प्राचीन भारतीय साहित्य | Ancient Indian Literature
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प्राचीन भारतीय साहित्य Ancient Indian Literature

ऋग्वेद की ऋचाओं से लेकर संगम के तमिल गीतों तक — भाषा, वर्गीकरण, प्रमुख ग्रंथ और वह ऐतिहासिक सूचना जो हमें केवल साहित्य से मिलती है, अन्य किसी स्रोत से नहीं।

लगभग 1500 ई.पू.ऋग्वेद — प्राचीनतम उपलब्ध ग्रंथ
लगभग 500 ई.पू.अष्टाध्यायी — पाणिनि
300 ई.पू.–300 ई.संगम साहित्य का काल
चौथी–पाँचवीं सदी ई.कालिदास एवं गुप्तकालीन काव्य

01भाषा, काल एवं वर्गीकरण Language, Chronology and Classification

प्राचीन भारतीय साहित्य किसी एक भाषा या एक धर्म की सम्पत्ति नहीं है। यह कम से कम पाँच भाषाओं में और तीन धार्मिक परंपराओं में एक साथ विकसित हुआ, और लंबे समय तक लिखित नहीं, कंठस्थ रहा।

क · मौखिक परंपरा की केन्द्रीयता The Oral Tradition

वैदिक साहित्य को श्रुति कहा जाता है — अर्थात् "सुना हुआ"। इसे लिखने के बजाय स्वर, मात्रा और उच्चारण की अत्यंत कठोर पद्धतियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रखा गया। पद-पाठ, क्रम-पाठ, जटा-पाठ एवं घन-पाठ जैसी वाचन-विधियाँ इसी उद्देश्य से विकसित हुईं कि एक भी अक्षर न बदले। इसी कारण ऋग्वेद का पाठ हज़ारों वर्षों तक असाधारण रूप से स्थिर रहा।

इसका एक ऐतिहासिक परिणाम भी है — चूँकि ग्रंथ लंबे समय तक मौखिक रहे, इसलिए उनमें प्रक्षेप (बाद के जोड़) की संभावना बनी रही, और तिथि-निर्धारण कठिन हो गया। यही कारण है कि साहित्यिक स्रोतों की तिथि प्रायः "लगभग" के साथ दी जाती है।

ख · भाषाओं का क्रम Sequence of Languages

वैदिक संस्कृतऋग्वेद एवं संहिताएँ
लौकिक संस्कृतकाव्य, नाटक, शास्त्र
पालिथेरवाद बौद्ध त्रिपिटक
प्राकृतजैन आगम, अभिलेख
अपभ्रंशआधुनिक भाषाओं का सेतु
तमिलसंगम साहित्य
वर्गभाषाप्रमुख अंतर्वस्तु
वैदिक (श्रुति)वैदिक संस्कृतसंहिता, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद — अपौरुषेय मानी जाती हैं।
स्मृति एवं सूत्रसंस्कृतवेदांग, कल्पसूत्र, धर्मशास्त्र, दर्शन-सूत्र।
महाकाव्य एवं पुराणसंस्कृतरामायण, महाभारत, 18 महापुराण।
बौद्ध साहित्यपालि एवं संस्कृतत्रिपिटक, जातक, महायान ग्रंथ।
जैन साहित्यअर्धमागधी प्राकृतआगम — अंग, उपांग एवं अन्य।
धर्मनिरपेक्ष साहित्यसंस्कृत एवं प्राकृतकाव्य, नाटक, कथा, व्याकरण, अर्थशास्त्र, विज्ञान।
संगम साहित्यतमिलअगम (प्रेम) एवं पुरम (वीरता) काव्य।

तालिका दाएँ-बाएँ स्क्रॉल की जा सकती है।

02वैदिक साहित्य Vedic Literature

वैदिक साहित्य चार स्तरों में विकसित हुआ — संहिता (मंत्र), ब्राह्मण (यज्ञ-विधि की व्याख्या), आरण्यक (प्रतीकात्मक चिंतन) एवं उपनिषद (दर्शन)। यह क्रम स्वयं एक बौद्धिक यात्रा है — कर्मकांड से ज्ञान की ओर।

