01प्राचीन भारत के युद्ध Battles of Ancient India
प्राचीन युद्धों का विवरण प्रायः साहित्य या अभिलेख से आता है, समकालीन सैन्य दस्तावेज़ से नहीं। इसलिए यहाँ तिथियाँ अनुमानित हैं और महत्त्व सैन्य से अधिक राजनीतिक एवं वैचारिक है।
| युद्ध | वर्ष | पक्ष | परिणाम एवं महत्त्व |
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| दाशराज्ञ युद्ध | ऋग्वैदिक काल | भरत नरेश सुदास बनाम दस राजाओं का संघ | परुष्णी (रावी) नदी के तट पर; सुदास विजयी। पुरोहित वसिष्ठ एवं विश्वामित्र की प्रतिद्वंद्विता; ऋग्वेद के सप्तम मंडल में वर्णित। |
| वितस्ता (हाइडेस्पीज़) का युद्ध | 326 ई.पू. | सिकंदर बनाम पोरस (पुरु) | झेलम नदी के तट पर; सिकंदर विजयी, किन्तु पोरस के साहस से प्रभावित होकर राज्य लौटा दिया। |
| मौर्य-सेल्यूकस संघर्ष | 305–303 ई.पू. | चन्द्रगुप्त मौर्य बनाम सेल्यूकस निकेटर | चन्द्रगुप्त विजयी; संधि में चार पश्चिमी प्रांत मिले, बदले में 500 हाथी; मेगस्थनीज राजदूत बनकर आया। |
| कलिंग युद्ध | 261 ई.पू. | अशोक बनाम कलिंग राज्य | अशोक विजयी, पर 13वें शिलालेख में गहरा पश्चात्ताप; युद्ध-नीति से धम्म-नीति की ओर मोड़। |
| खारवेल के अभियान | प्रथम सदी ई.पू. | कलिंग नरेश खारवेल बनाम मगध एवं सातवाहन | हाथीगुम्फा अभिलेख में वर्णित; कलिंग की पुनःप्रतिष्ठा। |
| शक-सातवाहन संघर्ष | दूसरी सदी ई. | गौतमीपुत्र सातकर्णि बनाम शक क्षत्रप नहपान | नासिक गुहालेख (गौतमी बलश्री) में वर्णित; सातवाहन शक्ति का शिखर। |
| समुद्रगुप्त की दिग्विजय | लगभग 350 ई. | समुद्रगुप्त बनाम आर्यावर्त एवं दक्षिणापथ के राजा | प्रयाग प्रशस्ति (हरिषेण) में वर्णित; उत्तर में उन्मूलन, दक्षिण में ग्रहण-मोक्ष-अनुग्रह की नीति। |
| स्कंदगुप्त एवं हूण संघर्ष | लगभग 455 ई. | स्कंदगुप्त बनाम हूण | भितरी अभिलेख; हूण आक्रमण अस्थायी रूप से रुका, पर गुप्त कोष क्षीण हुआ। |
| नर्मदा तट का युद्ध | लगभग 618–634 ई. | पुलकेशिन द्वितीय बनाम हर्षवर्धन | ऐहोल प्रशस्ति (रविकीर्ति) में वर्णित; हर्ष का दक्षिण-विस्तार रुका, नर्मदा सीमा बनी। |
तालिका दाएँ-बाएँ स्क्रॉल की जा सकती है।
02पूर्व-मध्यकालीन शक्ति-संघर्ष Early Medieval Power Struggles
| युद्ध / संघर्ष | वर्ष | पक्ष | परिणाम एवं महत्त्व |
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| वातापी का युद्ध | 642 ई. | नरसिंहवर्मन प्रथम (पल्लव) बनाम पुलकेशिन द्वितीय | चालुक्य राजधानी वातापी पर अधिकार; नरसिंहवर्मन ने "वातापीकोंड" उपाधि ली। पुलकेशिन संभवतः मारा गया। |
