भारतीय इतिहास के प्रमुख कथन Famous Statements, Slogans and Titles
"किसने कहा" — परीक्षा का सबसे निश्चित अंक। प्राचीन आदर्श-वाक्यों और अशोक के अभिलेखों से लेकर 1857 की व्याख्याओं, स्वतंत्रता संग्राम के नारों और संविधान पर की गई टिप्पणियों तक, सब एक ही पृष्ठ पर — कथन, कहने वाला और संदर्भ, तीनों के साथ।
इस पृष्ठ में
- 01शास्त्रीय आदर्श-वाक्य एवं उक्तियाँ
- 02अशोक के अभिलेखों के कथन
- 03विदेशी यात्रियों एवं विद्वानों के कथन
- 04मध्यकालीन कथन एवं उक्तियाँ
- 05इतिहासकारों के प्रसिद्ध कथन
- 061857 — किसने क्या कहा
- 07राष्ट्रीय आंदोलन के नारे एवं कथन
- 08समाज सुधारक एवं विचारक
- 09उपाधियाँ — किसने किसे कहा
- 10संविधान एवं स्वतंत्र भारत
- 11स्वयं जाँच
01शास्त्रीय आदर्श-वाक्य एवं उक्तियाँ Classical Mottoes and Maxims
भारत के अधिकांश राजकीय आदर्श-वाक्य किसी नेता के भाषण से नहीं, बल्कि उपनिषद, महाभारत और बौद्ध परंपरा से लिए गए हैं। परीक्षा में प्रायः यही पूछा जाता है कि कौन-सा वाक्य किस ग्रंथ से आया और आज किस संस्था का आदर्श-वाक्य है।
| उक्ति | स्रोत ग्रंथ | प्रयोग / अर्थ |
|---|---|---|
| सत्यमेव जयते | मुण्डक उपनिषद | भारत का राष्ट्रीय आदर्श-वाक्य; मदन मोहन मालवीय ने इसे राष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित किया। |
| यतो धर्मस्ततो जयः | महाभारत | भारत के उच्चतम न्यायालय का आदर्श-वाक्य। |
| धर्मचक्र प्रवर्तनाय | बौद्ध परंपरा | लोकसभा का आदर्श-वाक्य; सारनाथ के प्रथम उपदेश से जुड़ा। |
| वसुधैव कुटुम्बकम् | महा उपनिषद (हितोपदेश में भी) | "सम्पूर्ण पृथ्वी एक परिवार है" — भारतीय विदेश-नीति एवं संसद-भवन में उत्कीर्ण। |
| अहिंसा परमो धर्मः | महाभारत | गांधीवादी अहिंसा-दर्शन का शास्त्रीय आधार। |
| चरैवेति चरैवेति | ऐतरेय ब्राह्मण | "चलते रहो" — निरंतर कर्म एवं गतिशीलता का उपदेश। |
| तमसो मा ज्योतिर्गमय | बृहदारण्यक उपनिषद | अंधकार से प्रकाश की ओर — अनेक विश्वविद्यालयों का आदर्श-वाक्य। |
| श्रमेव जयते | आधुनिक रूपांतरण | श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय से संबद्ध उद्घोष। |
| प्रजासुखे सुखं राज्ञः | कौटिल्य · अर्थशास्त्र | "प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है" — लोक-कल्याणकारी राज्य की प्राचीनतम अभिव्यक्ति। |
| अप्प दीपो भव | बुद्ध · महापरिनिर्वाण सुत्त | "अपना दीपक स्वयं बनो" — बुद्ध का अंतिम उपदेश; आंबेडकर ने इसे विशेष महत्त्व दिया। |
| बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय | बौद्ध परंपरा | आकाशवाणी का आदर्श-वाक्य। |
| शं नो वरुणः | वैदिक मंत्र | भारतीय नौसेना का आदर्श-वाक्य। |
तालिका दाएँ-बाएँ स्क्रॉल की जा सकती है।
02अशोक के अभिलेखों के कथन Statements from Ashokan Edicts
