examcg.com · मध्यकालीन भारत · अध्याय 12

भक्ति एवं सूफी आंदोलनधर्म और समाज में सुधार का कार्य

आठवीं से अठारहवीं शताब्दी के बीच भारत में दो समान्तर धाराएँ बहीं — एक मंदिर से, दूसरी ख़ानक़ाह से। दोनों ने कर्मकांड के स्थान पर प्रेम, पंडित-मुल्ला के स्थान पर गुरु-पीर, और संस्कृत-अरबी के स्थान पर लोकभाषा को चुना।

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खंड 01 · संगम

पृष्ठभूमि एवं उद्भव के कारण

मध्यकालीन भारत में दो व्यापक धार्मिक-सामाजिक आंदोलन उभरे — भक्ति आंदोलन (हिंदू धर्म के भीतर से) एवं सूफी आंदोलन (इस्लाम के भीतर से)। दोनों ही कर्मकांड, पुरोहितवाद एवं धार्मिक कट्टरता के विरुद्ध प्रतिक्रिया थे, और दोनों ने ईश्वर के साथ व्यक्तिगत, प्रेममय संबंध को मुक्ति का मार्ग बताया।

6वीं–9वींशती · आलवार-नयनार
1192 ई.चिश्ती सिलसिला भारत में
14वीं–17वींशती · चरम काल
2 धाराएँनिर्गुण एवं सगुण

भक्ति आंदोलन के उदय के कारण

  • कर्मकांड की जटिलता — यज्ञ, कठिन विधि-विधान एवं महँगे अनुष्ठान आम जन की पहुँच से बाहर हो गए थे।
  • ब्राह्मणवादी वर्चस्व एवं जाति-कठोरता — निम्न वर्गों को धार्मिक अधिकारों से वंचित रखना।
  • इस्लाम का प्रभाव — एकेश्वरवाद, समानता एवं सामूहिक प्रार्थना की सरलता से प्रेरणा।
  • सूफी संतों का प्रभाव — प्रेम, समानता एवं सादगी का संदेश।
  • बौद्ध एवं जैन धर्म का पतन — जिससे उत्पन्न वैचारिक शून्य को भक्ति ने भरा।
  • वैष्णव-शैव आचार्यों का दार्शनिक आधार — रामानुज आदि ने भक्ति को शास्त्रीय वैधता दी।
  • लोकभाषाओं का विकास — तमिल, मराठी, अवधी, ब्रज, बांग्ला, पंजाबी आदि में अभिव्यक्ति संभव हुई।
  • नगरीय शिल्पी वर्ग का उदय — जुलाहा, चर्मकार, दर्जी, नाई जैसे वर्गों को जाति-मुक्त आध्यात्मिक स्थान की आवश्यकता थी।

सूफी आंदोलन के भारत आने के कारण

  • अरब एवं मध्य एशिया में मंगोल आक्रमणों (13वीं सदी) के कारण सूफी संतों का भारत की ओर पलायन।
  • उलेमा वर्ग की रूढ़िवादिता एवं राज्याश्रित इस्लाम के विरुद्ध आंतरिक प्रतिक्रिया।
  • तुर्क सत्ता की स्थापना से खुले मार्ग एवं संरक्षण।
  • भारतीय वेदांत, योग एवं नाथपंथ की रहस्यवादी परंपरा से वैचारिक निकटता।

भक्ति आंदोलन का प्रारंभ दक्षिण भारत (तमिल क्षेत्र) से हुआ और यह दक्षिण से उत्तर की ओर फैला — यह तथ्य लगभग प्रत्येक प्रारंभिक परीक्षा में किसी न किसी रूप में पूछा जाता है।

खंड 02 · भक्ति धारा

भक्ति का उद्भव: आलवार एवं नयनार संत

भक्ति की प्रथम संगठित लहर 6वीं से 9वीं शताब्दी के बीच तमिल प्रदेश में उठी। यहाँ दो संत-परंपराएँ समान्तर विकसित हुईं — विष्णु के उपासक आलवार एवं शिव के उपासक नयनार। इन्होंने संस्कृत छोड़कर तमिल में गाया, और मंदिर-मंदिर घूमकर भक्ति का प्रसार किया।

आधारआलवार संतनयनार संत
उपास्य देवविष्णु (वैष्णव)शिव (शैव)
संख्या1263
अर्थ'आलवार' = ईश्वर-भक्ति में डूबा हुआ'नयनार' = नायक / मार्गदर्शक
प्रमुख संतनम्मालवार (सर्वाधिक प्रसिद्ध), पेरियालवार, तिरुमंगई आलवार, आण्डाल (एकमात्र महिला संत)अप्पार (तिरुनावुक्कारसर), संबंदर, सुंदरार, माणिक्कवाचकर, कराइक्काल अम्मैयार (महिला)
पद-संग्रहनालायिर दिव्य प्रबंधम् (4000 पद) — इसे 'तमिल वेद' कहा जाता है; संकलन नाथमुनि द्वारातेवारम् (तिरुमुरै) — संकलन नंबी आण्डार नंबी द्वारा; माणिक्कवाचकर की रचना तिरुवाचकम्
संरक्षक राजवंशपल्लव, चोल (आरंभ में विरोध भी)पल्लव, पाण्ड्य, चोल

↔ तालिका को क्षैतिज रूप से स्क्रॉल किया जा सकता है

आलवार = 12, नयनार = 63 — याद रखने का सूत्र: "आ" से आगे कम, "न" से आगे ज़्यादा। अथवा — बारह बजे विष्णु, त्रेसठ पर शिव।

