examcg.com • CG TET विशेष श्रृंखला

बाल मनोविज्ञान (बाल विकास एवं शिक्षाशास्त्र)

छत्तीसगढ़ शिक्षक पात्रता परीक्षा (CG TET) के पेपर-1 एवं पेपर-2 हेतु सम्पूर्ण नोट्स — सिद्धांत, मनोवैज्ञानिक, तालिकाएँ, स्मृति-सूत्र, वन-लाइनर तथा अभ्यास प्रश्नोत्तरी — सब एक ही पृष्ठ पर।

CG TET पेपर-1 व 2 30 प्रश्न × 1 अंक हिन्दी माध्यम CGPSC / व्यापम उपयोगी

📖 विषय-सूची (Index)

  1. बाल विकास : अर्थ, वृद्धि बनाम विकास
  2. विकास के सिद्धांत (Principles)
  3. विकास की अवस्थाएँ
  4. वंशानुक्रम, वातावरण व समाजीकरण
  5. पियाजे : संज्ञानात्मक विकास
  6. वाइगोत्स्की : सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धांत
  7. कोहलबर्ग : नैतिक विकास
  8. बुद्धि : सिद्धांत, बुद्धि-लब्धि व परीक्षण
  9. व्यक्तित्व : सिद्धांत व मापन
  10. अधिगम : सिद्धांत व स्थानांतरण
  11. अभिप्रेरणा (मास्लो आदि)
  12. भाषा एवं चिंतन
  13. वैयक्तिक भिन्नता व जेंडर
  14. समावेशी शिक्षा व विशेष आवश्यकता
  15. आकलन, मूल्यांकन व CCE
  16. परीक्षा-दृष्टि : 25 वन-लाइनर
  17. स्मृति-सूत्र (Mnemonics)
  18. अभ्यास प्रश्नोत्तरी (15 MCQ)
CG TET पैटर्न : बाल विकास एवं शिक्षाशास्त्र खंड से दोनों पेपरों में 30 प्रश्न (30 अंक) पूछे जाते हैं। प्रश्न प्रायः कक्षा 1–5 (पेपर-1) व कक्षा 6–8 (पेपर-2) के आयु-वर्ग की शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया पर केंद्रित होते हैं। परीक्षा छत्तीसगढ़ व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापम) द्वारा आयोजित होती है।
अध्याय 01

बाल विकास : अर्थ एवं अवधारणा

बाल विकास (Child Development) मनोविज्ञान की वह शाखा है जो गर्भाधान से किशोरावस्था तक बालक में होने वाले शारीरिक, संज्ञानात्मक, संवेगात्मक, सामाजिक, नैतिक व भाषायी परिवर्तनों का क्रमबद्ध अध्ययन करती है। शिक्षक के लिए इसका ज्ञान इसलिए आवश्यक है क्योंकि शिक्षण-विधि, पाठ्यक्रम व आकलन — तीनों बालक की विकास-अवस्था के अनुरूप होने चाहिए (बाल-केंद्रित शिक्षा)।

बाल विकास / बाल मनोविज्ञान की परिभाषाएँ

श्यामपट्ट — बाल मनोविज्ञान

क्रो एवं क्रो : "बाल मनोविज्ञान वह वैज्ञानिक अध्ययन है जो बालक का जन्म से किशोरावस्था के प्रारंभ तक अध्ययन करता है।"

जेम्स ड्रेवर : "बाल मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की वह शाखा है जिसमें जन्म से परिपक्वावस्था की ओर बढ़ते हुए विकासशील मानव का अध्ययन किया जाता है।"

जर्सिल्ड : "बाल मनोविज्ञान गर्भावस्था से लेकर परिपक्वावस्था तक बालक के विकास की अवस्थाओं का वैज्ञानिक अध्ययन करता है।"

हरलॉक (बाल विकास) : "बाल विकास ज्ञान की वह शाखा है जो बालक की वृद्धि एवं विकास के स्वरूप (Pattern) — उनमें पाई जाने वाली समानताओं व वैयक्तिक भिन्नताओं — का अध्ययन करती है।"

विकास (Development) की परिभाषाएँ

श्यामपट्ट — विकास

हरलॉक : "विकास अभिवृद्धि तक सीमित नहीं है; यह परिपक्वता के लक्ष्य की ओर परिवर्तनों का व्यवस्थित एवं सुसंगत (प्रगतिशील) क्रम है।"

गेसेल : "विकास केवल एक अवधारणा ही नहीं है; इसका निरीक्षण, आकलन एवं मापन भी किया जा सकता है।"

जेम्स ड्रेवर : "विकास वह दशा है जो किसी प्राणी में सुप्त शक्तियों (क्षमताओं) के प्रकट होने की ओर निरंतर बढ़ती रहती है।"

मुनरो : "परिवर्तन-शृंखला की वे अवस्थाएँ जिनमें बालक भ्रूणावस्था से लेकर प्रौढ़ावस्था तक गुजरता है, विकास कहलाती हैं।"

जे.ई. एंडरसन : "विकास केवल आकार में बड़ा होना नहीं है; इसमें आकृति व स्वरूप का परिवर्तन तथा कार्य-क्षमता में सुधार भी सम्मिलित है।"

स्किनर : "विकास एक निरंतर तथा धीमी प्रक्रिया है, जो निश्चित लक्ष्य (परिपक्वता) की ओर बढ़ती है।"

लीबर्ट, पोलोस व मार्मोर : "विकास प्राणी की संरचना एवं व्यवहार में होने वाले उन परिवर्तनों की प्रक्रिया है, जो जैविक क्रियाओं तथा वातावरण की अंतःक्रिया के फलस्वरूप होते हैं।"

वृद्धि (Growth) की परिभाषाएँ

श्यामपट्ट — वृद्धि

हरलॉक : "वृद्धि आकार, अनुपात एवं शरीर के अंगों में होने वाले मात्रात्मक परिवर्तनों को कहते हैं।"

फ्रैंक : "कोशिका-विभाजन के फलस्वरूप शरीर, उसके अंगों व अवयवों के भार एवं आकार में होने वाली बढ़ोतरी वृद्धि है।"