| त्रिपक्षीय संघर्ष (कन्नौज हेतु) | 8वीं–9वीं सदी | पाल बनाम प्रतिहार बनाम राष्ट्रकूट | लगभग दो शताब्दी चला; अंततः प्रतिहारों का कन्नौज पर स्थायी अधिकार, पर तीनों शक्तियाँ क्षीण हुईं। |
| तक्कोलम का युद्ध | 949 ई. | कृष्ण तृतीय (राष्ट्रकूट) बनाम परांतक प्रथम (चोल) | चोल राजकुमार राजादित्य मारा गया; चोल विस्तार अस्थायी रूप से रुका। |
| राजेन्द्र चोल का गंगा अभियान | लगभग 1023 ई. | राजेन्द्र चोल प्रथम बनाम पाल नरेश महिपाल | "गंगैकोंडचोल" उपाधि; नई राजधानी गंगैकोंडचोलपुरम की स्थापना। |
| रावर का युद्ध (सिंध विजय) | 712 ई. | मुहम्मद बिन क़ासिम बनाम राजा दाहिर | अरबों की प्रथम स्थायी विजय; भारत में इस्लामी शासन का पहला बिंदु, पर विस्तार सिंध-मुल्तान तक सीमित रहा। |
| वैहिंद (पेशावर) का युद्ध | 1001 ई. | महमूद ग़ज़नवी बनाम जयपाल (हिन्दूशाही) | महमूद के 17 आक्रमणों की शृंखला का आरंभ; जयपाल ने आत्मदाह किया। |
| वैहिंद का द्वितीय युद्ध | 1008 ई. | महमूद ग़ज़नवी बनाम आनंदपाल एवं राजपूत संघ | उत्तर-पश्चिम का प्रतिरोध टूटा; 1025–26 में सोमनाथ पर आक्रमण संभव हुआ। |
03तुर्क आक्रमण एवं सल्तनत की स्थापना Turkish Invasions
तराइन का दूसरा युद्ध भारतीय इतिहास का सबसे निर्णायक मोड़ माना जाता है — इसके बाद उत्तर भारत में सत्ता का स्वरूप ही बदल गया।
| युद्ध | वर्ष | पक्ष | परिणाम एवं महत्त्व |
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| तराइन का प्रथम युद्ध | 1191 ई. | पृथ्वीराज चौहान तृतीय बनाम मुहम्मद ग़ोरी | ग़ोरी पराजित एवं घायल; भारतीय पक्ष ने पीछा नहीं किया — यही निर्णायक भूल सिद्ध हुई। |
| तराइन का द्वितीय युद्ध | 1192 ई. | मुहम्मद ग़ोरी बनाम पृथ्वीराज चौहान | ग़ोरी विजयी; दिल्ली सल्तनत की स्थापना का मार्ग खुला। सर्वाधिक निर्णायक युद्ध माना जाता है। |
| चंदावर का युद्ध | 1194 ई. | मुहम्मद ग़ोरी बनाम जयचंद (गहड़वाल) | कन्नौज-वाराणसी क्षेत्र पर अधिकार; उत्तर भारत में तुर्क सत्ता स्थायी हुई। |
| सिंधु तट पर मंगोल आक्रमण | 1221 ई. | चंगेज़ ख़ान बनाम ख़्वारिज़्म शाह जलालुद्दीन | इल्तुतमिश ने चतुराई से शरण देने से इनकार किया — सल्तनत मंगोल विनाश से बच गई। |
| तैमूर का आक्रमण | 1398 ई. | तैमूर बनाम नासिरुद्दीन महमूद तुग़लक़ | दिल्ली का भीषण विध्वंस एवं लूट; तुग़लक़ वंश का पतन एवं सैयद वंश का उदय। |
| अलाउद्दीन ख़लजी के दक्षिण अभियान | 1296–1311 ई. | मलिक काफ़ूर बनाम यादव, काकतीय, होयसल, पांड्य | देवगिरि, वारंगल, द्वारसमुद्र एवं मदुरै तक अभियान; दक्षिण से विपुल धन एवं वार्षिक कर। |
| मंगोल आक्रमणों का प्रतिरोध | 1297–1306 ई. | अलाउद्दीन ख़लजी बनाम मंगोल | जालंधर, किली एवं अमरोहा में विजय; इसी दबाव में स्थायी सेना, दाग-हुलिया एवं बाज़ार-नियंत्रण लागू हुए। |
