फ्रांसीसी क्रांति एवं नेपोलियन युग (1789–1815)
प्रमुख विषय-वस्तु
जन-संप्रभुता (Popular Sovereignty), सामंती विशेषाधिकारों का अंत, धर्मनिरपेक्ष नागरिकता, क्रांतिकारी युद्ध, तथा पूरे यूरोप में उदारवाद व राष्ट्रवाद का प्रसार।
मुख्य शब्दावली
प्राचीन व्यवस्था (Ancien Régime) · एस्टेट्स · सौं-कुलॉत (Sans-culottes) · जैकोबिन बनाम जिरोंदिस्त · थर्मिडोर · जनमत-संग्रह (Plebiscite) · कॉन्कोर्डेट · महाद्वीपीय व्यवस्था।
परीक्षा में महत्त्व क्यों?
क्लासिक कारण–घटनाक्रम–परिणाम अध्याय; मुख्य परीक्षा में 1789 को राष्ट्रवाद, नेपोलियन की विरासत तथा अमेरिकी व रूसी क्रांतियों से तुलना के प्रश्न बार-बार पूछे जाते हैं।
❧1. कारण: 1789 की क्रांति फ्रांस में ही क्यों?
सामाजिक कारण — एस्टेट व्यवस्था
- प्रथम एस्टेट (पादरी वर्ग, ~0.5%) और द्वितीय एस्टेट (कुलीन वर्ग, ~1.5%) के पास लगभग 40% भूमि थी, फिर भी वे प्रत्यक्ष करों से प्रायः मुक्त थे।
- तृतीय एस्टेट (~97%) — बुर्जुआ (मध्यम वर्ग), नगरीय श्रमिक और किसान — पर टाइल (भूमि कर), गैबेल (नमक कर), धार्मिक कर (Tithe) और सामंती बेगार (Corvée) का बोझ था।
- अब्बे सिये की पुस्तिका "तृतीय एस्टेट क्या है?" (जनवरी 1789) का उत्तर था — "सब कुछ"; यही बुर्जुआ चुनौती का वैचारिक घोषणापत्र बनी।
आर्थिक एवं वित्तीय कारण
- सप्तवर्षीय युद्ध (1756–63) तथा अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम (1776–83) में महँगे हस्तक्षेप से राजकोष दिवालिया — राज्य की लगभग आधी आय ऋण चुकाने में जाती थी।
- सुधारवादी वित्त मंत्री — तुर्गो, नेकर, कैलोन — असफल रहे, क्योंकि विशेषाधिकार-प्राप्त वर्गों ने कुलीनों पर कराधान रोक दिया (Assembly of Notables, 1787)।
- 1788 की फसल-विफलता से 1789 के मध्य तक रोटी के दाम दोगुने — अभिजात्य संवैधानिक संकट और जन-भूख एक हो गए।
बौद्धिक कारण — प्रबोधन (Enlightenment)
- मॉन्टेस्क्यू (विधि की आत्मा, 1748) — शक्ति-पृथक्करण; वॉल्तेयर — चर्च-विरोधी तर्कवाद; रूसो (सामाजिक संविदा, 1762) — जन-संप्रभुता एवं "सामान्य इच्छा" (General Will)।
- दार्शनिकों ने क्रांति "उत्पन्न" नहीं की, किंतु पुरानी व्यवस्था के चरमराते ही उन्होंने उसे वैधता देने वाली भाषा प्रदान की।
राजनीतिक तात्कालिक कारण
- लुई सोलहवें ने एस्टेट्स-जनरल (5 मई 1789) बुलाई; "वर्ग के अनुसार बनाम व्यक्ति के अनुसार मतदान" पर गतिरोध के चलते तृतीय एस्टेट ने स्वयं को राष्ट्रीय सभा (17 जून 1789) घोषित किया और टेनिस कोर्ट की शपथ (20 जून 1789) ली।
❧2. क्रांति के चरण (1789–1799)
चरण I — उदारवादी / संवैधानिक राजतंत्र (1789–92)
- 4 अगस्त 1789: अगस्त अध्यादेशों द्वारा सामंती विशेषाधिकार समाप्त; 26 अगस्त 1789: मानव एवं नागरिक अधिकारों की घोषणा (स्वतंत्रता, संपत्ति, सुरक्षा, अत्याचार का प्रतिरोध)।
- पादरी वर्ग का नागरिक संविधान (1790) — चर्च को राज्य के अधीन किया; धर्मनिष्ठ कैथोलिक विमुख हुए और राष्ट्र विभाजित हुआ।
- वारेन की भगदड़ (जून 1791) ने राजा पर से विश्वास समाप्त कर दिया; 1791 के संविधान ने सक्रिय/निष्क्रिय नागरिकता के साथ संवैधानिक राजतंत्र स्थापित किया।
चरण II — उग्र गणतंत्र एवं आतंक का शासन (1792–94)
- ऑस्ट्रिया–प्रशा से युद्ध (अप्रैल 1792); ट्यूलरीज़ महल पर धावा (10 अगस्त 1792); 21–22 सितंबर 1792 को गणतंत्र की घोषणा।
- लुई सोलहवें को गिलोटिन 21 जनवरी 1793; जैकोबिनों (माउंटेन) ने जिरोंदिस्तों का सफाया किया (जून 1793)।
- आतंक का शासन (सितंबर 1793 – जुलाई 1794): रोबस्पियर के नेतृत्व में लोक सुरक्षा समिति (Committee of Public Safety); संदिग्धों का कानून; लगभग 17,000 आधिकारिक मृत्युदंड; लेवी ऑन मास (अगस्त 1793) — पहली आधुनिक सामूहिक सैन्य भर्ती; गणतांत्रिक कैलेंडर व "परम सत्ता का पंथ"।
- थर्मिडोरियन प्रतिक्रिया (27–28 जुलाई 1794): रोबस्पियर को फाँसी; आतंक का अंत।
चरण III — डायरेक्टरी शासन (1795–99)
- तृतीय वर्ष का संविधान: पाँच-सदस्यीय डायरेक्टरी + द्विसदनीय विधायिका; संपत्ति-आधारित मताधिकार पुनः लागू।
- भ्रष्टाचार, राजतंत्रवादी व जैकोबिन विद्रोह (सेना की सहायता से दमन — नेपोलियन की "गोलियों की बौछार", अक्टूबर 1795) और मुद्रास्फीति ने शासन को अवैध बना दिया — मार्ग प्रशस्त हुआ 18 ब्रूमेयर के तख्तापलट (9 नवंबर 1799) का।
❧3. नेपोलियन: क्रांति का संरक्षक या विश्वासघाती?