  • इन संतों ने जाति-भेद को अस्वीकार किया — नयनारों में धोबी, कुम्हार, मछुआरा एवं अछूत जातियों के संत सम्मिलित थे।
  • इनकी भक्ति का स्वरूप भावनात्मक एवं व्यक्तिगत था — नृत्य, गान एवं अश्रु इसके अंग थे।
  • चोल शासकों ने इनके गीतों को मंदिर-अनुष्ठान का भाग बनाया; राजराज प्रथम ने नंबी आण्डार नंबी को तेवारम् संकलित करने को कहा।
  • आलवार-नयनार परंपरा ने आगे श्रीवैष्णव एवं शैव सिद्धांत संप्रदायों की नींव रखी।
"जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।"
भक्ति परंपरा का मूल स्वर — आलवार-नयनार से कबीर तक
खंड 03 · भक्ति धारा

भक्ति के आचार्य एवं उनके दर्शन

भावनात्मक भक्ति को दार्शनिक आधार देने का कार्य वैष्णव आचार्यों ने किया। यह तालिका परीक्षा में सर्वाधिक बार पूछे जाने वाले मैचिंग प्रश्नों का केंद्र है।

आचार्यकालदर्शनसंप्रदाय / प्रमुख तथ्य
शंकराचार्य788–820 ई.अद्वैतवादजन्म कालडी (केरल); गुरु गोविंदपाद; 'ब्रह्म सत्यं जगत् मिथ्या'; माया सिद्धांत; चार मठ — शृंगेरी, द्वारका, पुरी, बद्रीनाथ; ब्रह्मसूत्र भाष्य
रामानुजाचार्य1017–1137 ई.विशिष्टाद्वैतजन्म श्रीपेरंबदूर (तमिलनाडु); श्रीवैष्णव संप्रदाय; ग्रंथ श्रीभाष्य एवं वेदार्थसंग्रह; भक्ति एवं प्रपत्ति (आत्मसमर्पण)
निम्बार्काचार्य12वीं–13वीं शतीद्वैताद्वैतसनक संप्रदाय; राधा-कृष्ण की युगल उपासना के प्रवर्तक; ग्रंथ वेदांत पारिजात सौरभ
मध्वाचार्य1238–1317 ई.द्वैतवादजन्म उडुपी (कर्नाटक); ब्रह्म संप्रदाय; जीव एवं ब्रह्म पूर्णतः भिन्न; ग्रंथ अनुव्याख्यान
वल्लभाचार्य1479–1531 ई.शुद्धाद्वैतपुष्टिमार्ग / रुद्र संप्रदाय; केंद्र नाथद्वारा (श्रीनाथजी); अष्टछाप की स्थापना; ग्रंथ सुबोधिनी, अणुभाष्य
चैतन्य महाप्रभु1486–1533 ई.अचिंत्य भेदाभेदजन्म नवद्वीप (बंगाल); गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय; कीर्तन एवं नामसंकीर्तन के प्रवर्तक; रचना शिक्षाष्टक; जीवनी चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज)
रामानंद14वीं–15वीं शतीराम-भक्ति (सगुण)उत्तर भारत में भक्ति के प्रवर्तक; काशी; शिष्य — कबीर, रैदास, धन्ना, पीपा, सेन, अनंतानंद; जाति-भेद के बिना दीक्षा
बसवेश्वर (बसवन्ना)12वीं शतीवीरशैव / लिंगायतकल्याणी के चालुक्य नरेश बिज्जल के दरबारी; अनुभव मंटप (धार्मिक संसद); कन्नड़ 'वचन' साहित्य; जाति एवं कर्मकांड का तीव्र विरोध

दर्शन-क्रम याद रखने का सूत्र — "शं-रा-नि-म-व-चै":
शंकर → अद्वैत  ·  रामानुज → विशिष्टाद्वैत  ·  निम्बार्क → द्वैताद्वैत  ·  ध्व → द्वैत  ·  ल्लभ → शुद्धाद्वैत  ·  चैतन्य → अचिंत्य भेदाभेद

अष्टछाप (वल्लभाचार्य एवं उनके पुत्र विट्ठलनाथ द्वारा स्थापित आठ कृष्ण-भक्त कवि): सूरदास, कुंभनदास, परमानंददास, कृष्णदास (वल्लभाचार्य के शिष्य) तथा नंददास, गोविंदस्वामी, छीतस्वामी, चतुर्भुजदास (विट्ठलनाथ के शिष्य)।

खंड 04 · भक्ति धारा

भक्ति की दो धाराएँ: निर्गुण एवं सगुण

आधारनिर्गुण भक्तिसगुण भक्ति
ईश्वर की धारणानिराकार, निर्विशेष, अरूपसाकार, अवतारी, गुण-सहित
उपासनानाम-स्मरण, अंतर्मुखी साधनामूर्ति-पूजा, लीला-गान, कीर्तन
मूर्तिपूजाअस्वीकारस्वीकार एवं केंद्रीय
अवतारवादअस्वीकारस्वीकार (राम एवं कृष्ण)
काव्य-वर्गज्ञानाश्रयी (संत काव्य) एवं प्रेमाश्रयी (सूफी काव्य)रामाश्रयी एवं कृष्णाश्रयी
प्रमुख संतकबीर, गुरु नानक, रैदास, दादू दयाल, नामदेव, मलूकदास, सुंदरदासराम — रामानंद, तुलसीदास, नाभादास · कृष्ण — सूरदास, मीराबाई, चैतन्य, विद्यापति, चंडीदास
सामाजिक तेवरअधिक क्रांतिकारी — जाति, कर्मकांड एवं धर्मग्रंथों पर सीधा प्रहारअधिक समावेशी-सुधारवादी — परंपरा के भीतर रहकर उदारीकरण

प्रेमाश्रयी (सूफी) काव्य धारा हिंदी साहित्य में निर्गुण भक्ति के अंतर्गत आती है। प्रमुख कवि एवं कृतियाँ — मलिक मुहम्मद जायसी (पद्मावत), कुतुबन (मृगावती), मंझन (मधुमालती), उसमान (चित्रावली)। यह भक्ति एवं सूफी धाराओं के संगम का सर्वोत्तम साहित्यिक उदाहरण है।

