 'भारतीय अध्ययन का जनक' कहा जाता है
अल-बिलादुरी'फ़ुतूह-उल-बुलदान' — अरब आक्रमणों का विवरण
सुलेमान9वीं सदी का अरब व्यापारी; पाल एवं प्रतिहार राज्यों का विवरण
अल-मसूदी'मुरुज-उल-ज़हब' (915 ई.) — राष्ट्रकूट व प्रतिहार
मिनहाज-उस-सिराज'तबक़ात-ए-नासिरी' (13वीं सदी)
फ़रिश्ता'तारीख़-ए-फ़रिश्ता' (17वीं सदी)

यूरोपीय यात्री

  • मार्कोपोलोवेनिस (इटली) का यात्री; लगभग 1292–93 ई. में दक्षिण भारत आया। उसने पाण्ड्य राज्य, मोती-मत्स्यन (pearl fishery) एवं समुद्री व्यापार का वर्णन किया।
खंड 12

त्वरित पुनरावृत्ति

'प्रथम' से जुड़े तथ्य

प्रथमउत्तर
विश्व का प्राचीनतम ग्रंथऋग्वेद
शूद्रों का प्रथम उल्लेखऋग्वेद, 10वाँ मण्डल (पुरुषसूक्त)
संस्कृत व्याकरण का प्रथम ग्रंथअष्टाध्यायी — पाणिनि
भाषाशास्त्र का प्रथम ग्रंथनिरुक्त — यास्क
प्रथम विशुद्ध संस्कृत अभिलेखजूनागढ़ अभिलेख — रुद्रदामन, 150 ई.
संस्कृत का प्रथम ऐतिहासिक जीवन-चरितहर्षचरित — बाणभट्ट
सती प्रथा का प्रथम अभिलेखीय साक्ष्यएरण अभिलेख, 510 ई. — भानुगुप्त
प्रथम स्वर्ण मुद्रा जारीकर्ताहिन्द-यवन शासक
ब्राह्मी लिपि का प्रथम वाचकजेम्स प्रिंसेप — 1837 ई.
ASI के प्रथम महानिदेशकअलेक्जेंडर कनिंघम — 1861 ई.

'सर्वाधिक / सबसे बड़ा'

प्रश्नउत्तर
सबसे बड़ा ब्राह्मण ग्रंथशतपथ ब्राह्मण
सबसे प्राचीन एवं बड़ा उपनिषदबृहदारण्यक उपनिषद
सबसे बड़ा पिटकसुत्तपिटक
महाभारत का सबसे बड़ा पर्वशान्तिपर्व
सर्वाधिक प्रामाणिक पुराणमत्स्य पुराण
सर्वाधिक शुद्ध स्वर्ण सिक्केकुषाण
सर्वाधिक संख्या में स्वर्ण सिक्केगुप्त
सर्वाधिक सीसे के सिक्केसातवाहन

संख्या-आधारित तथ्य

विषयसंख्या
वेद4
ऋग्वेद — मण्डल / सूक्त / ऋचाएँ10 / 1028 / ~10,462
सामवेद — ऋचाएँ (मौलिक)1875 (75)
अथर्ववेद — काण्ड / सूक्त / मन्त्र20 / 731 / ~5987
आरण्यक7
उपनिषद108
वेदांग6
महापुराण18
महाभारत — पर्व18
रामायण — काण्ड7
जातक कथाएँ547
अर्थशास्त्र — अधिकरण / श्लोक15 / ~6000
राजतरंगिणी — तरंग8
अशोक — वृहत् शिलालेख / स्तम्भलेख14 / 7

ध्यान दें: कुछ संख्याओं (जैसे ऋग्वेद की ऋचाएँ, अथर्ववेद के मन्त्र, ह्वेनसांग का नालन्दा-प्रवास) पर विभिन्न ग्रंथों में मामूली अन्तर मिलता है। ऊपर वही मान दिए गए हैं जो UPSC/PSC की उत्तर-कुंजियों में सर्वाधिक स्वीकृत हैं।

खंड 13

अभ्यास प्रश्न (MCQ)

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