हर्षवर्धन का काल | The Age of Harshavardhana
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हर्षवर्धन का काल The Age of Harshavardhana

गुप्तों के बिखरने के बाद उत्तर भारत को एक छत के नीचे लाने का अंतिम बड़ा प्रयास। सोलह वर्ष की आयु में सिंहासन, इकतालीस वर्ष का शासन, और एक ऐसा दरबार जहाँ बाणभट्ट लिख रहा था और ह्वेनसांग पढ़ रहा था — पर नर्मदा के दक्षिण में हर्ष का घोड़ा कभी नहीं बढ़ सका।

606 ई.राज्यारोहण एवं हर्ष संवत् का आरंभ
लगभग 618–19 ई.पुलकेशिन द्वितीय से नर्मदा पर अवरोध
630–643 ई.ह्वेनसांग की भारत-यात्रा
647 ई.हर्ष की मृत्यु — साम्राज्य का विघटन

01गुप्तोत्तर परिदृश्य The Post-Gupta Landscape

छठी सदी के मध्य तक गुप्त साम्राज्य के स्थान पर अनेक क्षेत्रीय शक्तियाँ खड़ी हो गई थीं। हर्ष की कहानी इन्हीं शक्तियों के बीच से निकलती है — और इसी में उसकी सफलता एवं सीमा दोनों छिपी हैं।

राज्य / वंशकेन्द्रप्रमुख शासक एवं भूमिका
पुष्यभूति (वर्धन)थानेश्वर (स्थाण्वीश्वर)प्रभाकरवर्धन, राज्यवर्धन, हर्षवर्धन — आगे कन्नौज राजधानी।
मौखरिकन्नौजगृहवर्मन — हर्ष की बहन राज्यश्री का पति; इसकी हत्या से पूरा घटनाक्रम शुरू होता है।
परवर्ती गुप्तमगध एवं मालवादेवगुप्त — गृहवर्मन का हत्यारा; शशांक का सहयोगी।
गौड़बंगाल (कर्णसुवर्ण)शशांक — शैव; राज्यवर्धन की छल से हत्या का आरोप।
मैत्रकवल्लभी (सौराष्ट्र)ध्रुवसेन द्वितीय — पराजय के बाद हर्ष का जामाता बना।
वर्मनकामरूप (असम)भास्करवर्मन — हर्ष का स्थायी मित्र एवं सहयोगी।
बादामी के चालुक्यवातापि (बादामी)पुलकेशिन द्वितीय — दक्षिण में हर्ष का अवरोधक।
पल्लवकांचीमहेन्द्रवर्मन एवं नरसिंहवर्मन — चालुक्यों के प्रतिद्वंद्वी।

तालिका दाएँ-बाएँ स्क्रॉल की जा सकती है।

स्मरण रखें कि यह युग त्रिकोणीय शक्ति-संतुलन का है — उत्तर में हर्ष, दक्कन में चालुक्य, सुदूर दक्षिण में पल्लव। इसीलिए हर्ष का साम्राज्य अखिल भारतीय नहीं कहा जा सकता।