04सल्तनत काल के आंतरिक युद्ध Internal Conflicts of the Sultanate Era
| युद्ध | वर्ष | पक्ष | परिणाम एवं महत्त्व |
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| दिल्ली-विजयनगर-बहमनी संघर्ष | 14वीं–15वीं सदी | विजयनगर बनाम बहमनी सल्तनत | रायचूर दोआब पर लगभग दो शताब्दी का संघर्ष; दोनों शक्तियाँ क्षीण हुईं। |
| ख़ानुआ-पूर्व राजपूत उभार | 1518–19 ई. | राणा सांगा बनाम इब्राहीम लोदी | खातोली एवं धौलपुर में लोदी की पराजय; मेवाड़ उत्तर भारत की सबसे बड़ी देशी शक्ति बना। |
| पानीपत का प्रथम युद्ध | 1526 ई. | बाबर बनाम इब्राहीम लोदी | लोदी मारा गया; भारत में मुग़ल साम्राज्य की स्थापना। तुलुग़मा रणनीति एवं तोपख़ाने (उस्ताद अली, मुस्तफ़ा) का प्रथम प्रभावी प्रयोग। |
| खानवा का युद्ध | 1527 ई. | बाबर बनाम राणा सांगा | राजपूत संघ की निर्णायक पराजय; बाबर ने "ग़ाज़ी" उपाधि ली। मुग़ल सत्ता स्थायी हुई। |
| चंदेरी का युद्ध | 1528 ई. | बाबर बनाम मेदिनी राय | मालवा में राजपूत प्रतिरोध का अंत। |
| घाघरा का युद्ध | 1529 ई. | बाबर बनाम अफ़ग़ान संघ (महमूद लोदी) | बाबर का अंतिम बड़ा युद्ध; पूर्वी भारत में अफ़ग़ान शक्ति दबी। |
पानीपत के तीनों युद्ध · एक साथ- 1526 · प्रथम — बाबर बनाम इब्राहीम लोदी; परिणाम — मुग़ल साम्राज्य की स्थापना।
- 1556 · द्वितीय — अकबर (बैरम ख़ान) बनाम हेमू; परिणाम — मुग़ल सत्ता की पुनःस्थापना।
- 1761 · तृतीय — अहमदशाह अब्दाली बनाम मराठा; परिणाम — मराठा शक्ति को गहरा आघात, कंपनी के लिए मैदान खाली।
- तीनों में विजेता वह रहा जो बाहर से आया — यह संयोग परीक्षा में स्मरण-सूत्र के रूप में उपयोगी है।
05मुग़ल, सूर एवं दक्कन Mughals, Surs and the Deccan
| युद्ध | वर्ष | पक्ष | परिणाम एवं महत्त्व |
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| चौसा का युद्ध | 1539 ई. | शेरशाह सूरी बनाम हुमायूँ | हुमायूँ किसी तरह गंगा पार कर बचा; शेरख़ाँ ने "शेरशाह" की उपाधि धारण की। |
| कन्नौज (बिलग्राम) का युद्ध | 1540 ई. | शेरशाह सूरी बनाम हुमायूँ | हुमायूँ निर्वासित; भारत में सूर वंश की स्थापना (1540–55)। |
| मच्छीवाड़ा एवं सरहिंद | 1555 ई. | हुमायूँ बनाम सिकंदर सूर | हुमायूँ की सत्ता-वापसी; अगले वर्ष उसकी मृत्यु। |
| पानीपत का द्वितीय युद्ध | 1556 ई. | अकबर एवं बैरम ख़ान बनाम हेमू | हेमू आँख में तीर लगने से पराजित एवं मारा गया; मुग़ल सत्ता की निर्णायक पुनःस्थापना। |