आंतरिक सुदृढ़ीकरण (कॉन्सुलेट एवं साम्राज्य)
- पोप से कॉन्कोर्डेट समझौता (1801) — चर्च की भूमि लौटाए बिना धार्मिक विभाजन का उपचार।
- नेपोलियन संहिता (Civil Code, 1804): पुरुषों की कानूनी समानता, सुरक्षित संपत्ति-अधिकार, धर्मनिरपेक्ष विधि — किंतु पितृसत्तात्मक पारिवारिक सत्ता बहाल की और (1802) उपनिवेशों में दासता पुनः लागू की।
- योग्यता-आधारित प्रशासन: प्रीफेक्ट व्यवस्था, बैंक ऑफ फ्रांस (1800), लीसे (सरकारी विद्यालय), लीजन ऑफ ऑनर; 2 दिसंबर 1804 को सम्राट का राज्याभिषेक।
साम्राज्य एवं पतन
- ऑस्टरलिट्ज़ (1805) व जेना (1806) की विजयें; पवित्र रोमन साम्राज्य का विघटन (1806); राइन परिसंघ की स्थापना।
- महाद्वीपीय व्यवस्था (बर्लिन आदेश, 1806) — ब्रिटेन की आर्थिक नाकेबंदी, जिसने अंततः ब्रिटेन से अधिक यूरोप को हानि पहुँचाई।
- प्रायद्वीपीय युद्ध (1808–14) ("स्पेनी नासूर") और रूस अभियान (1812) ने ग्रैंड आर्मी को निचोड़ लिया; लाइपज़िग — राष्ट्रों का युद्ध (1813) में पराजय; 1814 में पदत्याग; "सौ दिनों" का अंत वाटरलू (18 जून 1815) में हुआ।
वियना कांग्रेस (1814–15)
- प्रमुख शिल्पकार: मेटरनिख (ऑस्ट्रिया), कैसलरे (ब्रिटेन), तालेरां (फ्रांस), ज़ार अलेक्जेंडर प्रथम।
- सिद्धांत: वैधता (Legitimacy), क्षतिपूर्ति (Compensation), शक्ति-संतुलन (Balance of Power); "यूरोपीय संगीत-मंडल" (Concert of Europe) की स्थापना — एक रूढ़िवादी व्यवस्था जिसने उदार राष्ट्रवाद को दबाया तो, पर मिटा नहीं सकी (1830 व 1848 की क्रांतियाँ)।
❧4. परिणाम एवं विश्वव्यापी प्रभाव
- प्राचीन व्यवस्था (Ancien Régime) का अंत: सामंतवाद, कानूनी विशेषाधिकार और दैवी-अधिकार आधारित राजतंत्र पूरे यूरोप में अप्रासंगिक।
- राष्ट्रवाद: "हथियारबंद राष्ट्र" की अवधारणा और नेपोलियन-विरोधी प्रतिरोध ने जर्मन व इतालवी एकीकरण आंदोलनों के बीज बोए।
- आधुनिक राजनीति की व्याकरण: वामपंथ और दक्षिणपंथ शब्द राष्ट्रीय सभा (1789) की बैठक-व्यवस्था से ही निकले हैं।
- वैश्विक तरंगें: हैती क्रांति (1791–1804) — इतिहास की एकमात्र सफल दास-क्रांति — ने 1789 के सिद्धांतों का आह्वान किया; एक पीढ़ी के भीतर लातीनी अमेरिका के स्वतंत्रता आंदोलन।
- भारत के संदर्भ में: राजा राममोहन राय ने क्रांति के आदर्शों का अभिनंदन किया; स्वतंत्रता–समता–बंधुत्व की त्रयी आगे चलकर भारतीय संविधान की प्रस्तावना में प्रतिध्वनित हुई (प्रारंभिक परीक्षा का प्रिय लिंक)।
इतिहासकारों की दृष्टि — उद्धरण योग्य व्याख्याएँ
- परंपरागत / मार्क्सवादी विचारधारा (जॉर्ज लेफेव्र, अल्बेर सोबूल): यह एक बुर्जुआ क्रांति थी, जिसने सामंतवाद के स्थान पर पूँजीवाद स्थापित किया।
- संशोधनवादी (अल्फ्रेड कॉबन, फ्रांस्वा फ्यूरे): "बुर्जुआ क्रांति" एक मिथक है — नेतृत्व औद्योगिक पूँजीपतियों का नहीं, बल्कि वकीलों व पदधारियों का था; फ्यूरे इसे राजनीतिक संस्कृति का संघर्ष मानते हैं।
- टॉकविल (पुरानी व्यवस्था और क्रांति, 1856): क्रांति ने राजशाही के केंद्रीकरण को तोड़ा नहीं, बल्कि आगे बढ़ाया।
PYQ रडार
- UPSC मुख्य परीक्षा: "फ्रांसीसी क्रांति ने विश्व को आधुनिक राजनीति की व्याकरण दी।" परीक्षण कीजिए।
- UPSC (2019 पैटर्न): फ्रांसीसी क्रांति के आदर्शों ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम / संवैधानिक मूल्यों को कैसे प्रभावित किया? व्याख्या कीजिए।
- NET: कालक्रम MCQ — टेनिस कोर्ट शपथ → बास्तील → अगस्त अध्यादेश → अधिकारों की घोषणा; इतिहासकारों का विचारधाराओं से मिलान (लेफेव्र/फ्यूरे)।
औद्योगिक क्रांति (लगभग 1760–1914)
प्रमुख विषय-वस्तु
कृषि-हस्तशिल्प अर्थव्यवस्था से मशीन-कारखाना अर्थव्यवस्था में संक्रमण; औद्योगिक पूँजीवाद, श्रमिक वर्ग, नगरीकरण और नई विचारधाराओं (उदारवाद, समाजवाद) का उदय।
मुख्य शब्दावली
बाड़ाबंदी (Enclosure) · पुटिंग-आउट प्रणाली · कारखाना प्रणाली · अहस्तक्षेप नीति (Laissez-faire) · लुडवाद · चार्टिस्ट आंदोलन · बेसेमर इस्पात · भारत का वि-औद्योगीकरण।
परीक्षा में महत्त्व क्यों?
