प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत
Sources of Ancient Indian History — तथ्य-सत्यापित एवं विस्तारित नोट्स
- UPSC / IAS
- CGPSC
- CG TET
- UGC NET
- SSC
- व्यापम
- रेलवे
- बैंक
स्रोतों का वर्गीकरण
प्राचीन भारतीय इतिहास की जानकारी मुख्यतः तीन व्यापक वर्गों से प्राप्त होती है, जिन्हें प्रायः चार उपवर्गों में बाँटकर पढ़ाया जाता है।
| क्रम | स्रोत | उपविभाजन |
|---|---|---|
| 1 | धार्मिक साहित्य | वैदिक (ब्राह्मण), बौद्ध, जैन |
| 2 | लौकिक / धर्मनिरपेक्ष साहित्य | ऐतिहासिक ग्रंथ, जीवनचरित, नाटक-काव्य, संगम साहित्य |
| 3 | पुरातात्विक साक्ष्य | अभिलेख, सिक्के, स्मारक, मूर्तियाँ, उत्खनन सामग्री |
| 4 | विदेशी विवरण | यूनानी-रोमन, चीनी-तिब्बती, अरबी-फ़ारसी |
↔ तालिका को क्षैतिज रूप से स्क्रॉल किया जा सकता है
शब्दावली: अभिलेखों के अध्ययन को पुरालेखशास्त्र (Epigraphy), लिपियों के अध्ययन को पुरालिपिशास्त्र (Palaeography) तथा सिक्कों के अध्ययन को मुद्राशास्त्र (Numismatics) कहते हैं।
वैदिक साहित्य
प्राचीन काल से भारत में तीन प्रमुख धार्मिक धाराएँ प्रवाहित हुईं — वैदिक, बौद्ध एवं जैन। वैदिक धर्मग्रंथों को ब्राह्मण साहित्य भी कहा जाता है।
वेद — सामान्य परिचय
- 'वेद' शब्द संस्कृत की 'विद्' धातु से बना है, जिसका अर्थ है जानना।
- वेदों को अपौरुषेय (दैवकृत) तथा श्रुति कहा जाता है।
- संकलनकर्ता — महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास।
- वेदों की कुल संख्या चार — ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद।
- वेदत्रयी — ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद (अथर्ववेद बाद का है)।
वेद, पुरोहित एवं उपवेद
| वेद | सम्बद्ध पुरोहित | उपवेद | प्रमुख विषय |
|---|---|---|---|
| ऋग्वेद | होतृ / होता | आयुर्वेद | देवस्तुति, ऋचाएँ |
| सामवेद | उद्गातृ | गंधर्ववेद | संगीत, गान |
| यजुर्वेद | अध्वर्यु | धनुर्वेद | यज्ञ-विधि |
| अथर्ववेद | ब्रह्मा | शिल्पवेद / स्थापत्यवेद | औषधि, जादू-टोना |
(क) ऋग्वेद
- चारों वेदों में सर्वाधिक प्राचीन; यह भारत ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व की प्राचीनतम उपलब्ध रचना है।
- रचनाकाल — लगभग 1500–1000 ई.पू.
- मन्त्रों का उच्चारण यज्ञ के अवसर पर होतृ ऋषि करते थे।
- संरचना — 10 मण्डल, 8 अष्टक, 1028 सूक्त एवं लगभग 10,462 ऋचाएँ।
- पुरुष रचयिता — गृत्समद, विश्वामित्र, वामदेव, अत्रि, भारद्वाज, वसिष्ठ।
- स्त्री रचयिता — लोपामुद्रा, घोषा, शची पौलोमी, अपाला, विश्ववारा, सिकता निवावरी, काक्षावृती।
मण्डलों की विशेषताएँ
| मण्डल | विशेषता |
|---|---|
| 2 से 7 | वंश / गोत्र मण्डल — सर्वाधिक प्राचीन भाग |
| 1 एवं 10 | सबसे अन्त में जोड़े गए (नवीनतम) |
| 3 | गायत्री मन्त्र (ऋ. 3.62.10) — रचयिता विश्वामित्र, देवता सविता (सूर्य); इसे 'सावित्री' भी कहते हैं |
| 8 | वालखिल्य सूक्त (8.49–8.59) — इन प्रक्षिप्त सूक्तों को 'खिल' कहा गया |
| 9 | पूर्णतः सोम देवता को समर्पित (सोम एक लता / पौधा था) |
| 10 | पुरुषसूक्त — शूद्रों का प्रथम उल्लेख; चातुर्वर्ण्य का आदि स्रोत; नासदीय सूक्त (सृष्टि-उत्पत्ति) |
- पाँच शाखाएँ — शाकल, वाष्कल, आश्वलायन, शांखायन, माण्डूक्य।
- विष्णु के वामनावतार (त्रिविक्रम) के तीन पगों का प्राचीनतम स्रोत ऋग्वेद है।
- ऋग्वेद में 'गाय' शब्द 176 बार, 'जन' 275 बार तथा 'विश्' 171 बार आया है।
- गंगा का उल्लेख केवल एक बार (10वें मण्डल में) और यमुना का तीन बार।
- सर्वाधिक उल्लिखित नदी सिन्धु; सर्वाधिक पवित्र नदी सरस्वती ("नदीतमा")।
(ख) सामवेद
- 'साम' का अर्थ 'गान' — यह गान-प्रधान ग्रंथ है।
- मन्त्रों का गान सोमयज्ञ के अवसर पर उद्गातृ पुरोहित करते थे।
- इसमें लगभग 1875 ऋचाएँ हैं, जिनमें 75 को छोड़कर शेष सभी ऋग्वेद से ली गई हैं।
- प्रमुख देवता — सविता / सूर्य।
- सामवेद को भारतीय संगीत का जनक कहा जाता है।
- तीन शाखाएँ — कौथुम, जैमिनीय (तल्वकार), राणायनीय।
(ग) यजुर्वेद
- 'यजुष' का अर्थ 'यज्ञ'; मन्त्रोच्चारण अध्वर्यु करते थे।
