भारतीय इतिहास-लेखन परंपरा Indian Historiographical Tradition
अतीत घटित होता है, इतिहास लिखा जाता है। यह अध्याय बताता है कि भारत में अतीत को किसने, किस दृष्टि से और किस उद्देश्य से लिखा — इतिहास-पुराण की अनुश्रुति से लेकर सबाल्टर्न अध्ययन तक।
इस पृष्ठ में
- 01इतिहास और इतिहास-लेखन — अवधारणा
- 02प्राचीन परंपरा — इतिहास-पुराण
- 03चरित-काव्य एवं क्षेत्रीय इतिवृत्त
- 04फ़ारसी तवारीख़ परंपरा
- 05प्राच्यवादी एवं औपनिवेशिक धारा
- 06राष्ट्रवादी इतिहासलेखन
- 07मार्क्सवादी इतिहासलेखन
- 08सबाल्टर्न, कैम्ब्रिज एवं नवीन प्रवृत्तियाँ
- 09इतिहास की शोध-पद्धति एवं वस्तुनिष्ठता
- 10शब्दावली
- 11पिछले वर्षों के प्रश्न
- 12स्वयं जाँच
01इतिहास और इतिहास-लेखन — अवधारणा History and Historiography
अतीत और इतिहास एक वस्तु नहीं हैं। अतीत वह सब है जो घटित हुआ; इतिहास उसका वह छोटा-सा अंश है जिसे किसी इतिहासकार ने साक्ष्य के आधार पर चुना, क्रम में रखा और अर्थ दिया। इसी चयन और अर्थ-निर्माण की प्रक्रिया का अध्ययन इतिहासलेखन (Historiography) कहलाता है।
क · शब्द एवं व्युत्पत्ति Etymology
संस्कृत में इतिहास शब्द "इति ह आस" से बना है, जिसका अर्थ है — "निश्चय ही ऐसा हुआ था"। अंग्रेज़ी का History यूनानी शब्द हिस्तोरिया (historia) से आया है, जिसका अर्थ है "अन्वेषण" या "छानबीन करके प्राप्त ज्ञान"। दोनों व्युत्पत्तियों में एक मूलभूत अंतर छिपा है: भारतीय शब्द घटना के घटित होने पर बल देता है, यूनानी शब्द अन्वेषण की पद्धति पर। यही अंतर आगे चलकर दोनों परंपराओं की प्रकृति भी तय करता है।
हेरोडोटस को "इतिहास का पिता" कहा जाता है, क्योंकि उसने पहली बार घटनाओं को दैवी इच्छा के बजाय मानवीय कारणों से जोड़कर देखा। किन्तु थ्यूसिडाइडीज़ को आलोचनात्मक एवं वैज्ञानिक इतिहास का जनक माना जाता है — उसने प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य को अनुश्रुति से ऊपर रखा और अतिशयोक्ति को सचेत रूप से त्यागा।
ख · इतिहासलेखन के दो अर्थ Two Senses of Historiography
पद्धति के रूप में As Method
- इतिहास लिखने की कला, तकनीक एवं नियम — स्रोत-संग्रह, आलोचना, संश्लेषण और प्रस्तुति।
- प्रश्न — साक्ष्य कैसे परखा जाए, कारण-संबंध कैसे स्थापित हो, प्रमाण की सीमा क्या है।
- यह इतिहास का "कैसे लिखें" वाला पक्ष है।
इतिहास के इतिहास के रूप में As History of History
- विभिन्न कालों के इतिहासकारों ने अतीत को किस दृष्टिकोण से देखा, इसका अध्ययन।
- प्रश्न — लेखक कौन था, किसके संरक्षण में लिख रहा था, किसे छोड़ रहा था और क्यों।
- यह इतिहास का "किसने और क्यों लिखा" वाला पक्ष है — परीक्षा में प्रायः यही पूछा जाता है।
ग · प्रमुख परिभाषाएँ एवं इतिहास-दर्शन Definitions and Philosophy
उन्नीसवीं सदी में लियोपोल्ड फ़ॉन रांके ने घोषित किया कि इतिहासकार का कार्य केवल यह बताना है कि "वास्तव में जैसा घटित हुआ" (wie es eigentlich gewesen)। उन्होंने अभिलेखागार-आधारित स्रोत-आलोचना को इतिहास का केन्द्र बनाया और इसीलिए वैज्ञानिक इतिहास के जनक कहलाए। बीसवीं सदी ने इस प्रत्यक्षवादी विश्वास को चुनौती दी — तथ्य स्वयं नहीं बोलते, इतिहासकार उन्हें बुलवाता है।
इतिहास इतिहासकार और उसके तथ्यों के बीच एक अनवरत संवाद है — वर्तमान और अतीत के बीच कभी न समाप्त होने वाली बातचीत।
ई.एच. कार · What is History? (1961) — भाव-अनुवाद| विचारक | कृति | केन्द्रीय स्थापना |
|---|---|---|
| हेरोडोटस | हिस्टोरीज़ | इतिहास का पिता; घटनाओं का मानवीय अन्वेषण। |
| थ्यूसिडाइडीज़ | पेलोपोनेशियन युद्ध | आलोचनात्मक, प्रत्यक्षदर्शी-आधारित वैज्ञानिक इतिहास। |
| इब्न ख़ल्दून | मुक़द्दमा (1377) | इतिहास-दर्शन एवं समाजशास्त्र का अग्रदूत; 'असबिय्या' (सामूहिक एकजुटता) का सिद्धांत। |
| लियोपोल्ड फ़ॉन रांके | — | "जैसा वास्तव में घटित हुआ"; स्रोत-आलोचना एवं अभिलेखागार पद्धति। |
| बेनेदेत्तो क्रोचे | History as the Story of Liberty | "समस्त इतिहास समकालीन इतिहास है" — वर्तमान की चिंता ही अतीत के प्रश्न तय करती है। |