अशोक के अभिलेख भारतीय इतिहास के ऐसे कथन हैं जो स्वयं शासक के मुख से, समकालीन रूप में और पत्थर पर उत्कीर्ण मिलते हैं — इसीलिए इनका साक्ष्य-मूल्य सर्वोच्च है।
सभी मनुष्य मेरी संतान हैं। (सर्वे मुनिसे पजा ममा)
अशोक · पृथक कलिंग शिलालेख — भाव-अनुवाद| कथन का भाव | अभिलेख | महत्त्व |
|---|---|---|
| सभी मनुष्य मेरी संतान हैं | पृथक कलिंग शिलालेख | पितृवत् शासन (paternal kingship) की अवधारणा। |
| कलिंग विजय पर गहरा पश्चात्ताप एवं शोक | 13वाँ वृहद् शिलालेख | विश्व इतिहास में किसी विजेता द्वारा युद्ध-पश्चात्ताप की दुर्लभ घोषणा। |
| अपने संप्रदाय की प्रशंसा और दूसरे की निंदा न की जाए | 12वाँ वृहद् शिलालेख | धार्मिक सहिष्णुता एवं "सार-वृद्धि" का सिद्धांत। |
| देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा | प्रायः सभी अभिलेखों में | अशोक की उपाधि; व्यक्तिगत नाम केवल मास्की एवं गुर्जरा में। |
| अब भेरीघोष के स्थान पर धम्मघोष हो | 4थाँ वृहद् शिलालेख | युद्ध-नीति से धम्म-नीति की ओर संक्रमण। |
| मनुष्यों एवं पशुओं दोनों के लिए चिकित्सा-व्यवस्था | 2रा वृहद् शिलालेख | लोक-कल्याणकारी राज्य का ठोस प्रमाण। |
| मैं सदैव प्रजा के कार्य के लिए उपलब्ध हूँ | 6ठा वृहद् शिलालेख | प्रतिवेदकों को हर समय सूचना देने का आदेश। |
| सुदर्शन झील का पुनर्निर्माण एवं प्रशस्ति | जूनागढ़ — रुद्रदामन (150 ई.) | अशोक-काल की झील; संस्कृत का प्रथम विस्तृत अभिलेख। |
03विदेशी यात्रियों एवं विद्वानों के कथन Statements by Foreign Observers
बाहरी पर्यवेक्षक का कथन दो कारणों से मूल्यवान है — वह वही देखता है जो उसे असामान्य लगे, और वह किसी भारतीय दरबार का वेतनभोगी नहीं होता। पर यही उसकी सीमा भी है: वह अल्पकालिक अतिथि था।
| कथन का भाव | कहने वाला | संदर्भ एवं परीक्षण |
|---|---|---|
| भारत में दास प्रथा नहीं है | मेगस्थनीज · इंडिका | यह दावा भ्रामक सिद्ध हुआ — अर्थशास्त्र में दास (दास-कर्मकर) का स्पष्ट उल्लेख है। |
| भारतीय समाज सात वर्गों में बँटा है | मेगस्थनीज | यूनानी वर्गीकरण-दृष्टि का प्रभाव; वास्तविक वर्ण-जाति व्यवस्था से मेल नहीं खाता। |
| हिंदू घटनाओं के कालक्रम के प्रति उदासीन हैं | अल-बिरूनी · किताब-उल-हिन्द | औपनिवेशिक लेखकों ने इसी को "भारत इतिहास-विहीन है" तक खींच लिया। |
| भारतीय विज्ञान श्रेष्ठ है, पर अहंकार-ग्रस्त है | अल-बिरूनी | प्रशंसा एवं आलोचना का संतुलन — तुलनात्मक पद्धति का आरंभिक उदाहरण। |
| मध्यदेश समृद्ध है और दंड-व्यवस्था सौम्य | फ़ाह्यान · फ़ो-कुओ-की | चन्द्रगुप्त द्वितीय का काल; राजनीति पर लगभग मौन। |
| नालंदा की शिक्षा-पद्धति एवं कठोर प्रवेश-परीक्षा | ह्वेनसांग · सी-यू-की | हर्षकाल; ह्वेनसांग को "यात्रियों का राजकुमार" कहा जाता है। |