- यह एकमात्र वेद है जो गद्य और पद्य दोनों में है। गद्य भाग 'यजुष' कहलाता है।
- कृष्ण यजुर्वेद — मन्त्र + गद्य मिश्रित। शाखाएँ: तैत्तिरीय, काठक, कपिष्ठल, मैत्रायणी।
- शुक्ल यजुर्वेद — केवल मन्त्र। शाखाएँ: माध्यन्दिन एवं काण्व। संहिता वाजसनेयी कहलाती है, क्योंकि द्रष्टा वाजसनि के पुत्र याज्ञवल्क्य थे।
- पतंजलि के अनुसार यजुर्वेद की 101 शाखाएँ थीं; आज केवल पाँच उपलब्ध हैं।
- मैत्रायणी संहिता में स्त्रियों की सर्वाधिक निम्न स्थिति — जुआ और शराब के बाद स्त्री को पुरुष का तीसरा प्रमुख दोष बताया गया।
- यजुर्वेद से उत्तर-वैदिक काल की राजनीतिक, सामाजिक व धार्मिक स्थिति ज्ञात होती है; राजसूय, वाजपेय व अश्वमेध यज्ञों का विस्तृत विवरण।
(घ) अथर्ववेद
- रचयिता अथर्वा ऋषि; दूसरे द्रष्टा आंगिरस — इसीलिए अथर्वाङ्गिरसवेद भी कहते हैं।
- अन्य नाम — ब्रह्मवेद, भैषज्यवेद, क्षत्रवेद।
- संरचना — 20 काण्ड, 731 सूक्त एवं लगभग 5987 मन्त्र।
- विषय — ब्रह्मज्ञान, औषधि, रोग-निवारण, जादू-टोना, तन्त्र-मन्त्र, विवाह, शाप।
- इसी वेद में कन्याओं के जन्म की निंदा की गई है।
- दो शाखाएँ — पिप्पलाद एवं शौनक।
- सभा और समिति को प्रजापति की दो पुत्रियाँ अथर्ववेद में कहा गया है।
- परीक्षित को 'कुरुओं का राजा' कहते हुए कुरु-देश की समृद्धि का वर्णन।
- अथर्ववेद को दीर्घकाल तक वेदत्रयी में स्थान नहीं मिला, क्योंकि इसमें लोक/अनार्य परम्पराओं का समावेश था।
ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद
ब्राह्मण ग्रंथ
यज्ञों एवं कर्मकाण्डों के विधान व क्रियाओं की गद्यात्मक व्याख्या करने वाले ग्रंथ। प्रत्येक वेद के अपने ब्राह्मण होते हैं।
| वेद | ब्राह्मण ग्रंथ |
|---|---|
| ऋग्वेद | ऐतरेय, कौषीतकी (शांखायन) |
| यजुर्वेद | शतपथ (वाजसनेयी), तैत्तिरीय |
| सामवेद | पंचविंश (ताण्ड्य महाब्राह्मण), षड्विंश, जैमिनीय |
| अथर्ववेद | गोपथ — अथर्ववेद का एकमात्र ब्राह्मण |
- शतपथ ब्राह्मण — सबसे बड़ा ब्राह्मण; ऋग्वेद के बाद सर्वोच्च ऐतिहासिक महत्व। इसमें विदेह माधव की पूर्व दिशा की आर्य-प्रसार यात्रा, गान्धार-कैकेय-कोसल-विदेह का उल्लेख तथा तीन ऋणों (देव, पितृ, ऋषि) की अवधारणा मिलती है।
- ऐतरेय ब्राह्मण — राज्याभिषेक विधियाँ तथा साम्राज्य, भौज्य, स्वाराज्य, वैराज्य जैसे शासन-प्रकारों का वर्णन।
आरण्यक
अरण्य (वन) में पढ़े जाने के कारण यह नाम पड़ा। इनमें दार्शनिक एवं रहस्यात्मक विषयों का विवेचन है; ये कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड के बीच सेतु हैं। कुल संख्या सात:
- ऐतरेय आरण्यक
- शांखायन आरण्यक
- तैत्तिरीय आरण्यक
- मैत्रायणी आरण्यक
- माध्यन्दिन बृहदारण्यक
- तल्वकार आरण्यक
- जैमिनीय आरण्यक
उपनिषद
- शाब्दिक अर्थ — 'समीप बैठना', अर्थात् ब्रह्मविद्या हेतु गुरु के समीप बैठना।
- ब्रह्म-विषयक होने से इन्हें ब्रह्मविद्या कहा जाता है।
- वैदिक साहित्य का अंतिम भाग होने से इन्हें 'वेदान्त' कहा जाता है।
- रचनाकाल — लगभग 800–500 ई.पू.; कुल संख्या 108 (मुक्तिकोपनिषद के अनुसार)।
- प्रमुख — ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक, श्वेताश्वतर, कौषीतकी, जाबाल।
| तथ्य | स्रोत |
|---|---|
| 'सत्यमेव जयते' — भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य | मुण्डकोपनिषद |
| 'असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय' | बृहदारण्यक उपनिषद |
| सबसे प्राचीन एवं सबसे बड़ा उपनिषद | बृहदारण्यक |
| तीन आश्रमों का प्रथम उल्लेख | छान्दोग्य उपनिषद |
| चारों आश्रमों का प्रथम स्पष्ट उल्लेख | जाबालोपनिषद |
| नचिकेता–यम संवाद (आत्मा एवं मृत्यु दर्शन) | कठोपनिषद |
| सत्यकाम जाबाल की कथा | छान्दोग्य उपनिषद |
उपनिषदों में प्रतिपादित निष्काम कर्म एवं भक्ति मार्ग का पूर्ण विकास भगवद्गीता में हुआ।
वेदांग एवं स्मृतियाँ
छह वेदांग
| वेदांग | विषय | प्रमुख ग्रंथ / आचार्य |
|---|---|---|
| शिक्षा | शुद्ध उच्चारण, स्वर | प्रातिशाख्य (प्राचीनतम) |
| कल्प | कर्मकाण्ड की विधि | कल्पसूत्र — श्रौत, गृह्य, धर्म एवं शुल्बसूत्र |