सोरेनसन : "वृद्धि से आशय शरीर तथा उसके विभिन्न अंगों के भार व लंबाई में होने वाली बढ़ोतरी से है।"

क्रो एवं क्रो : "वृद्धि शारीरिक अंगों के विकास (आकार-वर्धन) की ओर संकेत करती है।"

एक दृष्टि में : परिभाषा-मिलान तालिका (Matching प्रश्नों हेतु)

विचारककथन का कुंजी-संकेतसंबंधित पद
हरलॉक"परिवर्तनों का व्यवस्थित व प्रगतिशील क्रम" / "वृद्धि व विकास का स्वरूप (Pattern)"विकास / बाल विकास
गेसेल"निरीक्षण, आकलन एवं मापन संभव"विकास
जेम्स ड्रेवर"सुप्त शक्तियों का प्रकटीकरण" / "जन्म से परिपक्वावस्था"विकास / बाल मनोविज्ञान
मुनरो"भ्रूणावस्था से प्रौढ़ावस्था तक परिवर्तन-शृंखला"विकास
जे.ई. एंडरसन"आकृति-परिवर्तन के साथ कार्य-क्षमता में सुधार"विकास
स्किनर"निरंतर तथा धीमी प्रक्रिया"विकास
लीबर्ट, पोलोस व मार्मोर"जैविक क्रियाओं व वातावरण की अंतःक्रिया से संरचना-व्यवहार में परिवर्तन"विकास
हरलॉक"आकार, अनुपात व अंगों में मात्रात्मक परिवर्तन"वृद्धि
फ्रैंक"कोशिका-विभाजन से भार-आकार में बढ़ोतरी"वृद्धि
सोरेनसन"भार व लंबाई में बढ़ोतरी"वृद्धि
क्रो एवं क्रो"शारीरिक अंगों का आकार-वर्धन" / "जन्म से किशोरावस्था का वैज्ञानिक अध्ययन"वृद्धि / बाल मनोविज्ञान
जर्सिल्ड"गर्भावस्था से परिपक्वावस्था तक विकास-अवस्थाओं का वैज्ञानिक अध्ययन"बाल मनोविज्ञान
ध्यान दें : हरलॉक, ड्रेवर व क्रो एवं क्रो — तीनों के दो-दो कथन हैं (अलग-अलग पदों पर); विकल्पों में इन्हीं से भ्रम कराया जाता है। कथन का कुंजी-शब्द पकड़ें — "मात्रात्मक/आकार" आया तो वृद्धि, "क्रम/प्रक्रिया/क्षमता" आया तो विकास, "अध्ययन/शाखा" आया तो बाल मनोविज्ञान

वृद्धि बनाम विकास — सर्वाधिक पूछा जाने वाला अंतर

आधारवृद्धि (Growth)विकास (Development)
स्वरूपकेवल मात्रात्मक (लंबाई, भार, आकार)मात्रात्मक + गुणात्मक (क्षमता, व्यवहार)
अवधिएक निश्चित आयु (परिपक्वता) पर रुक जाती हैजीवनपर्यंत चलता है — "गर्भ से कब्र तक"
मापनप्रत्यक्ष मापन संभव (सेमी, किग्रा)प्रत्यक्ष मापन कठिन, केवल निरीक्षण/आकलन
क्षेत्रसंकुचित — शरीर के अंगों तकव्यापक — वृद्धि इसका एक भाग है
दिशाकेवल बाह्य परिवर्तनआंतरिक + बाह्य दोनों; कार्यकुशलता में सुधार
प्रकृतिकोशिका-विभाजन की जैविक प्रक्रियासमग्र, सर्वांगीण प्रक्रिया
परस्पर संबंधवृद्धि के बिना भी विकास संभवविकास वृद्धि को समाहित करता है
कुंजी-वाक्य : प्रत्येक वृद्धि विकास का हिस्सा है, किंतु प्रत्येक विकास वृद्धि नहीं। वृद्धि बताती है "कितना बड़ा", विकास बताता है "कितना बेहतर"।

विकास के आयाम (Dimensions)

शारीरिक, संज्ञानात्मक (मानसिक), संवेगात्मक, सामाजिक, नैतिक एवं भाषायी — सभी आयाम परस्पर संबंधित हैं; एक आयाम की बाधा अन्य आयामों को भी प्रभावित करती है (परस्पर-संबंध का सिद्धांत — देखें अध्याय 02)।

परीक्षा-दृष्टि : (1) "विकास गर्भ से कब्र तक चलता है" — निरंतरता का सिद्धांत (अध्याय 02)। (2) भार/लंबाई बढ़ना = मात्रात्मक परिवर्तन = वृद्धि। (3) भ्रामक विकल्प — "विकास केवल गुणात्मक होता है" गलत है; विकास दोनों है, वृद्धि केवल मात्रात्मक। (4) वृद्धि = Quantitative, विकास = Quantitative + Qualitative — CG TET में बार-बार पूछा गया भेद।
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अध्याय 02

विकास के सिद्धांत (Principles of Development)

  • निरंतरता का सिद्धांत : विकास कभी न रुकने वाली सतत प्रक्रिया है; गति कभी तीव्र, कभी मंद होती है।
  • क्रमबद्धता (एकरूपता का प्रतिमान) : विकास एक निश्चित क्रम में होता है — बालक पहले बैठता है, फिर खड़ा होता है, फिर चलता है।
  • शीर्षगामी (मस्तकाधोमुखी / Cephalocaudal) सिद्धांत : विकास सिर से पैर की ओर बढ़ता है — शिशु पहले सिर, फिर धड़, फिर पैरों पर नियंत्रण करता है।
  • निकट-दूर (Proximodistal) सिद्धांत : विकास शरीर के केंद्र (मेरुदंड) से बाहरी अंगों (हाथ-उँगलियों) की ओर होता है।
  • सामान्य से विशिष्ट की ओर : बालक पहले पूरे हाथ से पकड़ता है, बाद में उँगलियों से सूक्ष्म पकड़ (fine motor) सीखता है।
  • वैयक्तिक भिन्नता : विकास की गति प्रत्येक बालक में अलग होती है (देखें अध्याय 13)।
  • विकास वंशानुक्रम व वातावरण की अंतःक्रिया का प्रतिफल है (देखें अध्याय 04)।
  • परस्पर संबंध का सिद्धांत : शारीरिक, मानसिक, सामाजिक व संवेगात्मक विकास एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं।
  • पूर्वानुमान (Prediction) संभव : विकास-क्रम निश्चित होने से भावी विकास का अनुमान लगाया जा सकता है।
  • वर्तुलाकार (Spiral) गति : विकास सीधी रेखा में नहीं, वर्तुलाकार ढंग से आगे बढ़ता है — बालक सीखा हुआ दोहराकर पक्का करता है।
परीक्षा-दृष्टि : "सिर से पैर की ओर" = शीर्षगामी; "केंद्र से परिधि की ओर" = निकट-दूर — दोनों में भ्रम न करें; विकल्पों में दोनों साथ दिए जाते हैं।
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अध्याय 03