| तालीकोटा (राक्षसी-तंगड़ी) का युद्ध | 1565 ई. | दक्कन सल्तनतों का संघ बनाम विजयनगर (रामराय) | विजयनगर की निर्णायक पराजय एवं राजधानी हम्पी का विध्वंस; दक्षिण भारत की महान शक्ति का पतन। |
| हल्दीघाटी का युद्ध | 1576 ई. | मानसिंह (अकबर की ओर से) बनाम महाराणा प्रताप | मुग़ल पक्ष को बढ़त, पर निर्णायक विजय नहीं; प्रताप ने छापामार संघर्ष जारी रखा और 1582 के दिवेर युद्ध में सफलता पाई। |
| असीरगढ़ का घेरा | 1601 ई. | अकबर बनाम ख़ानदेश | अकबर का अंतिम अभियान; दक्कन में मुग़ल पैर जमे। |
| प्रतापगढ़ का संघर्ष | 1659 ई. | शिवाजी बनाम अफ़ज़ल ख़ान (बीजापुर) | अफ़ज़ल ख़ान मारा गया; शिवाजी की सैन्य ख्याति स्थापित। |
| सिंहगढ़ (कोंढाणा) की विजय | 1670 ई. | तानाजी मालुसरे (शिवाजी की ओर से) | तानाजी वीरगति को प्राप्त; किला पुनः मराठा अधिकार में। |
| गोलकुंडा एवं बीजापुर का पतन | 1686–87 ई. | औरंगज़ेब बनाम आदिलशाही एवं कुतुबशाही | दक्कन सल्तनतें समाप्त; पर लंबे दक्कन युद्धों ने मुग़ल कोष एवं सेना को खोखला कर दिया। |
06मराठा एवं अठारहवीं सदी The Marathas and the Eighteenth Century
हमने दो मोती बिखेर दिए, सत्ताईस स्वर्ण-मुद्राएँ खो दीं, और चाँदी-ताँबे की गिनती तो हो ही नहीं सकती।
पानीपत की तृतीय पराजय की सूचना देने वाला मराठा संदेश (1761) — परंपरागत रूप से उद्धृत| युद्ध | वर्ष | पक्ष | परिणाम एवं महत्त्व |
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| पालखेड़ का युद्ध | 1728 ई. | बाजीराव प्रथम बनाम निज़ामुल्मुल्क | गतिशील घुड़सवार रणनीति का उत्कृष्ट उदाहरण; मराठा उत्तर-विस्तार का मार्ग खुला। |
| दिल्ली पर मराठा आक्रमण | 1737 ई. | बाजीराव प्रथम बनाम मुग़ल | मुग़ल राजधानी तक मराठा पहुँच; मुग़ल दुर्बलता उजागर। |
| भोपाल का युद्ध | 1737 ई. | बाजीराव प्रथम बनाम निज़ाम | दुरई सराय की संधि; मालवा मराठों को मिला। |
| करनाल का युद्ध | 1739 ई. | नादिरशाह बनाम मुहम्मद शाह 'रंगीला' | दिल्ली की लूट; मयूर सिंहासन एवं कोहिनूर ईरान ले जाया गया। मुग़ल प्रतिष्ठा समाप्तप्राय। |
| पानीपत का तृतीय युद्ध | 1761 ई. | अहमदशाह अब्दाली बनाम मराठा (सदाशिवराव भाऊ, विश्वासराव) | मराठों की भीषण पराजय; विश्वासराव एवं भाऊ मारे गए। उत्तर भारत में शक्ति-शून्य बना, जिसका लाभ अंततः कंपनी को मिला। |
| राक्षसभुवन का युद्ध | 1763 ई. | माधवराव प्रथम बनाम निज़ाम | पानीपत के बाद मराठा शक्ति की पुनर्स्थापना का आरंभ। |
| दिल्ली पर पुनः अधिकार | 1771 ई. | महादजी शिंदे · मराठा | शाह आलम द्वितीय को मराठा संरक्षण में दिल्ली लौटाया गया। |
07यूरोपीय प्रतिद्वंद्विता एवं कंपनी की विजय European Rivalry and Company Conquest