| मुहम्मद बिन तुग़लक़ की राजधानी-परिवर्तन नीति का प्रत्यक्ष विवरण | इब्न बतूता · रेहला | मोरक्को का यात्री; दिल्ली का काज़ी भी नियुक्त हुआ। |
| विजयनगर जैसा समृद्ध एवं सुव्यवस्थित नगर कहीं नहीं देखा | डोमिंगो पेस / अब्दुर्रज़्ज़ाक़ | कृष्णदेवराय काल के विदेशी विवरण। |
| यदि पूछा जाए कि मानव-मस्तिष्क किस भूमि पर सर्वाधिक फला-फूला, तो संकेत भारत की ओर होगा | मैक्स मूलर | India: What Can It Teach Us? (1882) — भाव-अनुवाद। |
| भारत मानव-जाति का पालना और परंपरा की जननी है | मार्क ट्वेन | Following the Equator (1897) — भाव-अनुवाद। |
परीक्षा-सूत्र: विदेशी कथन को कभी "प्रमाण" न मानें, "साक्ष्य" मानें। मेगस्थनीज का दास-प्रथा वाला कथन इसका उत्कृष्ट उदाहरण है — कथन प्रामाणिक है, पर सूचना ग़लत।
04मध्यकालीन कथन एवं उक्तियाँ Medieval Statements
| कथन | कहने वाला | संदर्भ |
|---|---|---|
| हुनूज़ दिल्ली दूर अस्त — "दिल्ली अभी दूर है" | निज़ामुद्दीन औलिया | ग़यासुद्दीन तुग़लक़ के लौटने के संदर्भ में; सुल्तान की मार्ग में ही मृत्यु हो गई। |
| इतिहास धर्मशास्त्र का जुड़वाँ भाई है | ज़ियाउद्दीन बरनी | तारीख़-ए-फ़िरोज़शाही; इतिहास का उद्देश्य नैतिक शिक्षा। |
| सुलह-ए-कुल — सबके साथ शांति | अबुल फ़ज़ल · आइन-ए-अकबरी | अकबर की धार्मिक नीति का सैद्धांतिक सूत्र। |
| यदि धरती पर कहीं स्वर्ग है, तो वह यहीं है | अमीर ख़ुसरो (कश्मीर के संदर्भ में जहाँगीर को भी आरोपित) | फ़ारसी पंक्ति; अभिलेखीय रूप से शालीमार बाग़, कश्मीर से जोड़ी जाती है — आरोपण विवादित। |
| हिंदवी स्वराज्य — यह ईश्वर की इच्छा है | छत्रपति शिवाजी | स्वराज्य की अवधारणा का मध्यकालीन उद्घोष। |
| मैं शराब पीने वालों पर प्रतिबंध लगा सकता हूँ, पर पीने की इच्छा पर नहीं | अलाउद्दीन ख़लजी (बरनी द्वारा उद्धृत) | बाज़ार-नियंत्रण एवं नैतिक नियमन की सीमाओं पर। |
| ईश्वर एक है, चाहे उसे राम कहो या रहीम | कबीर · गुरु नानक की परंपरा | निर्गुण भक्ति का केन्द्रीय स्वर; भाव-अनुवाद। |
| मैं दो तलवारें एक म्यान में नहीं रख सकता | औरंगज़ेब से जुड़ी अनुश्रुति | धर्म एवं राजनीति के टकराव पर; अनुश्रुत्यात्मक, प्रामाणिक स्रोत नहीं। |
ध्यान दें: मध्यकाल के अनेक "प्रसिद्ध कथन" अनुश्रुति से आए हैं, अभिलेख या समकालीन दस्तावेज़ से नहीं। उत्तर लिखते समय ऐसे कथनों को "परंपरागत रूप से आरोपित" कहना अधिक सुरक्षित एवं शुद्ध है।
05इतिहासकारों के प्रसिद्ध कथन Statements by Historians
ये कथन केवल उद्धरण नहीं हैं — प्रत्येक के पीछे एक पूरी इतिहास-दृष्टि खड़ी है। NET एवं मुख्य परीक्षा में इन्हीं से व्याख्यात्मक प्रश्न बनते हैं।
इतिहास इतिहासकार और उसके तथ्यों के बीच अनवरत संवाद है।
ई.एच. कार · What is History? (1961) — भाव-अनुवाद| कथन का भाव | कहने वाला | निहितार्थ |
|---|---|---|
