मौर्योत्तर भारत Post-Mauryan India — Shungas, Satavahanas and Kushanas
मौर्य साम्राज्य के बिखरने से गुप्त उदय तक के लगभग पाँच सौ वर्ष। राजनीतिक दृष्टि से यह विखंडन का युग है — पर आर्थिक, धार्मिक एवं कलात्मक दृष्टि से प्राचीन भारत का सर्वाधिक जीवंत काल: रोम तक फैला व्यापार, महायान का जन्म, और पहली बार पत्थर में उतरी बुद्ध की मूर्ति।
इस पृष्ठ में
- 01पृष्ठभूमि — मौर्य पतन के बाद का परिदृश्य
- 02शुंग वंश
- 03कण्व वंश एवं कलिंग का खारवेल
- 04हिन्द-यवन (बैक्ट्रियाई यूनानी)
- 05शक क्षत्रप एवं पह्लव
- 06कुषाण वंश एवं कनिष्क
- 07सातवाहन वंश
- 08दक्षिण भारत — संगम युग के राज्य
- 09अर्थव्यवस्था, व्यापार एवं मुद्रा
- 10समाज एवं धार्मिक विकास
- 11कला, स्थापत्य एवं विज्ञान
- 12स्वयं जाँच
01पृष्ठभूमि — मौर्य पतन के बाद का परिदृश्य The Post-Mauryan Landscape
मौर्य साम्राज्य के बाद भारत में कोई एक सर्वभारतीय सत्ता नहीं रही — पर यह मानना भूल होगी कि यह "अंधकार युग" था। सत्ता बिखरी, पर समृद्धि केन्द्रित नहीं रही — वह अनेक क्षेत्रीय केन्द्रों में फैल गई, और यही इस युग की विशेषता है।
क · चार समानांतर धाराएँ Four Parallel Streams
उत्तर भारत
- मगध में देशी वंश — शुंग (185–73 ई.पू.) एवं कण्व (73–28 ई.पू.)।
- मथुरा, अयोध्या, कौशाम्बी, पांचाल में स्थानीय "मित्र" राजवंश — सिक्कों से ज्ञात।
- उत्तर-पश्चिम से क्रमशः आक्रमण — यवन, शक, पह्लव, कुषाण।
- परिणाम — उत्तर-पश्चिम भारत मध्य एशिया की राजनीति से जुड़ गया।
दक्षिण एवं पश्चिम
- दक्कन में सातवाहन — प्रथम बड़ा दक्षिणी साम्राज्य।
- कलिंग में चेदि (महामेघवाहन) वंश — खारवेल।
- सुदूर दक्षिण में चेर, चोल एवं पाण्ड्य — संगम युग।
- पश्चिमी तट के बंदरगाहों से रोम-व्यापार का उत्कर्ष।
- अभिलेख — खारवेल का हाथीगुम्फा, रुद्रदामन का जूनागढ़, गौतमी बलश्री का नासिक, हेलियोडोरस का बेसनगर स्तंभ, कनिष्क का रबातक।
- सिक्के — इस युग का सर्वाधिक भरोसेमंद स्रोत; हिन्द-यवन एवं कुषाण सिक्कों पर राजा का नाम, तिथि एवं चित्र मिलता है।
- विदेशी विवरण — पेरिप्लस ऑफ़ द एरिथ्रियन सी (लगभग 60–80 ई.), प्लिनी की "नेचुरल हिस्ट्री", टॉलेमी का भूगोल।
- साहित्य — पतंजलि का महाभाष्य, मिलिन्दपन्हो, गाथासत्तसई, संगम साहित्य, दिव्यावदान।
02शुंग वंश The Shunga Dynasty, 185–73 BCE
मौर्यों के बाद मगध की गद्दी उनके ही सेनापति के हाथ आई — पुष्यमित्र शुंग, जिसने लगभग 185 ई.पू. में अंतिम मौर्य शासक बृहद्रथ की हत्या कर सत्ता ग्रहण की। राजधानी पाटलिपुत्र रही, पर विदिशा एक प्रमुख केन्द्र बनी।
| शासक / प्रसंग | काल (लगभग) | प्रमुख तथ्य |
|---|---|---|