क · चारों संहिताएँ The Four Samhitas

वेदपुरोहितप्रमुख तथ्य
ऋग्वेदहोतृ10 मंडल, 1028 सूक्त, लगभग 10,600 मंत्र। मंडल 2–7 प्राचीनतम (वंश मंडल), 1 एवं 10 सर्वाधिक परवर्ती। तृतीय मंडल में गायत्री मंत्र (विश्वामित्र, सवितृ को समर्पित), नवम मंडल पूर्णतः सोम को, दशम मंडल में पुरुषसूक्त, नासदीय सूक्त एवं नदी सूक्त।
सामवेदउद्गातृ1,875 मंत्र, जिनमें अधिकांश ऋग्वेद से लिए गए। भारतीय संगीत का मूल स्रोत। शाखाएँ — कौथुम, राणायनीय एवं जैमिनीय।
यजुर्वेदअध्वर्युगद्य एवं पद्य दोनों में; यज्ञ की व्यावहारिक विधि। दो भाग — कृष्ण यजुर्वेद (तैत्तिरीय, मैत्रायणी, कठ, कपिष्ठल) एवं शुक्ल यजुर्वेद (वाजसनेयी — माध्यंदिन एवं काण्व)।
अथर्ववेदब्रह्मा20 कांड, लगभग 5,987 मंत्र। जादू-टोना, औषधि, रोग-निवारण एवं लोकजीवन। सबसे बाद में वेद-मान्यता मिली; इसी में सभा एवं समिति को प्रजापति की दो पुत्रियाँ कहा गया।

ख · ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद Brahmanas, Aranyakas and Upanishads

ब्राह्मण ग्रंथ

  • ऐतरेय एवं कौषीतकी — ऋग्वेद से संबद्ध।
  • ताण्ड्य (पंचविंश) एवं जैमिनीय — सामवेद।
  • शतपथ एवं तैत्तिरीय — यजुर्वेद; शतपथ सबसे बड़ा एवं सर्वाधिक महत्वपूर्ण।
  • गोपथ — अथर्ववेद का एकमात्र ब्राह्मण।
  • शतपथ में विदेह माधव की पूर्व-दिशा प्रसार-कथा — आर्य विस्तार का साक्ष्य।

आरण्यक

  • "वन में पढ़े जाने वाले" ग्रंथ; वानप्रस्थ के लिए।
  • यज्ञ की प्रतीकात्मक एवं आध्यात्मिक व्याख्या।
  • प्रमुख — ऐतरेय, तैत्तिरीय एवं बृहदारण्यक।
  • ये ब्राह्मण एवं उपनिषद के बीच का सेतु हैं।

उपनिषद

  • परंपरा में 108; इनमें 13 प्रमुख माने जाते हैं।
  • बृहदारण्यक एवं छान्दोग्य — प्राचीनतम एवं सबसे बड़े।
  • विषय — ब्रह्म, आत्मा, कर्म एवं पुनर्जन्म।
  • इन्हें वेदांत भी कहते हैं, क्योंकि ये वैदिक साहित्य के अंत में आते हैं।
उपनिषद · परीक्षा में सर्वाधिक पूछे जाने वाले तथ्य
  • सत्यमेव जयतेमुण्डक उपनिषद; भारत का राष्ट्रीय आदर्श-वाक्य।
  • चार महावाक्य — "प्रज्ञानं ब्रह्म" (ऐतरेय), "अहं ब्रह्मास्मि" (बृहदारण्यक), "तत्त्वमसि" (छान्दोग्य), "अयमात्मा ब्रह्म" (माण्डूक्य)।
  • कठोपनिषद — नचिकेता एवं यम का संवाद; मृत्यु एवं आत्मा का प्रश्न।
  • बृहदारण्यक — याज्ञवल्क्य के गार्गी एवं मैत्रेयी से संवाद; स्त्री-विदुषियों का प्रमाण।
  • श्वेताश्वतर — ईश्वरवादी झुकाव; ईशोपनिषद शुक्ल यजुर्वेद का अंतिम अध्याय है।

03वेदांग, सूत्र एवं दर्शन Vedangas, Sutras and Philosophy

क · षड्वेदांग The Six Vedangas

वेदांग वेद के "अंग" हैं — अर्थात् वे सहायक विद्याएँ जिनके बिना वेद का शुद्ध पाठ एवं प्रयोग संभव नहीं। परंपरा में इनकी तुलना शरीर के अंगों से की गई है: शिक्षा को नाक, कल्प को हाथ, व्याकरण को मुख, निरुक्त को कान, छन्द को पैर तथा ज्योतिष को नेत्र कहा गया।