| इतिहासकार राग एवं द्वेष दोनों से मुक्त होकर लिखे | कल्हण · राजतरंगिणी | भारतीय परंपरा में निष्पक्षता की सबसे स्पष्ट घोषणा। |
| इतिहासकार का काम बताना है कि वास्तव में जैसा घटित हुआ | लियोपोल्ड फ़ॉन रांके | प्रत्यक्षवादी, स्रोत-आलोचना आधारित वैज्ञानिक इतिहास। |
| समस्त इतिहास समकालीन इतिहास है | बेनेदेत्तो क्रोचे | वर्तमान की चिंता ही अतीत के प्रश्न तय करती है। |
| इतिहास अतीत के विचारों का पुनःअनुभवन है | आर.जी. कॉलिंगवुड | इतिहास मूलतः विचार का इतिहास है। |
| पहले इतिहासकार का अध्ययन करो, फिर उसके तथ्यों का | ई.एच. कार | तथ्य निर्दोष नहीं होते; चयन स्वयं व्याख्या है। |
| इतिहास उत्पादन के साधनों एवं संबंधों में क्रमिक परिवर्तन की प्रस्तुति है | डी.डी. कोसंबी | भारतीय मार्क्सवादी इतिहासलेखन की आधारशिला। |
| भारतीय इतिहास हिंदू, मुस्लिम एवं ब्रिटिश कालों में विभाजित है | जेम्स मिल (1817) | धर्म-आधारित कालविभाजन — साम्प्रदायिक इतिहास-दृष्टि की जड़। |
| भारत का इतिहास निरंकुशता एवं विदेशी आक्रमणों का इतिहास है | विन्सेंट स्मिथ | साम्राज्यवादी इतिहासलेखन का प्रतिनिधि स्वर। |
| प्राचीन भारत में गणतंत्रात्मक एवं प्रतिनिधि संस्थाएँ विद्यमान थीं | के.पी. जायसवाल · Hindu Polity | राष्ट्रवादी प्रत्युत्तर; निरंकुशता की धारणा का खंडन। |
| गुप्तोत्तर भारत में भू-अनुदान से सामंती व्यवस्था विकसित हुई | आर.एस. शर्मा · Indian Feudalism | हरबंस मुखिया ने इस अवधारणा को चुनौती दी। |
| भारतीय इतिहासलेखन अभिजनवादी रहा है | रणजीत गुहा · Subaltern Studies (1982) | अधीनस्थ जन की स्वायत्त चेतना का प्रतिपादन। |
| "स्वर्ण युग" की धारणा स्वयं एक आधुनिक निर्मिति है | रोमिला थापर | गुप्त-काल के महिमामंडन की आलोचना। |
061857 — किसने क्या कहा Interpretations of 1857
1857 भारतीय इतिहास की वह घटना है जिस पर सर्वाधिक परस्पर-विरोधी कथन मिलते हैं। परीक्षा में सीधे "किसने 1857 को क्या कहा" पूछा जाता है, इसलिए इसे तालिका के रूप में याद करना सबसे उपयोगी है।
| 1857 को क्या कहा | कहने वाला | दृष्टिकोण |
|---|---|---|
| मात्र सिपाही विद्रोह | सर जॉन लॉरेंस · जे.आर. सीले | साम्राज्यवादी — इसमें कोई राष्ट्रीय तत्त्व नहीं देखा। |
| भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम | वी.डी. सावरकर (1909) | राष्ट्रवादी — सुनियोजित एवं राष्ट्रव्यापी संघर्ष। |
| न प्रथम, न राष्ट्रीय, न स्वतंत्रता संग्राम | आर.सी. मजूमदार | राष्ट्रवादी होते हुए भी अतिशयोक्ति का खंडन। |
| सैनिक विद्रोह से बढ़कर, किन्तु राष्ट्रीय संग्राम से कम | एस.एन. सेन · Eighteen Fifty-Seven | सरकारी शताब्दी-ग्रंथ का संतुलित निष्कर्ष। |
| सामंती वर्ग के नेतृत्व वाला किसान विद्रोह | आर.पी. दत्त · India Today | मार्क्सवादी — वर्ग-आधार पर व्याख्या। |