| व्याकरण | सन्धि, समास, प्रत्यय | पाणिनि — अष्टाध्यायी (संस्कृत व्याकरण का प्रथम ग्रंथ) |
| निरुक्त | शब्द-व्युत्पत्ति | यास्क — निरुक्त; 'निघण्टु' की व्याख्या; भाषाशास्त्र का प्रथम ग्रंथ |
| छन्द | गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती, बृहती, अनुष्टुप् | पिंगल — छन्दसूत्र |
| ज्योतिष | काल-गणना, नक्षत्र | लगध — वेदांग ज्योतिष |
शुल्बसूत्र — यज्ञ-वेदी निर्माण की ज्यामिति; इसे भारतीय ज्यामिति का प्राचीनतम ग्रंथ माना जाता है।
स्मृतियाँ (धर्मशास्त्र)
- मनुस्मृति — सबसे प्राचीन एवं महत्वपूर्ण; रचनाकाल लगभग 200 ई.पू. – 200 ई. (शुंग काल); इसे 'मानव धर्मशास्त्र' भी कहते हैं।
- याज्ञवल्क्य स्मृति — गुप्तकाल; तीन काण्ड — आचार, व्यवहार, प्रायश्चित।
- नारद स्मृति — गुप्तकालीन सामाजिक-आर्थिक जीवन का प्रमुख स्रोत।
- अन्य — विष्णु, पराशर एवं बृहस्पति स्मृति।
| मूल ग्रंथ | टीकाकार एवं टीका |
|---|---|
| मनुस्मृति | मेधातिथि (मनुभाष्य), कुल्लूक भट्ट (मन्वर्थमुक्तावली), भारुचि, गोविन्दराज |
| याज्ञवल्क्य स्मृति | विज्ञानेश्वर — मिताक्षरा (अत्यंत महत्वपूर्ण), विश्वरूप (बालक्रीड़ा), अपरार्क |
महाकाव्य एवं पुराण
रामायण एवं महाभारत — भारत के दो प्राचीनतम महाकाव्य। रचनाकाल लगभग चौथी शती ई.पू. से चौथी शती ई. के मध्य।
रामायण
- रचयिता महर्षि वाल्मीकि; भाषा संस्कृत। इसे 'आदिकाव्य' एवं वाल्मीकि को 'आदिकवि' कहा जाता है।
- श्लोक-विकास — 6,000 → 12,000 → 24,000; 24,000 श्लोकों के कारण 'चतुर्विंशति साहस्री संहिता'।
- सात काण्ड — बाल, अयोध्या, अरण्य, किष्किन्धा, सुन्दर, युद्ध, उत्तर।
- बालकाण्ड एवं उत्तरकाण्ड बाद के प्रक्षेप माने जाते हैं।
महाभारत
- रचयिता महर्षि वेदव्यास; रामायण से लगभग चार गुना बड़ा — विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य।
- लगभग 950 ई.पू. के भरत-युद्ध पर आधारित; अंतिम संकलन गुप्तकाल में।
- प्रारम्भिक उल्लेख आश्वलायन गृह्यसूत्र में।
| चरण | श्लोक संख्या | नाम |
|---|---|---|
| प्रारम्भिक | 8,800 | जयसंहिता |
| मध्य | 24,000 | भारत |
| अंतिम | 1,00,000 | शतसाहस्री संहिता / महाभारत |
- भगवद्गीता महाभारत के भीष्मपर्व का अंश है (18 अध्याय, 700 श्लोक)।
- शान्तिपर्व सबसे बड़ा पर्व — राजधर्म एवं आपद्धर्म का विस्तृत विवेचन।
- हरिवंश पुराण महाभारत का परिशिष्ट (खिलभाग) माना जाता है।
18 पर्व — आदि, सभा, वन (आरण्यक), विराट, उद्योग, भीष्म, द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक, स्त्री, शान्ति, अनुशासन, अश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण।
पुराण
- शाब्दिक अर्थ — 'प्राचीन आख्यान'; रचयिता परम्परागत रूप से लोमहर्ष एवं उनके पुत्र उग्रश्रवा सौति।
- पंच लक्षण — सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर, वंशानुचरित।
- कुल 18 महापुराण (तथा 18 उपपुराण)।
- चार युग — कृत (सत्), त्रेता, द्वापर, कलि; प्रत्येक आगामी युग पूर्व की तुलना में अधिक पतनशील बताया गया।
- पुराणों की वंशावलियाँ भविष्यकाल (future tense) में लिखी गई हैं — यह इनकी विशिष्ट पहचान है।
| पुराण | ऐतिहासिक जानकारी |
|---|---|
| मत्स्य पुराण | सर्वाधिक प्राचीन एवं प्रामाणिक; आन्ध्र-सातवाहन वंश |
| विष्णु पुराण | मौर्य एवं गुप्त वंश |
| वायु पुराण | गुप्त साम्राज्य की सीमाओं हेतु सर्वाधिक प्रामाणिक; शुंग वंशावली |
| भागवत पुराण | कृष्ण-कथा; वंशानुचरित |
| भविष्य पुराण | सर्वाधिक परवर्ती वंशावलियाँ |
| ब्रह्माण्ड पुराण | गायत्री मन्त्र का विस्तृत विवेचन |
बौद्ध साहित्य
- आरम्भिक बौद्ध ग्रंथ पालि भाषा में; परवर्ती महायान ग्रंथ संस्कृत में।
- अंगुत्तर निकाय से छठी शताब्दी ई.पू. के 16 महाजनपदों का उल्लेख मिलता है। जैन ग्रंथ भगवती सूत्र में भी 16 महाजनपदों की सूची है, किन्तु नाम कुछ भिन्न हैं।
- खुद्दक निकाय में जातक कथाएँ (संख्या 547) संकलित हैं, जो बुद्ध के पूर्वजन्मों से सम्बद्ध हैं।
- जातकों से गणतन्त्रों, नगर-जीवन, प्रशासन, अस्पृश्यता, दास-व्यवस्था एवं व्यापार-वाणिज्य की मूल्यवान जानकारी मिलती है।