विश्लेषणात्मक प्रश्नों के लिए आदर्श: "इंग्लैंड में सबसे पहले क्यों?", सामाजिक लागत बनाम लाभ, तथा औपनिवेशिक संबंध — विशेषतः भारतीय हस्तशिल्प पर प्रभाव।
❧1. सबसे पहले ब्रिटेन में क्यों? (क्लासिक विश्लेषणात्मक प्रश्न)
- कृषि क्रांति: बाड़ाबंदी आंदोलन, नॉरफ़ॉक चतुर्वर्षीय फसल-चक्र, जेथ्रो टल की सीड ड्रिल (1701) → अतिरिक्त खाद्यान्न और कारखानों के लिए अतिरिक्त श्रम।
- पूँजी एवं साख: अटलांटिक व्यापार (दास-व्यापार सहित) और भूमि से प्राप्त मुनाफ़ा; बैंक ऑफ इंग्लैंड (1694) व ग्रामीण बैंकों ने निवेश जुटाया।
- प्राकृतिक संसाधन: पास-पास स्थित प्रचुर कोयला व लौह-अयस्क; नौगम्य नदियाँ, कटी-फटी तटरेखा, बाद में सघन नहर-जाल (ब्रिजवाटर नहर, 1761)।
- औपनिवेशिक साम्राज्य व नौसैनिक शक्ति: बँधे हुए बाज़ार और कच्चा माल (भारतीय कपास, बाद में अमेरिकी कपास) — एरिक विलियम्स की थीसिस दासता के मुनाफ़े को औद्योगिक पूँजी से जोड़ती है।
- राजनीतिक स्थिरता व संस्थाएँ: 1688 के बाद संवैधानिक शासन, सुरक्षित संपत्ति-अधिकार, पेटेंट कानून, आंतरिक चुंगी-बाधाओं का अभाव।
- सामाजिक कारक: गतिशील, गैर-सामंती श्रमशक्ति; असहमत (Dissenter) उद्यमी — जैसे कोलब्रुकडेल का डार्बी परिवार (क्वेकर); वैज्ञानिक-व्यावहारिक संस्कृति (रॉयल सोसाइटी, लूनर सोसाइटी)।
❧2. दो चरण एवं प्रमुख आविष्कार
प्रथम औद्योगिक क्रांति (लगभग 1760–1840): कपास, कोयला, लोहा, भाप
- वस्त्र उद्योग: के की फ्लाइंग शटल (1733) → हारग्रीव्ज़ की स्पिनिंग जेनी (1764) → आर्कराइट का वाटर फ्रेम (1769) → क्रॉम्पटन का म्यूल (1779) → कार्टराइट का पावर लूम (1785)। (यह शृंखला रट लें — NET का प्रिय मिलान-प्रश्न।)
- ऊर्जा: न्यूकॉमेन का वायुमंडलीय इंजन (1712), जिसे जेम्स वाट ने निर्णायक रूप से सुधारा (पेटेंट 1769; घूर्णी गति 1781–84)।
- लोहा: अब्राहम डार्बी की कोक-प्रगलन विधि (1709); कोर्ट की पडलिंग व रोलिंग प्रक्रिया (1784)।
- परिवहन: स्टीफेंसन का रॉकेट (1829); लिवरपूल–मैनचेस्टर रेलवे (1830); भाप-पोतों ने अटलांटिक की दूरी घटाई।
द्वितीय औद्योगिक क्रांति (लगभग 1870–1914): इस्पात, बिजली, रसायन
- बेसेमर कन्वर्टर (1856) और सीमेंस–मार्टिन ओपन हार्थ → रेल, पोत व गगनचुंबी भवनों के लिए सस्ता इस्पात।
- बिजली (एडिसन, सीमेंस), अंतर्दहन इंजन (डेमलर–बेंज़, 1885), कृत्रिम रंग व उर्वरक (जर्मन रसायन कंपनियाँ), टेलीग्राफ व टेलीफोन।
- नए अग्रणी: 1890 के दशक तक इस्पात उत्पादन में जर्मनी और अमेरिका ब्रिटेन से आगे; विज्ञान-आधारित उद्योग, कार्टेल और प्रबंधकीय पूँजीवाद ने अकेले आविष्कारक का स्थान ले लिया।
| आयाम | प्रथम क्रांति (1760–1840) | द्वितीय क्रांति (1870–1914) |
|---|---|---|
| अग्रणी क्षेत्र | सूती वस्त्र, लोहा, कोयला, भाप | इस्पात, बिजली, रसायन, पेट्रोलियम |
| अग्रणी देश | ब्रिटेन ("विश्व की कार्यशाला") | जर्मनी एवं अमेरिका |
| नवाचार-शैली | कारीगर-प्रयोगकर्ता, अनुभव-आधारित | औद्योगिक अनुसंधान प्रयोगशालाएँ, अनुप्रयुक्त विज्ञान |
| व्यवसाय-स्वरूप | पारिवारिक फर्में, छोटे कारखाने | निगम (Corporations), कार्टेल, वित्तीय पूँजी |
❧3. सामाजिक परिणाम एवं प्रतिक्रियाएँ
क्रांति की कीमत
- अनियोजित नगरीकरण: मैनचेस्टर की जनसंख्या ~25,000 (1772) से बढ़कर ~3 लाख+ (1850); गंदी बस्तियाँ, हैजा, औद्योगिक नगरों में जीवन-प्रत्याशा ग्रामीण क्षेत्रों से कहीं कम।
- कारखाना अनुशासन: 12–16 घंटे का कार्यदिवस, महिलाओं व बाल श्रम का शोषण (सैडलर समिति, 1832 में प्रलेखित), कारीगरों की स्वतंत्रता का विनाश।
- परिवार एवं जेंडर: घर और कार्यस्थल का पृथक्करण; मिलों में महिलाओं के व्यापक रोज़गार के साथ-साथ पुरुष "अन्नदाता" (Breadwinner) की अवधारणा का उदय।