वेदांगप्रमुख ग्रंथ / आचार्यविषय
शिक्षाप्रातिशाख्य ग्रंथउच्चारण, स्वर एवं ध्वनि-विज्ञान।
कल्पश्रौत, गृह्य, धर्म एवं शुल्बसूत्रयज्ञ-विधि, संस्कार, विधि तथा वेदी-निर्माण की ज्यामिति।
व्याकरणअष्टाध्यायी — पाणिनिभाषा का नियमन; कात्यायन का वार्तिक एवं पतंजलि का महाभाष्य।
निरुक्तयास्कवैदिक शब्दों की व्युत्पत्ति — प्राचीनतम शब्द-निर्वचन ग्रंथ।
छन्दपिंगलछन्द-शास्त्र; इसी में द्विआधारी संख्या-पद्धति के बीज मिलते हैं।
ज्योतिषलगध — वेदांग ज्योतिषयज्ञ-काल निर्धारण हेतु खगोलीय गणना।

विशेष ध्यान दें: शुल्बसूत्र कल्प का ही अंग हैं, पर इनका महत्त्व धार्मिक से अधिक वैज्ञानिक है — इन्हें भारतीय ज्यामिति का प्राचीनतम ग्रंथ माना जाता है, क्योंकि इनमें वेदी-निर्माण के लिए समकोण त्रिभुज संबंधी सिद्धांत मिलते हैं।

ख · षड्दर्शन एवं नास्तिक धाराएँ Six Systems and the Heterodox

दर्शनप्रवर्तक / मूल ग्रंथकेन्द्रीय स्थापना
सांख्यकपिल · सांख्य सूत्रप्रकृति एवं पुरुष का द्वैत; प्राचीनतम दर्शन-पद्धति मानी जाती है।
योगपतंजलि · योगसूत्रचित्तवृत्ति-निरोध; अष्टांग योग।
न्यायगौतम (अक्षपाद) · न्यायसूत्रप्रमाण एवं तर्क-पद्धति; भारतीय तर्कशास्त्र का आधार।
वैशेषिककणाद · वैशेषिक सूत्रपरमाणुवाद; पदार्थों का वर्गीकरण।
पूर्व मीमांसाजैमिनि · मीमांसा सूत्रवैदिक कर्मकांड की व्याख्या एवं वेद-प्रामाण्य।
उत्तर मीमांसा (वेदांत)बादरायण · ब्रह्मसूत्रब्रह्म-आत्म संबंध; शंकर, रामानुज एवं मध्व की भिन्न व्याख्याएँ।
चार्वाक / लोकायतबृहस्पति परंपराभौतिकवाद; केवल प्रत्यक्ष को प्रमाण माना — मूल ग्रंथ लुप्त।
बौद्ध एवं जैन दर्शनत्रिपिटक एवं आगमवेद-प्रामाण्य अस्वीकार; इसीलिए "नास्तिक" वर्ग में गिने जाते हैं।

ग · धर्मशास्त्र एवं स्मृतियाँ Dharmashastra

मनुस्मृति प्राचीनतम एवं सर्वाधिक प्रभावशाली स्मृति है, जिसकी रचना प्रायः शुंग काल के आसपास मानी जाती है। इसके बाद याज्ञवल्क्य स्मृति आती है, जो विधिक विषयों को अधिक व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करती है। नारद स्मृति गुप्तकाल की मानी जाती है और इसमें व्यवहार-विधि का विस्तृत विवेचन है। परवर्ती काल में इन पर लिखी दो टीकाएँ भारतीय उत्तराधिकार-विधि का आधार बनीं — मिताक्षरा (विज्ञानेश्वर) तथा बंगाल में प्रचलित दायभाग (जीमूतवाहन)।

04महाकाव्य एवं पुराण Epics and Puranas

रामायण Ramayana

  • रचयिता वाल्मीकि; "आदिकाव्य" कहा जाता है।
  • 7 कांड; बालकांड एवं उत्तरकांड परवर्ती जोड़ माने जाते हैं।
  • लगभग 24,000 श्लोक — इसीलिए "चतुर्विंशति सहस्री संहिता"।
  • ऐतिहासिक उपयोग — उत्तर वैदिक से मौर्योत्तर काल तक की सामाजिक स्थितियाँ।