02स्रोत एवं उनकी सीमाएँ Sources and Their Limitations

स्रोतप्रकारमहत्त्व एवं सावधानी
हर्षचरितबाणभट्ट · संस्कृत आख्यायिकादरबारी कवि द्वारा लिखित जीवनी; वंश एवं आरंभिक घटनाओं का मुख्य स्रोत। सावधानी — प्रशस्ति-साहित्य; अतिरंजना स्वाभाविक, तथा विवरण हर्ष के आरंभिक वर्षों तक ही जाता है।
सी-यू-की (सी-यू-ते)ह्वेनसांग · चीनी यात्रा-वृत्तांतसमाज, धर्म, नगर, शिक्षा एवं प्रशासन का सर्वाधिक विस्तृत विवरण। सावधानी — लेखक बौद्ध भिक्षु था, अतः बौद्ध-केन्द्रित दृष्टि; तिथियों में कहीं-कहीं अशुद्धि।
बंसखेड़ा एवं मधुबन ताम्रपत्रअभिलेखभूमि-अनुदान एवं प्रशासनिक शब्दावली; बंसखेड़ा अभिलेख पर हर्ष के स्वयं के हस्ताक्षर मिलते हैं। मधुबन से शैव-निष्ठा का संकेत।
ऐहोल अभिलेखरविकीर्ति · चालुक्य पक्षपुलकेशिन द्वितीय की दृष्टि से हर्ष-संघर्ष — प्रतिपक्षी का साक्ष्य, इसीलिए विशेष मूल्यवान।
नागानंद, रत्नावली, प्रियदर्शिकाहर्ष द्वारा रचित नाटकराजा की साहित्यिक अभिरुचि एवं धार्मिक झुकाव (नागानंद में बौद्ध कथावस्तु)।
सूर्यशतकमयूरदरबारी कवि-परंपरा का उदाहरण।
सिक्केमुद्राअत्यंत अल्प — जिससे यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि मुद्रा-अर्थव्यवस्था गुप्तकाल की तुलना में सिकुड़ चुकी थी।

03वर्धन (पुष्यभूति) वंश एवं हर्ष का उत्थान The Vardhana Dynasty

वर्धन वंश की प्रारंभिक राजधानी थानेश्वर थी। इस वंश का प्रथम महत्वपूर्ण शासक प्रभाकरवर्धन हुआ, जिसने "महाराजाधिराज" उपाधि ली और जिसे हूणों के विरुद्ध सफलता के कारण "हूण-हरिण-केसरी" कहा गया।

605 ई. के आसपासप्रभाकरवर्धन की मृत्यु; राज्यवर्धन गद्दी पर
मालवा के देवगुप्त द्वारा गृहवर्मन की हत्या; राज्यश्री बंदी
राज्यवर्धन की विजय, पर गौड़ के शशांक द्वारा छल से हत्या
606 ई.हर्ष का राज्यारोहण — आयु लगभग 16 वर्ष; हर्ष संवत्
विंध्य-वन में राज्यश्री की खोज एवं रक्षा
कन्नौज का विलय एवं राजधानी का स्थानांतरण
प्रारंभिक तथ्य · परीक्षा-बिंदु
  • राज्यारोहण 606 ई. — इसी से हर्ष संवत् का आरंभ। उपाधियाँ — शीलादित्य तथा परमभट्टारक, महाराजाधिराज।
  • राजधानी थानेश्वर से कन्नौज स्थानांतरित — यही निर्णय कन्नौज को आगे चलकर उत्तर भारत का सत्ता-केन्द्र बना गया, जिसके लिए नौवीं सदी में त्रिपक्षीय संघर्ष हुआ।
  • आरंभ में उसने विनम्रता से "राजपुत्र" एवं "शीलादित्य" जैसी उपाधियाँ लीं; बहन राज्यश्री के साथ संयुक्त शासन की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है।
  • स्थायी मित्रता — कामरूप के भास्करवर्मन से; यह गठबंधन शशांक के विरुद्ध निर्णायक रहा।

04सैन्य अभियान एवं साम्राज्य-विस्तार Military Campaigns

क्षेत्र / प्रतिपक्षीपरिणामटिप्पणी
कन्नौज (मौखरि रिक्तता)विलयबहन की रक्षा के साथ-साथ राजनीतिक लाभ; नई राजधानी।
मालवा — देवगुप्तपराजितभाई-बहन पर हुए अत्याचार का प्रतिशोध।
गौड़ — शशांकक्रमिक पराजयभास्करवर्मन के सहयोग से; शशांक की मृत्यु के बाद बंगाल पर प्रभाव।
वल्लभी — ध्रुवसेन द्वितीयपराजित, फिर मित्रअपनी पुत्री का विवाह उससे किया — युद्ध के बाद वैवाहिक कूटनीति का उदाहरण।
कोंगोद एवं उड़ीसा क्षेत्रअधीनपूर्वी तट तक विस्तार; गंजाम अभिलेख से संकेत।
सिंधअस्पष्टबाणभट्ट का दावा है, पर ठोस पुष्टि नहीं — परीक्षा में "विवादित" ही लिखें।
दक्कन — पुलकेशिन द्वितीयपराजय / अवरोधनर्मदा दक्षिण-सीमा बन गई; विस्तार का अंत।