प्रतिक्रियाएँ
- लुडाइट आंदोलन (1811–16): विस्थापित बुनकरों व कारीगरों द्वारा मशीन-तोड़ो अभियान।
- कारखाना कानून: फैक्ट्री एक्ट 1833 (बाल-श्रम सीमा, निरीक्षक), खान अधिनियम 1842, दस-घंटे अधिनियम 1847।
- चार्टिस्ट आंदोलन (1838–48): जन-चार्टर (People's Charter) की छह माँगें — जिनमें सार्वभौमिक पुरुष मताधिकार व गुप्त मतदान शामिल; पहला जन-आधारित श्रमिक राजनीतिक आंदोलन।
- ट्रेड यूनियन व सहकारिता: कॉम्बिनेशन एक्ट्स की समाप्ति (1824); रॉचडेल पायनियर्स (1844); रॉबर्ट ओवेन का काल्पनिक (Utopian) समाजवाद — न्यू लैनार्क।
- विचारधाराएँ: एडम स्मिथ (वेल्थ ऑफ नेशंस, 1776 — अहस्तक्षेप); माल्थस व रिकार्डो (क्लासिकी निराशावाद); मार्क्स–एंगेल्स (कम्युनिस्ट घोषणापत्र, 1848; दास कैपिटल, 1867) — इतिहास को वर्ग-संघर्ष के रूप में पढ़ना।
इतिहासकारों की दृष्टि
- अर्नोल्ड टॉयनबी (व्याख्यान, 1884) ने "औद्योगिक क्रांति" शब्द को एक आकस्मिक विच्छेद के रूप में लोकप्रिय किया; परवर्ती आर्थिक इतिहासकार (क्लैपहम, क्राफ्ट्स) क्रमिक व असमान विकास पर बल देते हैं।
- जीवन-स्तर विवाद: "निराशावादी" (ई. पी. थॉम्पसन, हॉब्सबॉम — 1840 से पूर्व वास्तविक मज़दूरी स्थिर, जीवन बदहाल) बनाम "आशावादी" (ऐश्टन, हार्टवेल — दीर्घकालिक लाभ)।
- ई. पी. थॉम्पसन की द मेकिंग ऑफ द इंग्लिश वर्किंग क्लास (1963): वर्ग एक जीवंत अनुभव है, जिसे श्रमिकों ने स्वयं "गढ़ा" — NET के इतिहास-लेखन प्रश्नों हेतु अनिवार्य।
❧4. वैश्विक प्रभाव — और भारतीय संदर्भ
- साम्राज्यवाद का इंजन: कच्चे माल व बाज़ारों की खोज ने "नव-साम्राज्यवाद" को जन्म दिया (अफ्रीका की बंदरबाँट, 1880 का दशक; बर्लिन सम्मेलन 1884–85)।
- भारत का वि-औद्योगीकरण (Deindustrialisation): लंकाशायर के आयातों ने भारतीय हथकरघा निर्यात को नष्ट किया; भारत कच्ची कपास, नील व जूट का आपूर्तिकर्ता और निर्मित माल का आयातक बना — दादाभाई नौरोजी का धन-निष्कासन सिद्धांत (पॉवर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया, 1901) तथा आर. सी. दत्त की इकोनॉमिक हिस्ट्री ऑफ इंडिया — मानक राष्ट्रवादी आलोचनाएँ।
- भारत में रेलवे (1853 से): निर्माण शोषण व सेना की आवाजाही हेतु हुआ, पर बाद में राष्ट्रवादियों ने आंदोलन को जोड़ने में इसका उपयोग किया — क्लासिक "दुधारी तलवार" वाला मुख्य-परीक्षा बिंदु।
- पारिस्थितिकीय मोड़: कोयला-अर्थव्यवस्था से जीवाश्म-ईंधन युग का आरंभ — समकालीन जलवायु-विमर्श से जोड़कर निष्कर्ष समृद्ध करें।
PYQ रडार
- UPSC मुख्य परीक्षा: "औद्योगिक क्रांति सर्वप्रथम इंग्लैंड में ही क्यों घटित हुई? वहाँ के जीवन की गुणवत्ता पर इसके प्रभाव की विवेचना कीजिए। वर्तमान भारत से इसकी तुलना कीजिए।" (इसी विश्लेषणात्मक रूप में पूछा गया)।
- UPSC मुख्य परीक्षा: "औद्योगिक क्रांति ने उपनिवेशवाद के चरित्र में मौलिक परिवर्तन किया।" भारत के संदर्भ में परीक्षण कीजिए।
- NET: वस्त्र-आविष्कारों का क्रम; लेखक–कृति मिलान (टॉयनबी, थॉम्पसन, हॉब्सबॉम); कारखाना कानूनों का कालक्रम।
प्रथम विश्व युद्ध एवं राष्ट्र संघ (1914–1920)
प्रमुख विषय-वस्तु
सम्पूर्ण युद्ध (Total War), चार साम्राज्यों का पतन (होहेनज़ोलर्न, हैब्सबर्ग, रोमानोव, उस्मानी), विल्सन का आदर्शवाद बनाम यथार्थ-राजनीति, और वह दोषपूर्ण शांति जिसने द्वितीय विश्व युद्ध को जन्म दिया।
मुख्य शब्दावली
MAIN कारण · वेल्टपोलिटिक · श्लीफेन योजना · खाई-युद्ध (Trench Warfare) · चौदह सूत्र · युद्ध-अपराध धारा (अनुच्छेद 231) · मैंडेट व्यवस्था · सामूहिक सुरक्षा।
परीक्षा में महत्त्व क्यों?