| आर.जी. कॉलिंगवुड | The Idea of History | इतिहास अतीत के विचारों का पुनःअनुभवन (re-enactment) है। |
| ई.एच. कार | What is History? | तथ्य और व्याख्या अविभाज्य; "पहले इतिहासकार का अध्ययन करो, फिर उसके तथ्यों का।" |
| अर्नाल्ड टॉयनबी | A Study of History | सभ्यताओं का उदय-पतन 'चुनौती एवं प्रत्युत्तर' के चक्र से। |
| ओसवाल्ड स्पेंगलर | Decline of the West | सभ्यताएँ जैविक इकाई की तरह जन्म, यौवन एवं क्षय से गुज़रती हैं। |
| कार्ल मार्क्स | — | इतिहास की गति का आधार उत्पादन-पद्धति एवं वर्ग-संघर्ष। |
- इतिहास का पिता — हेरोडोटस; वैज्ञानिक/आलोचनात्मक इतिहास का जनक — थ्यूसिडाइडीज़; आधुनिक स्रोत-आलोचना का जनक — रांके।
- "इतिहास वर्तमान एवं अतीत के बीच अनवरत संवाद" — ई.एच. कार। "समस्त इतिहास समकालीन इतिहास है" — क्रोचे।
- समय-बोध की दो धारणाएँ — चक्रीय (भारतीय युग-सिद्धांत, टॉयनबी, स्पेंगलर) एवं रैखिक (सामी-ईसाई परंपरा, प्रबोधन, मार्क्स)।
- इतिहास न विशुद्ध विज्ञान है, न विशुद्ध साहित्य — यह साक्ष्य-अनुशासित व्याख्या है, इसलिए इसे 'सामाजिक विज्ञान' में रखा जाता है।
02प्राचीन परंपरा — इतिहास-पुराण The Itihasa-Purana Tradition
भारत में अतीत का लेखन आधुनिक अर्थ में "इतिहास" नहीं, बल्कि इतिहास-पुराण नामक एक व्यापक अनुश्रुति-परंपरा के रूप में हुआ, जिसमें वंशावली, नीति, धर्म और स्मृति एक साथ गुँथे हुए थे।
क · परंपरा का स्वरूप Nature of the Tradition
अथर्ववेद, शतपथ ब्राह्मण एवं छान्दोग्य उपनिषद में "इतिहास-पुराण" का उल्लेख मिलता है और इसे पंचम वेद तक कहा गया है। यह परंपरा मौखिक थी और इसके संरक्षक थे सूत एवं मागध — वे जातिगत वृत्तिधारी जो राजवंशों की वंशावलियाँ कंठस्थ रखते और सभाओं में सुनाते थे। लिखित रूप बहुत बाद में स्थिर हुआ, इसलिए मूल पाठ में निरंतर प्रक्षेप (बाद के जोड़) होते रहे।
अनुश्रुति के प्रमुख रूप थे — गाथा (गीतात्मक स्मृति), नाराशंसी (वीर-पुरुषों की प्रशंसा), आख्यान एवं उपाख्यान (कथा एवं उपकथा), पुराण (प्राचीन वृत्तांत) तथा वंश एवं वंशानुचरित (वंशावली)। ध्यान देने योग्य है कि इनका उद्देश्य तिथि-क्रम बताना नहीं, बल्कि वैधता एवं आदर्श स्थापित करना था — किसी वंश को सूर्यवंश या चन्द्रवंश से जोड़ देना उसके शासन को नैतिक आधार देता था।
ख · पुराणों के पाँच लक्षण Pancha-Lakshana
सर्ग एवं प्रतिसर्ग
- सर्ग — सृष्टि की उत्पत्ति।
- प्रतिसर्ग — प्रलय के बाद पुनःसृष्टि।
- यह अंश विशुद्ध विश्व-दृष्टि है, ऐतिहासिक नहीं।
मन्वन्तर एवं वंश
- मन्वन्तर — मनु-कालचक्र; युग-विभाजन (सत्य, त्रेता, द्वापर, कलि)।
- वंश — देवताओं एवं ऋषियों की परंपरा।
- यहीं भारतीय चक्रीय समय-बोध स्पष्ट होता है।
वंशानुचरित
- राजवंशों का क्रमिक विवरण — यही एकमात्र ऐतिहासिक अंश है।
- मत्स्य, वायु, ब्रह्माण्ड एवं विष्णु पुराण सर्वाधिक उपयोगी।
- वंशावलियाँ भविष्यत् काल में लिखी गई हैं — मानो भविष्यवाणी हो।
ग · "भारत में इतिहास-बोध नहीं था" — आरोप एवं समीक्षा The Debate
अल-बिरूनी ने ग्यारहवीं सदी में टिप्पणी की थी कि भारतीय घटनाओं के क्रम पर पर्याप्त ध्यान नहीं देते। औपनिवेशिक काल में इसी टिप्पणी को बहुत आगे बढ़ाकर जेम्स मिल और दार्शनिक हीगल ने कहा कि भारत "इतिहास-विहीन" समाज है, जहाँ समय ठहरा हुआ है। यह आरोप निर्दोष नहीं था — यदि किसी समाज का अपना इतिहास ही न हो, तो उसका इतिहास लिखने और उस पर शासन करने का अधिकार बाहरी शक्ति को मिल जाता है।
आरोप के आधार
- तिथि-क्रमबद्ध, धर्मनिरपेक्ष इतिहास-ग्रंथों का अभाव।
- पुराणों में मिथक एवं तथ्य का घुला-मिला रूप।
- चक्रीय समय-बोध — घटना की एकबारगी विशिष्टता कमज़ोर पड़ती है।
- व्यक्ति के बजाय आदर्श एवं धर्म पर बल।
प्रत्युत्तर
- संवत-परंपरा — विक्रम (57 ई.पू.), शक (78 ई.), गुप्त (319–20 ई.), कलचुरि, हर्ष (606 ई.) — तिथि-चेतना का प्रमाण।
- प्रशस्ति एवं दानपत्रों में वंशावली, तिथि एवं घटनाक्रम का सुव्यवस्थित लेखा।
- राजतरंगिणी, दीपवंश-महावंश, बुरंजी, ख्यात — क्रमबद्ध इतिवृत्त परंपरा।