ह्वेनसांग के अनुसार हर्ष की सेना में राज्यारोहण के समय लगभग 5,000 हाथी, 20,000 अश्वारोही एवं 50,000 पदाति थे, और बाद में यह संख्या कई गुना बढ़ी। ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह सेना पूर्णतः केन्द्रीय नहीं थी — इसका बड़ा भाग सामंतों की टुकड़ियों से बनता था, और यही हर्ष की सत्ता की मूल कमज़ोरी थी।

चीन के तांग सम्राट ताई-त्सुंग के साथ राजनयिक आदान-प्रदान भी उल्लेखनीय है — हर्ष ने दूत भेजा और चीन से भी दूत-मंडल भारत आया। यह प्राचीन भारत-चीन राजनयिक सम्बन्धों का महत्वपूर्ण उदाहरण है।

05हर्ष बनाम पुलकेशिन द्वितीय Harsha and Pulakeshin II

यह इस अध्याय का सबसे निर्णायक प्रसंग है — और इसका सबसे अच्छा साक्ष्य हर्ष के अपने दरबार से नहीं, प्रतिपक्षी के दरबार से आता है।

ऐहोल अभिलेख का कथन
  • रचनाकार — रविकीर्ति, पुलकेशिन द्वितीय का दरबारी कवि; वर्ष लगभग 634 ई.।
  • हर्ष को "सकलोत्तरपथेश्वर" (सम्पूर्ण उत्तरापथ का स्वामी) कहा गया।
  • दावा — पुलकेशिन ने उस "सकलोत्तरपथेश्वर" के हर्ष को पराजित किया।
  • संघर्ष का काल लगभग 618–19 ई.; स्थल नर्मदा-क्षेत्र।
ऐतिहासिक निष्कर्ष
  • परिणाम — नर्मदा दोनों साम्राज्यों की सीमा बनी; हर्ष का दक्षिण-विस्तार रुक गया।
  • यह अभिलेख परोक्ष रूप से हर्ष की उत्तर भारत में सर्वोच्चता की भी पुष्टि करता है — शत्रु ही उसे "सम्पूर्ण उत्तर का स्वामी" कह रहा है।
  • बाणभट्ट इस पराजय पर मौन है — दरबारी स्रोत की सीमा का उत्कृष्ट उदाहरण।
  • यही कारण है कि हर्ष को अखिल भारतीय सम्राट नहीं, उत्तर भारत का सर्वोच्च शासक कहा जाता है।

06प्रशासनिक व्यवस्था Administration

हर्ष का प्रशासन गुप्त ढाँचे पर आधारित था, पर एक निर्णायक अंतर के साथ — सामंतीकरण अधिक गहरा हो चुका था। अधिकारियों को वेतन नकद के बजाय भूमि में दिया जाने लगा, और यही केन्द्रीय सत्ता के क्षरण का बीज था।

प्रमुख अधिकारी

  • अवंति — युद्ध एवं शांति (विदेश) का प्रमुख।
  • सिंहनाद — महासेनापति; कुंतल — अश्वसेना प्रमुख; स्कंदगुप्त — हस्तिसेना प्रमुख।
  • भंडि — हर्ष का चचेरा भाई एवं प्रमुख मंत्री।
  • अन्य पद — मीमांसक (न्यायाधीश), अक्षपटलिक (अभिलेख), करणिक (लिपिक), दूतक (अनुदान-वाहक), महाप्रतिहार।
  • राजा स्वयं निरंतर भ्रमणशील रहता था — प्रत्यक्ष निरीक्षण की परंपरा।