विकास की अवस्थाएँ (Stages of Development)

अवस्थाआयुमुख्य विशेषताएँ
गर्भावस्थागर्भाधान से जन्म (~280 दिन)सर्वाधिक तीव्र विकास; बीजावस्था → भ्रूणावस्था → गर्भस्थ शिशु
शैशवावस्थाजन्म से 5–6 वर्ष"सीखने का आदर्श काल" (वैलेंटाइन); तीव्र मानसिक विकास; अनुकरण, जिज्ञासा, दोहराने की प्रवृत्ति; फ्रायड — "मनुष्य को जो बनना है वह प्रारंभिक 4-5 वर्षों में बन जाता है"
बाल्यावस्था6 से 12 वर्ष"मिथ्या परिपक्वता का काल" (रॉस); समूह-प्रवृत्ति (Gang age); जिज्ञासा व संग्रह प्रवृत्ति; प्राथमिक विद्यालय काल — शिक्षक हेतु सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण
किशोरावस्था13 से 19 वर्षस्टेनली हॉल — "तनाव, तूफान व संघर्ष की अवस्था"; तीव्र शारीरिक/संवेगात्मक परिवर्तन; आत्म-पहचान की खोज (एरिक्सन); समूह व वीर-पूजा की भावना
परीक्षा-दृष्टि : बाल्यावस्था को "गैंग एज" (समूह अवस्था) तथा किशोरावस्था को "Storm & Stress" कहा जाना — दोनों कथन CG TET/ CGPSC में अनेक बार पूछे गए हैं। किशोरावस्था के संवेगात्मक पक्ष के लिए अभिप्रेरणा अध्याय भी देखें।
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अध्याय 04

वंशानुक्रम, वातावरण एवं समाजीकरण

वंशानुक्रम (Heredity)

  • माता-पिता से गुणसूत्रों (23 जोड़े) द्वारा प्राप्त गुण; वाहक — जीन
  • मेंडल — वंशानुक्रम के नियम; गाल्टन — "व्यक्ति की शारीरिक-मानसिक विशेषताएँ पूर्वजों से प्राप्त होती हैं"।
  • निर्धारित करता है — रंग-रूप, कद, बुद्धि की संभाव्य सीमा, मूल प्रवृत्तियाँ।

वातावरण (Environment)

  • गर्भाधान के बाद व्यक्ति को प्रभावित करने वाले सभी बाह्य कारक — परिवार, विद्यालय, समाज, संस्कृति, पोषण।
  • वुडवर्थ — "वातावरण वह सब कुछ है जो व्यक्ति के अतिरिक्त संपूर्ण जगत में है।"
  • वाटसन (व्यवहारवादी) — वातावरण की सर्वोच्चता : "मुझे एक दर्जन स्वस्थ बालक दो..."
श्यामपट्ट — निष्कर्ष

आधुनिक मत : विकास = वंशानुक्रम × वातावरण की अंतःक्रिया (Interaction), योग नहीं। वुडवर्थ के अनुसार व्यक्ति दोनों का गुणनफल है।

समाजीकरण (Socialization)

वह आजीवन प्रक्रिया जिसके द्वारा बालक समाज के मूल्य, मानदंड व भूमिकाएँ सीखकर सामाजिक प्राणी बनता है।

  • प्राथमिक अभिकरण : परिवार (प्रथम पाठशाला), माँ (प्रथम शिक्षिका), पड़ोस, खेल-समूह।
  • द्वितीयक अभिकरण : विद्यालय, धर्म, जनसंचार माध्यम, राज्य।
  • शिक्षक की भूमिका — सहयोग, सहानुभूति व लोकतांत्रिक व्यवहार द्वारा सकारात्मक समाजीकरण; वाइगोत्स्की के अनुसार अधिगम स्वयं एक सामाजिक प्रक्रिया है।
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अध्याय 05

जीन पियाजे : संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत

स्विस मनोवैज्ञानिक जीन पियाजे (1896–1980) के अनुसार बालक ज्ञान का सक्रिय निर्माता ("नन्हा वैज्ञानिक") है। संज्ञानात्मक विकास आयु के साथ गुणात्मक रूप से भिन्न चार अवस्थाओं से गुजरता है।

मूल संकल्पनाएँ

  • स्कीमा (Schema) : ज्ञान की मानसिक संरचना/इकाई।
  • आत्मसातीकरण (Assimilation) : नई सूचना को पुराने स्कीमा में समाहित करना।
  • समायोजन (Accommodation) : नई सूचना के अनुसार स्कीमा को बदलना।
  • साम्यधारण (Equilibration) : आत्मसातीकरण व समायोजन के बीच संतुलन।