बहस-प्रधान अध्याय (युद्ध का दोषी कौन?), संधि की धाराएँ, तथा राष्ट्र संघ की संरचना/विफलताएँ — द्वितीय विश्व युद्ध और संयुक्त राष्ट्र तक का सेतु-अध्याय।
❧1. दीर्घकालिक कारण — M.A.I.N. ढाँचा
- M — सैन्यवाद (Militarism): एंग्लो-जर्मन नौसैनिक होड़ (HMS ड्रेडनॉट, 1906); जर्मन सेना-विस्तार विधेयक; युद्ध-योजनाएँ (श्लीफेन योजना, फ्रांस की योजना XVII) जिनमें लामबंदी स्वयं युद्ध का ट्रिगर बन गई।
- A — गठबंधन (Alliances): 1890 के बाद बिस्मार्क की व्यवस्था उलट गई —
- त्रिगुट संधि / Triple Alliance (1882): जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी, इटली।
- फ्रांस-रूस संधि (1894) → आंत्रे कोर्दियाल (1904) → आंग्ल-रूस समझौता (1907) = त्रिराष्ट्र मैत्री (Triple Entente)।
- I — साम्राज्यवाद (Imperialism): मोरक्को संकट (1905, 1911); वेल्टपोलिटिक तथा बर्लिन–बगदाद रेलवे से ब्रिटेन व रूस चिंतित।
- N — राष्ट्रवाद (Nationalism): अल्सेस-लॉरेन (1871 में छिना) को लेकर फ्रांसीसी प्रतिशोध-भावना; सर्व-स्लाववाद बनाम सर्व-जर्मनवाद; बाल्कन युद्धों (1912–13) के बाद सर्बिया का उभार — बाल्कन यूरोप का "बारूद का ढेर"।
तात्कालिक कारण एवं जुलाई संकट (1914)
- 28 जून: गैवरिलो प्रिंसिप (ब्लैक हैंड संगठन) ने साराजेवो में आर्कड्यूक फ्रांज़ फर्डिनेंड की हत्या की।
- जर्मनी का ऑस्ट्रिया को "कोरा चेक" (5–6 जुलाई) → सर्बिया को ऑस्ट्रियाई अल्टीमेटम (23 जुलाई) → युद्ध-घोषणाओं की शृंखला; तटस्थ बेल्जियम पर जर्मन आक्रमण (4 अगस्त) से ब्रिटेन युद्ध में उतरा।
इतिहासकारों की दृष्टि — युद्ध-दोष विवाद
- फ्रिट्ज़ फिशर (ग्रिफ नाख़ डेर वेल्टमाख़्ट, 1961): जर्मनी ने विश्व-शक्ति बनने हेतु जान-बूझकर युद्ध का जोखिम लिया — मुख्य उत्तरदायित्व जर्मनी का।
- क्रिस्टोफर क्लार्क (द स्लीपवॉकर्स, 2012): साझा उत्तरदायित्व — राजनेता "नींद में चलते हुए" महाविनाश में जा पहुँचे।
- पुराना दृष्टिकोण — लॉयड जॉर्ज: राष्ट्र "फिसलते हुए खाई में गिर गए"; ए. जे. पी. टेलर: "समय-सारिणी से हुआ युद्ध" (लामबंदी कार्यक्रमों की जकड़न)।
❧2. युद्ध का घटनाक्रम एवं स्वरूप
एक नए प्रकार का युद्ध
- मार्न के प्रथम युद्ध (सितंबर 1914) में श्लीफेन योजना की विफलता → पश्चिमी मोर्चे पर चार वर्षों का खाई-गतिरोध।
- क्षय-युद्ध (Attrition): वर्दुन (फर.–दिस. 1916, "वे पार नहीं होंगे") तथा सोम (जुलाई–नव. 1916; पहले ही दिन ~57,000 ब्रिटिश हताहत)।
- सम्पूर्ण युद्ध की तकनीक: मशीनगन, भारी तोपखाना, विषैली गैस (इप्र, 1915), टैंक (सोम, 1916), वायुयान, यू-बोट पनडुब्बियाँ।
- गृह-मोर्चा: राशनिंग, युद्ध-अर्थव्यवस्था, गोला-बारूद कारखानों में महिलाएँ ("Munitionettes") — महिला मताधिकार को गति (ब्रिटेन 1918/1928)।
निर्णायक मोड़ (1917–18)
- अप्रतिबंधित पनडुब्बी युद्ध + ज़िमरमान टेलीग्राम → अमेरिका की युद्ध-घोषणा (6 अप्रैल 1917)।
- रूसी क्रांतियाँ (फरवरी व अक्टूबर 1917) → बोल्शेविकों ने ब्रेस्त-लितोव्स्क की संधि (3 मार्च 1918) कर युद्ध से किनारा किया।
- जर्मनी का वसंत-आक्रमण विफल; मित्र-राष्ट्रों का "सौ दिनों का आक्रमण"; युद्धविराम, 11 नवंबर 1918।
- भारत की भूमिका: 13 लाख से अधिक भारतीय सैनिक विदेशों में लड़े; युद्धकालीन वादों से मॉण्टेग्यू घोषणा (1917) आई — पर रौलेट एक्ट (1919) ने आशा को विश्वासघात में बदल दिया (आधुनिक भारत से लिंक)।
❧3. पेरिस शांति सम्मेलन एवं वर्साय की संधि (28 जून 1919)
"बिग थ्री" और उनके उद्देश्य
- विल्सन (अमेरिका): चौदह सूत्र (जनवरी 1918) — खुली कूटनीति, समुद्रों की स्वतंत्रता, आत्मनिर्णय (Self-determination), और "राष्ट्रों का एक सामान्य संघ"।