प्रादेशिक इकाइयाँ एवं कर

  • क्रम — भुक्ति (प्रांत) → विषय (ज़िला) → पथकग्राम
  • अधिकारी — उपरिक, विषयपति, आयुक्तक, ग्रामिक।
  • कर — भाग (उपज का लगभग छठा भाग), हिरण्य, बलि; ह्वेनसांग के अनुसार कर-भार हल्का था।
  • राजस्व का चतुर्विध विभाजन — राजकीय व्यय, विद्वानों-कर्मचारियों का वेतन, बौद्धिक-धार्मिक कार्य एवं दान।
  • निर्णायक परिवर्तन — अधिकारियों को भूमि-अनुदान के रूप में वेतन; बंसखेड़ा एवं मधुबन ताम्रपत्र इसी के साक्ष्य।

07अर्थव्यवस्था एवं समाज — ह्वेनसांग की दृष्टि Economy and Society

ह्वेनसांग का विवरण इस काल का दर्पण है — और यह दर्पण फ़ाह्यान के दर्पण से भिन्न चित्र दिखाता है। दोनों की तुलना परीक्षा में बार-बार पूछी जाती है।

पक्षफ़ाह्यान (गुप्तकाल)ह्वेनसांग (हर्षकाल)
मार्ग-सुरक्षामार्ग सुरक्षित बताएस्वयं लूटा गया; मार्ग असुरक्षित बताए।
दंड-व्यवस्थाप्रायः अर्थदंड; मृत्युदंड नहींगंभीर अपराधों में अंग-भंग तथा अग्नि-जल परीक्षा (दिव्य परीक्षा) का उल्लेख।
नगरपाटलिपुत्र समृद्धपाटलिपुत्र एवं वैशाली क्षीण; कन्नौज, प्रयाग एवं थानेश्वर समृद्ध।
अस्पृश्यताचांडाल नगर के बाहरवही स्थिति — निवास नगर-सीमा से बाहर।
करहल्काहल्का; उपज का छठा भाग।
बौद्ध धर्मव्यापक एवं सशक्तकई क्षेत्रों में ह्रासोन्मुख; कुछ स्थानों पर विहार सूने।

अर्थव्यवस्था

  • कृषि-प्रधान एवं आत्मनिर्भर ग्राम; व्यापार एवं नगर गुप्तकाल की तुलना में क्षीण।
  • सिक्कों की अल्पता — विनिमय में मुद्रा की भूमिका घटी; लेन-देन में वस्तु-विनिमय बढ़ा।
  • भूमि-अनुदानों का विस्तार — किसान एवं भूमि दोनों सामंत के अधीन।
  • अपवाद — कन्नौज एवं प्रयाग जैसे केन्द्र, तथा पूर्वी तट से दक्षिण-पूर्व एशिया का व्यापार।

समाज

  • वर्ण-व्यवस्था कठोर; जातियों-उपजातियों का गुणन।
  • स्त्रियों की स्थिति में निरंतर गिरावट — बाल विवाह, विधवा-पुनर्विवाह पर निषेध, सती के उल्लेख।
  • अपवाद — राज्यश्री की राजनीतिक भूमिका; शासन एवं सभाओं में उपस्थिति।
  • ह्वेनसांग के अनुसार शिक्षा एवं संस्कृत का प्रतिष्ठित स्थान; ब्राह्मणों की सामाजिक श्रेष्ठता।

08धार्मिक नीति एवं दो महासभाएँ Religious Policy and Two Great Assemblies

हर्ष की धार्मिक यात्रा शैव से महायान की ओर बढ़ी, पर वह किसी एक मत का कट्टर अनुयायी नहीं रहा — यही उसका सबसे प्रशंसित गुण है।

