विश्व इतिहास मास्टर नोट्स — UPSC · State PSC · NTA NET | ExamCG
ExamCG · विश्व इतिहास शृंखला

विश्व इतिहास मास्टर नोट्स

UPSC CSE (GS-I मुख्य परीक्षा), राज्य PSC एवं NTA UGC NET (इतिहास) हेतु विश्लेषणात्मक अध्याय नोट्स — कारण, चरण, परिणाम और इतिहास-लेखन (Historiography) एक ही स्थान पर।

अध्याय 01 · क्रांतियों का युग

फ्रांसीसी क्रांति एवं नेपोलियन युग (1789–1815)

5 मई 1789175 वर्षों बाद वर्साय में एस्टेट्स-जनरल की बैठक
14 जुलाई 1789बास्तील का पतन — राजशाही निरंकुशता का प्रतीक ध्वस्त
21 जनवरी 1793लुई सोलहवें को फाँसी; गणतंत्र उग्र होता है
1793–94लोक सुरक्षा समिति के अधीन आतंक का शासन
9 नव. 179918 ब्रूमेयर का तख्तापलट — नेपोलियन सत्ता में
1815वाटरलू की पराजय एवं वियना कांग्रेस की व्यवस्था

प्रमुख विषय-वस्तु

जन-संप्रभुता (Popular Sovereignty), सामंती विशेषाधिकारों का अंत, धर्मनिरपेक्ष नागरिकता, क्रांतिकारी युद्ध, तथा पूरे यूरोप में उदारवाद व राष्ट्रवाद का प्रसार।

मुख्य शब्दावली

प्राचीन व्यवस्था (Ancien Régime) · एस्टेट्स · सौं-कुलॉत (Sans-culottes) · जैकोबिन बनाम जिरोंदिस्त · थर्मिडोर · जनमत-संग्रह (Plebiscite) · कॉन्कोर्डेट · महाद्वीपीय व्यवस्था।

परीक्षा में महत्त्व क्यों?

क्लासिक कारण–घटनाक्रम–परिणाम अध्याय; मुख्य परीक्षा में 1789 को राष्ट्रवाद, नेपोलियन की विरासत तथा अमेरिकी व रूसी क्रांतियों से तुलना के प्रश्न बार-बार पूछे जाते हैं।

High-yield: UPSC GS-I · NET (विश्व इतिहास इकाई) · राज्य PSC मुख्य परीक्षा

1. कारण: 1789 की क्रांति फ्रांस में ही क्यों?

सामाजिक कारण — एस्टेट व्यवस्था

  • प्रथम एस्टेट (पादरी वर्ग, ~0.5%) और द्वितीय एस्टेट (कुलीन वर्ग, ~1.5%) के पास लगभग 40% भूमि थी, फिर भी वे प्रत्यक्ष करों से प्रायः मुक्त थे।
  • तृतीय एस्टेट (~97%) — बुर्जुआ (मध्यम वर्ग), नगरीय श्रमिक और किसान — पर टाइल (भूमि कर), गैबेल (नमक कर), धार्मिक कर (Tithe) और सामंती बेगार (Corvée) का बोझ था।
  • अब्बे सिये की पुस्तिका "तृतीय एस्टेट क्या है?" (जनवरी 1789) का उत्तर था — "सब कुछ"; यही बुर्जुआ चुनौती का वैचारिक घोषणापत्र बनी।

आर्थिक एवं वित्तीय कारण

  • सप्तवर्षीय युद्ध (1756–63) तथा अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम (1776–83) में महँगे हस्तक्षेप से राजकोष दिवालिया — राज्य की लगभग आधी आय ऋण चुकाने में जाती थी।
  • सुधारवादी वित्त मंत्री — तुर्गो, नेकर, कैलोन — असफल रहे, क्योंकि विशेषाधिकार-प्राप्त वर्गों ने कुलीनों पर कराधान रोक दिया (Assembly of Notables, 1787)।
  • 1788 की फसल-विफलता से 1789 के मध्य तक रोटी के दाम दोगुने — अभिजात्य संवैधानिक संकट और जन-भूख एक हो गए।

बौद्धिक कारण — प्रबोधन (Enlightenment)

  • मॉन्टेस्क्यू (विधि की आत्मा, 1748) — शक्ति-पृथक्करण; वॉल्तेयर — चर्च-विरोधी तर्कवाद; रूसो (सामाजिक संविदा, 1762) — जन-संप्रभुता एवं "सामान्य इच्छा" (General Will)।
  • दार्शनिकों ने क्रांति "उत्पन्न" नहीं की, किंतु पुरानी व्यवस्था के चरमराते ही उन्होंने उसे वैधता देने वाली भाषा प्रदान की।