- क्लेमेंसो (फ्रांस): सुरक्षा और प्रतिशोध — जर्मनी को स्थायी रूप से पंगु करना ("टाइगर")।
- लॉयड जॉर्ज (ब्रिटेन): मध्यम मार्ग — जर्मनी को दंड, पर व्यापार-साझेदार व बोल्शेविज़्म-विरोधी दीवार के रूप में सुरक्षित रखना।
जर्मनी पर थोपी गई प्रमुख शर्तें
- अनुच्छेद 231 — युद्ध-अपराध धारा (War Guilt Clause): संपूर्ण उत्तरदायित्व जर्मनी पर; इसी आधार पर क्षतिपूर्ति (1921 में निर्धारित) 132 अरब स्वर्ण मार्क (~6.6 अरब पाउंड)।
- क्षेत्रीय: अल्सेस-लॉरेन फ्रांस को; पोलिश गलियारा व डांज़िग (स्वतंत्र नगर); सार क्षेत्र 15 वर्षों तक राष्ट्र संघ के अधीन; सारे उपनिवेश छीनकर राष्ट्र संघ के मैंडेट बनाए गए।
- सैन्य: सेना अधिकतम 1,00,000, अनिवार्य सैन्य-सेवा निषिद्ध, वायुसेना निषिद्ध, केवल छह युद्धपोत, राइनलैंड विसैन्यीकृत।
- समानांतर संधियाँ: सेंट जर्मेन (ऑस्ट्रिया), ट्रियानों (हंगरी), न्यूई (बुल्गारिया), सेव्र → लोज़ान (1923) (उस्मानी साम्राज्य/तुर्की)।
❧4. राष्ट्र संघ: संरचना, सफलताएँ, विफलताएँ
संरचना (प्रसंविदा/Covenant = वर्साय संधि का भाग I; मुख्यालय जिनेवा)
- महासभा (Assembly) — सभी सदस्य, प्रत्येक का एक मत · परिषद (Council) — स्थायी महाशक्तियाँ + निर्वाचित सदस्य · सचिवालय।
- सहयोगी संस्थाएँ: अंतर्राष्ट्रीय न्याय का स्थायी न्यायालय (PCIJ) — हेग, तथा ILO (जो आज भी विद्यमान है — प्रारंभिक परीक्षा का प्रिय तथ्य)।
- मूल विचार: सामूहिक सुरक्षा (अनुच्छेद 10) + निरस्त्रीकरण + खुली कूटनीति। घातक दोष: निर्णयों हेतु सर्वसम्मति अनिवार्य, और संघ के पास अपनी सेना नहीं।
विफलता के कारण
- अनुपस्थित महाशक्तियाँ: अमेरिकी सीनेट ने सदस्यता अस्वीकृत की (1919–20); सोवियत संघ 1934 तक बाहर; जर्मनी केवल 1926–33 तक सदस्य।
- सफलताएँ छोटे राज्यों के विवादों तक सीमित: ऑलैंड द्वीप (1921), अपर साइलेसिया (1921), यूनान–बुल्गारिया संकट (1925); मानवीय कार्य (शरणार्थी — नानसेन पासपोर्ट, स्वास्थ्य, दास-प्रथा विरोध)।
- महाशक्ति-परीक्षाओं में विफल: कोर्फू (1923); मंचूरिया (1931) — जापान संघ छोड़कर चला गया (1933); एबीसीनिया/इथियोपिया (1935–36) — इटली पर अधूरे प्रतिबंध, पेट्रोल शामिल नहीं; होर–लावल समझौते ने साख नष्ट की; राइनलैंड के पुनःसैन्यीकरण (1936) का कोई उत्तर नहीं।
- सामूहिक सुरक्षा का स्थान तुष्टीकरण ने लिया → म्यूनिख (1938) → द्वितीय विश्व युद्ध। संयुक्त राष्ट्र (1945) ने डिज़ाइन-दोष सुधारे: प्रवर्तन-शक्तियों वाली सुरक्षा परिषद (अध्याय VII) — मानक तुलनात्मक प्रश्न।
PYQ रडार
- UPSC मुख्य परीक्षा: "वर्साय की संधि में द्वितीय विश्व युद्ध के बीज निहित थे।" समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए।
- UPSC मुख्य परीक्षा: सामूहिक सुरक्षा के प्रयोग के रूप में राष्ट्र संघ की सफलताओं एवं विफलताओं का मूल्यांकन कीजिए।
- NET: संधियों का पराजित राष्ट्रों से मिलान (सेंट जर्मेन–ऑस्ट्रिया, ट्रियानों–हंगरी…); चौदह सूत्रों की विषय-वस्तु; फिशर थीसिस की पहचान।
शीत युद्ध काल (1945–1991)
प्रमुख विषय-वस्तु
प्रत्यक्ष युद्ध रहित द्विध्रुवीयता; विचारधारा (पूँजीवाद बनाम साम्यवाद), परमाणु प्रतिरोध (Deterrence), छद्म युद्ध (Proxy Wars), उपनिवेशवाद का अंत तथा गुटनिरपेक्ष आंदोलन।
मुख्य शब्दावली
लौह आवरण (Iron Curtain) · नियंत्रण-नीति (Containment) · डोमिनो सिद्धांत · MAD · शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व · दितांत · ग्लास्नोस्त · पेरेस्त्रोइका · ब्रेझनेव / सिनात्रा सिद्धांत।
परीक्षा में महत्त्व क्यों?