चार अवस्थाएँ

अवस्थाआयुप्रमुख उपलब्धि / विशेषता
संवेदी-गामक (Sensorimotor)0–2 वर्षवस्तु स्थायित्व (Object Permanence); इंद्रियों व क्रियाओं से सीखना
पूर्व-संक्रियात्मक (Preoperational)2–7 वर्षअहंकेंद्रवाद, जीववाद (Animism), प्रतीकात्मक खेल, भाषा-विस्फोट; संरक्षण का अभाव
मूर्त संक्रियात्मक (Concrete Operational)7–11 वर्षसंरक्षण (Conservation), पलटावीपन, वर्गीकरण, क्रमबद्धता — किंतु केवल मूर्त वस्तुओं पर
औपचारिक संक्रियात्मक (Formal Operational)11+ वर्षअमूर्त व काल्पनिक चिंतन, परिकल्पनात्मक-निगमनात्मक तर्क
शैक्षिक निहितार्थ : प्राथमिक कक्षाओं (मूर्त अवस्था) में ठोस शिक्षण-सामग्री, प्रयोग व गतिविधि आधारित शिक्षण दें; अमूर्त सूत्र किशोरावस्था में। तुलना हेतु वाइगोत्स्की (अध्याय 06) देखें — पियाजे में विकास अधिगम से आगे चलता है, वाइगोत्स्की में अधिगम विकास को खींचता है।
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अध्याय 06

लेव वाइगोत्स्की : सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धांत

रूसी मनोवैज्ञानिक वाइगोत्स्की (1896–1934) के अनुसार संज्ञानात्मक विकास सामाजिक अंतःक्रिया व संस्कृति की उपज है; भाषा इसका सबसे महत्त्वपूर्ण उपकरण है।

समीपस्थ विकास का क्षेत्र (ZPD)

जो कार्य बालक अकेले नहीं कर सकता किंतु वयस्क/समर्थ साथी की सहायता से कर सकता है — वही क्षेत्र शिक्षण का वास्तविक लक्ष्य है।

पाड़ / मचान (Scaffolding)

ZPD में दी जाने वाली अस्थायी सहायता — संकेत, प्रश्न, प्रदर्शन — जो दक्षता बढ़ने पर धीरे-धीरे हटा ली जाती है।

MKO

More Knowledgeable Other — अधिक ज्ञान रखने वाला व्यक्ति (शिक्षक, अभिभावक, सहपाठी)।

निजी वाक् (Private Speech)

बालक स्वयं से बोलकर चिंतन का नियमन करता है; पियाजे इसे अहंकेंद्रित वाक् मानते थे, वाइगोत्स्की इसे समस्या-समाधान का साधन

शैक्षिक निहितार्थ : सहयोगी अधिगम (Cooperative Learning), सहपाठी शिक्षण (Peer Tutoring), मार्गदर्शित अभ्यास — CG TET में "ZPD किसने दिया?" और "Scaffolding का अर्थ" सीधे पूछे जाते हैं।
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अध्याय 07

लॉरेंस कोहलबर्ग : नैतिक विकास का सिद्धांत

कोहलबर्ग ने "हाइंज दुविधा" जैसी नैतिक दुविधा-कथाओं के आधार पर नैतिक विकास के 3 स्तर व 6 अवस्थाएँ बताईं। उनका सिद्धांत पियाजे के नैतिक विकास (परायत्त → स्वायत्त नैतिकता) का विस्तार है।

स्तरअवस्थानैतिक तर्क का आधार
1. पूर्व-परंपरागत
(प्रायः 9 वर्ष तक)
1. दंड व आज्ञापालनदंड से बचना ही सही
2. साधनात्मक-सापेक्ष (विनिमय)"तुम मेरी मदद करो, मैं तुम्हारी" — व्यक्तिगत लाभ
2. परंपरागत
(किशोर/वयस्क)
3. अच्छा बालक/बालिकादूसरों की स्वीकृति व प्रशंसा पाना
4. कानून एवं व्यवस्थानियम-कानून का पालन ही कर्तव्य
3. उत्तर-परंपरागत
(कुछ ही वयस्क)
5. सामाजिक अनुबंधनियम जनकल्याण हेतु; बदले जा सकते हैं
6. सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांतअंतरात्मा व न्याय के स्व-चयनित सिद्धांत
परीक्षा-दृष्टि : "अच्छा बालक-अच्छी बालिका अभिविन्यास" किस स्तर में है? — परंपरागत स्तर (अवस्था 3)। आलोचना — कैरोल गिलिगन ने इसे पुरुष-केंद्रित बताया ("care perspective")। नैतिक शिक्षण के व्यावहारिक पक्ष हेतु आकलन अध्याय के मूल्य-आधारित बिंदु देखें।
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अध्याय 08

बुद्धि : सिद्धांत, बुद्धि-लब्धि एवं परीक्षण

श्यामपट्ट — परिभाषाएँ

बिने : "बुद्धि ठीक प्रकार से निर्णय लेने, समझने व तर्क करने की योग्यता है।"

वेक्सलर : "बुद्धि उद्देश्यपूर्ण कार्य करने, तार्किक चिंतन करने व वातावरण से प्रभावी समायोजन की सामूहिक योग्यता है।"

बुद्धि के प्रमुख सिद्धांत

सिद्धांतप्रवर्तकसार
एक-कारकबिने, टर्मन, स्टर्नबुद्धि एक अखंड सामान्य योग्यता
द्वि-कारकस्पीयरमैन (1904)सामान्य कारक G + विशिष्ट कारक S
बहु-कारकथार्नडाइकबुद्धि अनेक स्वतंत्र कारकों का समूह
समूह-कारक (PMA)थर्स्टन7 प्राथमिक मानसिक योग्यताएँ
त्रि-आयामी संरचनागिलफोर्डसंक्रिया × विषयवस्तु × उत्पाद (SOI मॉडल)
तरल-ठोस बुद्धिकैटेलFluid (जन्मजात) व Crystallized (अनुभवजन्य)
बहुबुद्धिहावर्ड गार्डनर (1983)8 प्रकार — भाषायी, तार्किक-गणितीय, स्थानिक, सांगीतिक, शारीरिक-गतिक, अंतर्वैयक्तिक, अंतरावैयक्तिक, प्रकृतिवादी
त्रितंत्र (Triarchic)स्टर्नबर्गविश्लेषणात्मक + सृजनात्मक + व्यावहारिक

बुद्धि-लब्धि (IQ)

श्यामपट्ट — सूत्र

IQ = (मानसिक आयु MA ÷ वास्तविक आयु CA) × 100

सूत्र-प्रवर्तक : विलियम स्टर्न; व्यापक प्रयोग : टर्मन (स्टैनफोर्ड-बिने परीक्षण)। विश्व का पहला बुद्धि परीक्षण : बिने-साइमन (1905, फ्रांस)