| पुष्यमित्र शुंग | 185–149 ई.पू. | वंश-संस्थापक; यवन आक्रमण का प्रतिरोध; दो अश्वमेध यज्ञ (अयोध्या के धनदेव अभिलेख से पुष्टि)। ब्राह्मण धर्म का पुनरुत्थान। |
| अग्निमित्र | 149–141 ई.पू. | कालिदास के नाटक मालविकाग्निमित्रम् का नायक — इसी से शुंग-विदर्भ संबंधों की सूचना। |
| भागभद्र (भागवत) | लगभग द्वितीय-प्रथम सदी ई.पू. | इनके दरबार में यवन राजदूत हेलियोडोरस आया — बेसनगर (विदिशा) का गरुड़ स्तंभ। |
| देवभूति (देवभूमि) | अंतिम शासक, 73 ई.पू. तक | अपने ही अमात्य वासुदेव कण्व द्वारा मारा गया — कण्व वंश की स्थापना। |
| पतंजलि | लगभग 150 ई.पू. | महाभाष्य के रचयिता; परंपरा उन्हें पुष्यमित्र का पुरोहित बताती है। ग्रंथ से तत्कालीन समाज एवं यवन-सम्पर्क की सूचना। |
तालिका दाएँ-बाएँ स्क्रॉल की जा सकती है।
- बौद्ध ग्रंथ दिव्यावदान पुष्यमित्र को बौद्ध-विरोधी उत्पीड़क बताता है — विहार तोड़ने एवं पुरस्कार घोषित करने की कथा।
- किन्तु पुरातत्त्व दूसरी बात कहता है — भरहुत स्तूप की वेदिका एवं साँची की वेदिका का निर्माण-विस्तार शुंग काल में ही हुआ, और वह भी बौद्ध स्थलों पर।
- इसलिए आधुनिक इतिहासकार दिव्यावदान के विवरण को अतिरंजित मानते हैं — शुंगों ने वैदिक यज्ञ-परंपरा को पुनर्जीवित किया, पर व्यापक धार्मिक उत्पीड़न के प्रमाण नहीं।
- परीक्षा में यही संतुलित निष्कर्ष लिखें — "साहित्यिक साक्ष्य एवं पुरातात्त्विक साक्ष्य में विरोध है।"
03कण्व वंश एवं कलिंग का खारवेल The Kanvas and Kharavela of Kalinga
क · कण्व वंश (73–28 ई.पू.) The Kanvas
संस्थापक वासुदेव कण्व — जो शुंगों का ही अमात्य था। यह वंश ब्राह्मण था और लगभग 45 वर्ष तक मगध पर शासन किया। अंतिम शासक सुशर्मा था। परंपरा एवं पुराणों के अनुसार कण्वों का अंत आंध्र-सातवाहनों द्वारा हुआ — इसी से मगध की केन्द्रीय भूमिका समाप्त हो जाती है और राजनीतिक गुरुत्व दक्कन एवं उत्तर-पश्चिम की ओर खिसक जाता है।
ख · कलिंग — खारवेल Kharavela of Kalinga
अशोक के बाद उजड़ी कलिंग ने प्रथम सदी ई.पू. में चेदि (महामेघवाहन) वंश के अधीन पुनः शक्ति पाई। इसका सबसे प्रसिद्ध शासक खारवेल था।
- स्थान — उदयगिरि पहाड़ी (भुवनेश्वर के निकट); भाषा प्राकृत, लिपि ब्राह्मी।
- खारवेल जैन धर्म का अनुयायी; अभिलेख उसके शासन-वर्षों का क्रमवार वृत्तांत देता है।
- इसमें मगध पर आक्रमण तथा नंद-कालीन जिन-प्रतिमा को वापस लाने का उल्लेख — नंद वंश के लिए भी यह प्रमुख साक्ष्य है।
- सार्वजनिक कार्य — नहर-मरम्मत एवं राजधानी कलिंगनगर का पुनर्निर्माण; उदयगिरि-खंडगिरि की जैन गुफाएँ इसी काल की।
04हिन्द-यवन (बैक्ट्रियाई यूनानी) The Indo-Greeks