महाभारत Mahabharata

  • रचयिता वेदव्यास; विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य।
  • 18 पर्व तथा परिशिष्ट के रूप में हरिवंश।
  • विकास-क्रम — जय संहिता (8,800 श्लोक) → भारत (24,000) → महाभारत (1,00,000)।
  • भगवद्गीता भीष्मपर्व का अंश है; शांतिपर्व में राजधर्म का विस्तृत विवेचन।

पुराण The Puranas

पुराणों की संख्या 18 महापुराण तथा उतने ही उपपुराण मानी जाती है। इनके पाँच लक्षण हैं — सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर एवं वंशानुचरित। इनमें से केवल वंशानुचरित ऐतिहासिक दृष्टि से उपयोगी है, क्योंकि उसी में राजवंशों की क्रमिक सूचियाँ मिलती हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है कि ये वंशावलियाँ भविष्यत् काल में लिखी गई हैं, मानो भविष्यवाणी हों — यह शैली ही बताती है कि इनका संकलन घटनाओं के बहुत बाद हुआ।

पुराणविशेषताऐतिहासिक उपयोग
मत्स्य पुराणप्राचीनतम माना जाता हैआंध्र-सातवाहन वंशावली का प्रमुख स्रोत।
वायु पुराणशैव झुकावगुप्त साम्राज्य के प्रारंभिक विस्तार की सूचना।
विष्णु पुराणवैष्णवमौर्य वंशावली एवं परवर्ती राजवंश।
ब्रह्माण्ड पुराणभौगोलिक विवरणप्राचीन भूगोल एवं जनपद।
भागवत पुराणभक्ति-प्रधानकृष्ण-भक्ति परंपरा का प्रमुख आधार।

05बौद्ध साहित्य Buddhist Literature

बौद्ध साहित्य का ऐतिहासिक मूल्य इसलिए असाधारण है कि यह पहली बार सामान्य जन, व्यापारी, शिल्पी एवं नगर-जीवन को केन्द्र में लाता है — वह क्षेत्र जिस पर वैदिक साहित्य लगभग मौन है।

क · पालि त्रिपिटक The Pali Canon

विनय पिटक

  • संघ के नियम एवं अनुशासन।
  • तीन भाग — सुत्तविभंग, खंधक एवं परिवार।
  • भिक्षु-भिक्षुणी जीवन का प्रत्यक्ष विवरण।

सुत्त पिटक

  • बुद्ध के उपदेश; सर्वाधिक विस्तृत पिटक।
  • पाँच निकाय — दीघ, मज्झिम, संयुत्त, अंगुत्तर एवं खुद्दक
  • खुद्दक निकाय में धम्मपद, जातक, थेरगाथा एवं थेरीगाथा

अभिधम्म पिटक

  • दार्शनिक एवं मनोवैज्ञानिक विवेचन।
  • सर्वाधिक परवर्ती — तृतीय संगीति में जोड़ा गया।
  • रचयिता परंपरा में मोग्गलिपुत्त तिस्स से संबद्ध।

जातक कथाएँ (547) परीक्षा की दृष्टि से सर्वाधिक उपयोगी हैं — ये बुद्ध के पूर्वजन्मों की कथाएँ होते हुए भी ई.पू. छठी से दूसरी सदी के व्यापार, श्रेणी-व्यवस्था, नगर एवं ग्राम-जीवन का जीवंत चित्र देती हैं। थेरीगाथा प्राचीन विश्व के दुर्लभतम स्त्री-रचित संग्रहों में से एक है।