| राष्ट्रीय विद्रोह (national revolt) | बेंजामिन डिज़रायली | ब्रिटिश संसद में; इसे मात्र सैनिक असंतोष मानने से इनकार। |
| सभ्यता एवं बर्बरता के बीच संघर्ष | टी.आर. होम्स | नस्लीय एवं औपनिवेशिक पूर्वाग्रह का चरम। |
| हिंदू-मुस्लिम षड्यंत्र | जेम्स आउट्रम · डब्ल्यू. टेलर | षड्यंत्र-सिद्धांत; ऐतिहासिक आधार कमज़ोर। |
| ईसाई धर्म के विरुद्ध धर्मयुद्ध | एल.ई.आर. रीज़ | धार्मिक व्याख्या। |
| स्वतंत्रता के लिए सुनियोजित युद्ध | अशोक मेहता | राष्ट्रवादी-समाजवादी दृष्टि। |
| मूलतः किसान-विद्रोह एवं कृषि-असंतोष | एरिक स्टोक्स | ग्रामीण सामाजिक संरचना पर केन्द्रित आधुनिक शोध। |
| यह सैनिक विद्रोह नहीं, नागरिक विद्रोह था | एस.बी. चौधरी | Civil Rebellion in the Indian Mutinies — जन-भागीदारी पर बल। |
- सावरकर = प्रथम स्वतंत्रता संग्राम · मजूमदार = तीनों का खंडन · एस.एन. सेन = बीच का रास्ता।
- लॉरेंस एवं सीले = सिपाही विद्रोह · डिज़रायली = राष्ट्रीय विद्रोह — दोनों ही अंग्रेज़, पर निष्कर्ष विपरीत।
- आर.पी. दत्त एवं स्टोक्स = वर्ग एवं कृषि-आधारित व्याख्या; होम्स एवं आउट्रम = नस्ली एवं षड्यंत्रवादी व्याख्या।
07राष्ट्रीय आंदोलन के नारे एवं कथन Slogans of the Freedom Movement
नारा इतिहास का सबसे छोटा दस्तावेज़ है। वह बताता है कि उस क्षण आंदोलन किससे लड़ रहा था और किसे संबोधित कर रहा था।
क · प्रमुख नारे Principal Slogans
| नारा / कथन | किसने दिया | वर्ष एवं संदर्भ |
|---|---|---|
| स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा | बाल गंगाधर तिलक | 1916; होमरूल आंदोलन का केन्द्रीय उद्घोष। |
| करो या मरो | महात्मा गांधी | 8 अगस्त 1942, गोवालिया टैंक — भारत छोड़ो आंदोलन। |
| तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा | सुभाष चन्द्र बोस | 1944, बर्मा; आज़ाद हिन्द फ़ौज को संबोधन। |
| दिल्ली चलो | सुभाष चन्द्र बोस | आज़ाद हिन्द फ़ौज का सैन्य उद्घोष। |
| जय हिन्द | आबिद हसन सफ़रानी (सुभाष द्वारा अपनाया) | आज़ाद हिन्द फ़ौज का अभिवादन; बाद में राष्ट्रीय उद्घोष। |
| इंक़लाब ज़िंदाबाद | मौलाना हसरत मोहानी | 1921; भगत सिंह एवं क्रांतिकारियों ने इसे अमर बनाया। |
| वंदे मातरम् | बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय | आनंदमठ (1882); 1896 कांग्रेस अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने गाया। |
| सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा | मुहम्मद इक़बाल | 1904; तराना-ए-हिन्द की प्रथम पंक्ति। |
| सत्याग्रह | महात्मा गांधी | दक्षिण अफ़्रीका, 1906–08; शब्द-चयन प्रतियोगिता से निर्मित। |
| साइमन कमीशन वापस जाओ | यूसुफ़ मेहर अली | 1928; उन्हीं को "भारत छोड़ो" नामकरण का श्रेय भी दिया जाता है। |
| पूर्ण स्वराज | कांग्रेस · लाहौर अधिवेशन | 1929, अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू; 26 जनवरी 1930 प्रथम स्वतंत्रता दिवस। |