राजव्यवस्था/अंतर्राष्ट्रीय संबंध से सीधा जुड़ाव: गुटनिरपेक्षता व भारत की विदेश नीति, द्विध्रुवीय विश्व में संयुक्त राष्ट्र, और "क्या नया शीत युद्ध उभर रहा है?" जैसे निबंध-लिंक।
❧1. उद्भव: महागठबंधन से लौह आवरण तक (1945–47)
- याल्टा (फरवरी 1945) — रूज़वेल्ट, चर्चिल, स्टालिन: जर्मनी का अधिग्रहण-क्षेत्रों में विभाजन; पूर्वी यूरोप में स्वतंत्र चुनावों का वादा (जो कभी निभाया नहीं गया); पोट्सडैम (जुलाई–अगस्त 1945) — रूज़वेल्ट के स्थान पर ट्रूमैन; परमाणु बम से रुख और कठोर।
- संरचनात्मक कारण: यूरोप में शक्ति-शून्यता, असंगत विचारधाराएँ, सोवियत सुरक्षा-भय (पोलैंड के रास्ते दो बार आक्रमण झेला) बनाम साम्यवादी विस्तार का पश्चिमी भय।
- केनन का "लॉन्ग टेलीग्राम" (फरवरी 1946) — नियंत्रण-नीति (Containment) का सैद्धांतिक आधार; चर्चिल का "लौह आवरण" भाषण (फुल्टन, 5 मार्च 1946) — विभाजन का नामकरण।
- ट्रूमैन सिद्धांत (12 मार्च 1947): यूनान व तुर्की को सहायता — दमन का प्रतिरोध कर रहे "स्वतंत्र जन" का समर्थन; मार्शल योजना (जून 1947): पश्चिमी यूरोप के पुनर्निर्माण हेतु ~13 अरब डॉलर; सोवियत उत्तर — कॉमिनफॉर्म (1947) व कॉमेकॉन (1949)।
- सैन्य गुट: नाटो (4 अप्रैल 1949) बनाम वारसा संधि (14 मई 1955)।
इतिहासकारों की दृष्टि — शीत युद्ध किसने शुरू किया?
- परंपरागत (Orthodox) दृष्टिकोण (1950 का दशक — जैसे फ़ाइस): दोषी सोवियत विस्तारवाद।
- संशोधनवादी (Revisionist) (1960 का दशक — विलियम एपलमैन विलियम्स, गैब्रियल कोल्को): अमेरिकी आर्थिक "ओपन डोर" विस्तारवाद ने संघर्ष भड़काया।
- उत्तर-संशोधनवादी (Post-revisionist) (जॉन लुईस गैडिस): परस्पर ग़लतफ़हमी व सुरक्षा-दुविधा; सोवियत अभिलेखागार खुलने के बाद गैडिस (वी नाउ नो, 1997) ने दोष का पलड़ा स्टालिन की ओर झुकाया।
❧2. संकट एवं छद्म युद्ध: शीत युद्ध के "गर्म" मोर्चे
- बर्लिन नाकेबंदी (जून 1948 – मई 1949): स्टालिन ने थल-मार्ग काटे; पश्चिमी एयरलिफ्ट (~2.3 लाख उड़ानें) ने संकल्प की पहली लड़ाई जीती; जर्मनी FRG व GDR में विभाजित (1949)।
- कोरिया युद्ध (1950–53): उत्तर ने 38वीं समानांतर रेखा पार कर दक्षिण पर आक्रमण किया; मैकआर्थर के नेतृत्व में संयुक्त राष्ट्र सेना (संभव केवल इसलिए कि सोवियत संघ सुरक्षा परिषद का बहिष्कार कर रहा था); चीन का हस्तक्षेप; पनमुनजोम युद्धविराम — कोरिया आज भी विभाजित।
- हंगरी (1956) तथा प्राग वसंत (1968): सोवियत टैंकों द्वारा सुधारों का दमन; औचित्य — सीमित संप्रभुता का ब्रेझनेव सिद्धांत।
- बर्लिन की दीवार (13 अगस्त 1961): पूर्वी जर्मनों के पलायन को रोकने हेतु — शीत युद्ध का "कंक्रीट" प्रतीक।
- क्यूबा मिसाइल संकट (अक्टूबर 1962): U-2 विमान की तस्वीरों से क्यूबा में सोवियत मिसाइलों का खुलासा — तेरह दिनों का संकट; कैनेडी की नौसैनिक "क्वारंटीन"; समाधान — अमेरिका के "आक्रमण-न-करने" के वचन (+ तुर्की से जुपिटर मिसाइलों की गुप्त वापसी) के बदले सोवियत मिसाइल-वापसी। परिणाम: हॉटलाइन (1963), आंशिक परीक्षण प्रतिबंध संधि (1963), और MAD (परस्पर सुनिश्चित विनाश) का तर्क।
- वियतनाम युद्ध (अमेरिकी वृद्धि 1965–73): डोमिनो सिद्धांत का व्यवहार; टेट आक्रमण (1968) ने अमेरिकी मनोबल तोड़ा; पेरिस समझौते (1973); साइगॉन का पतन (1975)।
- अफ़गानिस्तान (1979–89): सोवियत संघ का "वियतनाम" — अर्थव्यवस्था व मनोबल दोनों का क्षरण; अमेरिका ने मुजाहिदीन को हथियार दिए (दीर्घकालिक दुष्परिणामों — Blowback — के साथ)।