ख · संस्कृत बौद्ध साहित्य एवं संगीतियाँ Sanskrit Buddhist Texts and Councils

ग्रंथलेखकमहत्त्व
बुद्धचरित एवं सौन्दरानन्दअश्वघोषकनिष्क का समकालीन; संस्कृत बौद्ध महाकाव्य।
माध्यमिककारिकानागार्जुनशून्यवाद; महायान दर्शन का आधार।
अभिधम्मकोशवसुबन्धुबौद्ध दर्शन का विश्वकोशीय ग्रंथ।
विशुद्धिमग्गबुद्धघोषथेरवाद का प्रामाणिक व्याख्या-ग्रंथ।
ललितविस्तर, महावस्तु, दिव्यावदानविभिन्नमहायान परंपरा; बुद्ध का अलौकिक रूप।
मिलिन्दपन्होसंवाद — नागसेन एवं मिनांडरपालि; यवन राजा से दार्शनिक संवाद।
दीपवंश, महावंश, चूलवंशश्रीलंकाई परंपरामौर्य कालक्रम की रीढ़; महावंश के रचयिता महानाम माने जाते हैं।
चार बौद्ध संगीतियाँ · एक साथ
  • प्रथम — राजगृह (लगभग 483 ई.पू.), शासक अजातशत्रु, अध्यक्ष महाकस्सप; विनय एवं सुत्त पिटक का संकलन।
  • द्वितीय — वैशाली (लगभग 383 ई.पू.), शासक कालाशोक; संघ का स्थविरवादी एवं महासांघिक में विभाजन।
  • तृतीय — पाटलिपुत्र (लगभग 250 ई.पू.), शासक अशोक, अध्यक्ष मोग्गलिपुत्त तिस्स; अभिधम्म पिटक जोड़ा गया।
  • चतुर्थ — कुण्डलवन, कश्मीर (कनिष्क का काल), अध्यक्ष वसुमित्र एवं उपाध्यक्ष अश्वघोष; महाविभाषा शास्त्र की रचना तथा हीनयान-महायान विभाजन स्पष्ट हुआ।

06जैन साहित्य Jaina Literature

जैन ग्रंथ अर्धमागधी प्राकृत में हैं और इनकी सबसे बड़ी ऐतिहासिक देन यह है कि ये व्यापार, वणिक वर्ग, नगर एवं श्रेणी-व्यवस्था पर सर्वाधिक प्रकाश डालते हैं।

ग्रंथ / वर्गरचयिताविवरण
आगम साहित्यपरंपरागत संकलन12 अंग, 12 उपांग, 10 प्रकीर्ण, 6 छेदसूत्र, 4 मूलसूत्र एवं 2 चूलिकासूत्र।
आचारांग सूत्रप्रथम अंगभिक्षु-आचार एवं अहिंसा के नियम।
भगवती सूत्रपंचम अंगमहावीर का जीवन तथा सोलह महाजनपदों का उल्लेख।
कल्पसूत्रभद्रबाहुतीर्थंकर-परंपरा एवं महावीर की जीवनी।
तत्त्वार्थसूत्रउमास्वातिसंस्कृत में जैन दर्शन का प्रथम व्यवस्थित ग्रंथ; दोनों संप्रदायों को मान्य।
समयसारकुन्दकुन्ददिगंबर परंपरा का प्रमुख दार्शनिक ग्रंथ।
परिशिष्टपर्वन् एवं द्व्याश्रयकाव्यहेमचन्द्रचन्द्रगुप्त मौर्य के दक्षिण-गमन का उल्लेख; चालुक्य इतिहास भी।
समराइच्चकहाहरिभद्र सूरिप्राकृत कथा-साहित्य का उत्कृष्ट उदाहरण।
जैन संगीतियाँ
  • प्रथम — पाटलिपुत्र (लगभग तीसरी सदी ई.पू.), अध्यक्ष स्थूलभद्र; 12 अंगों का संकलन। इसी काल में श्वेतांबर-दिगंबर विभाजन की पृष्ठभूमि बनी।
  • द्वितीय — वल्लभी (गुजरात), अध्यक्ष देवर्धिगणि क्षमाश्रमण; आगमों का अंतिम लिखित संकलन।
  • जैन साहित्य का ऐतिहासिक विशेष महत्त्व — महाजनपद काल, व्यापार-मार्ग एवं नगरीय जीवन की सूचना।

07संस्कृत काव्य, नाटक एवं कथा Classical Sanskrit Literature

क · महाकाव्य एवं गीतिकाव्य Kavya

ग्रंथकविविशेषता
रघुवंश एवं कुमारसम्भवकालिदासगुप्तकाल; संस्कृत महाकाव्य का शिखर।
मेघदूत एवं ऋतुसंहारकालिदासगीतिकाव्य; मेघदूत विरह-काव्य की विश्व-परंपरा में विशिष्ट।
किरातार्जुनीयम्भारविबृहत्त्रयी का प्रथम ग्रंथ; ऐहोल प्रशस्ति में उल्लेख।
शिशुपालवधमाघबृहत्त्रयी; अलंकार-प्राचुर्य।
नैषधीयचरितश्रीहर्षबृहत्त्रयी; नल-दमयंती कथा।
अमरुशतकअमरुशृंगार-प्रधान मुक्तक काव्य।
गीतगोविन्दजयदेवबारहवीं सदी; भक्ति एवं संगीत का संगम।