मौर्य पतन के बाद उत्तर-पश्चिम में प्रवेश करने वाले पहले विदेशी बैक्ट्रिया के यूनानी थे। राजनीतिक दृष्टि से वे अल्पजीवी रहे, पर भारतीय इतिहास में उनका योगदान असाधारण है — मुद्रा-शास्त्र।
| शासक / प्रसंग | काल (लगभग) | तथ्य |
|---|---|---|
| डेमेट्रियस प्रथम | द्वितीय सदी ई.पू. आरंभ | भारत पर आक्रमण करने वाला प्रथम प्रमुख बैक्ट्रियाई शासक। |
| मिनांडर (मिलिन्द) | लगभग 165–145 ई.पू. | सर्वाधिक प्रसिद्ध हिन्द-यवन शासक; राजधानी शाकल (सियालकोट)। बौद्ध भिक्षु नागसेन से संवाद — मिलिन्दपन्हो; बौद्ध धर्म अपनाया। |
| एंटियालकीडस | लगभग द्वितीय-प्रथम सदी ई.पू. | तक्षशिला का शासक; इसका राजदूत हेलियोडोरस विदिशा गया — वहाँ वासुदेव के सम्मान में गरुड़ स्तंभ स्थापित किया। |
- सिक्कों में क्रांति — भारत में सर्वप्रथम ऐसे सिक्के जिन पर शासक का नाम, उपाधि एवं मुखाकृति अंकित हो। इससे पूर्व के आहत सिक्कों (कार्षापण) पर केवल प्रतीक थे।
- परिणाम — इतिहासकारों को पहली बार तिथि-निश्चित राजवंश-क्रम मिला; इसे "भारतीय मुद्रा-शास्त्र का आरंभ" कहा जाता है।
- बेसनगर स्तंभ — एक यूनानी राजदूत द्वारा वैष्णव देवता को समर्पित — भागवत धर्म का प्राचीनतम अभिलेखीय साक्ष्य एवं सांस्कृतिक समन्वय का प्रमाण।
- कला में हेलेनिस्टिक प्रभाव — जो आगे गांधार शैली में परिपक्व हुआ; ज्योतिष एवं चिकित्सा में भी आदान-प्रदान।
05शक क्षत्रप एवं पह्लव The Shakas and Pahlavas
यवनों के बाद मध्य एशिया से शक (सीथियन) आए और भारत में पाँच शाखाओं में बँटकर बसे। इनमें दो शाखाएँ परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं — क्षहरात एवं पश्चिमी क्षत्रप (कार्दमक)।
| शासक | शाखा / क्षेत्र | तथ्य |
|---|---|---|
| मोअस (मोग) | प्रथम शक शासक · तक्षशिला | भारत में शक सत्ता का संस्थापक; प्रथम सदी ई.पू.। |
| भूमक एवं नहपान | क्षहरात · पश्चिमी भारत | नहपान का विस्तार महाराष्ट्र-गुजरात तक; इसे गौतमीपुत्र सातकर्णि ने पराजित किया। नहपान के सिक्के जोगलथंबी निधि से। |
| चष्टन | कार्दमक · उज्जयिनी | पश्चिमी क्षत्रप वंश का वास्तविक संस्थापक; टॉलेमी ने उल्लेख किया। |
| रुद्रदामन प्रथम | कार्दमक · उज्जयिनी | सर्वाधिक प्रसिद्ध शक शासक; जूनागढ़ (गिरनार) अभिलेख, 150 ई. — सुदर्शन झील की मरम्मत; संस्कृत का प्रथम विस्तृत अभिलेख। |
| गोंडोफर्नीस | पह्लव (पार्थियन) · उत्तर-पश्चिम | तख़्त-ए-बाही अभिलेख; परंपरा के अनुसार इसी के काल में संत थॉमस भारत आए। |
- जूनागढ़ अभिलेख (150 ई.) — शुद्ध संस्कृत में लिखा प्रथम विस्तृत अभिलेख; इससे पूर्व अभिलेख प्रायः प्राकृत में थे। सुदर्शन झील मूलतः चन्द्रगुप्त मौर्य के काल में बनी, अशोक के काल में नहर जुड़ी, रुद्रदामन ने बाढ़ के बाद मरम्मत कराई — तीन युगों की निरंतरता एक ही अभिलेख में।