IQ परासवर्ग
140 से अधिकप्रतिभाशाली (Genius)
120–139अति उत्कृष्ट
110–119उत्कृष्ट
90–109सामान्य/औसत
70–89मंद / सीमांत
70 से कमबौद्धिक अक्षमता की श्रेणी
परीक्षा-दृष्टि : उदाहरण-प्रश्न — 10 वर्ष के बालक की मानसिक आयु 12 वर्ष है, IQ = (12/10)×100 = 120। प्रतिभाशाली व विशेष बालकों की शिक्षा हेतु अध्याय 14 देखें।
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अध्याय 09

व्यक्तित्व : सिद्धांत एवं मापन

"Personality" शब्द लैटिन Persona (मुखौटा) से बना है। ऑलपोर्ट — "व्यक्तित्व व्यक्ति के भीतर उन मनोदैहिक तंत्रों का गत्यात्मक संगठन है जो वातावरण के साथ उसके अनूठे समायोजन को निर्धारित करता है।"

प्रकार (Type) उपागम

  • युंग : अंतर्मुखी, बहिर्मुखी, उभयमुखी — TET का सर्वप्रिय प्रश्न।
  • क्रेश्मर (शारीरिक गठन) व शेल्डन (एंडोमॉर्फ, मेसोमॉर्फ, एक्टोमॉर्फ)।
  • हिप्पोक्रेट्स : चार द्रव्यों पर आधारित स्वभाव-प्रकार।

फ्रायड का मनोविश्लेषण

  • मन के स्तर : चेतन, अवचेतन, अचेतन (हिमशैल रूपक)।
  • व्यक्तित्व संरचना : इदम् (Id — सुख का सिद्धांत), अहम् (Ego — वास्तविकता), पराहम् (Superego — नैतिकता/आदर्श)
  • मनोलैंगिक अवस्थाएँ : मौखिक → गुदा → लैंगिक → अव्यक्त → जननेंद्रिय।

एरिक्सन : मनोसामाजिक विकास

जीवनपर्यंत 8 अवस्थाएँ; विद्यालय-आयु (6–12 वर्ष) की अवस्था — परिश्रम बनाम हीनता; किशोरावस्था — पहचान बनाम भूमिका-संभ्रम

मापन विधियाँ

विधिउदाहरण
प्रक्षेपी (Projective)रोर्शा स्याही-धब्बा परीक्षण, TAT (मरे व मॉर्गन), CAT (बालकों हेतु), वाक्य-पूर्ति
प्रश्नावली/सूचीकैटेल का 16 PF, MMPI, बिग फाइव (OCEAN)
अन्यसाक्षात्कार, निरीक्षण, आत्मकथा, समाजमिति (मोरेनो)
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अध्याय 10

अधिगम : सिद्धांत, नियम एवं स्थानांतरण

श्यामपट्ट — परिभाषा

गेट्स : "अनुभव व प्रशिक्षण द्वारा व्यवहार में होने वाला अपेक्षाकृत स्थायी परिवर्तन ही अधिगम है।" (थकान, परिपक्वता या औषधि से हुआ परिवर्तन अधिगम नहीं।)

प्रमुख अधिगम सिद्धांत — तुलनात्मक तालिका

सिद्धांतप्रवर्तकप्रयोगमुख्य बिंदु
प्रयास एवं त्रुटि (S-R)थार्नडाइकभूखी बिल्ली + पहेली बॉक्ससंबंधवाद; नियम — तत्परता, अभ्यास, प्रभाव
शास्त्रीय अनुबंधनपावलवकुत्ता + घंटी + भोजनउद्दीपन का प्रतिस्थापन; CS-UCS साहचर्य
क्रिया-प्रसूत अनुबंधनस्किनरचूहा/कबूतर + स्किनर बॉक्सपुनर्बलन (धनात्मक/ऋणात्मक) से व्यवहार-आवृत्ति; अभिक्रमित अनुदेशन
अंतर्दृष्टि (सूझ)कोहलर (गेस्टाल्ट)चिंपैंजी ‘सुल्तान’ + केलेसमस्या का समग्र प्रत्यक्षीकरण — "अहा!" अनुभूति
सामाजिक अधिगमबंडूराबोबो डॉल प्रयोगनिरीक्षण व अनुकरण से अधिगम (मॉडलिंग)
चिह्न/संकेत अधिगमटॉलमैनचूहे + भूलभुलैयासप्रयोजन व्यवहार; संज्ञानात्मक मानचित्र
क्षेत्र सिद्धांतकुर्ट लेविनव्यवहार = f(व्यक्ति, वातावरण); जीवन-क्षेत्र

थार्नडाइक के मुख्य नियम

  • तत्परता का नियम : सीखने को तैयार होने पर अधिगम सुखद व प्रभावी।
  • अभ्यास का नियम : उपयोग से संबंध दृढ़, अनुपयोग से क्षीण।
  • प्रभाव (परिणाम) का नियम : संतोषजनक परिणाम व्यवहार को दृढ़ करता है — पुरस्कार-दंड का मनोवैज्ञानिक आधार।

अधिगम स्थानांतरण (Transfer of Learning)

  • धनात्मक : पूर्व-अधिगम नए अधिगम में सहायक (हिंदी → संस्कृत)।
  • ऋणात्मक : पूर्व-अधिगम नए अधिगम में बाधक।
  • शून्य : कोई प्रभाव नहीं।
परीक्षा-दृष्टि : "अधिगम पठार" (Learning Plateau) — अभ्यास के बावजूद प्रगति का अस्थायी ठहराव; इसका उपचार — विधि-परिवर्तन व अभिप्रेरणा। पुनर्बलन बनाम दंड का अंतर स्किनर से जुड़ा है।
↑ विषय-सूची पर लौटें
अध्याय 11

अभिप्रेरणा (Motivation)

अभिप्रेरणा वह आंतरिक शक्ति है जो व्यवहार को आरंभ, दिशा व निरंतरता देती है। शब्द लैटिन Movere (गति करना) से बना है।