त्रिपिटक
1. सुत्तपिटक — पाँच निकाय
| निकाय | विशेषता |
|---|---|
| दीघ निकाय | बौद्ध सिद्धान्तों का समर्थन एवं अन्य मतों का खण्डन; सर्वाधिक महत्वपूर्ण सुत्त — महापरिनिब्बानसुत्त (बुद्ध के अंतिम क्षण) |
| मज्झिम निकाय | बुद्ध कहीं साधारण मनुष्य, कहीं अलौकिक दैवी रूप में चित्रित |
| संयुत्त निकाय | अनेक 'संयुत्तों' का संकलन; गद्य-पद्य दोनों |
| अंगुत्तर निकाय | 11 निपातों में संगठित; भिक्षुओं को उपदेश; 16 महाजनपद |
| खुद्दक निकाय | खुद्दकपाठ, धम्मपद, उदान, इतिवुत्तक, सुत्तनिपात, विमानवत्थु, पेतवत्थु, थेरगाथा, थेरीगाथा, जातक |
थेरीगाथा — बौद्ध भिक्षुणियों द्वारा रचित; विश्व के प्राचीनतम स्त्री-रचित साहित्य में से एक।
2. विनयपिटक
संघ/मठ के अनुशासन सम्बन्धी नियम। चार भाग — पातिमोक्ख, सुत्तविभंग, खन्धक, परिवार।
3. अभिधम्मपिटक
बौद्ध सिद्धान्तों की दार्शनिक व्याख्या; तीनों पिटकों में सबसे बाद का। सात ग्रंथ — धम्मसंगणि, विभंग, धातुकथा, पुग्गलपञ्ञत्ति, कथावत्थु, यमक, पट्ठान। इसका 'कथावत्थु' नामक ग्रंथ अशोक-कालीन तृतीय बौद्ध संगीति (पाटलिपुत्र, 250 ई.पू.) में मोग्गलिपुत्त तिस्स द्वारा रचा गया।
अन्य प्रमुख बौद्ध ग्रंथ
| ग्रंथ | लेखक / विशेषता |
|---|---|
| मिलिन्दपन्ह | यूनानी नरेश मिनांडर (मिलिन्द) एवं भिक्षु नागसेन का संवाद |
| दीपवंश एवं महावंश | श्रीलंका में पालि में रचित; अशोक व मौर्य इतिहास |
| बुद्धचरित, सौन्दरानन्द | अश्वघोष (कनिष्क के दरबारी); संस्कृत |
| महावस्तु एवं ललितविस्तर | बुद्ध की जीवनी; महायान |
| दिव्यावदान, अशोकावदान, अवदानशतक | अशोक एवं परवर्ती मौर्य इतिहास |
| आर्यमंजुश्रीमूलकल्प | बौद्ध दृष्टिकोण से राजवंशों का इतिहास |
| माध्यमिककारिका | नागार्जुन — शून्यवाद |
| विसुद्धिमग्ग | बुद्धघोष (5वीं सदी) |
जैन साहित्य
- रचना मुख्यतः प्राकृत (अर्धमागधी) भाषा में।
- जैन साहित्य को 'आगम' कहा जाता है — 12 अंग, 12 उपांग, 10 प्रकीर्ण, 6 छेदसूत्र, 4 मूलसूत्र आदि।
जैन आगमों का अंतिम संकलन 512/513 ई. में वल्लभी (गुजरात) की सभा में देवर्धिगणी क्षमाश्रमण के नेतृत्व में हुआ।
| ग्रंथ | लेखक / विषय |
|---|---|
| आचारांग सूत्र | जैन भिक्षुओं के आचार-विचार व विधि-निषेध; सबसे प्राचीन अंग |
| भगवती सूत्र | महावीर स्वामी का जीवन व शिक्षाएँ; 16 महाजनपद |
| कल्पसूत्र | भद्रबाहु — तीर्थंकरों की जीवनियाँ |
| परिशिष्टपर्व | हेमचन्द्र — चन्द्रगुप्त मौर्य के जैन धर्म स्वीकार का उल्लेख |
| त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित | हेमचन्द्र — 63 शलाका पुरुषों का चरित |
| उवासगदसाओ | जैन उपासकों (श्रावकों) का वर्णन |
| भद्रबाहुचरित | भद्रबाहु एवं चन्द्रगुप्त मौर्य की दक्षिण-यात्रा |
लौकिक / धर्मनिरपेक्ष साहित्य
अर्थशास्त्र
- रचयिता चाणक्य (अन्य नाम — कौटिल्य, विष्णुगुप्त); मौर्यकाल।
- लगभग 6,000 श्लोक; 15 अधिकरण एवं 180 प्रकरण। द्वितीय एवं तृतीय अधिकरण सर्वाधिक प्राचीन।
- चन्द्रगुप्त मौर्य की प्रशासनिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक व्यवस्था का सर्वोत्तम स्रोत।
- विषयवस्तु की तुलना अरस्तू के पॉलिटिक्स तथा मैकियावेली के द प्रिंस से की जाती है।
- सप्तांग सिद्धांत (स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोश, दण्ड, मित्र) एवं मण्डल सिद्धांत का प्रतिपादन।
अर्थशास्त्र की पाण्डुलिपि 1905 ई. में आर. शामशास्त्री ने खोजी और 1909 ई. में प्रकाशित की।
राजतरंगिणी
- रचयिता कल्हण; रचनाकाल 1148–1150 ई.; भाषा संस्कृत; 8 तरंगों में विभाजित।
- कश्मीर के राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास का विवरण।
- विद्वानों का एक बड़ा वर्ग इसे प्राचीन भारत का एकमात्र प्रामाणिक ऐतिहासिक ग्रंथ मानता है; कल्हण को 'भारत का प्रथम इतिहासकार' कहा जाता है।
- कल्हण के बाद जोनराज, श्रीवर, प्राज्यभट्ट एवं शुक ने इसे आगे बढ़ाया।
अन्य प्रमुख लौकिक ग्रंथ
| ग्रंथ | लेखक | ऐतिहासिक महत्व |
|---|---|---|
| अष्टाध्यायी | पाणिनि | गणतन्त्रात्मक व्यवस्था; तत्कालीन भूगोल |