स्मरण-सूत्र: बृहत्त्रयी = किरातार्जुनीयम् + शिशुपालवध + नैषधीयचरित। लघुत्रयी = कालिदास के तीन काव्य (रघुवंश, कुमारसम्भव, मेघदूत)।

ख · नाटक Drama

नाटकनाटककारविषय
स्वप्नवासवदत्तम्भासकालिदास से पूर्ववर्ती; उदयन-वासवदत्ता कथा।
मृच्छकटिकम्शूद्रकनगर-जीवन, गणिका एवं सामाजिक यथार्थ का दुर्लभ चित्रण।
अभिज्ञानशाकुन्तलम्कालिदाससंस्कृत नाट्य-परंपरा की सर्वाधिक प्रसिद्ध कृति; विलियम जोन्स ने अनुवाद किया।
विक्रमोर्वशीयम् एवं मालविकाग्निमित्रम्कालिदासमालविकाग्निमित्रम् से शुंग काल की सूचना।
मुद्राराक्षसविशाखदत्तनन्द-मौर्य संक्रमण एवं चाणक्य की कूटनीति।
उत्तररामचरित एवं मालतीमाधवभवभूतिकन्नौज के यशोवर्मन के दरबारी कवि; करुण रस के आचार्य।
नागानन्द, रत्नावली, प्रियदर्शिकाहर्षवर्धनस्वयं सम्राट द्वारा रचित तीन नाटक।
वेणीसंहारभट्ट नारायणमहाभारत-कथा पर आधारित; वीर एवं रौद्र रस।
मत्तविलास प्रहसनमहेन्द्रवर्मन प्रथमपल्लव नरेश; तत्कालीन धार्मिक संप्रदायों पर व्यंग्य।

ग · गद्य एवं कथा-साहित्य Prose and Narrative

गद्य Prose

  • कादम्बरी एवं हर्षचरित — बाणभट्ट; संस्कृत गद्य का शिखर।
  • दशकुमारचरित — दण्डी; समाज के निचले स्तरों का यथार्थ चित्रण।
  • वासवदत्ता — सुबन्धु; अलंकार-प्रधान गद्य।
  • गद्य की दो शैलियाँ — कथा (काल्पनिक) एवं आख्यायिका (ऐतिहासिक आधार)।

कथा-साहित्य Fables

  • पंचतंत्र — विष्णु शर्मा; विश्व की सर्वाधिक अनूदित कथा-कृतियों में।
  • हितोपदेश — नारायण पण्डित।
  • बृहत्कथा — गुणाढ्य; पैशाची प्राकृत में, मूल लुप्त।
  • कथासरित्सागर (सोमदेव) एवं बृहत्कथामंजरी (क्षेमेन्द्र) — बृहत्कथा के संस्कृत रूपांतरण।

08व्याकरण, कोश एवं शास्त्र Grammar, Lexicon and Treatises

ग्रंथलेखकमहत्त्व
अष्टाध्यायीपाणिनिलगभग 500 ई.पू.; लगभग 4,000 सूत्र। भाषा-विज्ञान की विश्व-परंपरा में अद्वितीय। तत्कालीन जनपदों एवं भूगोल की सूचना भी।
वार्तिककात्यायनअष्टाध्यायी पर पूरक टिप्पणी।
महाभाष्यपतंजलिलगभग 150 ई.पू.; शुंग काल एवं यवन आक्रमण का संकेत।
वाक्यपदीयभर्तृहरिभाषा-दर्शन; स्फोट सिद्धांत।
कातन्त्रसर्ववर्मनसातवाहन नरेश हाल के लिए रचित सरलीकृत व्याकरण।
अमरकोशअमरसिंहसंस्कृत का प्रसिद्धतम कोश; गुप्तकालीन सामाजिक श्रेणियों की सूचना।
अर्थशास्त्रकौटिल्य15 अधिकरण; राज्य, कर, गुप्तचर एवं अर्थव्यवस्था — मौर्य प्रशासन का प्रामाणिक स्रोत।
नाट्यशास्त्रभरत मुनिनाट्य, नृत्य, संगीत एवं रस-सिद्धांत का मूल ग्रंथ।
कामसूत्रवात्स्यायनगुप्तकालीन नागरिक जीवन एवं शहरी संस्कृति का महत्वपूर्ण स्रोत।
ध्वन्यालोकआनन्दवर्धनकाव्यशास्त्र में ध्वनि सिद्धांत; अभिनवगुप्त ने इस पर लोचन टीका लिखी।
काव्यप्रकाशमम्मटकाव्यशास्त्र का मानक ग्रंथ।