- रोमिला थापर का तर्क — भारत में चक्रीय एवं रैखिक दोनों समय-बोध साथ-साथ चलते रहे; इतिहास-बोध का रूप भिन्न था, अभाव नहीं।
- पुराणों के पाँच लक्षण — सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर, वंशानुचरित; इनमें केवल वंशानुचरित ऐतिहासिक है।
- वंशावली-परंपरा के संरक्षक — सूत एवं मागध।
- कुल पुराण 18; ऐतिहासिक दृष्टि से मत्स्य, वायु, ब्रह्माण्ड एवं विष्णु पुराण सर्वाधिक उपयोगी।
- इतिहास-पुराण को पंचम वेद कहा गया (छान्दोग्य उपनिषद)।
03चरित-काव्य एवं क्षेत्रीय इतिवृत्त Charita Literature and Regional Chronicles
सातवीं सदी के बाद भारत में एक नई विधा उभरी — चरित, अर्थात् किसी जीवित शासक की जीवनी, जो प्रायः उसी के दरबारी कवि ने लिखी। यहाँ पहली बार इतिहास का केन्द्र मिथक से हटकर व्यक्ति एवं घटना बनता है।
क · चरित-काव्य की प्रकृति Nature of Charita Writing
चरित-काव्य आधे इतिहास और आधे काव्य हैं। इनका लेखक आश्रयदाता के वेतन पर था, इसलिए पराजयें छिप जाती हैं और विजयें बढ़ा-चढ़ाकर आती हैं। फिर भी इनका मूल्य असाधारण है, क्योंकि ये दरबारी जीवन, प्रशासनिक पदावली, सामाजिक रीति और समकालीन भूगोल का ऐसा विवरण देते हैं जो अभिलेखों में कभी नहीं मिलता। इतिहासकार इन्हें "छाननी लगाकर" पढ़ता है — अतिशयोक्ति हटाकर संरचना बचा लेता है।
| ग्रंथ | लेखक | नायक एवं महत्त्व |
|---|---|---|
| हर्षचरित | बाणभट्ट | हर्षवर्धन; संस्कृत की प्रथम ऐतिहासिक आख्यायिका एवं गद्य-जीवनी। |
| विक्रमांकदेवचरित | बिल्हण | चालुक्य नरेश विक्रमादित्य षष्ठ; कश्मीर से कर्नाटक तक की यात्रा का भी विवरण। |
| गौडवहो | वाक्पति | कन्नौज के यशोवर्मन की गौड़-विजय; प्राकृत काव्य। |
| रामचरित | सन्ध्याकर नन्दी | द्व्यर्थक काव्य — एक साथ राम एवं पाल नरेश रामपाल की कथा; कैवर्त विद्रोह का स्रोत। |
| नवसाहसांकचरित | पद्मगुप्त | परमार नरेश सिन्धुराज। |
| कुमारपालचरित (द्व्याश्रय) | हेमचन्द्र | चालुक्य कुमारपाल; व्याकरण एवं इतिहास एक साथ। |
| पृथ्वीराजविजय | जयानक | चाहमान पृथ्वीराज तृतीय। |
| पृथ्वीराजरासो | चन्दबरदाई | वीरगाथा; ऐतिहासिक दृष्टि से विवादास्पद एवं अतिरंजित। |
ख · कल्हण की राजतरंगिणी — भारतीय आलोचनात्मक इतिहास का शिखर Kalhana's Rajatarangini
कल्हण ने लगभग 1148–1150 ई. में कश्मीर का इतिहास आठ तरंगों एवं लगभग 7,826 श्लोकों में लिखा। जो बात इसे शेष चरित-साहित्य से अलग करती है, वह विषय नहीं बल्कि पद्धति है। कल्हण ने पुराने ग्रंथों, शिलालेखों, ताम्रपत्रों, सिक्कों, मंदिर-अभिलेखों तथा स्थानीय परंपरा का उपयोग किया, परस्पर विरोधी विवरणों की तुलना की, और यह स्पष्ट घोषणा की कि इतिहासकार को राग एवं द्वेष से मुक्त होकर लिखना चाहिए।
श्लाघ्य वही इतिहासकार है जिसकी वाणी, न्यायाधीश की भाँति, राग और द्वेष दोनों से मुक्त होकर केवल बीते हुए तथ्य का वर्णन करे।
कल्हण · राजतरंगिणी, प्रथम तरंग — भाव-अनुवादकल्हण की सीमाएँ भी हैं — प्रारंभिक तरंगों का कालक्रम अविश्वसनीय है, चमत्कार एवं शाप की कथाएँ मौजूद हैं, और उनकी दृष्टि ब्राह्मण-अभिजन वर्ग की है। फिर भी परवर्ती परंपरा उन्हीं से चली: जोनराज, श्रीवर, प्राज्यभट्ट एवं शुक ने राजतरंगिणी को सुल्तानों के काल तक आगे बढ़ाया — भारत में यह अकेली अविच्छिन्न इतिहास-लेखन शृंखला है।
ग · क्षेत्रीय इतिवृत्त परंपराएँ Regional Chronicles
पश्चिम एवं दक्षिण West and South
- प्रबंधचिंतामणि — मेरुतुंग; गुजरात के चालुक्य।
- प्रबंधकोश — राजशेखर सूरि; जैन प्रबंध परंपरा।
- कीर्तिकौमुदी — सोमेश्वर; वस्तुपाल-तेजपाल।
- मुशिकवंश (केरल) एवं तमिल कलिंगत्तुपरणि।
पूर्व, उत्तर एवं द्वीप East, North and Island
- बुरंजी — असम के अहोम राज्य के तिथि-क्रमबद्ध वृत्तांत (अहोम एवं असमिया भाषा)।
- ख्यात एवं वंश-भास्कर — राजस्थान की चारण परंपरा; सूर्यमल्ल मिश्रण।
- दीपवंश, महावंश, चूलवंश — श्रीलंकाई पालि इतिवृत्त; मौर्य कालक्रम की रीढ़।
- राजतरंगिणी की उत्तरवर्ती शृंखला — जोनराज, श्रीवर, शुक।
04फ़ारसी तवारीख़ परंपरा The Persian Tarikh Tradition