खंड 05 · भक्ति धारा

प्रमुख भक्ति संत — विस्तृत विवरण

निर्गुण संत परंपरा

संतकाल एवं क्षेत्ररचनाएँ / पंथविशेष तथ्य
कबीरदास1440–1518 ई. (लगभग) · काशीबीजक — तीन भाग: साखी, सबद, रमैनी; 'कबीर ग्रंथावली'पालक माता-पिता नीरू-नीमा (जुलाहा); गुरु रामानंद; मृत्यु मगहर में; भाषा सधुक्कड़ी (पंचमेल खिचड़ी); वाणी गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित; पंथ — कबीरपंथ
गुरु नानक देव1469–1539 ई. · तलवंडी (ननकाना साहिब)जपजी, आसा दी वार, बारहमाहासिख धर्म के संस्थापक; 'एक ओंकार'; लंगर, संगत एवं पंगत की परंपरा; करतारपुर में निधन; मूल मंत्र गुरु ग्रंथ साहिब का आरंभ
संत रैदास (रविदास)15वीं–16वीं शती · काशीपद एवं दोहे; 40 पद गुरु ग्रंथ साहिब मेंजाति से चर्मकार; कबीर के समकालीन एवं रामानंद के शिष्य माने जाते हैं; मीराबाई ने इन्हें गुरु रूप में स्मरण किया; 'बेगमपुरा' की कल्पना — जाति-कर-रहित आदर्श नगर
संत नामदेव1270–1350 ई. · महाराष्ट्र (पंढरपुर)अभंग; 61 पद गुरु ग्रंथ साहिब मेंजाति से दर्जी (छीपी); निर्गुण एवं सगुण दोनों धाराओं में स्थान; वारकरी संप्रदाय के प्रमुख संत
दादू दयाल1544–1603 ई. · राजस्थान (नराणा)दादू की वाणी; दादूपंथ (ब्रह्म संप्रदाय)अकबर से भेंट; 52 प्रमुख शिष्य ('बावन शिष्य'); शिष्य — रज्जब, सुंदरदास, गरीबदास
मलूकदास17वीं शती · कड़ा (इलाहाबाद)रत्नखान, ज्ञानबोधप्रसिद्ध पंक्ति — "अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम"
सुंदरदास1596–1689 ई. · राजस्थानज्ञानसमुद्र, सुंदरविलासदादू दयाल के शिष्य; निर्गुण संतों में सर्वाधिक शास्त्र-सम्मत एवं सुशिक्षित
"पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोइ।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़ै सु पंडित होइ॥"
संत कबीर — शास्त्रीय ज्ञान पर प्रेम की श्रेष्ठता

सगुण भक्ति — राम काव्य धारा

संतकाल एवं क्षेत्ररचनाएँविशेष तथ्य
तुलसीदास1532–1623 ई. · राजापुर/काशीरामचरितमानस (अवधी), विनयपत्रिका, कवितावली, गीतावली, दोहावली, हनुमान चालीसा, बरवै रामायणरामचरितमानस का आरंभ 1574 ई. में अयोध्या में; कुल 12 प्रमुख रचनाएँ; अकबर एवं जहाँगीर के समकालीन; गुरु नरहरिदास; 'लोकनायक' कहे जाते हैं
नाभादास16वीं–17वीं शतीभक्तमाल200 से अधिक भक्तों के जीवन-वृत्त — भक्ति आंदोलन का प्रमुख स्रोत ग्रंथ
अग्रदास16वीं शतीअष्टयाम, ध्यानमंजरीनाभादास के गुरु; रामानंदी संप्रदाय की रसिक शाखा

सगुण भक्ति — कृष्ण काव्य धारा

संतकाल एवं क्षेत्ररचनाएँविशेष तथ्य
सूरदास1478–1583 ई. · ब्रज (सीही/रुनकता)सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य लहरीगुरु वल्लभाचार्य; अष्टछाप के सर्वप्रमुख कवि; ब्रजभाषा; वात्सल्य एवं शृंगार वर्णन के शिखर; 'वात्सल्य रस का सम्राट'
मीराबाई1498–1546 ई. · मेड़ता (राजस्थान)पदावली, नरसीजी का माहेरा, गीत गोविंद टीकापिता रतनसिंह; विवाह मेवाड़ के राणा सांगा के पुत्र भोजराज से; गुरु संत रैदास; कृष्ण को 'गिरधर गोपाल' के रूप में पति मानकर उपासना; भाषा — राजस्थानी एवं ब्रज; अंतिम काल द्वारका में
चैतन्य महाप्रभु1486–1533 ई. · नवद्वीप (बंगाल)शिक्षाष्टकगौड़ीय वैष्णव संप्रदाय; नामसंकीर्तन का प्रचार; बंगाल एवं ओडिशा में जन-आंदोलन; जीवनी — चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज) एवं चैतन्य भागवत (वृंदावन दास)
विद्यापति14वीं–15वीं शती · मिथिलापदावली, कीर्तिलता, पुरुष परीक्षामैथिली के महाकवि; 'अभिनव जयदेव' एवं 'मैथिल कोकिल'; राधा-कृष्ण के शृंगार वर्णन
चंडीदास14वीं–15वीं शती · बंगालपद (बांग्ला)राधा-कृष्ण प्रेम के गायक; प्रसिद्ध पंक्ति — "सबार ऊपरे मानुष सत्य" (मनुष्य सबसे बड़ा सत्य है)
जयदेव12वीं शती · बंगालगीत गोविंद (संस्कृत)सेन नरेश लक्ष्मणसेन के दरबारी कवि; कृष्ण-भक्ति काव्य की आधारशिला
नरसी मेहता15वीं शती · गुजरातप्रभातिया एवं पदगुजराती भक्ति काव्य के जनक; प्रसिद्ध पद "वैष्णव जन तो तेने कहिए" — गांधीजी का प्रिय भजन