| महाभाष्य | पतंजलि | शुंग वंश एवं पुष्यमित्र के यज्ञ का उल्लेख |
| गार्गी संहिता | — | यवन (यूनानी) आक्रमण का उल्लेख — युगपुराण खण्ड |
| मालविकाग्निमित्रम् | कालिदास | पुष्यमित्र शुंग व अग्निमित्र; शुंग-यवन संघर्ष |
| मुद्राराक्षस | विशाखदत्त | चन्द्रगुप्त मौर्य व चाणक्य द्वारा नन्दों का उन्मूलन |
| देवीचन्द्रगुप्तम् | विशाखदत्त | रामगुप्त एवं चन्द्रगुप्त द्वितीय |
| मृच्छकटिकम् | शूद्रक | गुप्त/पूर्व-गुप्त सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन |
| हर्षचरित | बाणभट्ट | हर्षवर्धन का जीवन; संस्कृत का प्रथम ऐतिहासिक जीवन-चरित |
| कादम्बरी | बाणभट्ट | हर्षकालीन समाज |
| नीतिसार | कामन्दक | 7वीं–8वीं सदी; राजनीति एवं आचार |
| नवसाहसांकचरित | पद्मगुप्त परिमल | 11वीं सदी; परमार वंश, सिन्धुराज नवसाहसांक |
| गौडवहो | वाक्पतिराज (प्राकृत) | कन्नौज नरेश यशोवर्मन की विजयें |
| विक्रमांकदेवचरित | बिल्हण | कल्याणी के चालुक्य नरेश विक्रमादित्य षष्ठ |
| कुमारपालचरित (द्व्याश्रयकाव्य) | हेमचन्द्र | गुजरात के शासक कुमारपाल |
| प्रबन्धचिन्तामणि | मेरुतुंग (1305 ई.) | विक्रमांक, सातवाहन, मूलराज, मुंज, भोज, लक्ष्मणसेन, जयचन्द्र |
| कीर्तिकौमुदी | सोमेश्वर | चालुक्य (सोलंकी) वंश; वस्तुपाल-तेजपाल |
| मत्तविलासप्रहसन | महेन्द्रवर्मन प्रथम (पल्लव) | तत्कालीन सामाजिक-धार्मिक जीवन का व्यंग्य |
| अवन्तिसुन्दरी कथा | दण्डी | पल्लव इतिहास |
| रामचरित | सन्ध्याकर नन्दी | पाल शासक रामपाल; कैवर्त विद्रोह (द्व्यर्थक काव्य) |
| पृथ्वीराजविजय | जयानक (1191–93) | पृथ्वीराज चौहान तृतीय |
| पृथ्वीराजरासो | चन्दबरदाई | अपभ्रंश; पृथ्वीराज चौहान |
| मुषिकवंश | अतुल (11वीं सदी) | केरल का मुषिक वंश |
| रसमाला, प्रबन्धकोश, चचनामा | — | क्रमशः गुजरात, जैन-प्रबन्ध एवं सिन्ध का इतिहास |
- विशाखदत्त के दोनों नाटक मौर्य एवं गुप्त इतिहास के लिए अनिवार्य स्रोत हैं।
- हर्षवर्धन ने स्वयं तीन नाटक लिखे — नागानन्द, रत्नावली, प्रियदर्शिका।
- कालिदास की अन्य रचनाएँ — अभिज्ञानशाकुन्तलम्, रघुवंशम्, कुमारसंभवम्, मेघदूतम्, ऋतुसंहार।
संगम साहित्य (तमिल)
- दक्षिण भारत के प्रारम्भिक इतिहास का प्रमुख स्रोत; यह धर्मनिरपेक्ष साहित्य है।
- काल — ईसा की प्रथम चार शताब्दियाँ (लगभग 300 ई.पू. – 300 ई.)।
- तीन संगम आयोजित हुए, संरक्षक पाण्ड्य शासक; तीसरा एवं सर्वाधिक महत्वपूर्ण संगम मदुरै में। केवल तीसरे संगम का साहित्य उपलब्ध है।
| कृति | विवरण |
|---|---|
| तोल्काप्पियम् | तोल्काप्पियर कृत; तमिल का प्राचीनतम व्याकरण ग्रंथ |
| एट्टुटोगै | आठ संग्रह — इसमें पुरनानूरु, अहनानूरु आदि |
| पत्तुप्पाट्टु | दस गीत / काव्य |
| पदिनेनकीलकणक्कु | 18 लघु ग्रंथ — इसमें तिरुक्कुरल (तिरुवल्लुवर) — 'तमिल का वेद' |
संगम साहित्य में दक्षिण के तीन प्रमुख राजवंशों — चेर, चोल एवं पाण्ड्य के आरम्भिक इतिहास, समाज-व्यवस्था, उद्योग-धन्धों तथा रोम के साथ विदेशी व्यापार की जानकारी मिलती है।
संगमोत्तर (Post-Sangam) महाकाव्य
- शिलप्पादिकारम् — रचयिता इलंगो आडिगल; तमिल का प्रथम महाकाव्य।
- मणिमेकलै — रचयिता सत्तनार; बौद्ध धर्म से प्रभावित।
पल्लव-चोल इतिहास के अन्य स्रोत — नन्दिक्कलम्बकम्, कलिंगत्तुपरणि, चोलचरित।
पुरातात्विक साक्ष्य
अभिलेख (Inscriptions)
सर्वाधिक प्रामाणिक पुरातात्विक स्रोत, क्योंकि इनमें बाद में परिवर्तन सम्भव नहीं। ये स्तम्भों, शिलाओं, ताम्रपत्रों, मुद्राओं, पात्रों, मूर्तियों एवं गुफाओं पर उत्कीर्ण मिलते हैं।
भारत के बाहर प्राप्त अभिलेख
- बोगजकोई अभिलेख (एशिया माइनर, लगभग 1400 ई.पू.) — हित्ती व मितन्नी राजाओं की सन्धि; वैदिक देवताओं इन्द्र, मित्र, वरुण एवं नासत्य का उल्लेख। आर्यों के मूल निवास सम्बन्धी विवाद का प्रमुख साक्ष्य।
- सुमेर / मेसोपोटामिया से प्राप्त मुहरें — सिन्धु घाटी एवं सुमेर के व्यापारिक सम्बन्धों का प्रमाण।
अशोक के अभिलेख
- हड़प्पाई मुहरों की लिपि अब तक अपठित है; अतः पठित अभिलेखों में प्राचीनतम अशोक के अभिलेख हैं।