- शक संवत् (78 ई.) — भारत का राष्ट्रीय शक संवत्; इसका आरंभ प्रायः कनिष्क के राज्यारोहण से जोड़ा जाता है। इसकी तुलना में विक्रम संवत् (58 ई.पू.) उज्जयिनी से संबद्ध है।
- शक-सातवाहन संघर्ष इस युग की धुरी है — पश्चिमी भारत के बंदरगाह एवं व्यापार-मार्गों पर नियंत्रण का प्रश्न।
06कुषाण वंश एवं कनिष्क The Kushanas and Kanishka
कुषाण मध्य एशिया की यूची (Yuezhi) जनजाति की एक शाखा थे। इनका ऐतिहासिक महत्त्व यह है कि इन्होंने पहली बार मध्य एशिया, अफ़ग़ानिस्तान एवं उत्तर भारत को एक राजनीतिक छत के नीचे लाकर रेशम मार्ग पर नियंत्रण स्थापित किया।
| शासक | काल (लगभग) | प्रमुख तथ्य |
|---|---|---|
| कुजुल कडफ़िसेस | प्रथम सदी ई. | वंश-संस्थापक; ताँबे के सिक्के। |
| विम कडफ़िसेस | प्रथम सदी ई. उत्तरार्ध | भारत में स्वर्ण सिक्कों का व्यापक प्रचलन आरंभ; सिक्कों पर शिव एवं नंदी तथा "महेश्वर" अंकन — शैव झुकाव। |
| कनिष्क | 78–101 ई. (लगभग) | महानतम कुषाण; राजधानी पुरुषपुर (पेशावर), द्वितीय केन्द्र मथुरा। शक संवत् (78 ई.) का आरंभ इससे जोड़ा जाता है। |
| हुविष्क | द्वितीय सदी ई. | मथुरा में निर्माण-कार्य; कला-संरक्षण की निरंतरता। |
| वासुदेव प्रथम | द्वितीय सदी ई. उत्तरार्ध | अंतिम प्रमुख कुषाण; नाम एवं शिव-अंकन से पूर्ण भारतीयकरण स्पष्ट। इसके बाद वंश का विघटन। |
- चतुर्थ बौद्ध संगीति — कुण्डलवन (कश्मीर); अध्यक्ष वसुमित्र, उपाध्यक्ष अश्वघोष; परिणाम — महाविभाषा शास्त्र तथा हीनयान-महायान विभाजन स्पष्ट।
- दरबारी विद्वान — अश्वघोष (बुद्धचरित), नागार्जुन (शून्यवाद), वसुमित्र, चिकित्सक चरक, तथा यूनानी अभियंता एजेसिलस।
- रबातक अभिलेख (अफ़ग़ानिस्तान) — कुषाण वंशावली एवं साम्राज्य-विस्तार की पुष्टि करने वाला निर्णायक साक्ष्य।
- मत (मथुरा) से कनिष्क की शिरविहीन प्रतिमा — जिस पर उसका नाम अंकित है; कुषाण राजकीय प्रतिमा-परंपरा (देवकुल) का उदाहरण।
- सिक्कों पर बहुदेववादी अंकन — बुद्ध, शिव, ईरानी एवं यूनानी देवता एक साथ; कुषाण उपाधि "देवपुत्र" — दैवी राजत्व की धारणा।
कुषाण स्वर्ण सिक्के शुद्धता एवं संख्या दोनों में उल्लेखनीय हैं और इनके पीछे रोम से आने वाला स्वर्ण एक कारण माना जाता है। इन्हीं सिक्कों की परंपरा आगे गुप्तकालीन स्वर्ण मुद्राओं का आधार बनी।
07सातवाहन वंश The Satavahanas
सातवाहन (पुराणों में "आंध्र") दक्षिण भारत का प्रथम विशाल एवं दीर्घजीवी साम्राज्य थे। इनका महत्त्व केवल राजनीतिक नहीं — इन्होंने वह प्रशासनिक एवं धार्मिक प्रयोग किए जो आगे पूरे भारत की परंपरा बन गए।
| शासक | काल (लगभग) | तथ्य |
|---|---|---|