प्लासी ने कंपनी को धन दिया, बक्सर ने वैधता। इसीलिए अनेक इतिहासकार बक्सर को प्लासी से अधिक निर्णायक मानते हैं।
| युद्ध | वर्ष | पक्ष | परिणाम एवं महत्त्व |
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| प्रथम कर्नाटक युद्ध | 1746–48 ई. | फ़्रांसीसी बनाम अंग्रेज़ | सेंट थोमे के युद्ध में फ़्रांसीसियों ने कर्नाटक नवाब की सेना हराई; एक्स-ला-शापेल की संधि से मद्रास अंग्रेज़ों को वापस। |
| द्वितीय कर्नाटक युद्ध | 1749–54 ई. | फ़्रांसीसी बनाम अंग्रेज़ (उत्तराधिकार विवाद) | अंग्रेज़ समर्थित मुहम्मद अली कर्नाटक का नवाब बना; डुप्ले को वापस बुलाया गया। |
| वांडीवाश का युद्ध | 1760 ई. | सर आयरकूट (अंग्रेज़) बनाम काउंट लाली (फ़्रांसीसी) | तृतीय कर्नाटक युद्ध का निर्णायक मोड़; भारत में फ़्रांसीसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा समाप्त। |
| प्लासी का युद्ध | 1757 ई. | रॉबर्ट क्लाइव बनाम सिराजुद्दौला | मीर जाफ़र के विश्वासघात से निर्णय हुआ; वास्तविक युद्ध नाममात्र। बंगाल की संपदा पर कंपनी का नियंत्रण। |
| बक्सर का युद्ध | 1764 ई. | हेक्टर मुनरो बनाम मीर क़ासिम, शुजाउद्दौला एवं शाह आलम द्वितीय | तीन शक्तियों का संयुक्त मोर्चा पराजित; 1765 की इलाहाबाद संधि से बंगाल-बिहार-उड़ीसा की दीवानी मिली — कंपनी शासन की वैधानिक शुरुआत। |
| बंगाल में द्वैध शासन | 1765–72 ई. | कंपनी बनाम नवाब | दीवानी कंपनी के पास, निज़ामत नवाब के पास; उत्तरदायित्वहीन सत्ता से 1770 का भीषण अकाल। |
प्लासी बनाम बक्सर · अंतर स्पष्ट रखें- प्लासी (1757) — षड्यंत्र से जीता गया; परिणाम आर्थिक — बंगाल का धन।
- बक्सर (1764) — वास्तविक युद्ध; परिणाम वैधानिक — मुग़ल बादशाह से दीवानी का अधिकार।
- बक्सर में कंपनी ने एक साथ बंगाल के नवाब, अवध के नवाब एवं मुग़ल बादशाह — तीनों को हराया, इसीलिए इसे अधिक निर्णायक कहा जाता है।
08आंग्ल-मैसूर, आंग्ल-मराठा एवं आंग्ल-सिख युद्ध Anglo-Mysore, Anglo-Maratha and Anglo-Sikh Wars
क · आंग्ल-मैसूर युद्ध Anglo-Mysore Wars
| युद्ध | वर्ष | पक्ष | परिणाम |
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| प्रथम आंग्ल-मैसूर | 1767–69 ई. | हैदर अली बनाम अंग्रेज़ | हैदर मद्रास के द्वार तक पहुँचा; मद्रास की संधि — यथास्थिति एवं पारस्परिक सहायता। |
| द्वितीय आंग्ल-मैसूर | 1780–84 ई. | हैदर अली एवं टीपू बनाम अंग्रेज़ | पोर्टोनोवो में अंग्रेज़ों की सफलता; युद्ध के बीच हैदर की मृत्यु (1782)। मंगलौर की संधि — अनिर्णायक। |
| तृतीय आंग्ल-मैसूर | 1790–92 ई. | कॉर्नवॉलिस बनाम टीपू सुल्तान | श्रीरंगपट्टनम की संधि — टीपू का आधा राज्य एवं भारी क्षतिपूर्ति; दो पुत्र बंधक। |