तेरहवीं सदी के बाद भारत में एक ऐसी लेखन-परंपरा आई जो पेशेवर, तिथि-सजग और गद्यात्मक थी — तारीख़। पहली बार इतिहास लिखना राजकीय संरक्षण में एक स्वीकृत वृत्ति बन गया।
क · तवारीख़ की प्रकृति एवं सिद्धांत Nature and Theory
फ़ारसी इतिहासकार अरब-ईरानी परंपरा से आए थे, जहाँ इतिहास का उद्देश्य केवल घटना दर्ज करना नहीं, बल्कि शासक एवं पाठक को नैतिक शिक्षा देना था। ज़ियाउद्दीन बरनी ने तो स्पष्ट लिखा कि इतिहास धर्मशास्त्र का जुड़वाँ भाई है और उसका काम अच्छे-बुरे का उदाहरण प्रस्तुत करना है। इसका परिणाम यह हुआ कि तवारीख़ में विवरण सटीक होते हुए भी चयन नैतिक एवं वर्गीय आग्रह से तय होता था।
इस परंपरा की सबसे बड़ी उपलब्धि है तिथि की सटीकता एवं प्रशासनिक विवरण, और सबसे बड़ी सीमा है दरबार-केन्द्रिकता — किसान, कारीगर, स्त्री और जनजातीय समाज इनमें लगभग अनुपस्थित रहते हैं। बरनी की दृष्टि तो खुले तौर पर अभिजन-समर्थक थी; उन्होंने निम्न वर्गों के शिक्षा एवं पद पाने का विरोध किया।
| इतिहासकार | कृति | विशेषता |
|---|---|---|
| अल-बिरूनी | किताब-उल-हिन्द / तहक़ीक़-ए-हिन्द | संस्कृत सीखकर तुलनात्मक अध्ययन; तवारीख़ परंपरा का सर्वाधिक वस्तुनिष्ठ अग्रदूत। |
| मिन्हाज-उस-सिराज | तबक़ात-ए-नासिरी | दिल्ली सल्तनत का प्रथम व्यवस्थित इतिहास; इल्तुतमिश एवं रज़िया काल। |
| ज़ियाउद्दीन बरनी | तारीख़-ए-फ़िरोज़शाही; फ़तवा-ए-जहाँदारी | इतिहास का नैतिक सिद्धांत; अलाउद्दीन के बाज़ार-नियंत्रण का मुख्य स्रोत; अभिजनवादी पूर्वाग्रह। |
| अमीर ख़ुसरो | ख़ज़ाइन-उल-फ़ुतूह; तुग़लक़नामा | काव्यात्मक इतिहास; सांस्कृतिक एवं संगीत सम्बन्धी सूचना। |
| इब्न बतूता | रेहला | मोरक्को का यात्री; मुहम्मद बिन तुग़लक़ काल का बाह्य प्रत्यक्ष विवरण। |
| अबुल फ़ज़ल | अकबरनामा; आइन-ए-अकबरी | सुलह-ए-कुल की व्याख्या; आँकड़ों-आधारित प्रशासनिक इतिहास का प्रथम उदाहरण। |
| अब्दुल क़ादिर बदायूँनी | मुन्तख़ब-उत-तवारीख़ | अकबर की धार्मिक नीति का कटु आलोचक — दरबारी इतिहास का प्रति-स्वर। |
| मुहम्मद क़ासिम फ़रिश्ता | गुलशन-ए-इब्राहीमी (तारीख़-ए-फ़रिश्ता) | अखिल भारतीय दृष्टि; दक्कन सल्तनतों का विस्तृत विवरण। |
तालिका दाएँ-बाएँ स्क्रॉल की जा सकती है।
- भाषा एवं विधा — चरित प्रायः पद्य एवं अलंकारप्रधान; तारीख़ मुख्यतः गद्य एवं वृत्तांतप्रधान।
- तिथि-चेतना — चरित में शिथिल; तारीख़ में हिजरी सन् के साथ प्रायः सटीक।
- उद्देश्य — चरित में आश्रयदाता का यशगान; तारीख़ में नैतिक शिक्षा एवं राजनीतिक व्यावहारिकता।
- साझा सीमा — दोनों ही दरबार-केन्द्रित हैं; आम जन दोनों में लगभग अनुपस्थित।
05प्राच्यवादी एवं औपनिवेशिक धारा Orientalist and Colonial Historiography
अठारहवीं सदी के अंत में भारतीय अतीत का अध्ययन एक नए उद्देश्य से शुरू हुआ — शासन के लिए ज्ञान। इसी से आधुनिक शोध-पद्धति भी आई और औपनिवेशिक पूर्वाग्रह भी।
क · प्राच्यवाद — खोज का युग Orientalism
1784 में विलियम जोन्स ने कलकत्ता में एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल की स्थापना की। जोन्स ने 1786 में यह क्रांतिकारी स्थापना दी कि संस्कृत, ग्रीक एवं लैटिन एक ही मूल भाषा-परिवार से निकली हैं — इसी से तुलनात्मक भाषाविज्ञान और आगे चलकर "आर्य" संबंधी समस्त बहस जन्मी। चार्ल्स विल्किंस ने गीता का प्रथम अंग्रेज़ी अनुवाद किया, एच.टी. कोलब्रुक ने वेद एवं धर्मशास्त्र पर कार्य किया, तथा मैक्स मूलर ने ऋग्वेद का संस्करण एवं Sacred Books of the East शृंखला तैयार की। जेम्स प्रिंसेप द्वारा 1837 में ब्राह्मी का वाचन और 1861 में ASI की स्थापना (प्रथम महानिदेशक अलेक्जेंडर कनिंघम) ने इतिहास को पुरातात्विक आधार दिया।
किन्तु प्राच्यवाद निर्दोष विद्वत्ता नहीं थी। इसका सामान्य ढाँचा यह था कि भारत का अतीत गौरवशाली था और वर्तमान पतित — और इस पतन से उबारने का दायित्व औपनिवेशिक सत्ता का है। एडवर्ड सईद ने अपनी कृति Orientalism (1978) में दिखाया कि "पूर्व" की यह छवि स्वयं सत्ता-संबंध की उपज थी।
ख · उपयोगितावादी एवं साम्राज्यवादी लेखन Utilitarian and Imperialist