धार्मिक झुकाव

  • कुल-परंपरा शैव एवं सूर्य-उपासना की; मधुबन ताम्रपत्र में शिव-निष्ठा का संकेत।
  • ह्वेनसांग के प्रभाव में महायान बौद्ध धर्म की ओर झुकाव; उसने अपने नाटक नागानंद में बौद्ध कथावस्तु ली।
  • पशु-वध पर प्रतिबंध, स्तूप एवं विहारों का निर्माण, धर्मशालाएँ एवं चिकित्सा-गृह।
  • निष्कर्ष — सहिष्णु बहु-धार्मिक संरक्षक; ब्राह्मण, बौद्ध एवं जैन तीनों को दान।

दो महासभाएँ

  • कन्नौज सभा (लगभग 643 ई.) — ह्वेनसांग की अध्यक्षता में महायान पर विशाल धार्मिक सम्मेलन; लगभग 20 अधीन राजा एवं हज़ारों विद्वान। बुद्ध-प्रतिमा की शोभा-यात्रा; आयोजन के दौरान अग्नि-कांड एवं हर्ष पर हत्या के प्रयास का उल्लेख।
  • प्रयाग सभा — प्रत्येक पाँच वर्ष पर आयोजित "महामोक्ष परिषद"; अंतिम सभा में हर्ष ने अपना सम्पूर्ण कोष दान कर दिया और बहन राज्यश्री से वस्त्र माँगकर पहने — त्याग का प्रसिद्ध प्रसंग।
  • इन सभाओं का राजनीतिक अर्थ भी समझें — ये सामंतों को एक मंच पर लाकर सर्वोच्चता प्रदर्शित करने के अवसर भी थे।

09नालंदा एवं शिक्षा Nalanda and Education

नालंदा महाविहार की परंपरा कुमारगुप्त प्रथम से आरंभ मानी जाती है, पर उसका स्वर्ण-काल हर्ष के समय आया — और उसका सर्वोत्तम विवरण ह्वेनसांग का है, जो वहाँ स्वयं वर्षों रहकर अध्ययन किया।

नालंदा · ह्वेनसांग के आँकड़े एवं तथ्य
  • लगभग 10,000 विद्यार्थी एवं 1,500 शिक्षक; अनेक गाँवों के राजस्व से व्यय-निर्वाह।
  • कुलपति (आचार्य) शीलभद्र — ह्वेनसांग के गुरु; उसे यहाँ योगाचार दर्शन पढ़ाया गया।
  • प्रवेश अत्यंत कठिन — द्वारपंडित के प्रश्नों में दस में से केवल दो-तीन उत्तीर्ण होते थे।
  • विषय — महायान एवं हीनयान बौद्ध दर्शन, वेद, तर्कशास्त्र, व्याकरण, चिकित्सा, गणित एवं खगोल।
  • अन्य केन्द्र — वल्लभी (जैन एवं धर्मनिरपेक्ष विद्या), वाराणसी, कांची, तक्षशिला-परंपरा एवं विक्रमशिला (परवर्ती)।
  • ह्वेनसांग भारत से लगभग 650 ग्रंथ ले गया; उसका शिष्य-विवरण "ह्वेली" द्वारा लिखा गया।

एक और चीनी यात्री इत्सिंग (I-tsing) हर्ष के बाद, सातवीं सदी के उत्तरार्ध में भारत आया और नालंदा में रहा — वह भी विहार-जीवन एवं शिक्षा-पद्धति का महत्वपूर्ण स्रोत है। इन दोनों को हर्ष-कालीन विवरण में मिलाकर न पढ़ें।

10साहित्य एवं सांस्कृतिक जीवन Literature and Culture

रचनाकारकृतिविशेषता
हर्षवर्धन (स्वयं)नागानंद, रत्नावली, प्रियदर्शिकातीन नाटक; नागानंद में जीमूतवाहन की बौद्ध कथा — राजा द्वारा रचित नाटकों का दुर्लभ उदाहरण।
बाणभट्टहर्षचरित एवं कादम्बरीसंस्कृत गद्य का शिखर; कादम्बरी विश्व के प्राचीनतम उपन्यास-रूपों में गिनी जाती है।
मयूरसूर्यशतकसूर्य-स्तुति; दरबारी कवि-परंपरा।
ह्वेनसांगसी-यू-कीयात्रा-वृत्तांत; "यात्रियों का राजकुमार" कहा जाता है।
भास्करवर्मन-दरबारकामरूप में भी संस्कृत-संरक्षण; हर्ष के साथ सांस्कृतिक आदान-प्रदान।