| चतुर्थ आंग्ल-मैसूर | 1799 ई. | वेलेजली बनाम टीपू सुल्तान | श्रीरंगपट्टनम में टीपू वीरगति को प्राप्त; मैसूर वाडियार वंश को लौटाकर सहायक संधि में बाँधा गया। |
ख · आंग्ल-मराठा युद्ध Anglo-Maratha Wars
| युद्ध | वर्ष | पक्ष | परिणाम |
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| प्रथम आंग्ल-मराठा | 1775–82 ई. | मराठा बनाम अंग्रेज़ | वडगाँव की संधि (1779) में अंग्रेज़ों की अपमानजनक स्थिति; अंततः सालबाई की संधि (1782) — बीस वर्ष की शांति। एकमात्र युद्ध जिसमें मराठा पराजित नहीं हुए। |
| द्वितीय आंग्ल-मराठा | 1803–05 ई. | अंग्रेज़ बनाम शिंदे, भोंसले एवं होल्कर | पेशवा बाजीराव द्वितीय ने बसीन की संधि (1802) से सहायक संधि स्वीकारी; असई एवं लासवाड़ी में मराठा पराजय। |
| तृतीय आंग्ल-मराठा | 1817–18 ई. | हेस्टिंग्स बनाम मराठा संघ | खड़की, सीताबल्डी एवं महिदपुर में पराजय; पेशवा पद समाप्त, मराठा संघ का अंत, कंपनी सर्वोच्च शक्ति बनी। |
ग · आंग्ल-सिख युद्ध Anglo-Sikh Wars
| युद्ध | वर्ष | प्रमुख संघर्ष | परिणाम |
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| प्रथम आंग्ल-सिख | 1845–46 ई. | मुदकी, फ़िरोज़शाह, अलीवाल, सबराँव | अंग्रेज़ विजयी; लाहौर की संधि — जालंधर दोआब का विलय एवं भारी क्षतिपूर्ति। भैरोवाल की संधि से रेजिडेंट नियुक्त। |
| द्वितीय आंग्ल-सिख | 1848–49 ई. | रामनगर, चिलियाँवाला, गुजरात | चिलियाँवाला में अंग्रेज़ों को भारी क्षति, पर गुजरात के युद्ध में निर्णायक विजय; डलहौज़ी ने पंजाब का विलय कर लिया। |
09सीमांत युद्ध एवं 1857 Frontier Wars and 1857
| युद्ध | वर्ष | पक्ष | परिणाम |
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| आंग्ल-नेपाल (गोरखा) युद्ध | 1814–16 ई. | अंग्रेज़ बनाम नेपाल | सुगौली की संधि — गढ़वाल, कुमाऊँ एवं सिक्किम का क्षेत्र मिला; गोरखा भर्ती आरंभ। |
| प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध | 1824–26 ई. | अंग्रेज़ बनाम बर्मा | यंडाबू की संधि — असम, अराकान एवं तेनासरिम का अधिग्रहण। |
| प्रथम आंग्ल-अफ़ग़ान युद्ध | 1839–42 ई. | अंग्रेज़ बनाम दोस्त मुहम्मद | अंग्रेज़ों की भीषण पराजय एवं काबुल से विनाशकारी वापसी; अग्रगामी नीति की विफलता। |
| सिंध की विजय | 1843 ई. | चार्ल्स नेपियर बनाम अमीर | मियानी एवं दब्बो के युद्ध; सिंध का विलय — औचित्यहीन आक्रमण के रूप में आलोचित। |
| द्वितीय आंग्ल-बर्मा युद्ध | 1852 ई. | डलहौज़ी बनाम बर्मा | निचला बर्मा (पेगू) ब्रिटिश अधिकार में। |