महिला भक्ति संत — आण्डाल (तमिल, आलवार), कराइक्काल अम्मैयार (तमिल, नयनार), अक्का महादेवी (कन्नड़, वीरशैव), लल्लेश्वरी / लाल देद (कश्मीरी, 'वाख'), मीराबाई (राजस्थानी), जनाबाई एवं बहिणाबाई (मराठी, वारकरी), मुक्ताबाई (ज्ञानेश्वर की बहन)। सूफी परंपरा में राबिया बसरी (इराक) प्रथम प्रमुख महिला सूफी संत थीं।

खंड 06 · भक्ति धारा

क्षेत्रीय भक्ति आंदोलन

क्षेत्रसंप्रदाय / आंदोलनप्रमुख संत एवं विशेषताएँ
महाराष्ट्रवारकरी संप्रदाय (विठोबा/पंढरपुर)ज्ञानेश्वर (1275–1296; ज्ञानेश्वरी = गीता की मराठी टीका, अमृतानुभव) — मराठी भक्ति के जनक; नामदेव; एकनाथ (एकनाथी भागवत); तुकाराम (1608–1650, अभंग गाथा, शिवाजी के समकालीन); चोखामेला (महार जाति) एवं जनाबाई — निम्न वर्ग की भागीदारी के प्रतीक
महाराष्ट्रधारकरी संप्रदायसमर्थ रामदास (दासबोध) — शिवाजी के आध्यात्मिक गुरु; राम-भक्ति एवं राष्ट्र-चेतना का समन्वय
बंगालगौड़ीय वैष्णवचैतन्य महाप्रभु, चंडीदास, विद्यापति; कीर्तन परंपरा; षड्गोस्वामी (वृंदावन)
असमएकशरण नाम धर्मशंकरदेव (1449–1568) — कीर्तन घोषा; नामघर (प्रार्थना गृह) एवं सत्र (मठ) की स्थापना; बरगीत (भक्ति गीत) एवं अंकिया नाट (एकांकी नाटक); शिष्य माधवदेव
कर्नाटकवीरशैव / लिंगायतबसवन्ना एवं अल्लम प्रभु; अक्का महादेवी; अनुभव मंटप; कन्नड़ 'वचन' गद्य-काव्य; जाति, मंदिर-वर्चस्व एवं बाल-विवाह का विरोध; विधवा पुनर्विवाह का समर्थन
कर्नाटकहरिदास आंदोलनपुरंदरदास (कर्नाटक संगीत के जनक) एवं कनकदास (कुरुबा जाति); विजयनगर काल; कन्नड़ 'कीर्तने'
कश्मीरऋषि परंपरालल्लेश्वरी (लाल देद) — 'वाख' छंद; शेख नूरुद्दीन वली (नुंद ऋषि) — हिंदू-मुस्लिम समन्वय के प्रतीक
ओडिशापंचसखाबलराम दास, जगन्नाथ दास, अच्युतानंद, यशोवंत, अनंत दास; जगन्नाथ भक्ति; ओड़िया भाषा का विकास
आंध्र-तेलंगानातेलुगु भक्तिवेमना (जाति-विरोधी पद्य), तल्लपाका अन्नमय्या (तिरुपति के प्रथम प्रमुख कीर्तनकार)
गुजरातवैष्णव भक्तिनरसी मेहता, मीराँ के पद, अखा भगत (कर्मकांड-विरोधी)
पंजाबसिख परंपरागुरु नानक से गुरु गोबिंद सिंह तक दस गुरु; गुरु ग्रंथ साहिब का संकलन गुरु अर्जुन देव द्वारा (1604 ई.), स्थान अमृतसर

गुरु ग्रंथ साहिब की विशेषता यह है कि इसमें सिख गुरुओं के साथ-साथ कबीर, रैदास, नामदेव, शेख फ़रीद जैसे हिंदू एवं मुस्लिम संतों की वाणी भी संकलित है — यह भक्ति एवं सूफी धाराओं के संगम का सर्वाधिक ठोस प्रमाण है।

खंड 07 · सूफी धारा

सूफीवाद: उद्भव, सिद्धांत एवं शब्दावली

'सूफी' शब्द की व्युत्पत्ति

  • 'सूफ़' — ऊन; सूफी संत मोटे ऊनी वस्त्र पहनते थे (सर्वाधिक स्वीकृत मत)।
  • 'सफ़ा' — पवित्रता; हृदय की शुद्धता।
  • 'अहल-ए-सुफ़्फ़ा' — पैगंबर मुहम्मद की मस्जिद के बरामदे में रहने वाले निर्धन साथी।
  • सूफी रहस्यवाद को अरबी में 'तसव्वुफ़' कहा जाता है।

आध्यात्मिक यात्रा के चार चरण

चरणअर्थ
शरीअतइस्लामी विधि-विधान का पालन — यात्रा का प्रारंभिक बिंदु
तरीक़तपीर के मार्गदर्शन में रहस्यवादी साधना का मार्ग
हक़ीक़तपरम सत्य की अनुभूति
मारिफ़तईश्वर का प्रत्यक्ष ज्ञान — अंतिम अवस्था

प्रमुख सिद्धांत

  • वहदत-उल-वुजूद (एकात्मवाद) — 'अस्तित्व एक है'; प्रवर्तक इब्न-उल-अरबी (स्पेन)। यह सिद्धांत भारतीय अद्वैत वेदांत के अत्यंत निकट है और इसी ने भक्ति-सूफी संवाद को संभव बनाया।
  • वहदत-उल-शुहूद (प्रत्यक्षवाद) — इसके विरुद्ध रूढ़िवादी प्रतिक्रिया; प्रवर्तक शेख अहमद सरहिंदी
  • इश्क़-ए-हक़ीक़ी — ईश्वर के प्रति सच्चा प्रेम, जो मुक्ति का मार्ग है (भक्ति के 'प्रेम' के समानांतर)।
  • फ़ना — आत्म का ईश्वर में विलय।
  • समा — संगीत एवं नृत्य द्वारा ईश्वर-स्मरण; चिश्तियों ने इसे अपनाया, नक्शबंदियों ने अस्वीकार किया।