- प्रकार — 14 वृहत् शिलालेख, लघु शिलालेख, 7 स्तम्भलेख, लघु स्तम्भलेख, गुहालेख (बराबर की गुफाएँ — आजीवकों को दान)।
- भाषा प्रायः प्राकृत; लिपि ब्राह्मी; उत्तर-पश्चिम (शाहबाजगढ़ी, मानसेहरा) में खरोष्ठी; कन्धार में यूनानी एवं आरामाइक।
- अशोक के नाम 'अशोक' का स्पष्ट उल्लेख मास्की, गुर्जरा, नेत्तूर एवं उडेगोलम लघु शिलालेखों में; अन्यत्र वह 'देवानांपिय पियदस्सी' कहलाता है।
अशोक के अभिलेखों की जानकारी सर्वप्रथम 1750 ई. में पादरी टीफेन्थैलर ने दी, और 1837 ई. में जेम्स प्रिंसेप ने ब्राह्मी लिपि का वाचन कर इन्हें पढ़ा।
अन्य प्रमुख अभिलेख
| अभिलेख | शासक / विवरण |
|---|---|
| पिपरहवा अस्थिकलश अभिलेख | बुद्ध के अवशेषों से सम्बन्धित; प्राचीनतम अभिलेखों में |
| सोहगौरा ताम्रपत्र एवं महास्थान अभिलेख | मौर्यकाल; अकाल राहत व्यवस्था का उल्लेख |
| हाथीगुम्फा अभिलेख (उदयगिरि, ओडिशा) | कलिंग नरेश खारवेल; प्राकृत; जैन धर्म |
| बेसनगर (विदिशा) गरुड़ स्तम्भ लेख | हेलियोडोरस — तक्षशिला के यूनानी नरेश एण्टियालकिडस का राजदूत, शुंग नरेश भागभद्र के दरबार में; भागवत धर्म का प्रमाण (लगभग 113 ई.पू.) |
| जूनागढ़ / गिरनार अभिलेख (150 ई.) | शक क्षत्रप रुद्रदामन; प्रथम विशुद्ध संस्कृत अभिलेख; सुदर्शन झील की मरम्मत |
| नासिक गुहालेख | गौतमी बलश्री (गौतमीपुत्र सातकर्णि की माता) द्वारा, वासिष्ठीपुत्र पुलुमावी के 19वें वर्ष में उत्कीर्ण |
| प्रयाग (इलाहाबाद) स्तम्भ प्रशस्ति | हरिषेण रचित; समुद्रगुप्त की विजयें; चम्पू शैली; अशोक के स्तम्भ पर उत्कीर्ण |
| भितरी एवं जूनागढ़ अभिलेख | स्कन्दगुप्त; हूण आक्रमण का उल्लेख |
| एरण अभिलेख (मध्य प्रदेश) | वराह प्रतिमा पर हूण राजा तोरमाण का लेख; तथा भानुगुप्त का 510 ई. का लेख — सती प्रथा का प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य |
| मन्दसौर स्तम्भ अभिलेख | यशोधर्मन — जिसने हूण नरेश मिहिरकुल को पराजित किया |
| मन्दसौर अभिलेख (473 ई.) | वत्सभट्टि रचित; कुमारगुप्त / बन्धुवर्मन काल; रेशम बुनकर श्रेणी का उल्लेख |
| ऐहोल अभिलेख (634 ई.) | चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय; जैन कवि रविकीर्ति रचित; हर्ष की पराजय |
| ग्वालियर अभिलेख | प्रतिहार नरेश मिहिरभोज |
| देवपाड़ा प्रशस्ति | बंगाल के विजयसेन; उमापतिधर रचित |
लिपियाँ
- ब्राह्मी लिपि — बाएँ से दाएँ लिखी जाती थी; भारत की अधिकांश आधुनिक लिपियों की जननी।
- खरोष्ठी लिपि — दाएँ से बाएँ; प्रयोग मुख्यतः उत्तर-पश्चिम भारत में।
- आरामाइक एवं यूनानी — अशोक के कुछ अफ़ग़ानिस्तान-क्षेत्र के अभिलेखों में।
- आरम्भिक अभिलेख प्राकृत में; बाद में संस्कृत तथा तेलुगु-तमिल आदि क्षेत्रीय भाषाओं में।
सिक्के / मुद्राएँ
- मुद्राओं से लगभग 206 ई.पू. से 300 ई. तक के इतिहास पर विशेष प्रकाश पड़ता है।
- आहत सिक्के (Punch Marked) — भारत के प्राचीनतम सिक्के; लेख नहीं, केवल चिह्न (पहाड़, वृक्ष, मछली, हाथी); मुख्यतः चाँदी-ताँबे के; कार्षापण / पण कहलाते थे।
- सर्वप्रथम लेख एवं तिथि युक्त सिक्के तथा प्रथम स्वर्ण मुद्रा — हिन्द-यवन (Indo-Greek) शासकों ने चलाए।
- सर्वाधिक सिक्के उत्तर-मौर्यकाल के — सीसा, पोटीन, ताँबा, काँसा, चाँदी एवं सोने के।
- कुषाणों ने सर्वाधिक शुद्ध सोने के सिक्के चलाए; सर्वाधिक संख्या में सोने के सिक्के गुप्तकाल में — इन्हें 'दीनार' कहा जाता था।
- सर्वाधिक सीसे (lead) के सिक्के सातवाहनों ने चलाए।
- गुप्तकालीन सिक्कों से समुद्रगुप्त की वीणावादन एवं अश्वमेध यज्ञ जैसी जानकारियाँ मिलती हैं।
स्मारक, मूर्तियाँ एवं उत्खनन
- हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, तक्षशिला, मथुरा, कौशाम्बी, पाटलिपुत्र के भवन-अवशेषों से नगर-निर्माण शैली का ज्ञान।
- नालन्दा एवं विक्रमशिला के खण्डहरों से इन विश्वविद्यालयों की गरिमा प्रकट होती है।
- गान्धार शैली (यूनानी प्रभाव) एवं मथुरा शैली (देशी, लाल बलुआ पत्थर)।
- साँची, भरहुत, अमरावती के स्तूप तथा अजन्ता, एलोरा, एलिफेण्टा, बाघ की गुफाएँ।
- मन्दिर स्थापत्य की तीन शैलियाँ — नागर (उत्तर), द्रविड़ (दक्षिण), वेसर (मिश्रित)।