| सिमुक | प्रथम सदी ई.पू. | वंश-संस्थापक; राजधानी प्रतिष्ठान (पैठण), गोदावरी तट। |
| सातकर्णि प्रथम | — | अश्वमेध यज्ञ; नानाघाट अभिलेख (रानी नयनिका द्वारा) से सूचना। |
| हाल | प्रथम सदी ई. | गाथासत्तसई (गाथा सप्तशती) — महाराष्ट्री प्राकृत का प्रेम-काव्य संकलन; इसी के लिए सर्ववर्मन ने "कातन्त्र" व्याकरण रचा। |
| गौतमीपुत्र सातकर्णि | लगभग 106–130 ई. | वंश का महानतम शासक; शक नहपान को पराजित किया (उसके सिक्कों पर पुनरंकन)। उपाधियाँ — "एकब्राह्मण", "क्षत्रिय-दर्प-मान-मर्दन"। |
| वशिष्ठीपुत्र पुलुमावि | द्वितीय सदी ई. | रुद्रदामन से वैवाहिक संबंध, पर सैन्य पराजय भी — जूनागढ़ अभिलेख में उल्लेख। |
| यज्ञश्री सातकर्णि | द्वितीय सदी ई. उत्तरार्ध | अंतिम महत्वपूर्ण शासक; सिक्कों पर जलपोत (जहाज़) का अंकन — समुद्री व्यापार का प्रमाण। |
- मातृनामांकित नाम — गौतमीपुत्र, वशिष्ठीपुत्र; अर्थात् नाम में माता का गोत्र। पर उत्तराधिकार पितृसत्तात्मक ही था — यह अंतर परीक्षा में पूछा जाता है।
- भूमि-अनुदान की परंपरा — ब्राह्मणों एवं बौद्ध भिक्षुओं को कर-मुक्त भूमि देने का प्राचीनतम अभिलेखीय साक्ष्य; यही आगे सामंती व्यवस्था का बीज बना।
- भाषा एवं धर्म — राजभाषा प्राकृत, लिपि ब्राह्मी; शासक स्वयं ब्राह्मण-धर्मानुयायी, पर बौद्ध संघों को उदार दान — धार्मिक सहिष्णुता का उदाहरण।
- प्रशासन — राज्य "आहार" में विभाजित; अधिकारी — अमात्य, महाभोज, महारथी, सेनागोप। सिक्के मुख्यतः सीसा (lead) एवं पोटिन के।
08दक्षिण भारत — संगम युग के राज्य The Sangam Age Kingdoms
सुदूर दक्षिण में इस काल के तीन राज्य — चेर, चोल एवं पाण्ड्य — का इतिहास मुख्यतः संगम साहित्य तथा रोमन-यूनानी विवरणों से पुनर्निर्मित होता है।
| राज्य | राजधानी / बंदरगाह | प्रमुख शासक एवं तथ्य |
|---|---|---|
| चोल | उरैयूर · कावेरीपट्टिनम् (पुहार) | करिकाल — वेण्णि युद्ध का विजेता; कावेरी पर बाँध एवं पुहार बंदरगाह का विकास। प्रतीक — बाघ। |
| चेर | वंजि · मुजिरिस एवं तोंडी | शेनगुट्टुवन — "लाल चेर"; पत्तिनी (कण्णगी) पूजा का प्रवर्तन। रोम-व्यापार का प्रमुख केन्द्र; प्रतीक — धनुष। |
| पाण्ड्य | मदुरै · कोरकई | नेडुनजेलियन; संगम-सभाओं का संरक्षक। मोती-व्यापार प्रसिद्ध; प्रतीक — मछली। |
इन राज्यों का शासन-ढाँचा उत्तर की तुलना में सरल था, पर समुद्री व्यापार में ये सबसे आगे थे। तमिल क्षेत्र के अरिकामेडु (पुदुच्चेरी के निकट) से मिली रोमन एरेटाइन मृद्भांड, दीपक एवं काँच की वस्तुएँ इस व्यापार का प्रत्यक्ष पुरातात्त्विक प्रमाण हैं। दक्षिण भारत से रोमन सिक्कों की बड़ी निधियाँ भी मिली हैं।
09अर्थव्यवस्था, व्यापार एवं मुद्रा Economy, Trade and Coinage