| आराम हराम है | जवाहरलाल नेहरू | स्वतंत्रता के बाद राष्ट्र-निर्माण का आह्वान। |
| जय जवान जय किसान | लाल बहादुर शास्त्री | 1965; बाद में "जय विज्ञान" (वाजपेयी) एवं "जय अनुसंधान" जुड़े। |
| गरीबी हटाओ | इंदिरा गांधी | 1971 आम चुनाव का केन्द्रीय नारा। |
ख · प्रसिद्ध राजनीतिक कथन Political Statements
| कथन का भाव | कहने वाला | संदर्भ |
|---|---|---|
| यह एक ऐसा चेक है जो डूबते हुए बैंक पर लिखा गया है | महात्मा गांधी | क्रिप्स मिशन प्रस्ताव (1942) पर टिप्पणी। |
| यह मेरी हिमालय जैसी भूल थी | महात्मा गांधी | 1919 के रौलट सत्याग्रह में जन-हिंसा पर आत्म-आलोचना। |
| मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी | रानी लक्ष्मीबाई | 1857; व्यपगत सिद्धांत के विरोध में — परंपरागत रूप से आरोपित। |
| अंग्रेज़ों को कांग्रेस से बड़ा भय नहीं, यह लड़खड़ाकर गिरने वाली है | लॉर्ड कर्ज़न | 1900; कांग्रेस के पतन की भविष्यवाणी — पूर्णतः ग़लत सिद्ध हुई। |
| कांग्रेस एक सूक्ष्म अल्पसंख्यक वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है | लॉर्ड डफ़रिन | प्रारंभिक कांग्रेस की वैधता पर प्रश्न। |
| कांग्रेस की स्थापना एक "सुरक्षा वाल्व" के रूप में हुई | लाला लाजपत राय (यंग इंडिया, 1916) | ह्यूम-डफ़रिन संबंध पर; बाद में आर.पी. दत्त ने इसे सिद्धांत का रूप दिया। |
| यह अर्धनग्न फ़कीर वायसराय के महल की सीढ़ियाँ चढ़ रहा है | विंस्टन चर्चिल | 1931, गांधी-इरविन समझौते एवं गोलमेज़ यात्रा पर व्यंग्य। |
| बंगाल विभाजन "फूट डालो और राज करो" की नीति है | राष्ट्रवादी नेतृत्व | 1905; कर्ज़न का प्रशासनिक तर्क अस्वीकृत। |
| हिन्दू एवं मुसलमान दो पृथक राष्ट्र हैं | मुहम्मद अली जिन्ना | 1940 लाहौर अधिवेशन; द्वि-राष्ट्र सिद्धांत। |
| आधी रात के समय भारत नियति से अपना वादा पूरा करेगा | जवाहरलाल नेहरू | 14–15 अगस्त 1947, "Tryst with Destiny" भाषण — भाव-अनुवाद। |
| देश आज़ाद हो गया, पर मेरे लिए यह उत्सव का दिन नहीं | महात्मा गांधी | 15 अगस्त 1947 को नोआखली-कलकत्ता में; विभाजन की पीड़ा। |
08समाज सुधारक एवं विचारक Reformers and Thinkers
| कथन | कहने वाला | संदर्भ |
|---|---|---|
| वेदों की ओर लौटो | स्वामी दयानन्द सरस्वती | आर्य समाज (1875); मूर्तिपूजा एवं कर्मकांड का विरोध। |
| उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक रुको मत | स्वामी विवेकानन्द | कठोपनिषद पर आधारित आह्वान; युवाओं को संबोधन। |
| दरिद्रनारायण की सेवा ही ईश्वर की सेवा है | स्वामी विवेकानन्द | व्यावहारिक वेदांत; 1893 शिकागो धर्म-संसद के बाद का चिंतन। |
| शिक्षित बनो, संगठित हो, संघर्ष करो | डॉ. भीमराव आंबेडकर | 1942, अखिल भारतीय दलित महासभा; दलित मुक्ति का सूत्र। |