वैज्ञानिक तिथि-निर्धारण पद्धतियाँ
| पद्धति | उपयोग |
|---|---|
| कार्बन-14 (रेडियोकार्बन) | जैविक अवशेषों (लकड़ी, हड्डी, अनाज) की तिथि; खोजकर्ता विलार्ड लिब्बी |
| डेण्ड्रोक्रोनोलॉजी | वृक्षों के वलयों (tree rings) द्वारा तिथि निर्धारण |
| थर्मोल्युमिनिसेन्स (TL) | मृद्भाण्ड (pottery) की तिथि |
| पुरावनस्पति / पुराजन्तु विज्ञान | कृषि एवं पशुपालन का स्वरूप |
भारतीय पुरातत्व का विकास
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1784 | सर विलियम जोन्स — एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल (कलकत्ता) की स्थापना |
| 1837 | जेम्स प्रिंसेप — ब्राह्मी एवं खरोष्ठी लिपि का वाचन |
| 1861 | भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की स्थापना; अलेक्जेंडर कनिंघम प्रथम महानिदेशक — 'भारतीय पुरातत्व के जनक' |
| 1902–28 | जॉन मार्शल महानिदेशक; इनके काल में हड़प्पा व मोहनजोदड़ो की खोज (1921–22) |
| 1944–48 | सर मॉर्टिमर व्हीलर — वैज्ञानिक उत्खनन पद्धति के प्रवर्तक |
विदेशी विवरण
यूनानी-रोमन लेखक
(क) सिकन्दर के पूर्व
| लेखक | योगदान |
|---|---|
| हेकेटियस ऑफ़ मिलेटस | भूगोल की पुस्तक; सिन्धु प्रदेश का प्राचीनतम विवरण |
| हेरोडोटस ('इतिहास का पिता') | 5वीं शती ई.पू. में 'हिस्टोरिका'; भारत-ईरान (फ़ारस) सम्बन्ध |
| स्काईलैक्स | डेरियस के आदेश पर सिन्धु नदी की खोजयात्रा |
| टेसियस (Ctesias) | फ़ारसी सम्राट अर्तक्षत्र द्वितीय का चिकित्सक; भारत सम्बन्धी अतिरंजित विवरण |
(ख) सिकन्दर के समकालीन
- नियार्कस — सिकन्दर का नौसेनापति; सिन्धु से फ़ारस की खाड़ी तक की यात्रा।
- ओनेसिक्रिटस — सिकन्दर की जीवनी; भारतीय नग्न साधुओं का वर्णन।
- अरिस्टोबुलस — सिकन्दर के अभियान का इतिहास।
- यूमेनीस, चारस — सिकन्दर के अभिलेखागार अधिकारी।
(ग) सिकन्दर के बाद
| लेखक | कृति एवं महत्व |
|---|---|
| मेगास्थनीज | सेल्यूकस निकेटर का राजदूत, चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में। कृति 'इण्डिका' — मौर्य प्रशासन, पाटलिपुत्र ('पालिबोथ्रा'), समाज का सात वर्गों में विभाजन। मूल कृति अनुपलब्ध; उसका दासप्रथा के अभाव सम्बन्धी कथन त्रुटिपूर्ण है |
| डाइमेकस | सीरियन नरेश एण्टियोकस का राजदूत, बिन्दुसार के दरबार में |
| डायोनिसियस | मिस्र नरेश टॉलेमी फिलाडेल्फस का राजदूत, अशोक के दरबार में |
| एरियन | 'इण्डिका' एवं 'अनाबासिस' — सिकन्दर के आक्रमण का सर्वाधिक विश्वसनीय विवरण |
| प्लूटार्क | सिकन्दर एवं चन्द्रगुप्त मौर्य की भेंट का उल्लेख |
| जस्टिन | चन्द्रगुप्त मौर्य ('सैण्ड्रोकोट्स') सम्बन्धी विवरण |
| कर्टियस, डायोडोरस, पोलिबियस, स्ट्रैबो | सिकन्दर-कालीन भारत एवं भूगोल |
| प्लिनी (द एल्डर) | प्रथम शती ई., लैटिन में 'नेचुरल हिस्ट्री'; भारत-रोम व्यापार से रोम के स्वर्ण-निकास की शिकायत |
| टॉलेमी | लगभग 150 ई., यूनानी में 'ज्योग्राफी' |
| अज्ञात नाविक | लगभग 80 ई., यूनानी में 'पेरिप्लस ऑफ़ द एरिथ्रियन सी' — समुद्री व्यापार-मार्गदर्शिका; भारतीय बन्दरगाहों एवं आयात-निर्यात का विवरण |
एरियन, जस्टिन एवं प्लूटार्क — सिकन्दर के आक्रमण तथा चन्द्रगुप्त मौर्य से सम्बन्धित प्रश्नों के लिए अनिवार्य नाम।
चीनी एवं तिब्बती लेखक
सभी प्रमुख चीनी यात्री बौद्ध मतानुयायी थे और मुख्यतः बौद्ध धर्म के अध्ययन हेतु भारत आए।
| यात्री | काल / शासक | कृति एवं विवरण |
|---|---|---|
| फ़ाह्यान | चन्द्रगुप्त द्वितीय | कृति 'फ़ो-क्यो-की'। यात्रा 399–414 ई.; भारत में लगभग 6 वर्ष। मध्यदेश की जनता को सुखी एवं समृद्ध बताया; चाण्डालों की दयनीय स्थिति का वर्णन। राजनीतिक विवरण अत्यल्प |
| सुंगयुन | 518 ई. | तीन वर्ष की यात्रा; बौद्ध ग्रंथों की प्रतियाँ एकत्र कीं |
| ह्वेनसांग ('यात्रियों का राजकुमार') | हर्षवर्धन (606–647 ई.) | 629/630 ई. में प्रस्थान; प्रथम भारतीय राज्य कपिशा; भारत में लगभग 15 वर्ष; 645 ई. में लौटा। कृति 'सी-यू-की' — 138 देशों का विवरण। नालन्दा में आचार्य शीलभद्र से अध्ययन। उसके अनुसार सिन्ध का राजा शूद्र था; कन्नौज सभा एवं प्रयाग महामोक्षपरिषद का वर्णन |