यही इस युग की सबसे बड़ी कहानी है। राजनीतिक विखंडन के बावजूद — या कुछ हद तक उसी के कारण — भारत का व्यापार अपने प्राचीन शिखर पर पहुँचा। पश्चिम में रोम, उत्तर में रेशम मार्ग, पूर्व में दक्षिण-पूर्व एशिया।
रोम-व्यापार
- प्रमुख स्रोत — पेरिप्लस ऑफ़ द एरिथ्रियन सी (अज्ञात यूनानी नाविक, लगभग 60–80 ई.) एवं प्लिनी।
- पश्चिमी बंदरगाह — भृगुकच्छ (बेरीगाज़ा/भरूच), सोपारा, कल्याण; दक्षिण में मुजिरिस, अरिकामेडु; पूर्व में ताम्रलिप्ति।
- निर्यात — मसाले (काली मिर्च), वस्त्र, मलमल, मोती, रत्न, हाथीदाँत, नील।
- आयात — स्वर्ण एवं रजत मुद्राएँ, शराब, काँच, ज़ैतून तेल, दास।
- प्लिनी की शिकायत — भारत रोम के लिए "स्वर्ण का निगलने वाला" है; व्यापार-संतुलन भारत के पक्ष में।
- मानसूनी पवनों के ज्ञान (हिप्पालस) ने सीधी समुद्री यात्रा संभव बनाई।
आंतरिक अर्थव्यवस्था
- श्रेणी (गिल्ड) संस्थाओं का चरम — शिल्पी एवं व्यापारी संघ; ये बैंक जैसा कार्य भी करते थे (निक्षेप एवं ब्याज)।
- अभिलेखों में श्रेणियों द्वारा स्तूप-गुफ़ा को दान — नासिक, कार्ले, साँची में दानदाताओं में शिल्पी-व्यापारी प्रमुख।
- शिल्प-विशेषज्ञता — मथुरा (वस्त्र), उज्जयिनी, वाराणसी; लगभग तीन दर्जन शिल्पों का उल्लेख।
- मुद्रा — कुषाण स्वर्ण दीनार, सातवाहन सीसा-पोटिन, शक-क्षत्रप रजत; धातु-मुद्रा का व्यापक प्रचलन।
- नगरीकरण का उत्कर्ष — पेशावर, तक्षशिला, मथुरा, उज्जयिनी, पैठण, अमरावती।
10समाज एवं धार्मिक विकास Society and Religious Developments
क · समाज — विदेशियों का समावेश Assimilation of Foreigners
इस युग की सबसे रोचक सामाजिक प्रक्रिया यह है कि यवन, शक, पह्लव एवं कुषाण — जो वर्ण-व्यवस्था के बाहर थे — क्रमशः भारतीय समाज में समा गए। स्मृति-ग्रंथों ने इन्हें "व्रात्य क्षत्रिय" (पतित क्षत्रिय) की श्रेणी में रखकर वैधता दी, और मनु ने कारीगर-वर्गों तथा संकर जातियों की विस्तृत सूची दी — अर्थात् जाति-व्यवस्था लचीली होकर विस्तृत हुई, टूटी नहीं। मनुस्मृति का संकलन प्रायः इसी काल के आसपास माना जाता है। श्रेणियों के बढ़ते महत्त्व से वैश्य एवं शिल्पी वर्ग की सामाजिक प्रतिष्ठा भी बढ़ी — और यही वर्ग बौद्ध धर्म का सबसे बड़ा संरक्षक बना।
ख · धार्मिक विकास Religious Developments
महायान बौद्ध धर्म का उदय
- चतुर्थ संगीति (कनिष्क) में हीनयान-महायान विभाजन स्पष्ट।
- बुद्ध अब आचार्य नहीं, उपास्य देवता; प्रथम बार मूर्ति-पूजा।
- बोधिसत्व की धारणा — करुणा एवं परोपकार का आदर्श; भक्ति-तत्त्व का प्रवेश।
- भाषा — पालि के स्थान पर संस्कृत; ग्रंथ — बुद्धचरित, ललितविस्तर, माध्यमिककारिका।
- नागार्जुन का शून्यवाद — महायान दर्शन का आधार।