आंतरिक (Intrinsic)

कार्य स्वयं में आनंददायक — जिज्ञासा, रुचि, सीखने का सुख। शिक्षा में सर्वश्रेष्ठ।

बाह्य (Extrinsic)

पुरस्कार, अंक, प्रशंसा, दंड-भय जैसे बाहरी कारक।

मास्लो का आवश्यकता-पदानुक्रम (1943)

  1. दैहिक/शारीरिक आवश्यकताएँ — भोजन, जल, नींद (सबसे नीचे)
  2. सुरक्षा की आवश्यकता
  3. प्रेम व संबंधन (Belongingness)
  4. सम्मान (Esteem)
  5. आत्मसिद्धि / आत्म-यथार्थीकरण (Self-Actualization — शिखर)
परीक्षा-दृष्टि : भूखा बालक कक्षा में ध्यान क्यों नहीं देता? — क्योंकि दैहिक आवश्यकता अपूर्ण है (मास्लो)। उपलब्धि अभिप्रेरणा (n-Ach) की अवधारणा — मैक्लीलैंड। अभिप्रेरणा व अधिगम का संबंध अध्याय 10 में देखें।
↑ विषय-सूची पर लौटें
अध्याय 12

भाषा एवं चिंतन

  • चॉम्स्की : भाषा-अर्जन जन्मजात क्षमता है — LAD (Language Acquisition Device) व सार्वभौमिक व्याकरण।
  • स्किनर : भाषा अनुकरण व पुनर्बलन से सीखी जाती है (व्यवहारवादी मत)।
  • पियाजे : चिंतन भाषा से पहले — भाषा संज्ञानात्मक विकास का अनुसरण करती है।
  • वाइगोत्स्की : भाषा व चिंतन प्रारंभ में स्वतंत्र, लगभग 2 वर्ष की आयु पर मिलकर मौखिक चिंतन बनाते हैं; निजी वाक् → आंतरिक वाक्।
  • भाषा-विकास क्रम : रुदन → बबलाना (Babbling) → एक-शब्द → दो-शब्द (टेलीग्राफिक) → वाक्य।
  • बहुभाषिक कक्षा : मातृभाषा प्रथम भाषा-शिक्षण का सर्वोत्तम माध्यम (NCF 2005 का मत); बहुभाषिकता संसाधन है, बाधा नहीं।
↑ विषय-सूची पर लौटें
अध्याय 13

वैयक्तिक भिन्नता एवं जेंडर

वैयक्तिक भिन्नता — बुद्धि, रुचि, अभिक्षमता, अधिगम-शैली, गति व सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में बालकों के बीच पाया जाने वाला अंतर। कारण — वंशानुक्रम व वातावरण दोनों।

  • शैक्षिक निहितार्थ : विविध शिक्षण-विधियाँ, लचीला पाठ्यक्रम, विभेदित अनुदेशन, अपनी गति से सीखने के अवसर।
  • अधिगम-शैलियाँ : दृश्य (Visual), श्रव्य (Auditory), गतिक (Kinesthetic)।

जेंडर : एक सामाजिक निर्मिति

  • लिंग (Sex) जैविक है; जेंडर (Gender) समाज द्वारा निर्मित भूमिकाएँ।
  • जेंडर पूर्वाग्रह/रूढ़िबद्धता (Stereotype) — "गणित लड़कों का विषय है" — ऐसी धारणाओं का शिक्षक द्वारा सक्रिय खंडन आवश्यक।
  • पाठ्यपुस्तकों व कक्षा-व्यवहार में जेंडर-संवेदनशीलता — दोनों को समान अवसर, समान अपेक्षाएँ।
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अध्याय 14

समावेशी शिक्षा एवं विशेष आवश्यकता वाले बच्चे

समावेशी शिक्षा — सभी बच्चों (दिव्यांग, वंचित, प्रतिभाशाली सहित) को एक ही सामान्य कक्षा में, उनकी आवश्यकतानुसार सहायता देकर पढ़ाना। यह पृथक्करण (Segregation) व एकीकरण (Integration) से आगे की अवधारणा है।

अधिगम अक्षमताएँ (Learning Disabilities)

अक्षमताप्रभावित क्षेत्रलक्षण
डिस्लेक्सियापठनअक्षर उलटना (b/d), धीमा व त्रुटिपूर्ण वाचन
डिस्ग्राफियालेखनअस्पष्ट हस्तलेख, वर्तनी त्रुटियाँ
डिस्कैल्कुलियागणना/गणितसंख्या-बोध व गणितीय संक्रियाओं में कठिनाई
डिस्प्रैक्सियागति-समन्वयबटन लगाने, लिखने जैसी क्रियाओं में कठिनाई
ADHDध्यान/सक्रियताध्यान-अवधि कम, अति-सक्रियता, आवेगशीलता
ऑटिज्म स्पेक्ट्रमसामाजिक संप्रेषणसामाजिक अंतःक्रिया व संप्रेषण में कठिनाई, दोहराव वाले व्यवहार

महत्त्वपूर्ण प्रावधान

  • RTE अधिनियम 2009 : 6–14 वर्ष के सभी बच्चों को निःशुल्क व अनिवार्य शिक्षा (अनुच्छेद 21-A); कक्षा में शारीरिक दंड व मानसिक उत्पीड़न निषिद्ध।
  • RPWD अधिनियम 2016 : दिव्यांगता की 21 श्रेणियाँ; बेंचमार्क दिव्यांग बच्चों हेतु विशेष प्रावधान।
  • प्रतिभाशाली बालक : उच्च IQ (लगभग 130+), मौलिकता व तीव्र अधिगम — इन्हें संवर्धन (Enrichment) व त्वरण (Acceleration) कार्यक्रम चाहिए; बुद्धि-वर्गीकरण हेतु अध्याय 08 देखें।
CG संदर्भ : छत्तीसगढ़ में समावेशी शिक्षा समग्र शिक्षा अभियान के अंतर्गत संचालित है; अनुसूचित क्षेत्रों (बस्तर, सरगुजा) की बहुभाषिक पृष्ठभूमि — गोंडी, हल्बी, सरगुजिहा, छत्तीसगढ़ी — के बच्चों हेतु मातृभाषा-आधारित शिक्षण पर प्रश्न पूछे जा सकते हैं।
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अध्याय 15