जेम्स मिल ने The History of British India (1817) लिखी — यद्यपि वे कभी भारत नहीं आए और न संस्कृत या फ़ारसी जानते थे। उन्होंने भारतीय इतिहास को हिन्दू, मुस्लिम एवं ब्रिटिश — तीन कालों में बाँटा। यह विभाजन आज भी पाठ्यक्रमों में "प्राचीन, मध्यकालीन, आधुनिक" के रूप में चलता है, किन्तु इसकी मूल अंतर्वस्तु धर्म-आधारित थी और इसी से साम्प्रदायिक इतिहास-दृष्टि की नींव पड़ी।
विन्सेंट स्मिथ की Early History of India (1904) ने भारतीय राजनीति को स्थायी निरंकुशता के रूप में प्रस्तुत किया और विदेशी आक्रमणों को इतिहास का चालक बताया। इस समूची धारा के कुछ साझा लक्षण हैं, जिन्हें परीक्षा में प्रायः पूछा जाता है।
औपनिवेशिक इतिहासलेखन के लक्षण
- प्राच्य निरंकुशता — भारत में सदा स्वेच्छाचारी राजतंत्र।
- स्थिर ग्राम-समुदाय — गतिहीन, आत्मनिर्भर, इतिहास से अछूता।
- इतिहास-विहीनता का आरोप एवं धर्म-आधारित कालविभाजन।
- जाति को अपरिवर्तनीय एवं शास्त्र-निर्धारित मानना।
- औपनिवेशिक शासन को "आधुनिकता का वाहक" सिद्ध करना।
फिर भी स्थायी योगदान
- अभिलेखों का संकलन — Corpus Inscriptionum Indicarum।
- लिपि-वाचन, मुद्रा-वर्गीकरण एवं व्यवस्थित उत्खनन।
- संस्कृत-पालि ग्रंथों के आलोचनात्मक संस्करण एवं अनुवाद।
- जनगणना, सर्वेक्षण एवं गजेटियर — आँकड़ों का विशाल आधार।
- आधुनिक शोध-पद्धति एवं विश्वविद्यालयी अनुशासन की स्थापना।
- एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल — विलियम जोन्स, 1784; भारत-यूरोपीय भाषा-परिवार की स्थापना 1786।
- भारतीय इतिहास का हिन्दू-मुस्लिम-ब्रिटिश कालविभाजन — जेम्स मिल, 1817।
- Orientalism (1978) — एडवर्ड सईद; प्राच्य-छवि को सत्ता-संबंध की उपज बताया।
- ASI की स्थापना 1861; जॉन मार्शल के काल में हड़प्पा-मोहनजोदड़ो की घोषणा (1924)।
06राष्ट्रवादी इतिहासलेखन Nationalist Historiography
यदि औपनिवेशिक इतिहास ने भारत को इतिहास-विहीन कहा, तो राष्ट्रवादी इतिहास उसी आरोप का उत्तर था — अतीत को खोजकर आत्म-सम्मान और राजनीतिक दावेदारी दोनों अर्जित करना।
क · प्रेरणा एवं तर्क-पद्धति Motivation and Argument
राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने उन्हीं स्रोतों से विपरीत निष्कर्ष निकाले। जहाँ औपनिवेशिक लेखन ने निरंकुशता देखी, वहाँ के.पी. जायसवाल ने Hindu Polity में गणतंत्रात्मक एवं प्रतिनिधिमूलक संस्थाओं का इतिहास देखा। जहाँ भारत को स्थिर कहा गया, वहाँ आर.सी. मजूमदार एवं आर.के. मुखर्जी ने समुद्री व्यापार, उपनिवेशन और सांस्कृतिक विस्तार की गतिशील कहानी प्रस्तुत की। यह लेखन केवल शैक्षणिक नहीं था — यह स्वाधीनता संग्राम का बौद्धिक मोर्चा था।
| इतिहासकार | प्रमुख कृति | स्थापना |
|---|---|---|
| राजेन्द्रलाल मित्र | The Antiquities of Orissa | प्रथम भारतीय आधुनिक पुरातत्त्वविद् एवं इतिहासकार। |
| आर.जी. भण्डारकर | Early History of the Deccan | आलोचनात्मक स्रोत-पद्धति के भारतीय प्रवर्तक; समाज-सुधार से जुड़ी दृष्टि। |
| के.पी. जायसवाल | Hindu Polity | प्राचीन भारत में गणतंत्र एवं प्रतिनिधि संस्थाओं का प्रतिपादन। |
| एच.सी. रायचौधरी | Political History of Ancient India | परीक्षण-आधारित राजनीतिक कालक्रम का मानक ग्रंथ। |
| आर.सी. मजूमदार | The History and Culture of the Indian People | बहुखंडीय राष्ट्रीय इतिहास परियोजना का संपादन। |
| ए.एस. अल्तेकर | State and Government in Ancient India; The Position of Women… | राज्य-संस्था एवं स्त्री-स्थिति का व्यवस्थित अध्ययन। |
| राधाकुमुद मुखर्जी | Indian Shipping; Chandragupta Maurya and His Times | समुद्री परंपरा एवं मौर्य राज्य का गौरव-पक्ष। |
| के.ए. नीलकंठ शास्त्री | A History of South India; The Colas | दक्षिण भारत के इतिहास को राष्ट्रीय आख्यान में स्थान। |
| जदुनाथ सरकार | History of Aurangzib | फ़ारसी स्रोतों का कठोर आलोचनात्मक उपयोग; तथ्यनिष्ठ मध्यकालीन इतिहास। |
ख · उपलब्धि एवं सीमा Achievement and Limitation
उपलब्धियाँ
- औपनिवेशिक स्थापनाओं का स्रोत-आधारित खंडन।