| 1857 का विद्रोह | 1857–58 ई. | भारतीय सैनिक एवं जनता बनाम कंपनी | मेरठ से आरंभ; दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, झाँसी, बरेली, आरा प्रमुख केन्द्र। दमन के बाद कंपनी शासन समाप्त एवं ताज का प्रत्यक्ष शासन (1858)। |
| द्वितीय आंग्ल-अफ़ग़ान युद्ध | 1878–80 ई. | अंग्रेज़ बनाम शेर अली | गंडमक की संधि (1879) — अफ़ग़ान विदेश-नीति ब्रिटिश नियंत्रण में। |
| तृतीय आंग्ल-बर्मा युद्ध | 1885 ई. | अंग्रेज़ बनाम थिबॉ | सम्पूर्ण बर्मा का विलय। |
1857 · प्रमुख केन्द्र एवं नेतृत्व- दिल्ली — बहादुरशाह ज़फ़र एवं बख़्त ख़ान · कानपुर — नाना साहब एवं तात्या टोपे।
- लखनऊ — बेगम हज़रत महल · झाँसी — रानी लक्ष्मीबाई · ग्वालियर — तात्या टोपे एवं रानी।
- बरेली — ख़ान बहादुर ख़ान · आरा (बिहार) — कुँवर सिंह · फ़ैज़ाबाद — मौलवी अहमदुल्ला शाह।
- विद्रोह का तात्कालिक कारण — चर्बी वाले कारतूस; प्रथम शहीद — मंगल पांडे (बैरकपुर, 29 मार्च 1857)।
10स्वतंत्र भारत के युद्ध Wars of Independent India
| युद्ध / अभियान | वर्ष | पक्ष | परिणाम |
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| प्रथम भारत-पाक युद्ध (कश्मीर) | 1947–48 | भारत बनाम पाकिस्तान | महाराजा हरि सिंह द्वारा विलय-पत्र पर हस्ताक्षर; संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से युद्धविराम, नियंत्रण रेखा बनी। |
| ऑपरेशन पोलो (हैदराबाद) | 1948 | भारत बनाम हैदराबाद रियासत | पुलिस कार्रवाई; हैदराबाद का भारत में विलय। |
| ऑपरेशन विजय (गोवा) | 1961 | भारत बनाम पुर्तगाल | गोवा, दमन एवं दीव की मुक्ति; भारत में पुर्तगाली उपस्थिति समाप्त। |
| भारत-चीन युद्ध | 1962 | भारत बनाम चीन | नेफ़ा एवं लद्दाख में भारत को गहरा आघात; चीन का एकतरफ़ा युद्धविराम। रक्षा-नीति की व्यापक पुनर्समीक्षा। |
| द्वितीय भारत-पाक युद्ध | 1965 | भारत बनाम पाकिस्तान | ऑपरेशन जिब्राल्टर विफल; असल उत्तर का टैंक-युद्ध निर्णायक। ताशकंद समझौता (जनवरी 1966)। |
| भारत-पाक युद्ध एवं बांग्लादेश मुक्ति | 1971 | भारत बनाम पाकिस्तान | 13 दिन में निर्णायक विजय; लगभग 93,000 सैनिकों का आत्मसमर्पण एवं बांग्लादेश का उदय। शिमला समझौता (1972)। |
| ऑपरेशन मेघदूत | 1984 | भारत · सियाचिन | विश्व के सर्वोच्च युद्धक्षेत्र सियाचिन ग्लेशियर पर नियंत्रण। |
| कारगिल युद्ध (ऑपरेशन विजय) | 1999 | भारत बनाम पाकिस्तान | टाइगर हिल एवं तोलोलिंग की पुनःप्राप्ति; नियंत्रण रेखा पार किए बिना विजय — 26 जुलाई कारगिल विजय दिवस। |
11प्रमुख संधियाँ — किस युद्ध के बाद Treaties and Their Wars