| मैं हिन्दू धर्म में जन्मा अवश्य हूँ, पर हिन्दू रहकर मरूँगा नहीं | डॉ. भीमराव आंबेडकर | 1935, येवला सम्मेलन; 1956 में बौद्ध धर्म ग्रहण। |
| जाति का विनाश किए बिना सामाजिक सुधार असंभव है | डॉ. भीमराव आंबेडकर | Annihilation of Caste (1936)। |
| विद्या के अभाव में सब कुछ नष्ट हो गया | ज्योतिबा फुले | गुलामगिरी (1873); शिक्षा को सामाजिक मुक्ति की कुंजी बताया। |
| सती प्रथा शास्त्र-सम्मत नहीं, यह मानव-हत्या है | राजा राममोहन राय | 1829 में सती प्रथा उन्मूलन का वैचारिक आधार। |
| स्वतंत्रता के बिना जीवन निरर्थक है | ईश्वरचन्द्र विद्यासागर की सुधार-परंपरा | विधवा पुनर्विवाह अधिनियम (1856) का वैचारिक आधार। |
| जहाँ मन भय से मुक्त हो और मस्तक ऊँचा हो | रवीन्द्रनाथ टैगोर | गीतांजलि; स्वतंत्र भारत की कल्पना — भाव-अनुवाद। |
| सत्य ही ईश्वर है | महात्मा गांधी | पूर्ववर्ती सूत्र "ईश्वर ही सत्य है" का परिवर्तित रूप। |
| बहरों को सुनाने के लिए धमाके की आवश्यकता होती है | भगत सिंह एवं बटुकेश्वर दत्त | 8 अप्रैल 1929, केन्द्रीय असेम्बली बम कांड का पर्चा — भाव-अनुवाद। |
09उपाधियाँ — किसने किसे कहा Who Called Whom What
यह खंड परीक्षा में सर्वाधिक "निश्चित अंक" वाला है, क्योंकि इसमें व्याख्या नहीं, केवल सही जोड़ी चाहिए।
किसने दी उपाधि Attributed By
- महात्मा — गांधी को; प्रचलित रूप से रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा।
- गुरुदेव — टैगोर को; महात्मा गांधी द्वारा।
- राष्ट्रपिता — गांधी को; सुभाष चन्द्र बोस द्वारा (1944, आज़ाद हिन्द रेडियो)।
- नेताजी — सुभाष को; आज़ाद हिन्द फ़ौज के सैनिकों द्वारा।
- भारतीय अशांति का जनक — तिलक को; वैलेंटाइन शिरोल द्वारा।
- अर्धनग्न फ़कीर — गांधी को; विंस्टन चर्चिल द्वारा।
- राजा — राममोहन राय को; मुग़ल सम्राट अकबर द्वितीय द्वारा।
प्रचलित उपाधियाँ Popular Epithets
- लोकमान्य — बाल गंगाधर तिलक। पंजाब केसरी — लाला लाजपत राय।
- देशबंधु — चित्तरंजन दास। दीनबंधु — सी.एफ. एंड्रयूज़।
- लौह पुरुष / भारत का बिस्मार्क — सरदार वल्लभभाई पटेल।
- सीमांत गांधी / बादशाह ख़ान — ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान।
- ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ़ इंडिया — दादाभाई नौरोजी।
- लोकनायक — जयप्रकाश नारायण। शेर-ए-कश्मीर — शेख़ अब्दुल्ला।
- आंध्र केसरी — टी. प्रकाशम। बिहार विभूति — अनुग्रह नारायण सिन्हा।
ऐतिहासिक व्यक्तित्वों की उपाधियाँ Historical Titles
- देवानांप्रिय प्रियदर्शी — सम्राट अशोक।
- भारतीय नेपोलियन — समुद्रगुप्त; उपाधि वी.ए. स्मिथ ने दी।
- यात्रियों का राजकुमार — ह्वेनसांग।
- कविराज — समुद्रगुप्त (प्रयाग प्रशस्ति)।
- हिन्दवी स्वराज्य के संस्थापक — छत्रपति शिवाजी।
- ज़िन्दा पीर — औरंगज़ेब। शाहंशाह-ए-हिन्द — मुग़ल सम्राटों की उपाधि।