आकलन, मूल्यांकन एवं CCE

पदअर्थ
मापन (Measurement)अंकात्मक/संख्यात्मक वर्णन — "कितना?"
आकलन (Assessment)अधिगम-प्रगति के प्रमाण जुटाने की सतत प्रक्रिया
मूल्यांकन (Evaluation)मूल्य-निर्णय — "कितना अच्छा?" (व्यापक अवधारणा)

रचनात्मक आकलन (Formative)

अधिगम के लिए आकलन — शिक्षण के दौरान; उद्देश्य सुधार व फीडबैक; उदाहरण — कक्षा-प्रश्न, कार्यपत्रक, अवलोकन, पोर्टफोलियो।

योगात्मक आकलन (Summative)

अधिगम का आकलन — सत्रांत में उपलब्धि का निर्णय; उदाहरण — वार्षिक/इकाई परीक्षा, ग्रेडिंग।

  • CCE (सतत एवं व्यापक मूल्यांकन) : RTE 2009 की धारा-29 में उल्लिखित; शैक्षिक + सह-शैक्षिक दोनों पक्षों का सतत आकलन।
  • NCF 2005 : आकलन को अधिगम का सहज हिस्सा बनाना; परीक्षा-भय घटाना; रटने के स्थान पर समझ ("Learning without Burden" — यशपाल समिति की भावना)।
  • अच्छे परीक्षण के गुण : वैधता, विश्वसनीयता, वस्तुनिष्ठता, व्यापकता, व्यावहारिकता
  • निदानात्मक परीक्षण → कठिनाई का पता; उपचारात्मक शिक्षण → समाधान (दोनों साथ-साथ चलते हैं)।
परीक्षा-दृष्टि : "आकलन के लिए, का और के रूप में" (for / of / as Learning) का भेद तथा CCE का RTE से संबंध — CG TET में प्रत्यक्ष प्रश्न। बाल-केंद्रित शिक्षण के सैद्धांतिक आधार हेतु पियाजेवाइगोत्स्की पढ़ें।
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अध्याय 16

परीक्षा-दृष्टि : 25 वन-लाइनर

पुनरावृत्ति हेतु तथ्य — प्रत्येक तथ्य के विस्तार हेतु संबंधित अध्याय का लिंक साथ दिया गया है।

  1. "विकास गर्भ से कब्र तक चलने वाली प्रक्रिया है" — विकास की निरंतरता। (अ. 02)
  2. विकास का शीर्षगामी क्रम — सिर से पैर की ओर। (अ. 02)
  3. किशोरावस्था को "तनाव व तूफान की अवस्था" — स्टेनली हॉल ने कहा। (अ. 03)
  4. बाल्यावस्था = गैंग एज (समूह-अवस्था)। (अ. 03)
  5. व्यक्ति वंशानुक्रम व वातावरण का गुणनफल है — वुडवर्थ। (अ. 04)
  6. वस्तु स्थायित्व की प्राप्ति — पियाजे की संवेदी-गामक अवस्था (0–2 वर्ष)। (अ. 05)
  7. अहंकेंद्रवाद व जीववाद — पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था (2–7 वर्ष) की विशेषता। (अ. 05)
  8. संरक्षण (Conservation) की समझ — मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (7–11 वर्ष)। (अ. 05)
  9. ZPD व Scaffolding की अवधारणा — वाइगोत्स्की। (अ. 06)
  10. वाइगोत्स्की के अनुसार संज्ञानात्मक विकास का प्रमुख साधन — भाषा व सामाजिक अंतःक्रिया। (अ. 06)
  11. "अच्छा बालक-अच्छी बालिका" अभिविन्यास — कोहलबर्ग का परंपरागत स्तर। (अ. 07)
  12. कोहलबर्ग ने नैतिक विकास के अध्ययन हेतु नैतिक दुविधाओं (हाइंज) का प्रयोग किया। (अ. 07)
  13. बुद्धि का द्वि-कारक (G व S) सिद्धांत — स्पीयरमैन। (अ. 08)
  14. बहुबुद्धि सिद्धांत (8 बुद्धियाँ) — हावर्ड गार्डनर। (अ. 08)
  15. IQ सूत्र (MA/CA × 100) — विलियम स्टर्न; प्रथम बुद्धि परीक्षण — बिने-साइमन (1905)। (अ. 08)
  16. अंतर्मुखी-बहिर्मुखी वर्गीकरण — युंग। (अ. 09)
  17. रोर्शा स्याही-धब्बा व TAT — व्यक्तित्व की प्रक्षेपी विधियाँ। (अ. 09)
  18. प्रयास व त्रुटि सिद्धांत (बिल्ली-प्रयोग) — थार्नडाइक; प्रभाव का नियम भी इन्हीं का। (अ. 10)
  19. क्रिया-प्रसूत अनुबंधन व पुनर्बलन — स्किनर। (अ. 10)
  20. अंतर्दृष्टि (सूझ) द्वारा अधिगम — कोहलर (चिंपैंजी ‘सुल्तान’)। (अ. 10)
  21. बोबो डॉल प्रयोग व सामाजिक अधिगम — बंडूरा। (अ. 10)
  22. आवश्यकता-पदानुक्रम का शिखर — आत्मसिद्धि (मास्लो)। (अ. 11)
  23. LAD (भाषा-अर्जन युक्ति) — चॉम्स्की। (अ. 12)
  24. पठन संबंधी अधिगम अक्षमता — डिस्लेक्सिया; गणना संबंधी — डिस्कैल्कुलिया। (अ. 14)
  25. CCE का उल्लेख — RTE 2009 की धारा 29; रचनात्मक आकलन = अधिगम के लिए आकलन। (अ. 15)
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अध्याय 17

स्मृति-सूत्र (Mnemonics)