सूफी शब्दावली (Glossary)

शब्दअर्थ
सिलसिलासूफी संप्रदाय / गुरु-शिष्य की श्रृंखला
ख़ानक़ाहसूफी मठ / निवास एवं शिक्षा केंद्र
जमातखानासामूहिक निवास वाला बड़ा ख़ानक़ाह
पीर / मुर्शिदआध्यात्मिक गुरु
मुरीदशिष्य
ख़लीफ़ापीर द्वारा नियुक्त उत्तराधिकारी
वलीईश्वर का मित्र / सिद्ध संत
दरगाहसूफी संत की समाधि
सज्जादानशीनदरगाह का प्रमुख / उत्तराधिकारी
ज़िक्रईश्वर के नाम का स्मरण (जपा के समान)
चिल्लाचालीस दिन का एकांत साधना-काल
उर्ससंत की पुण्यतिथि पर वार्षिक उत्सव — 'ईश्वर से मिलन' का प्रतीक
फ़ुतूहअयाचित दान — चिश्तियों की एकमात्र स्वीकार्य आय
तौबापश्चाताप
क़व्वालीभक्ति-संगीत की शैली; भारत में विकास का श्रेय अमीर ख़ुसरो को

बा-शरा सिलसिले — इस्लामी विधि (शरीअत) का पालन करने वाले: चिश्ती, सुहरावर्दी, कादिरी, नक्शबंदी, फ़िरदौसी, शत्तारी
बे-शरा सिलसिले — शरीअत से मुक्त, अपरंपरागत: कलंदरी, मदारी, हैदरी, मलंग

खंड 08 · सूफी धारा

प्रमुख सूफी सिलसिले

अबुल फ़ज़ल की आइन-ए-अकबरी में भारत के 14 सूफी सिलसिलों का उल्लेख है। परीक्षा दृष्टि से निम्नलिखित छह सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं।

सिलसिलाभारत में संस्थापककेंद्रप्रमुख विशेषताएँ
चिश्तीख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती (1192 ई.)अजमेर, दिल्ली, अजोधनभारत का सर्वाधिक लोकप्रिय सिलसिला; समा (संगीत) स्वीकार; राज्य-सेवा एवं जागीर का त्याग; लोकभाषा का प्रयोग; निर्धनता का व्रत
सुहरावर्दीशेख बहाउद्दीन ज़कारियामुल्तान, सिंध, बंगालचिश्तियों के विपरीत — राज्य से निकटता, धन-संपत्ति एवं पद स्वीकार; जलालुद्दीन तबरेज़ी ने बंगाल में प्रसार किया
कादिरीशाह नियामतुल्लाह एवं मख़दूम मुहम्मद जीलानी (15वीं शती)पंजाब, सिंध, दक्कनमूल संस्थापक शेख अब्दुल क़ादिर जीलानी (बग़दाद); दारा शिकोह इसी सिलसिले के मुल्ला शाह बदख़्शी का शिष्य था; मियाँ मीर प्रमुख संत
नक्शबंदीख़्वाजा बाक़ी बिल्लाह (अकबर काल)दिल्ली, सरहिंदमूल संस्थापक ख़्वाजा बहाउद्दीन नक्शबंद; रूढ़िवादी — समा एवं दरगाह-पूजा का विरोध; शेख अहमद सरहिंदी ('मुजद्दिद अलिफ़-सानी') — जहाँगीर द्वारा ग्वालियर में कैद; औरंगज़ेब का झुकाव
शत्तारीशाह अब्दुल्ला शत्तारीग्वालियर, माँडूप्रमुख संत मुहम्मद ग़ौस ग्वालियरी; तानसेन का संबंध इसी सिलसिले से; योग-साधना का समावेश
फ़िरदौसीशेख बदरुद्दीन समरकंदीबिहारप्रमुख संत शरफ़ुद्दीन याह्या मनेरी; रचना मक़तूबात-ए-सदी
कलंदरी (बे-शरा)अबू अली कलंदरपानीपतशरीअत से मुक्त, घुमक्कड़, अपरंपरागत जीवन
मदारी (बे-शरा)शाह मदारमकनपुर (कानपुर)बदायूँ से संबद्ध; लोक-परंपराओं का समावेश

चिश्ती बनाम सुहरावर्दी — एक पंक्ति में अंतर: चिश्ती = राज्य से दूरी + संगीत स्वीकार + निर्धनता; सुहरावर्दी = राज्य से निकटता + संपत्ति स्वीकार + पद-ग्रहण