09वैज्ञानिक साहित्य Scientific Literature

ग्रंथलेखकयोगदान
शुल्बसूत्रबौधायन, आपस्तम्ब आदिवेदी-निर्माण की ज्यामिति; समकोण त्रिभुज संबंधी नियम — भारतीय ज्यामिति का आरंभ।
आर्यभटीयआर्यभट499 ई.; पृथ्वी के अपने अक्ष पर घूमने तथा ग्रहण के वैज्ञानिक कारण का प्रतिपादन; π का सन्निकट मान।
पंचसिद्धांतिका एवं बृहत्संहितावराहमिहिरपाँच खगोलीय पद्धतियों का संकलन; बृहत्संहिता तत्कालीन ज्ञान का विश्वकोश।
ब्रह्मस्फुटसिद्धांतब्रह्मगुप्तशून्य के गणितीय नियम एवं ऋणात्मक संख्याओं पर कार्य।
सिद्धांत शिरोमणि (लीलावती सहित)भास्कराचार्य द्वितीयबारहवीं सदी; गणित एवं खगोल का शिखर-ग्रंथ।
चरक संहिताचरककाय-चिकित्सा; रोग-निदान एवं औषधि।
सुश्रुत संहितासुश्रुतशल्य-चिकित्सा; शल्य-उपकरणों एवं प्लास्टिक सर्जरी संबंधी विवरण।
अष्टांगहृदयवाग्भट्टआयुर्वेद की बृहत्त्रयी का तीसरा ग्रंथ।
माधव निदानमाधवकररोग-निदान (diagnosis) पर केन्द्रित प्रामाणिक ग्रंथ।
रसरत्नाकरनागार्जुनरसायन एवं धातु-विज्ञान।

10संगम एवं तमिल साहित्य Sangam and Tamil Literature

संगम साहित्य की विशेषता यह है कि यह प्रायः धर्मनिरपेक्ष है। यहाँ देवता नहीं, प्रेम एवं वीरता केन्द्र में हैं — और इसीलिए यह दक्षिण भारत के सामाजिक-आर्थिक जीवन का सर्वाधिक विश्वसनीय साहित्यिक स्रोत है।

क · संगम की संरचना Structure

परंपरा में तीन संगम माने जाते हैं, जो पांड्य राजाओं के संरक्षण में मदुरै एवं आसपास आयोजित हुए। प्रथम एवं द्वितीय संगम की रचनाएँ लगभग लुप्त हैं; उपलब्ध साहित्य मुख्यतः तृतीय संगम का है, जिसका काल लगभग 300 ई.पू. से 300 ई. माना जाता है।

संग्रहस्वरूपविवरण
तोल्काप्पियम्व्याकरणतोल्काप्पियर कृत; तमिल का प्राचीनतम उपलब्ध ग्रंथ — व्याकरण के साथ काव्यशास्त्र एवं समाज-वर्णन भी।
एट्टुत्तोकैआठ संग्रहअगनानूरु, पुरनानूरु, नर्रिणै, कुरुन्तोकै आदि; पुरनानूरु से राजनीतिक इतिहास की सर्वाधिक सूचना।
पत्तुप्पाट्टुदस दीर्घ गीततिरुमुरुगाट्रुप्पडै, पट्टिनप्पालै आदि; पट्टिनप्पालै से कावेरीपट्टिनम् बंदरगाह का विवरण।
पदिनेनकीलकणक्कुअठारह लघु ग्रंथइसी वर्ग में तिरुक्कुरल (तिरुवल्लुवर) आता है — नीति एवं जीवन-दर्शन, "तमिल वेद"।
शिलप्पदिकारम्महाकाव्यइलंगो आडिगल; कण्णगी की कथा — तमिल का प्रथम महाकाव्य।
मणिमेखलैमहाकाव्यसत्तनार; बौद्ध पृष्ठभूमि, शिलप्पदिकारम् की अनुवर्ती कथा।
जीवक चिन्तामणिमहाकाव्यतिरुत्तक्कदेवर; जैन तमिल महाकाव्य।