ब्राह्मण एवं अन्य धाराएँ
- भागवत/वैष्णव धर्म — वासुदेव-कृष्ण उपासना; बेसनगर स्तंभ प्राचीनतम अभिलेखीय प्रमाण।
- शैव धर्म — कुषाण सिक्कों पर शिव-नंदी; "महेश्वर" उपाधि।
- अवतारवाद एवं भक्ति का विकास; प्रतिमा-पूजा एवं मंदिर-परंपरा का आरंभ।
- यज्ञ-परंपरा की पुनःस्थापना — शुंग एवं सातवाहन अश्वमेध।
- जैन धर्म — कलिंग में खारवेल तथा मथुरा में संरक्षण।
11कला, स्थापत्य एवं विज्ञान Art, Architecture and Science
कला के इतिहास में यह युग निर्णायक है — इसी में बुद्ध की प्रथम मानव-प्रतिमाएँ बनीं। इससे पूर्व मौर्य-शुंग कला में बुद्ध केवल प्रतीकों (चरण-चिह्न, बोधिवृक्ष, चक्र, स्तूप) से दर्शाए जाते थे।
| शैली | संरक्षक · सामग्री | विशेषताएँ |
|---|---|---|
| गांधार | कुषाण · धूसर बलुआ पत्थर (schist) | यूनानी-रोमन प्रभाव — "ग्रीको-बौद्ध"। यथार्थवादी शरीर-रचना, लहरदार केश, तहदार पारदर्शी वस्त्र। केन्द्र — तक्षशिला, पुरुषपुर, जलालाबाद। |
| मथुरा | कुषाण · लाल चित्तीदार बलुआ पत्थर | पूर्णतः देशी शैली; भारी-सुगठित देह, पारदर्शी नहीं वस्त्र, मुखमंडल पर प्रसन्नता। यहाँ बुद्ध के साथ जैन तीर्थंकर, यक्ष-यक्षी एवं राजकीय प्रतिमाएँ भी। |
| अमरावती | सातवाहन · श्वेत संगमरमर (चूना-पत्थर) | कथात्मक उत्कीर्णन (narrative panels) में सर्वोच्च; भाव-प्रवण एवं गतिमान आकृतियाँ। केन्द्र — अमरावती, नागार्जुनकोंडा, जग्गयपेट। |
स्थापत्य
- स्तूप — भरहुत (शुंग वेदिका, जातक-दृश्य), साँची (तोरण-द्वार सातवाहन काल में), अमरावती, नागार्जुनकोंडा।
- शैलकृत गुफाएँ — कार्ले का विशालतम चैत्य, भाजा, बेडसा, नासिक, कान्हेरी; अजंता की आरंभिक गुफाएँ (9 एवं 10) सातवाहन काल की।
- दो प्रकार — चैत्य (पूजा-गृह, स्तूप सहित) एवं विहार (भिक्षु-निवास)।
- जैन गुफाएँ — उदयगिरि-खंडगिरि (खारवेल); मथुरा में आयागपट्ट।
विज्ञान एवं साहित्य
- चरक — चरक संहिता; कनिष्क के दरबारी चिकित्सक माने जाते हैं (काय-चिकित्सा)।
- पतंजलि — महाभाष्य (व्याकरण); शुंग काल।
- अश्वघोष — बुद्धचरित, सौन्दरानन्द; नागार्जुन — माध्यमिककारिका।
- हाल — गाथासत्तसई; मिलिन्दपन्हो — पालि संवाद-ग्रंथ।
- ज्योतिष एवं चिकित्सा में यूनानी-भारतीय आदान-प्रदान; "होरा" जैसे शब्द इसी सम्पर्क के अवशेष।
- मौर्योत्तर काल को "अंधकार युग" कहना भ्रामक है — राजनीतिक एकता टूटी, पर व्यापार, नगर, कला एवं धर्म तीनों में यह उत्कर्ष का काल था।
- तीन कला-शैलियों की सामग्री याद रखें — गांधार धूसर, मथुरा लाल चित्तीदार, अमरावती श्वेत।
- इस युग की देन आगे गुप्तकाल को मिली — स्वर्ण मुद्रा-परंपरा (कुषाण), संस्कृत अभिलेख-परंपरा (रुद्रदामन), भूमि-अनुदान (सातवाहन) एवं प्रतिमा-कला (मथुरा)।