- भारतीयों द्वारा भारत का इतिहास — अकादमिक स्वायत्तता।
- क्षेत्रीय एवं दक्षिण भारतीय इतिहास का समावेश।
- प्राचीन संस्थाओं, कला एवं विज्ञान का पुनर्मूल्यांकन।
सीमाएँ
- "स्वर्ण युग" की अतिरंजित धारणा (विशेषतः गुप्त काल)।
- प्राचीन काल का महिमामंडन एवं मध्यकाल की उपेक्षा — मिल के ढाँचे को अनजाने स्वीकार करना।
- जाति, अस्पृश्यता एवं स्त्री-अधीनता जैसे असुविधाजनक प्रश्नों पर सापेक्ष मौन।
- वर्तमान की राजनीतिक आवश्यकता से अतीत की व्याख्या।
- अभिजन-केन्द्रित — राजा एवं शास्त्र, किन्तु उत्पादक वर्ग नहीं।
07मार्क्सवादी इतिहासलेखन Marxist Historiography
स्वतंत्रता के बाद प्रश्न बदल गया। अब पूछा जाने लगा — राजा कौन था, यह नहीं; बल्कि अन्न कौन उगाता था, अधिशेष किसके पास जाता था, और समाज किन संबंधों पर टिका था।
क · सैद्धांतिक आधार Theoretical Framework
मार्क्सवादी इतिहास-दृष्टि ऐतिहासिक भौतिकवाद पर आधारित है। इसके अनुसार किसी युग की मूल पहचान उसकी उत्पादन-पद्धति (mode of production) से होती है — अर्थात् उत्पादन के साधन किसके पास हैं और श्रम-संबंध किस रूप में हैं। इसी आर्थिक आधार (base) पर राज्य, विधि, धर्म एवं विचारधारा की अधिरचना (superstructure) खड़ी होती है, और परिवर्तन का इंजन है वर्ग-संघर्ष। ध्यान रहे कि परिपक्व भारतीय मार्क्सवादी लेखन यांत्रिक नहीं है — यह मानता है कि अधिरचना भी आधार को प्रभावित करती है।
इतिहास उत्पादन के साधनों एवं संबंधों में क्रमिक परिवर्तन की कालक्रमबद्ध प्रस्तुति है।
डी.डी. कोसंबी · An Introduction to the Study of Indian History (1956) — भाव-अनुवादख · प्रमुख इतिहासकार एवं अवधारणाएँ Key Historians and Concepts
डी.डी. कोसंबी D.D. Kosambi
- गणितज्ञ से इतिहासकार; भारतीय मार्क्सवादी इतिहासलेखन के प्रवर्तक।
- कृतियाँ — An Introduction to the Study of Indian History (1956), The Culture and Civilisation of Ancient India in Historical Outline (1965)।
- अंतर्विषयक पद्धति — भाषाविज्ञान, नृविज्ञान, मुद्राशास्त्र एवं क्षेत्र-भ्रमण का संयुक्त प्रयोग।
- जनजातीय समाजों के कृषि-समाज में समावेशन की प्रक्रिया पर बल।
आर.एस. शर्मा R.S. Sharma
- Indian Feudalism, Śūdras in Ancient India, Urban Decay in India।
- भारतीय सामंतवाद की अवधारणा — भू-अनुदान, मुद्रा-अभाव एवं विकेन्द्रीकरण।
- गुप्तोत्तर काल में नगरीय ह्रास का सिद्धांत।
- वर्ण-व्यवस्था को श्रम-विभाजन एवं अधिशेष-नियंत्रण से जोड़कर देखा।
रोमिला थापर Romila Thapar
- Aśoka and the Decline of the Mauryas, From Lineage to State, Early India।
- वंश-समाज से राज्य-समाज में संक्रमण की प्रक्रिया।
- धम्म की राजनीतिक-सामाजिक व्याख्या; "स्वर्ण युग" धारणा की आलोचना।
- भारतीय समय-बोध पर कार्य — चक्रीय एवं रैखिक दोनों की उपस्थिति।
इरफ़ान हबीब एवं अन्य Irfan Habib and Others
- इरफ़ान हबीब — The Agrarian System of Mughal India; मुग़ल कृषि-संबंध एवं संकट।
- सतीश चन्द्र — मुग़ल दरबार की गुटबंदी एवं जागीरदारी संकट।
- बिपन चन्द्र — Rise and Growth of Economic Nationalism; उपनिवेशवाद एवं धन-निष्कासन।
- डी.एन. झा, के.एम. श्रीमाली, सुवीरा जायसवाल — प्राचीन भारतीय अर्थव्यवस्था एवं समाज।
ग · भीतर की बहस The Internal Debate
मार्क्सवादी इतिहासलेखन एकरूप नहीं है; उसकी सबसे प्रसिद्ध आंतरिक बहस भारतीय सामंतवाद को लेकर है। हरबंस मुखिया ने प्रश्न उठाया कि क्या भारतीय इतिहास में यूरोपीय अर्थ में सामंतवाद था भी — भारत में स्वतंत्र कृषक उत्पादन प्रबल था और भू-दास प्रथा उस रूप में नहीं थी। आर.एस. शर्मा ने भू-अनुदान अभिलेखों के आधार पर अपना पक्ष रखा। इस बहस ने भारतीय इतिहासलेखन को यूरोपीय प्रतिमानों की यांत्रिक नकल से बचाने में बड़ी भूमिका निभाई।
08सबाल्टर्न, कैम्ब्रिज एवं नवीन प्रवृत्तियाँ Subaltern, Cambridge and New Trends
1970 के दशक के बाद प्रश्न फिर बदला — इतिहास में किसकी आवाज़ दर्ज है? यदि स्रोत स्वयं अभिजन ने लिखे हैं, तो किसान, आदिवासी, दलित और स्त्री का इतिहास कैसे लिखा जाए?