❧3. तीसरी दुनिया का उत्तर: गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM)
- जड़ें एफ्रो-एशियाई एकजुटता में: बांडुंग सम्मेलन (1955) — 29 राष्ट्र; पंचशील सिद्धांत (भारत–चीन, 1954) इसकी आत्मा में समाहित।
- प्रथम NAM शिखर सम्मेलन: बेलग्रेड, 1961। संस्थापक शिल्पकार: नेहरू (भारत), टीटो (यूगोस्लाविया), नासिर (मिस्र), सुकर्णो (इंडोनेशिया), एनक्रूमा (घाना)।
- अर्थ: तटस्थता नहीं, स्वतंत्र विवेक — गुट-अनुशासन से बाहर रहकर प्रत्येक मुद्दे को गुण-दोष के आधार पर परखने की स्वतंत्रता; उपनिवेशवाद-विरोध, निरस्त्रीकरण व नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (NIEO, 1974) का मंच।
- आलोचनाएँ: सदस्य प्रायः किसी ओर झुके रहे (भारत–सोवियत संधि 1971); फिर भी NAM ने नव-स्वतंत्र राष्ट्रों को संयुक्त राष्ट्र महासभा में सामूहिक सौदेबाज़ी की शक्ति दी।
- मुख्य परीक्षा लिंक: NAM से आज की "रणनीतिक स्वायत्तता" (Strategic Autonomy) व बहु-संरेखण (Multi-alignment) तक की निरंतरता — मूल्यांकनपरक समापन-बिंदु, जिसे परीक्षक पुरस्कृत करते हैं।
❧4. दितांत, द्वितीय शीत युद्ध एवं अंत (1969–1991)
दितांत / तनाव-शैथिल्य (लगभग 1969–79)
- प्रेरक: परमाणु समता, वियतनाम की थकान, चीन–सोवियत मतभेद (निक्सन की चीन यात्रा, 1972)।
- मील के पत्थर: SALT-I व ABM संधि (1972), विली ब्रांट की ओस्टपोलिटिक, हेलसिंकी समझौते (1975) — सीमाओं को मान्यता, मानवाधिकारों की "बास्केट III" असंतुष्टों (Dissidents) का हथियार बनी।
द्वितीय शीत युद्ध (1979–85)
- अफ़गानिस्तान पर सोवियत आक्रमण (दिसंबर 1979) से SALT-II समाप्त; रीगन की शस्त्र-होड़ और SDI "स्टार वार्स" (1983); "दुष्ट साम्राज्य" (Evil Empire) की बयानबाज़ी।
गोर्बाचेव और खेल का अंत (1985–91)
- ग्लास्नोस्त (खुलापन) + पेरेस्त्रोइका (आर्थिक पुनर्गठन) + विदेश नीति में "नई सोच"; INF संधि (1987) से मिसाइलों की एक पूरी श्रेणी समाप्त।
- ब्रेझनेव सिद्धांत का परित्याग (परिहासपूर्ण "सिनात्रा सिद्धांत" — उन्हें अपने ढंग से चलने दो) → पूर्वी यूरोप में 1989 की क्रांतियाँ; 9 नवंबर 1989 को बर्लिन की दीवार गिरी; माल्टा शिखर सम्मेलन (दिसंबर 1989) में शीत युद्ध की समाप्ति की घोषणा; जर्मन एकीकरण (अक्टूबर 1990)।
- कट्टरपंथियों का असफल तख्तापलट (अगस्त 1991) → गणराज्यों का अलगाव → 26 दिसंबर 1991 को सोवियत संघ विघटित; CIS का गठन।
- परिणाम: एकध्रुवीय क्षण (Unipolar Moment), उदार-पूँजीवादी व्यवस्था का विस्तार, नाटो/यूरोपीय संघ का प्रसार — और आज का "नया शीत युद्ध" विमर्श (निबंध हेतु तैयार सामग्री)।
इतिहासकारों की दृष्टि — अंत क्यों हुआ?
- विजयवादी (Triumphalist) दृष्टिकोण: रीगन के दबाव ने सोवियत संघ को होड़ में दिवालिया कर दिया।
- गोर्बाचेव-केंद्रित दृष्टिकोण (आर्ची ब्राउन): ऊपर से सुधार — यह विवशता नहीं, चुनाव था।
- संरचनावादी दृष्टिकोण: ऐसी नियंत्रित (Command) अर्थव्यवस्था जो "बंदूक और रोटी" दोनों नहीं दे सकती थी; पॉल कैनेडी की "साम्राज्यिक अति-विस्तार" (Imperial Overstretch) थीसिस।
PYQ रडार
- UPSC मुख्य परीक्षा: "शीत युद्ध का अंत बाहरी दबाव का नहीं, बल्कि सोवियत संघ के आंतरिक क्षय का परिणाम था।" विवेचना कीजिए।
- UPSC GS-II लिंक: बहुध्रुवीय विश्व में गुटनिरपेक्ष आंदोलन की प्रासंगिकता — भारत की रणनीतिक स्वायत्तता के संदर्भ में मूल्यांकन कीजिए।
- NET: कालक्रम — ट्रूमैन सिद्धांत → नाटो → वारसा संधि; NAM शिखर सम्मेलन व संस्थापक; सिद्धांतों (ब्रेझनेव, सिनात्रा) व इतिहास-लेखन विचारधाराओं की पहचान।