खंड 09 · सूफी धारा

चिश्ती संत परंपरा

संतकाल / समकालीन शासककेंद्रविशेष तथ्य
ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती1141–1236 ई. · पृथ्वीराज चौहान एवं इल्तुतमिशअजमेरभारत में चिश्ती सिलसिले के संस्थापक; 'ग़रीब नवाज़'; सिजिस्तान (सीस्तान) से आए; 1192 ई. में भारत आगमन; अकबर ने इनकी दरगाह की कई बार पैदल यात्रा की
ख़्वाजा क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकीमृत्यु 1235 ई. · इल्तुतमिशदिल्ली (महरौली)मुईनुद्दीन के प्रमुख शिष्य; क़ुतुब मीनार का नामकरण इन्हीं के नाम पर माना जाता है; इल्तुतमिश ने इनका सम्मान किया
बाबा फ़रीदुद्दीन गंजशकर1175–1265 ई. · बलबनअजोधन / पाकपट्टन (पंजाब)'शेख फ़रीद'; पंजाबी में रचना करने वाले प्रथम सूफी; इनके 112 पद गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित हैं — भक्ति-सूफी संगम का प्रत्यक्ष प्रमाण; बलबन के दामाद
शेख निज़ामुद्दीन औलिया1238–1325 ई. · सात सुल्तानों के समकालीनदिल्ली (गयासपुर)'महबूब-ए-इलाही'; चिश्ती परंपरा के सर्वाधिक प्रभावशाली संत; सुल्तानों के दरबार जाने से इनकार; अमीर ख़ुसरो इनके प्रिय शिष्य; ग़यासुद्दीन तुग़लक़ से विवाद के संदर्भ में प्रसिद्ध उक्ति — "हुनूज़ दिल्ली दूर अस्त"
शेख नसीरुद्दीन महमूदमृत्यु 1356 ई. · मुहम्मद बिन तुग़लक़ एवं फ़िरोज़ शाहदिल्ली'चिराग़-ए-देहली'; निज़ामुद्दीन के उत्तराधिकारी; इनके बाद दिल्ली में चिश्ती केंद्रीयता क्षीण हुई और सिलसिला प्रांतों में फैला
सैयद मुहम्मद गेसूदराज़1321–1422 ई. · बहमनी शासक फ़िरोज़ शाहगुलबर्गा (दक्कन)'बंदा नवाज़'; दक्कन में चिश्ती सिलसिले के प्रवर्तक; दक्खिनी (उर्दू की पूर्वज) में लिखने वाले प्रथम सूफी; रचना मिराज-उल-आशिक़ीन
शेख सलीम चिश्ती16वीं शती · अकबरफ़तेहपुर सीकरीइनके आशीर्वाद से जहाँगीर का जन्म माना जाता है — इसीलिए जहाँगीर का बाल्यकाल का नाम 'सलीम' रखा गया; इनका मक़बरा फ़तेहपुर सीकरी में संगमरमर की जालीदार वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना

अमीर ख़ुसरो (1253–1325 ई.) — निज़ामुद्दीन औलिया के शिष्य; 'तूती-ए-हिंद' (भारत का तोता) कहे जाते हैं। क़व्वाली के विकास तथा सितार एवं तबला के आविष्कार का श्रेय इन्हें दिया जाता है। रचनाएँ — क़िरान-उस-सादैन, तुग़लकनामा, ख़ज़ाइन-उल-फ़ुतूह, नुह सिपिहर, ख़ालिक़बारी (हिंदवी-फ़ारसी शब्दकोश)। इन्होंने अपनी भाषा को 'हिंदवी' कहा।

सुहरावर्दी संत

  • शेख बहाउद्दीन ज़कारिया (मुल्तान) — इल्तुतमिश से 'शेख-उल-इस्लाम' की उपाधि; विपुल संपत्ति के स्वामी।
  • शेख जलालुद्दीन तबरेज़ी — बंगाल में सिलसिले का प्रसार।
  • सैयद जलालुद्दीन बुख़ारी ('मख़दूम-ए-जहानियाँ') — उच्च (सिंध); फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ के समकालीन।
खंड 10 · सूफी धारा

सूफी साहित्य

साहित्य के तीन वर्ग

  • मलफ़ूज़ात — सूफी संतों के वार्तालाप एवं कथनों का संकलन (शिष्यों द्वारा लिखित)।
  • मक़तूबात — संतों द्वारा लिखे गए पत्र।
  • तज़्किरा — संतों की जीवनियाँ।
ग्रंथलेखकविषय / महत्व
कश्फ़-उल-महजूबशेख अली हुजविरी ('दाता गंज बख़्श')भारतीय उपमहाद्वीप में रचित प्रथम प्रमुख सूफी ग्रंथ; लाहौर; फ़ारसी में तसव्वुफ़ का व्यवस्थित विवेचन
फ़वाइद-उल-फ़ुआदअमीर हसन सिज्जी देहलवीनिज़ामुद्दीन औलिया के कथनों का संकलन — मलफ़ूज़ात साहित्य का श्रेष्ठतम उदाहरण एवं तत्कालीन सामाजिक इतिहास का प्रमुख स्रोत
ख़ैर-उल-मजालिसहमीद क़लंदरनसीरुद्दीन चिराग़-ए-देहली के कथन
सियर-उल-औलियाअमीर ख़ुर्दचिश्ती संतों की विस्तृत जीवनियाँ
सियर-उल-आरिफ़ीनहामिद बिन फ़ज़लुल्लाह (जमाली)चिश्ती एवं सुहरावर्दी संतों का वृत्तांत
अख़बार-उल-अख़यारशेख अब्दुल हक़ मुहद्दिस देहलवीअकबर-जहाँगीर काल; भारतीय सूफी संतों का विश्वकोशीय संग्रह
मक़तूबात-ए-सदीशरफ़ुद्दीन याह्या मनेरीफ़िरदौसी सिलसिला; सौ पत्रों का संग्रह
मसनवीमौलाना जलालुद्दीन रूमीफ़ारसी सूफी काव्य का शिखर; भारतीय सूफियों पर गहरा प्रभाव

सूफी प्रेमाख्यान काव्य (हिंदी) — सूफी कवियों ने अवधी में लोक-प्रेमकथाओं के माध्यम से रहस्यवाद व्यक्त किया: मलिक मुहम्मद जायसी — पद्मावत (सर्वश्रेष्ठ), कुतुबन — मृगावती (प्रथम), मंझन — मधुमालती, उसमान — चित्रावली, शेख नबी — ज्ञानदीप

खंड 11 · संगम

धर्म एवं समाज में सुधार का कार्य

यह खंड मुख्य परीक्षा के दीर्घ उत्तरीय प्रश्नों का केंद्र है। दोनों आंदोलनों का योगदान धार्मिक एवं सामाजिक-सांस्कृतिक दो शीर्षकों के अंतर्गत व्यवस्थित करना चाहिए।