ख · अगम एवं पुरम — काव्य का मूल विभाजन Agam and Puram

अगम — आंतरिक जीवन
  • विषय — प्रेम, दांपत्य एवं वैयक्तिक भावनाएँ।
  • पात्रों के नाम प्रायः नहीं दिए जाते — भाव सार्वभौमिक रहे।
  • पाँच तिणै (भू-दृश्य) — कुरिञ्जी (पर्वत), मुल्लै (वन), मरुदम् (कृषि-भूमि), नेय्दल (तट), पालै (शुष्क भूमि)।
  • यही वर्गीकरण तमिल भूगोल एवं जीविका का भी चित्र देता है।
पुरम — बाह्य जीवन
  • विषय — युद्ध, वीरता, राजा एवं दानशीलता।
  • राजाओं, सरदारों एवं युद्धों के वास्तविक नाम मिलते हैं।
  • चेर, चोल एवं पाण्ड्य — तीनों राज्यों की राजनीतिक सूचना।
  • रोमन व्यापार, बंदरगाह एवं यवन व्यापारियों का प्रत्यक्ष उल्लेख।

11साहित्य की ऐतिहासिक उपयोगिता एवं सीमाएँ Utility and Limitations

साहित्य से इतिहास निकालना सरल नहीं है। वह "क्या हुआ" कम बताता है, "लोग क्या मानते थे" अधिक — और इतिहासकार के लिए दूसरी सूचना कई बार पहली से भी अधिक मूल्यवान होती है।

उपयोगिता
  • सामाजिक संरचना — वर्ण, आश्रम, परिवार एवं स्त्री की स्थिति।
  • आर्थिक जीवन — जातक एवं जैन ग्रंथों से व्यापार, श्रेणी एवं नगर।
  • राजनीतिक विचार — अर्थशास्त्र एवं शांतिपर्व से राज्य की अवधारणा।
  • भौगोलिक सूचना — अष्टाध्यायी एवं पुराणों से जनपद एवं नदियाँ।
  • विचार एवं मूल्य — जो अभिलेख या सिक्कों से कभी नहीं मिल सकते।
सीमाएँ
  • तिथि-निर्धारण कठिन — मौखिक परंपरा एवं प्रक्षेप की समस्या।
  • वर्गीय पूर्वाग्रह — अधिकांश ग्रंथ अभिजन एवं पुरोहित वर्ग के।
  • आदर्श बनाम यथार्थ — धर्मशास्त्र बताते हैं कि क्या होना चाहिए, यह नहीं कि क्या था।
  • अतिशयोक्ति — प्रशस्ति एवं चरित-काव्य में विजय बढ़ा-चढ़ाकर।
  • क्षेत्रीय असंतुलन — कुछ क्षेत्रों का साहित्य समृद्ध, कुछ का लगभग मौन।

धर्मशास्त्र हमें यह नहीं बताते कि समाज कैसा था; वे बताते हैं कि कुछ लोग चाहते थे कि समाज कैसा हो।

आधुनिक इतिहासलेखन की स्थापित सावधानी — भाव-कथन
परीक्षा-दृष्टि · निष्कर्ष
  • साहित्यिक स्रोत की सूचना को सदैव अभिलेख, मुद्रा एवं पुरातत्त्व से मिलाकर परखा जाता है — इसे संयुक्त पाठ कहते हैं।
  • प्राचीन भारत का सर्वाधिक विश्वसनीय स्रोत अभिलेख हैं; साहित्य सर्वाधिक समृद्ध स्रोत है — दोनों बातें अलग हैं।
  • व्यापार एवं नगरीय जीवन के लिए जातक एवं जैन ग्रंथ, प्रशासन के लिए अर्थशास्त्र, तथा दक्षिण भारत के लिए संगम साहित्य — तीनों की भूमिका याद रखें।

12स्वयं जाँच Self Test — 15 Questions

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प्राचीन भारत · साहित्य मॉड्यूल examcg.com
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