"संपू मूर्ति औपचारिक"
पियाजे की अवस्थाएँ क्रम से — संवेदी-गामक → पूर्व-संक्रियात्मक → मूर्त संक्रियात्मक → औपचारिक संक्रियात्मक। (अ. 05)
"दैनिक सुरक्षा से प्रेम, सम्मान और आत्मसिद्धि"
मास्लो का पदानुक्रम नीचे से ऊपर — दैहिक → सुरक्षाप्रेम/संबंधन → सम्मानआत्मसिद्धि। (अ. 11)
"तत्परता से अभ्यास करो, प्रभाव मिलेगा"
थार्नडाइक के तीन मुख्य नियम — तत्परता, अभ्यास, प्रभाव। (अ. 10)
"पाशा बिल्ली, स्किनर चूहा, कोहलर बंदर, बंडूरा गुड़िया"
प्रयोग-पशु याद रखें — पावलव (कुत्ता*), थार्नडाइक (बिल्ली), स्किनर (चूहा/कबूतर), कोहलर (चिंपैंजी), बंडूरा (बोबो डॉल)। *पाशा = पावलव-शास्त्रीय। (अ. 10)
"लेखनी गिरी गणित की गति"
डिस्ग्राफिया = लेखन; डिस्लेक्सिया = पठन; डिस्कैल्कुलिया = गणित; डिस्प्रैक्सिया = गति-समन्वय। (अ. 14)
"वैध विश्वास ही वस्तु का व्यवहार"
अच्छे परीक्षण के गुण — वैधता, विश्वसनीयता, वस्तुनिष्ठता, व्यापकता, व्यवहारिकता। (अ. 15)
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अध्याय 18

अभ्यास प्रश्नोत्तरी — 15 MCQ

विकल्प चुनते ही सही/गलत का संकेत व व्याख्या मिलेगी। कमज़ोर विषय की पहचान कर संबंधित अध्याय दोबारा पढ़ें।

प्रश्न 01 बाल विकास में 'शीर्षगामी सिद्धांत' का अर्थ है —

व्याख्या : शीर्षगामी (Cephalocaudal) = सिर से पैर की ओर; केंद्र से परिधि = निकट-दूर सिद्धांत। (अ. 02)

प्रश्न 02 किशोरावस्था को 'तनाव, तूफान एवं संघर्ष की अवस्था' किसने कहा?

व्याख्या : स्टेनली हॉल — Storm & Stress; रॉस ने बाल्यावस्था को 'मिथ्या परिपक्वता का काल' कहा। (अ. 03)

प्रश्न 03 पियाजे के अनुसार 'वस्तु स्थायित्व' किस अवस्था की उपलब्धि है?

व्याख्या : वस्तु स्थायित्व (Object Permanence) 0–2 वर्ष की संवेदी-गामक अवस्था में विकसित होता है। (अ. 05)

प्रश्न 04 नई सूचना के अनुसार पुराने स्कीमा को बदलना कहलाता है —

व्याख्या : स्कीमा बदलना = समायोजन (Accommodation); पुराने स्कीमा में समाहित करना = आत्मसातीकरण। (अ. 05)

प्रश्न 05 'समीपस्थ विकास का क्षेत्र (ZPD)' की अवधारणा किसने दी?

व्याख्या : ZPD, Scaffolding व MKO — वाइगोत्स्की के सामाजिक-सांस्कृतिक सिद्धांत की अवधारणाएँ। (अ. 06)

प्रश्न 06 कोहलबर्ग के अनुसार 'दंड से बचने हेतु नियम-पालन' किस स्तर का लक्षण है?

व्याख्या : दंड-आज्ञापालन अभिविन्यास पूर्व-परंपरागत स्तर की पहली अवस्था है। (अ. 07)

प्रश्न 07 बुद्धि का द्वि-कारक सिद्धांत (G व S कारक) किसने दिया?

व्याख्या : स्पीयरमैन (1904) — सामान्य कारक G + विशिष्ट कारक S। (अ. 08)

प्रश्न 08 8 वर्ष के बालक की मानसिक आयु 10 वर्ष है, उसकी बुद्धि-लब्धि होगी —

व्याख्या : IQ = (10 ÷ 8) × 100 = 125। सूत्र-प्रवर्तक विलियम स्टर्न। (अ. 08)

प्रश्न 09 रोर्शा स्याही-धब्बा परीक्षण किसके मापन की विधि है?

व्याख्या : रोर्शा व TAT व्यक्तित्व मापन की प्रक्षेपी (Projective) विधियाँ हैं। (अ. 09)

प्रश्न 10 'प्रभाव का नियम' (Law of Effect) किस मनोवैज्ञानिक से संबंधित है?

व्याख्या : तत्परता, अभ्यास व प्रभाव — तीनों मुख्य नियम थार्नडाइक के हैं। (अ. 10)

प्रश्न 11 अंतर्दृष्टि (सूझ) द्वारा अधिगम का प्रयोग चिंपैंजी 'सुल्तान' पर किसने किया?

व्याख्या : कोहलर (गेस्टाल्टवादी) — समस्या का समग्र प्रत्यक्षीकरण, 'अहा!' अनुभूति। (अ. 10)

प्रश्न 12 मास्लो के आवश्यकता-पदानुक्रम में सर्वोच्च आवश्यकता है —

व्याख्या : क्रम: दैहिक → सुरक्षा → प्रेम/संबंधन → सम्मान → आत्मसिद्धि (शिखर)। (अ. 11)

प्रश्न 13 LAD (Language Acquisition Device) की अवधारणा किसने दी?

व्याख्या : चॉम्स्की — भाषा-अर्जन की जन्मजात क्षमता; स्किनर इसे पुनर्बलन से सीखा मानते थे। (अ. 12)

प्रश्न 14 गणितीय गणना में कठिनाई से संबंधित अधिगम अक्षमता है —

व्याख्या : डिस्कैल्कुलिया = गणना; डिस्लेक्सिया = पठन; डिस्ग्राफिया = लेखन। (अ. 14)

प्रश्न 15 'सतत एवं व्यापक मूल्यांकन (CCE)' का उल्लेख किस अधिनियम में है?

व्याख्या : RTE अधिनियम 2009 की धारा 29 में CCE का प्रावधान है। (अ. 15)
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