क · कैम्ब्रिज स्कूल The Cambridge School
अनिल सील (The Emergence of Indian Nationalism, 1968), जॉन गैलाघर एवं गॉर्डन जॉनसन ने भारतीय राष्ट्रवाद को आदर्शवादी संघर्ष के बजाय सत्ता एवं संसाधनों की प्रतिस्पर्धा के रूप में देखा — उनके अनुसार अंग्रेज़ों द्वारा दी गई सीमित प्रतिनिधित्व-सुविधाओं ने भारतीय अभिजनों में गुटबंदी पैदा की और यही राष्ट्रवाद का रूप ले गई। इस दृष्टि की तीखी आलोचना हुई, क्योंकि यह जनांदोलनों, त्याग एवं विचारधारा को लगभग शून्य कर देती है। बिपन चन्द्र ने इसे "औपनिवेशिक तर्क का परिष्कृत रूप" कहा।
ख · सबाल्टर्न अध्ययन Subaltern Studies
रणजीत गुहा के संपादन में 1982 से Subaltern Studies शृंखला आरंभ हुई। 'सबाल्टर्न' शब्द इतालवी चिंतक अंतोनियो ग्राम्शी से लिया गया है, जिसका अर्थ है — वर्ग, जाति, लिंग, आयु या पद के आधार पर अधीनस्थ जन। गुहा का केन्द्रीय तर्क यह था कि भारतीय इतिहासलेखन — औपनिवेशिक, राष्ट्रवादी और यहाँ तक कि कुछ हद तक मार्क्सवादी भी — अभिजनवादी रहा है, और उसमें जनता केवल नेतृत्व का अनुसरण करने वाली भीड़ के रूप में दिखती है।
अपनी कृति Elementary Aspects of Peasant Insurgency in Colonial India (1983) में गुहा ने दिखाया कि किसान विद्रोहों की अपनी स्वायत्त चेतना, प्रतीक एवं तर्क थी। परवर्ती विद्वानों — पार्थ चटर्जी, ज्ञानेन्द्र पाण्डेय, शाहिद अमीन (Event, Metaphor, Memory — चौरी-चौरा), दीपेश चक्रवर्ती, डेविड हार्डिमन — ने इसे विस्तार दिया। गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक के प्रसिद्ध निबंध Can the Subaltern Speak? ने भीतर से ही यह प्रश्न उठाया कि अभिजन-निर्मित स्रोतों से अधीनस्थ की "अपनी" आवाज़ निकालना कहाँ तक संभव है।
ग · नवीन क्षेत्र एवं प्रवृत्तियाँ Emerging Fields
स्त्री एवं जेंडर इतिहास
- उमा चक्रवर्ती — ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की अवधारणा।
- कुमकुम रॉय, तनिका सरकार, निवेदिता मेनन।
- स्त्री को "विषय" से हटाकर कर्ता के रूप में देखना।
पर्यावरण इतिहास
- माधव गाडगिल एवं रामचन्द्र गुहा — This Fissured Land।
- वन-नीति, संसाधन-नियंत्रण एवं जनजातीय अधिकार।
- महेश रंगराजन — वन्यजीव एवं औपनिवेशिक वन-प्रशासन।
दलित एवं मौखिक इतिहास
- आंबेडकर की व्याख्या-परंपरा; जाति को इतिहास का केन्द्रीय प्रश्न बनाना।
- मौखिक इतिहास — साक्षात्कार, स्मृति एवं लोकगाथा से साक्ष्य।
- विभाजन एवं आपातकाल के अध्ययन में विशेष उपयोगी।
इसी दौर में फ़्रांसीसी अन्नाल्स स्कूल (मार्क ब्लॉक, ल्यूसिएँ फ़ेब्रे, फ़र्नां ब्रॉदेल) का प्रभाव भारत तक पहुँचा — घटना-प्रधान इतिहास के बजाय दीर्घ अवधि (longue durée), भूगोल, जलवायु और सामूहिक मानसिकता पर बल। साथ ही सांस्कृतिक इतिहास, विज्ञान एवं चिकित्सा का इतिहास, तथा अंकीय-मात्रात्मक पद्धतियाँ भी भारतीय शोध में स्थान बनाती गईं।
| धारा | केन्द्रीय प्रश्न | प्रतिनिधि नाम |
|---|---|---|
| औपनिवेशिक | भारत पर शासन कैसे उचित ठहराया जाए? | जेम्स मिल, विन्सेंट स्मिथ |
| राष्ट्रवादी | भारत का गौरवशाली अतीत क्या था? | जायसवाल, मजूमदार, अल्तेकर |
| मार्क्सवादी | उत्पादन-संबंध एवं वर्ग-संरचना क्या थी? | कोसंबी, आर.एस. शर्मा, हबीब |
| कैम्ब्रिज | सत्ता एवं संसाधन के लिए प्रतिस्पर्धा कैसी थी? | अनिल सील, गैलाघर |
| सबाल्टर्न | अधीनस्थ जन की स्वायत्त चेतना क्या थी? | रणजीत गुहा, पार्थ चटर्जी |
| जेंडर एवं पर्यावरण | स्त्री, जाति एवं प्रकृति इतिहास में कहाँ हैं? | उमा चक्रवर्ती, रामचन्द्र गुहा |
09इतिहास की शोध-पद्धति एवं वस्तुनिष्ठता Method and Objectivity
इतिहास प्रयोगशाला में दोहराया नहीं जा सकता। इसलिए उसकी विश्वसनीयता प्रयोग पर नहीं, साक्ष्य के अनुशासित परीक्षण पर टिकी है।
क · शोध के चरण Stages of Research