राजनीतिक तात्कालिक कारण

  • लुई सोलहवें ने एस्टेट्स-जनरल (5 मई 1789) बुलाई; "वर्ग के अनुसार बनाम व्यक्ति के अनुसार मतदान" पर गतिरोध के चलते तृतीय एस्टेट ने स्वयं को राष्ट्रीय सभा (17 जून 1789) घोषित किया और टेनिस कोर्ट की शपथ (20 जून 1789) ली।
मुख्य परीक्षा सूत्र: कारणों को संयोग-बिंदु (Conjuncture) के रूप में प्रस्तुत करें — दीर्घकालिक संरचनात्मक असमानता + मध्यमकालिक वित्तीय संकट + तात्कालिक खाद्य संकट। किसी एक कारण पर आधारित उत्तर से बचें।

2. क्रांति के चरण (1789–1799)

चरण I — उदारवादी / संवैधानिक राजतंत्र (1789–92)

  • 4 अगस्त 1789: अगस्त अध्यादेशों द्वारा सामंती विशेषाधिकार समाप्त; 26 अगस्त 1789: मानव एवं नागरिक अधिकारों की घोषणा (स्वतंत्रता, संपत्ति, सुरक्षा, अत्याचार का प्रतिरोध)।
  • पादरी वर्ग का नागरिक संविधान (1790) — चर्च को राज्य के अधीन किया; धर्मनिष्ठ कैथोलिक विमुख हुए और राष्ट्र विभाजित हुआ।
  • वारेन की भगदड़ (जून 1791) ने राजा पर से विश्वास समाप्त कर दिया; 1791 के संविधान ने सक्रिय/निष्क्रिय नागरिकता के साथ संवैधानिक राजतंत्र स्थापित किया।

चरण II — उग्र गणतंत्र एवं आतंक का शासन (1792–94)

  • ऑस्ट्रिया–प्रशा से युद्ध (अप्रैल 1792); ट्यूलरीज़ महल पर धावा (10 अगस्त 1792); 21–22 सितंबर 1792 को गणतंत्र की घोषणा
  • लुई सोलहवें को गिलोटिन 21 जनवरी 1793; जैकोबिनों (माउंटेन) ने जिरोंदिस्तों का सफाया किया (जून 1793)।
  • आतंक का शासन (सितंबर 1793 – जुलाई 1794): रोबस्पियर के नेतृत्व में लोक सुरक्षा समिति (Committee of Public Safety); संदिग्धों का कानून; लगभग 17,000 आधिकारिक मृत्युदंड; लेवी ऑन मास (अगस्त 1793) — पहली आधुनिक सामूहिक सैन्य भर्ती; गणतांत्रिक कैलेंडर व "परम सत्ता का पंथ"।
  • थर्मिडोरियन प्रतिक्रिया (27–28 जुलाई 1794): रोबस्पियर को फाँसी; आतंक का अंत।

चरण III — डायरेक्टरी शासन (1795–99)

  • तृतीय वर्ष का संविधान: पाँच-सदस्यीय डायरेक्टरी + द्विसदनीय विधायिका; संपत्ति-आधारित मताधिकार पुनः लागू।
  • भ्रष्टाचार, राजतंत्रवादी व जैकोबिन विद्रोह (सेना की सहायता से दमन — नेपोलियन की "गोलियों की बौछार", अक्टूबर 1795) और मुद्रास्फीति ने शासन को अवैध बना दिया — मार्ग प्रशस्त हुआ 18 ब्रूमेयर के तख्तापलट (9 नवंबर 1799) का।

3. नेपोलियन: क्रांति का संरक्षक या विश्वासघाती?

आंतरिक सुदृढ़ीकरण (कॉन्सुलेट एवं साम्राज्य)

  • पोप से कॉन्कोर्डेट समझौता (1801) — चर्च की भूमि लौटाए बिना धार्मिक विभाजन का उपचार।
  • नेपोलियन संहिता (Civil Code, 1804): पुरुषों की कानूनी समानता, सुरक्षित संपत्ति-अधिकार, धर्मनिरपेक्ष विधि — किंतु पितृसत्तात्मक पारिवारिक सत्ता बहाल की और (1802) उपनिवेशों में दासता पुनः लागू की।
  • योग्यता-आधारित प्रशासन: प्रीफेक्ट व्यवस्था, बैंक ऑफ फ्रांस (1800), लीसे (सरकारी विद्यालय), लीजन ऑफ ऑनर; 2 दिसंबर 1804 को सम्राट का राज्याभिषेक।

साम्राज्य एवं पतन

  • ऑस्टरलिट्ज़ (1805) व जेना (1806) की विजयें; पवित्र रोमन साम्राज्य का विघटन (1806); राइन परिसंघ की स्थापना।
  • महाद्वीपीय व्यवस्था (बर्लिन आदेश, 1806) — ब्रिटेन की आर्थिक नाकेबंदी, जिसने अंततः ब्रिटेन से अधिक यूरोप को हानि पहुँचाई।
  • प्रायद्वीपीय युद्ध (1808–14) ("स्पेनी नासूर") और रूस अभियान (1812) ने ग्रैंड आर्मी को निचोड़ लिया; लाइपज़िग — राष्ट्रों का युद्ध (1813) में पराजय; 1814 में पदत्याग; "सौ दिनों" का अंत वाटरलू (18 जून 1815) में हुआ।