| ह्वी-ली | ह्वेनसांग का शिष्य/मित्र | ह्वेनसांग की जीवनी |
| इत्सिंग | 671–695 ई. | नालन्दा विश्वविद्यालय एवं तत्कालीन बौद्ध संघ-जीवन का विस्तृत विवरण |
| मा-त्वान-लिन | — | हर्ष के पूर्वी अभियान पर प्रकाश |
| चाऊ-जू-कुआ | — | चोलकालीन इतिहास एवं व्यापार |
ध्यान रहे: विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना 8वीं शताब्दी में पाल शासक धर्मपाल ने की थी। अतः 7वीं शताब्दी में आए इत्सिंग के विवरण में केवल नालन्दा का उल्लेख है, विक्रमशिला का नहीं।
तिब्बती लेखक
- लामा तारानाथ — 'कंग्युर' एवं 'तंग्युर' तथा 'History of Buddhism' (1608 ई.) — पूर्व-मध्यकालीन भारतीय इतिहास का महत्वपूर्ण स्रोत।
- धर्मस्वामी — 13वीं शताब्दी में भारत आया; उसके विवरण से स्पष्ट है कि 13वीं सदी के पूर्वार्ध तक नालन्दा महाविहार पूर्णतः नष्ट नहीं हुआ था।
अरबी एवं फ़ारसी लेखक
712 ई. में मुहम्मद बिन कासिम की सिन्ध विजय के बाद भारत के अरब जगत से सम्पर्क बढ़े।
| लेखक | कृति एवं विवरण |
|---|---|
| अलबरूनी | 'तहक़ीक़-ए-हिन्द' (किताब-उल-हिन्द) — 11वीं सदी के भारत का सर्वाधिक प्रामाणिक विवरण। महमूद ग़ज़नवी के साथ भारत आया (1017–1030 ई.); मूलतः ख़्वारिज़्म का निवासी; संस्कृत सीखी। उसे 'भारतीय अध्ययन का जनक' कहा जाता है |
| अल-बिलादुरी | 'फ़ुतूह-उल-बुलदान' — अरब आक्रमणों का विवरण |
| सुलेमान | 9वीं सदी का अरब व्यापारी; पाल एवं प्रतिहार राज्यों का विवरण |
| अल-मसूदी | 'मुरुज-उल-ज़हब' (915 ई.) — राष्ट्रकूट व प्रतिहार |
| मिनहाज-उस-सिराज | 'तबक़ात-ए-नासिरी' (13वीं सदी) |
| फ़रिश्ता | 'तारीख़-ए-फ़रिश्ता' (17वीं सदी) |
यूरोपीय यात्री
- मार्कोपोलो — वेनिस (इटली) का यात्री; लगभग 1292–93 ई. में दक्षिण भारत आया। उसने पाण्ड्य राज्य, मोती-मत्स्यन (pearl fishery) एवं समुद्री व्यापार का वर्णन किया।
त्वरित पुनरावृत्ति
'प्रथम' से जुड़े तथ्य
| प्रथम | उत्तर |
|---|---|
| विश्व का प्राचीनतम ग्रंथ | ऋग्वेद |
| शूद्रों का प्रथम उल्लेख | ऋग्वेद, 10वाँ मण्डल (पुरुषसूक्त) |
| संस्कृत व्याकरण का प्रथम ग्रंथ | अष्टाध्यायी — पाणिनि |
| भाषाशास्त्र का प्रथम ग्रंथ | निरुक्त — यास्क |
| प्रथम विशुद्ध संस्कृत अभिलेख | जूनागढ़ अभिलेख — रुद्रदामन, 150 ई. |
| संस्कृत का प्रथम ऐतिहासिक जीवन-चरित | हर्षचरित — बाणभट्ट |
| सती प्रथा का प्रथम अभिलेखीय साक्ष्य | एरण अभिलेख, 510 ई. — भानुगुप्त |
| प्रथम स्वर्ण मुद्रा जारीकर्ता | हिन्द-यवन शासक |
| ब्राह्मी लिपि का प्रथम वाचक | जेम्स प्रिंसेप — 1837 ई. |
| ASI के प्रथम महानिदेशक | अलेक्जेंडर कनिंघम — 1861 ई. |
'सर्वाधिक / सबसे बड़ा'
| प्रश्न | उत्तर |
|---|---|
| सबसे बड़ा ब्राह्मण ग्रंथ | शतपथ ब्राह्मण |
| सबसे प्राचीन एवं बड़ा उपनिषद | बृहदारण्यक उपनिषद |
| सबसे बड़ा पिटक | सुत्तपिटक |
| महाभारत का सबसे बड़ा पर्व | शान्तिपर्व |
| सर्वाधिक प्रामाणिक पुराण | मत्स्य पुराण |
| सर्वाधिक शुद्ध स्वर्ण सिक्के | कुषाण |
| सर्वाधिक संख्या में स्वर्ण सिक्के | गुप्त |
| सर्वाधिक सीसे के सिक्के | सातवाहन |
संख्या-आधारित तथ्य
| विषय | संख्या |
|---|---|
| वेद | 4 |
| ऋग्वेद — मण्डल / सूक्त / ऋचाएँ | 10 / 1028 / ~10,462 |
| सामवेद — ऋचाएँ (मौलिक) | 1875 (75) |
| अथर्ववेद — काण्ड / सूक्त / मन्त्र | 20 / 731 / ~5987 |
| आरण्यक | 7 |
| उपनिषद | 108 |
| वेदांग | 6 |
| महापुराण | 18 |
| महाभारत — पर्व | 18 |
| रामायण — काण्ड | 7 |
| जातक कथाएँ | 547 |
| अर्थशास्त्र — अधिकरण / श्लोक | 15 / ~6000 |
| राजतरंगिणी — तरंग | 8 |
| अशोक — वृहत् शिलालेख / स्तम्भलेख | 14 / 7 |
ध्यान दें: कुछ संख्याओं (जैसे ऋग्वेद की ऋचाएँ, अथर्ववेद के मन्त्र, ह्वेनसांग का नालन्दा-प्रवास) पर विभिन्न ग्रंथों में मामूली अन्तर मिलता है। ऊपर वही मान दिए गए हैं जो UPSC/PSC की उत्तर-कुंजियों में सर्वाधिक स्वीकृत हैं।
अभ्यास प्रश्न (MCQ)
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