बाह्य आलोचना यह जाँचती है कि दस्तावेज़ असली है या नहीं — लिपि, भाषा, स्याही, धातु, तिथि एवं शैली का परीक्षण; जालसाज़ी वाले ताम्रपत्र इसी स्तर पर पकड़े जाते हैं। आंतरिक आलोचना यह जाँचती है कि असली दस्तावेज़ जो कह रहा है, वह सच है या नहीं — लेखक कौन था, वह घटनास्थल पर था या नहीं, उसका हित किसमें था, और अन्य स्वतंत्र स्रोत क्या कहते हैं। यही कारण है कि किसी प्रशस्ति को "प्रामाणिक" मानते हुए भी उसकी हर विजय को "सत्य" नहीं मान लिया जाता।
ख · वस्तुनिष्ठता की समस्या The Problem of Objectivity
प्रत्यक्षवादी परंपरा मानती थी कि इतिहासकार तथ्यों का निष्पक्ष संग्रहकर्ता है। किन्तु व्यवहार में इतिहासकार को चयन करना ही पड़ता है — कौन-सी घटना महत्वपूर्ण है, यह निर्णय स्वयं एक मूल्य-निर्णय है। ई.एच. कार ने इसीलिए कहा कि तथ्य मछली की तरह हैं और इतिहासकार मछुआरा — वह कहाँ जाल डालता है, यही तय करता है कि उसे क्या मिलेगा।
इसका निष्कर्ष यह नहीं कि इतिहास मनमाना है। पूर्ण वस्तुनिष्ठता असंभव हो सकती है, पर निष्पक्षता, पारदर्शिता एवं साक्ष्य के प्रति उत्तरदायित्व अनिवार्य हैं। इतिहासकार को अपना दृष्टिकोण छिपाना नहीं, स्पष्ट करना चाहिए, और अपने निष्कर्ष को खंडन-योग्य रूप में प्रस्तुत करना चाहिए।
ग · कालविभाजन एवं अंतर्विषयकता Periodisation and Interdisciplinarity
कालविभाजन की बहस
- मिल का धर्म-आधारित त्रिविभाजन आज अस्वीकार्य।
- प्राचीन/मध्यकालीन/आधुनिक — यूरोपीय अनुभव से लिया ढाँचा।
- रोमिला थापर एवं अन्य — विभाजन का आधार सामाजिक-आर्थिक संरचना हो, धर्म या राजवंश नहीं।
- कोई भी विभाजन सुविधा है, सत्य नहीं — सीमाएँ सदा धुँधली रहती हैं।
सहायक अनुशासन
- पुरातत्त्व एवं पुरालेखशास्त्र — भौतिक एवं लिखित साक्ष्य।
- मुद्राशास्त्र — कालक्रम एवं अर्थव्यवस्था।
- भाषाविज्ञान — प्रवास एवं संपर्क के प्रमाण।
- नृविज्ञान एवं समाजशास्त्र — जीवित परंपरा से अतीत की व्याख्या।
- विज्ञान — कार्बन-14, तापदीप्ति, डी.एन.ए. एवं पुरा-वनस्पति विश्लेषण।
- बाह्य आलोचना = दस्तावेज़ की प्रामाणिकता; आंतरिक आलोचना = कथन की विश्वसनीयता।
- प्राथमिक स्रोत — समकालीन एवं प्रत्यक्ष (अभिलेख, सिक्के, दस्तावेज़); द्वितीयक स्रोत — बाद का विश्लेषण (शोध-ग्रंथ, पाठ्यपुस्तक)।
- इतिहास में पुनरावृत्ति एवं प्रयोग संभव नहीं, इसलिए वह प्राकृतिक विज्ञान से भिन्न है।
- अंतर्विषयकता आधुनिक इतिहासलेखन की सबसे बड़ी पद्धतिगत उपलब्धि है — इसका सर्वोत्तम भारतीय उदाहरण डी.डी. कोसंबी हैं।
10शब्दावली Glossary — Tap to Reveal
11पिछले वर्षों के प्रश्न Previous Year Questions
NTA NET · SET · इतिहास
- 'सबाल्टर्न स्टडीज़' शृंखला के संस्थापक संपादक कौन थे? NET (अ) पार्थ चटर्जी · (ब) रणजीत गुहा · (स) दीपेश चक्रवर्ती · (द) ज्ञानेन्द्र पाण्डेय उत्तर: (ब) रणजीत गुहा
- "इतिहास इतिहासकार और उसके तथ्यों के बीच अनवरत संवाद है" — यह कथन किसका है? NET (अ) कॉलिंगवुड · (ब) रांके · (स) ई.एच. कार · (द) क्रोचे उत्तर: (स) ई.एच. कार
- An Introduction to the Study of Indian History के लेखक कौन हैं? NET (अ) आर.एस. शर्मा · (ब) डी.डी. कोसंबी · (स) रोमिला थापर · (द) इरफ़ान हबीब उत्तर: (ब) डी.डी. कोसंबी
UPSC · संघ लोक सेवा आयोग
- भारतीय इतिहास को हिन्दू, मुस्लिम एवं ब्रिटिश कालों में विभाजित करने वाला इतिहासकार कौन था? UPSC (अ) विन्सेंट स्मिथ · (ब) जेम्स मिल · (स) मैक्स मूलर · (द) विलियम जोन्स उत्तर: (ब) जेम्स मिल
- एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल की स्थापना किसने और कब की? UPSC (अ) विलियम जोन्स, 1784 · (ब) कोलब्रुक, 1794 · (स) प्रिंसेप, 1837 · (द) कनिंघम, 1861 उत्तर: (अ) विलियम जोन्स, 1784
CGPSC · MPPSC · UPPSC
- 'राजतरंगिणी' के रचयिता एवं उसकी तरंगों की संख्या क्रमशः क्या है? CGPSC (अ) बिल्हण, 6 · (ब) कल्हण, 8 · (स) जोनराज, 8 · (द) बाणभट्ट, 7 उत्तर: (ब) कल्हण, 8 तरंग
- 'फ़तवा-ए-जहाँदारी' के लेखक कौन थे? UPPSC (अ) अमीर ख़ुसरो · (ब) मिन्हाज-उस-सिराज · (स) ज़ियाउद्दीन बरनी · (द) अबुल फ़ज़ल उत्तर: (स) ज़ियाउद्दीन बरनी
- Hindu Polity के लेखक कौन हैं? MPPSC (अ) के.पी. जायसवाल · (ब) आर.सी. मजूमदार · (स) ए.एस. अल्तेकर · (द) एच.सी. रायचौधरी उत्तर: (अ) के.पी. जायसवाल