परीक्षा में युद्ध और संधि प्रायः अलग-अलग पूछे जाते हैं, पर याद एक साथ करने पर ही टिकते हैं।
| संधि | वर्ष | किनके बीच | मुख्य प्रावधान |
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| पुरंदर की संधि | 1665 | शिवाजी एवं जयसिंह (मुग़ल) | शिवाजी ने 23 किले सौंपे; पुत्र शंभाजी को मुग़ल मनसब। |
| इलाहाबाद की संधि | 1765 | क्लाइव, शाह आलम द्वितीय एवं शुजाउद्दौला | बंगाल-बिहार-उड़ीसा की दीवानी कंपनी को; बक्सर के बाद। |
| मद्रास की संधि | 1769 | हैदर अली एवं अंग्रेज़ | प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध के बाद; यथास्थिति एवं पारस्परिक सहायता। |
| सूरत की संधि | 1775 | रघुनाथराव एवं अंग्रेज़ | प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध का तात्कालिक कारण। |
| वडगाँव की संधि | 1779 | मराठा एवं अंग्रेज़ | अंग्रेज़ों की अपमानजनक शर्तें; बाद में अस्वीकृत। |
| सालबाई की संधि | 1782 | महादजी शिंदे एवं अंग्रेज़ | प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध का अंत; बीस वर्ष की शांति। |
| मंगलौर की संधि | 1784 | टीपू सुल्तान एवं अंग्रेज़ | द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध का अनिर्णायक अंत। |
| श्रीरंगपट्टनम की संधि | 1792 | टीपू सुल्तान एवं कॉर्नवॉलिस | तृतीय आंग्ल-मैसूर के बाद; आधा राज्य एवं क्षतिपूर्ति। |
| बसीन की संधि | 1802 | पेशवा बाजीराव द्वितीय एवं अंग्रेज़ | सहायक संधि की स्वीकृति; द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध का कारण। |
| सुगौली की संधि | 1816 | नेपाल एवं अंग्रेज़ | आंग्ल-नेपाल युद्ध का अंत; कुमाऊँ-गढ़वाल का अधिग्रहण। |
| यंडाबू की संधि | 1826 | बर्मा एवं अंग्रेज़ | प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध का अंत; असम एवं अराकान मिले। |
| लाहौर की संधि | 1846 | सिख दरबार एवं अंग्रेज़ | प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध के बाद; जालंधर दोआब का विलय। |
| गंडमक की संधि | 1879 | याक़ूब ख़ान एवं अंग्रेज़ | द्वितीय आंग्ल-अफ़ग़ान युद्ध; अफ़ग़ान विदेश-नीति पर नियंत्रण। |
| ताशकंद समझौता | 1966 | भारत एवं पाकिस्तान | 1965 युद्ध के बाद; सोवियत मध्यस्थता, लाल बहादुर शास्त्री की वहीं मृत्यु। |
| शिमला समझौता | 1972 | इंदिरा गांधी एवं ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो | 1971 युद्ध के बाद; द्विपक्षीय समाधान का सिद्धांत, युद्धविराम रेखा "नियंत्रण रेखा" बनी। |
12स्वयं जाँच Self Test — 15 Questions
प्रत्येक प्रश्न का एक ही प्रयास मिलेगा।
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