- आन्ध्रभोज — कृष्णदेवराय। अभिनव भरताचार्य — जयदेव / परंपरागत रूप से समुद्रगुप्त-कालीन प्रयोग।
आधुनिक भारत के जनक "Father of…"
- आधुनिक भारत के जनक / भारतीय पुनर्जागरण के अग्रदूत — राजा राममोहन राय।
- भारतीय राष्ट्रवाद के जनक — दादाभाई नौरोजी (कुछ मत ए.ओ. ह्यूम को भी)।
- भारतीय पुरातत्त्व के जनक — अलेक्जेंडर कनिंघम।
- भारतीय संविधान के शिल्पी — डॉ. भीमराव आंबेडकर।
- भारतीय हरित क्रांति के जनक — एम.एस. स्वामीनाथन।
- श्वेत क्रांति के जनक — वर्गीज़ कुरियन।
- भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक — विक्रम साराभाई।
10संविधान एवं स्वतंत्र भारत Constitution and Modern India
संविधान चाहे कितना भी अच्छा हो, यदि उसे लागू करने वाले बुरे निकले तो वह बुरा ही सिद्ध होगा।
डॉ. भीमराव आंबेडकर · संविधान सभा, 25 नवम्बर 1949 — भाव-अनुवाद| कथन का भाव | कहने वाला | संदर्भ |
|---|---|---|
| अनुच्छेद 32 संविधान की आत्मा एवं हृदय है | डॉ. भीमराव आंबेडकर | संवैधानिक उपचारों का अधिकार। |
| प्रस्तावना संविधान का परिचय-पत्र है | एन.ए. पालकीवाला | प्रस्तावना की व्याख्यात्मक भूमिका। |
| प्रस्तावना संविधान की कुंजी है | अर्नेस्ट बार्कर | अपनी कृति में भारतीय प्रस्तावना को उद्धृत किया। |
| यह विश्व का सबसे लंबा एवं विस्तृत संविधान है | सर आइवर जेनिंग्स | आलोचनात्मक टिप्पणी — "वकीलों का स्वर्ग" भी कहा। |
| भारतीय संविधान अर्ध-संघीय है | के.सी. व्हीयर | प्रबल केन्द्र वाली संघीय व्यवस्था। |
| यह सामाजिक क्रांति का दस्तावेज़ है | ग्रैनविल ऑस्टिन | The Indian Constitution: Cornerstone of a Nation। |
| संविधान का मूल ढाँचा संशोधित नहीं किया जा सकता | उच्चतम न्यायालय | केशवानंद भारती वाद, 1973। |
| उद्देश्य प्रस्ताव — भारत एक स्वतंत्र प्रभुसत्तासम्पन्न गणराज्य होगा | जवाहरलाल नेहरू | 13 दिसम्बर 1946; यही आगे प्रस्तावना बनी। |
| राज्य के नीति-निदेशक तत्त्व "एक ऐसा चेक हैं जिसका भुगतान बैंक की सुविधा पर निर्भर है" | के.टी. शाह | निदेशक तत्त्वों की गैर-न्यायोचित प्रकृति की आलोचना। |
| भारत रियासतों के एकीकरण के बिना अधूरा रहता | सरदार वल्लभभाई पटेल की भूमिका पर | 562 रियासतों का विलय; इसीलिए "लौह पुरुष"। |
- "संविधान की आत्मा" दो अर्थों में पूछा जाता है — प्रस्तावना (सामान्य प्रयोग) एवं अनुच्छेद 32 (आंबेडकर का कथन)। प्रश्न के शब्द ध्यान से पढ़ें।
- "भारतीय नेपोलियन" — समुद्रगुप्त, उपाधि वी.ए. स्मिथ ने दी; "भारत का बिस्मार्क" — सरदार पटेल।
- "सुरक्षा वाल्व" सिद्धांत का प्रथम स्पष्ट उल्लेख लाला लाजपत राय ने किया, आर.पी. दत्त ने उसे विकसित किया — ह्यूम ने स्वयं ऐसा नहीं कहा।
- "भारत छोड़ो" एवं "साइमन वापस जाओ" — दोनों नामकरण का श्रेय यूसुफ़ मेहर अली को दिया जाता है।