वियना कांग्रेस (1814–15)

  • प्रमुख शिल्पकार: मेटरनिख (ऑस्ट्रिया), कैसलरे (ब्रिटेन), तालेरां (फ्रांस), ज़ार अलेक्जेंडर प्रथम।
  • सिद्धांत: वैधता (Legitimacy), क्षतिपूर्ति (Compensation), शक्ति-संतुलन (Balance of Power); "यूरोपीय संगीत-मंडल" (Concert of Europe) की स्थापना — एक रूढ़िवादी व्यवस्था जिसने उदार राष्ट्रवाद को दबाया तो, पर मिटा नहीं सकी (1830 व 1848 की क्रांतियाँ)।
उत्तर-संरचना: नेपोलियन ने क्रांति की नागरिक समानता व प्रशासनिक तर्कसंगतता को संस्थागत किया, किंतु उसकी राजनीतिक स्वतंत्रता का गला घोंटा (सेंसरशिप, जनमत-संग्रह आधारित तानाशाही)। संतुलित उत्तर में दोनों पक्ष अनिवार्य हैं।

4. परिणाम एवं विश्वव्यापी प्रभाव

  • प्राचीन व्यवस्था (Ancien Régime) का अंत: सामंतवाद, कानूनी विशेषाधिकार और दैवी-अधिकार आधारित राजतंत्र पूरे यूरोप में अप्रासंगिक।
  • राष्ट्रवाद: "हथियारबंद राष्ट्र" की अवधारणा और नेपोलियन-विरोधी प्रतिरोध ने जर्मन व इतालवी एकीकरण आंदोलनों के बीज बोए।
  • आधुनिक राजनीति की व्याकरण: वामपंथ और दक्षिणपंथ शब्द राष्ट्रीय सभा (1789) की बैठक-व्यवस्था से ही निकले हैं।
  • वैश्विक तरंगें: हैती क्रांति (1791–1804) — इतिहास की एकमात्र सफल दास-क्रांति — ने 1789 के सिद्धांतों का आह्वान किया; एक पीढ़ी के भीतर लातीनी अमेरिका के स्वतंत्रता आंदोलन।
  • भारत के संदर्भ में: राजा राममोहन राय ने क्रांति के आदर्शों का अभिनंदन किया; स्वतंत्रता–समता–बंधुत्व की त्रयी आगे चलकर भारतीय संविधान की प्रस्तावना में प्रतिध्वनित हुई (प्रारंभिक परीक्षा का प्रिय लिंक)।
इतिहासकारों की दृष्टि — उद्धरण योग्य व्याख्याएँ
  • परंपरागत / मार्क्सवादी विचारधारा (जॉर्ज लेफेव्र, अल्बेर सोबूल): यह एक बुर्जुआ क्रांति थी, जिसने सामंतवाद के स्थान पर पूँजीवाद स्थापित किया।
  • संशोधनवादी (अल्फ्रेड कॉबन, फ्रांस्वा फ्यूरे): "बुर्जुआ क्रांति" एक मिथक है — नेतृत्व औद्योगिक पूँजीपतियों का नहीं, बल्कि वकीलों व पदधारियों का था; फ्यूरे इसे राजनीतिक संस्कृति का संघर्ष मानते हैं।
  • टॉकविल (पुरानी व्यवस्था और क्रांति, 1856): क्रांति ने राजशाही के केंद्रीकरण को तोड़ा नहीं, बल्कि आगे बढ़ाया
PYQ रडार
  • UPSC मुख्य परीक्षा: "फ्रांसीसी क्रांति ने विश्व को आधुनिक राजनीति की व्याकरण दी।" परीक्षण कीजिए।
  • UPSC (2019 पैटर्न): फ्रांसीसी क्रांति के आदर्शों ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम / संवैधानिक मूल्यों को कैसे प्रभावित किया? व्याख्या कीजिए।
  • NET: कालक्रम MCQ — टेनिस कोर्ट शपथ → बास्तील → अगस्त अध्यादेश → अधिकारों की घोषणा; इतिहासकारों का विचारधाराओं से मिलान (लेफेव्र/फ्यूरे)।
ExamCG · विश्व इतिहास शृंखला — परीक्षा से एक दिन पूर्व प्रत्येक अध्याय की समयरेखा-पट्टी अवश्य दोहराएँ। · आगामी अध्याय: रूसी क्रांति · द्वितीय विश्व युद्ध · उपनिवेशवाद का अंत।
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