कला की दृष्टि से यह काल गुप्तकाल जैसा उर्वर नहीं है, पर संक्रमण का काल है। बादामी, ऐहोल एवं पट्टडकल (चालुक्य) तथा महाबलीपुरम् के रथ-मंदिर एवं मंडप (पल्लव) इसी शताब्दी की देन हैं — अर्थात् मंदिर-स्थापत्य का केन्द्र उत्तर से दक्षिण की ओर खिसक रहा था। उत्तर में नागर शैली का विकास जारी रहा, और नालंदा में विहार-स्थापत्य अपने विस्तार पर था।

11मूल्यांकन एवं पतन Assessment and Decline

647 ई. में हर्ष की मृत्यु हुई — और उसके साथ ही उसका साम्राज्य भी समाप्त हो गया। यह अकस्मात् नहीं था; इसके कारण उसकी सत्ता की संरचना में ही निहित थे।

पतन के कारण
  • कोई उत्तराधिकारी नहीं — मृत्यु के बाद उसके मंत्री अरुणाश्व (अर्जुन) ने सत्ता हथिया ली।
  • चीनी दूत-मंडल (वांग-ह्वेन-त्से) ने नेपाल-तिब्बत की सहायता से उसे पराजित किया — विदेशी हस्तक्षेप का उल्लेखनीय प्रसंग।
  • साम्राज्य सामंतों के गठबंधन पर टिका था, स्थायी नौकरशाही पर नहीं — केन्द्र हटा, ढाँचा बिखरा।
  • व्यक्तिगत नेतृत्व पर अतिशय निर्भरता; संस्थागत निरंतरता का अभाव।
  • आर्थिक आधार क्षीण — व्यापार एवं मुद्रा का ह्रास।
उपलब्धियाँ
  • विखंडित उत्तर भारत का पुनः एकीकरण — चालीस वर्ष की सापेक्ष स्थिरता।
  • कन्नौज को उत्तर भारत का सत्ता-केन्द्र बनाया — जिसका महत्त्व सदियों तक रहा।
  • विद्या-संरक्षण — नालंदा का उत्कर्ष, बाणभट्ट-मयूर का दरबार, स्वयं नाटककार।
  • धार्मिक सहिष्णुता एवं लोक-कल्याण (धर्मशाला, चिकित्सालय, दान)।
  • भारत-चीन राजनयिक सम्बन्धों का सुदृढ़ीकरण।
परीक्षा-दृष्टि · तीन सावधानियाँ
  • हर्ष को "अंतिम महान हिंदू सम्राट" कहना भ्रामक है — उसी समय चालुक्य एवं पल्लव समान रूप से शक्तिशाली थे, और आगे चोल, राजपूत तथा विजयनगर जैसी सत्ताएँ आईं।
  • उसका साम्राज्य अखिल भारतीय नहीं था — दक्षिण-सीमा नर्मदा पर रुक गई; इसे "उत्तर भारत की सर्वोच्च सत्ता" कहना शुद्ध है।
  • हर्ष मौर्य-गुप्त परंपरा का उत्तराधिकारी नहीं, प्रारंभिक मध्यकाल का पूर्वाभास है — सामंती ढाँचा, भूमि-अनुदान, क्षेत्रीय राज्यों का संतुलन। इसीलिए अनेक इतिहासकार उसके काल से प्रारंभिक मध्यकाल की गणना करते हैं।

12स्वयं जाँच Self Test — 15 Questions

प्रत्येक प्रश्न का एक ही प्रयास मिलेगा। अंक 0 / 15
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