क. धार्मिक क्षेत्र में सुधार

सुधारविवरण
कर्मकांड का विरोधयज्ञ, बलि, तीर्थ, व्रत एवं महँगे अनुष्ठानों के स्थान पर सरल नाम-स्मरण को पर्याप्त बताया। कबीर एवं नानक ने बाह्य आडंबर पर तीव्र प्रहार किया।
पुरोहित-वर्ग की मध्यस्थता समाप्तईश्वर तक पहुँचने के लिए ब्राह्मण या मुल्ला की आवश्यकता नहीं — केवल गुरु/पीर का मार्गदर्शन एवं व्यक्तिगत भक्ति।
एकेश्वरवाद का प्रसार'राम-रहीम एक हैं' का उद्घोष; निर्गुण संतों ने बहुदेववाद को अस्वीकार किया।
धार्मिक कट्टरता का शमनसूफियों की उदारता एवं संतों के समन्वयवाद ने धर्मांतरण के दबाव को कम किया और सहअस्तित्व का वातावरण बनाया।
नए पंथ एवं संप्रदायसिख धर्म, कबीरपंथ, दादूपंथ, वारकरी, लिंगायत, गौड़ीय वैष्णव, एकशरण नाम धर्म — सभी इसी आंदोलन की उपज।

ख. सामाजिक क्षेत्र में सुधार

सुधारविवरण एवं उदाहरण
जाति-व्यवस्था पर प्रहारसंत स्वयं निम्न कहे जाने वाले वर्गों से आए — कबीर (जुलाहा), रैदास (चर्मकार), नामदेव (दर्जी), सेना (नाई), सधना (कसाई), चोखामेला (महार), कनकदास (कुरुबा), तिरुप्पन आलवार (अछूत)। सूफी ख़ानक़ाहों में जाति एवं वर्ग के भेद बिना सब भोजन करते थे।
स्त्रियों की भागीदारीआण्डाल, अक्का महादेवी, लल्लेश्वरी, मीराबाई, जनाबाई, बहिणाबाई — स्त्रियों को प्रथम बार स्वतंत्र आध्यात्मिक स्वर मिला। लिंगायतों ने विधवा पुनर्विवाह का समर्थन एवं बाल-विवाह का विरोध किया।
लोकभाषाओं का विकासतमिल, कन्नड़, मराठी, बांग्ना, मैथिली, अवधी, ब्रज, पंजाबी, गुजराती, ओड़िया, असमिया एवं दक्खिनी उर्दू — सभी को समृद्ध साहित्य मिला। यह आंदोलन का सर्वाधिक स्थायी योगदान माना जाता है।
हिंदू-मुस्लिम सामंजस्यगुरु ग्रंथ साहिब में शेख फ़रीद की वाणी; कबीर को दोनों समुदाय अपना मानते हैं; दरगाहों पर हिंदुओं की उपस्थिति; 'गंगा-जमुनी तहज़ीब' का जन्म।
संगीत एवं कलाकीर्तन, अभंग, पद, वचन, बरगीत, क़व्वाली, समा; अमीर ख़ुसरो का संगीत में योगदान; भक्ति चित्रकला एवं मंदिर-दरगाह स्थापत्य।
नैतिक-आचरणमूलक शिक्षासत्य, अहिंसा, सेवा, ईमानदार श्रम एवं संतोष पर बल; कबीर का 'कर्म के साथ भक्ति' तथा नानक का 'किरत करो, नाम जपो, वंड छको' (श्रम करो, नाम जपो, बाँटकर खाओ)।
"किरत करो, नाम जपो, वंड छको।"
गुरु नानक देव — ईमानदार श्रम, नाम-स्मरण एवं बाँटकर खाना

ग. सीमाएँ एवं आलोचना

  • जाति-व्यवस्था समाप्त नहीं हुई — संतों ने उसकी वैचारिक आलोचना की, परंतु सामाजिक संरचना यथावत बनी रही; कई संत-परंपराएँ स्वयं जातिगत पंथों में बदल गईं।
  • संस्थागत रूढ़िवादिता — कबीरपंथ एवं दरगाह-व्यवस्था कालांतर में उसी कर्मकांड की शिकार हुईं जिसका उन्होंने विरोध किया था।
  • राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था अछूती रही — आंदोलन ने भू-स्वामित्व, सामंती शोषण अथवा राज्य-सत्ता को चुनौती नहीं दी।
  • पलायनवादी झुकाव — कुछ इतिहासकारों के अनुसार अत्यधिक भावुक भक्ति ने कर्म-चेतना एवं सामूहिक संगठन को कमज़ोर किया।
  • सुहरावर्दी एवं नक्शबंदी सिलसिले राज्य-सत्ता के निकट रहे, अतः उनका सुधारवादी योगदान सीमित रहा।

निष्कर्ष-वाक्य (उत्तर लेखन हेतु): भक्ति एवं सूफी आंदोलन ने भारतीय समाज की संरचना नहीं बदली, परंतु उसकी चेतना बदल दी — उन्होंने यह स्थापित किया कि आध्यात्मिक गरिमा जन्म से नहीं, आचरण एवं प्रेम से निर्धारित होती है। यही चेतना 19वीं सदी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों की पृष्ठभूमि बनी।

खंड 12 · संगम

भक्ति एवं सूफी: तुलनात्मक अध्ययन

  • ईश्वर की एकता — दोनों एकेश्वरवादी; 'ईश्वर एक है, मार्ग अनेक'।
  • प्रेम को साधन माना — भक्ति का 'प्रेम' एवं सूफी का 'इश्क़-ए-हक़ीक़ी' समान अवधारणाएँ हैं।
  • गुरु की अनिवार्यता — भक्ति में गुरु, सूफीवाद में पीर/मुर्शिद
  • कर्मकांड एवं पुरोहितवाद का विरोध — पंडित एवं मुल्ला दोनों की मध्यस्थता अस्वीकार।
  • लोकभाषा का प्रयोग — संस्कृत एवं अरबी-फ़ारसी के स्थान पर जनभाषा।
  • संगीत का उपयोग — कीर्तन एवं समा/क़व्वाली।
  • समानता एवं मानवतावाद — जाति, वर्ग एवं संप्रदाय से ऊपर मनुष्य की गरिमा।
  • आत्म-विलय का लक्ष्य — भक्ति का 'सायुज्य' एवं सूफी का 'फ़ना'।
आधारभक्ति आंदोलनसूफी आंदोलन
धार्मिक आधारहिंदू धर्म (वैष्णव, शैव)इस्लाम
उद्भवदक्षिण भारत, 6वीं–9वीं शतीपश्चिम एशिया; भारत में 11वीं–12वीं शती
संगठनअपेक्षाकृत शिथिल; मठ एवं संप्रदायसुसंगठित सिलसिला एवं ख़ानक़ाह व्यवस्था
गुरु-परंपरागुरु–शिष्यपीर–मुरीद, ख़लीफ़ा द्वारा उत्तराधिकार
ग्रंथ-प्रमाणवेद-उपनिषद को अनेक संतों ने अस्वीकार कियाक़ुरान एवं हदीस की मूलभूत स्वीकृति (बा-शरा)
अवतारवादसगुण धारा में केंद्रीयपूर्णतः अस्वीकृत
मृत्यु के बादसमाधि/मंदिरदरगाह एवं उर्स की संस्था
राज्य से संबंधप्रायः तटस्थचिश्ती तटस्थ; सुहरावर्दी एवं नक्शबंदी राज्य के निकट
  • कबीर पर सूफी रहस्यवाद एवं नाथपंथ दोनों का स्पष्ट प्रभाव; इनकी 'ढाई आखर प्रेम' की अवधारणा सूफी इश्क़ के समानांतर है।
  • शेख फ़रीद के 112 पद गुरु ग्रंथ साहिब में — दोनों धाराओं के औपचारिक संगम का प्रमाण।
  • वहदत-उल-वुजूद एवं अद्वैत वेदांत की वैचारिक निकटता; दारा शिकोह ने सिर्र-ए-अकबर में उपनिषदों का फ़ारसी अनुवाद कराया एवं मजमा-उल-बहरीन ('दो सागरों का संगम') लिखा।
  • सूफी प्रेमाख्यान काव्य — जायसी का पद्मावत हिंदू लोककथा को सूफी रहस्यवाद में ढालता है।
  • अमीर ख़ुसरो की हिंदवी रचनाएँ, पहेलियाँ एवं मुकरियाँ — भाषाई संगम।
  • कश्मीर की ऋषि परंपरा (लल्लेश्वरी एवं नुंद ऋषि) — दोनों धाराओं का पूर्ण एकीकरण।
  • शत्तारी सिलसिले में योग-प्राणायाम का समावेश; मुहम्मद ग़ौस ने योग-ग्रंथ अमृतकुंड से सामग्री ली।
खंड 13 · संगम

त्वरित पुनरावृत्ति

'प्रथम' एवं 'सर्वाधिक'

प्रश्नउत्तर
भक्ति आंदोलन का प्रारंभदक्षिण भारत (तमिल क्षेत्र), 6वीं–9वीं शती
उत्तर भारत में भक्ति के प्रवर्तकस्वामी रामानंद
आलवारों की एकमात्र महिला संतआण्डाल
मराठी भक्ति साहित्य के जनकसंत ज्ञानेश्वर
पंजाबी में लिखने वाले प्रथम सूफीबाबा फ़रीदुद्दीन गंजशकर
दक्खिनी (उर्दू) में लिखने वाले प्रथम सूफीगेसूदराज़ 'बंदा नवाज़'
भारत में रचित प्रथम प्रमुख सूफी ग्रंथकश्फ़-उल-महजूब — अली हुजविरी
प्रथम प्रमुख महिला सूफी संतराबिया बसरी (इराक)
भारत का सर्वाधिक लोकप्रिय सिलसिलाचिश्ती
प्रथम सूफी प्रेमाख्यान (हिंदी)मृगावती — कुतुबन
कर्नाटक संगीत के जनकपुरंदरदास

संत एवं उनकी उपाधियाँ

उपाधिसंत
ग़रीब नवाज़ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती
महबूब-ए-इलाहीशेख निज़ामुद्दीन औलिया
चिराग़-ए-देहलीशेख नसीरुद्दीन महमूद
बंदा नवाज़ / गेसूदराज़सैयद मुहम्मद हुसैनी (गुलबर्गा)
गंजशकरबाबा फ़रीदुद्दीन
दाता गंज बख़्शशेख अली हुजविरी
मुजद्दिद अलिफ़-सानीशेख अहमद सरहिंदी
मख़दूम-ए-जहानियाँसैयद जलालुद्दीन बुख़ारी
तूती-ए-हिंदअमीर ख़ुसरो
अभिनव जयदेव / मैथिल कोकिलविद्यापति

संत एवं समकालीन शासक

संतसमकालीन शासक
मुईनुद्दीन चिश्तीपृथ्वीराज चौहान, मुहम्मद ग़ोरी, इल्तुतमिश
क़ुतुबुद्दीन बख़्तियार काकीइल्तुतमिश
बाबा फ़रीदबलबन
निज़ामुद्दीन औलियाबलबन से मुहम्मद बिन तुग़लक़ तक — सात सुल्तान
चिराग़-ए-देहलीमुहम्मद बिन तुग़लक़, फ़िरोज़ शाह तुग़लक़
कबीरसिकंदर लोदी
गुरु नानकसिकंदर लोदी, बाबर
सलीम चिश्ती एवं दादू दयालअकबर
तुलसीदासअकबर, जहाँगीर
अहमद सरहिंदीजहाँगीर
तुकाराम एवं रामदासशिवाजी

चिश्ती क्रम याद रखने का सूत्र — "मु-क़ु-फ़-नि-न": मुईनुद्दीन → क़ुतुबुद्दीन → फ़रीदुद्दीन → निज़ामुद्दीन → सीरुद्दीन। यही गुरु-शिष्य की अविच्छिन्न श्रृंखला है।

खंड 14 · अभ्यास

अभ्यास प्रश्न (MCQ)

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