प्रागैतिहासिक एवं प्राचीन काल (पाषाण काल से गुप्त साम्राज्य तक)
मुख्य विषय
छत्तीसगढ़ में पाषाण युगीन बस्तियां, महाकाव्य काल में दक्षिण कोसल की भौगोलिक स्थिति, और मौर्य, सातवाहन व गुप्त साम्राज्यों के अधीन क्षेत्र का महत्व।
प्रमुख शब्दावली
शैलचित्र (Rock Art) · सिंघनपुर · जोगीमारा गुफा · सुतनुका-देवदत्त · किरारी काष्ठ स्तंभ · प्रयाग प्रशस्ति · महाकान्तार।
परीक्षक इसे क्यों पसंद करते हैं
CGPSC में अक्सर पुरातात्विक स्थलों की खोज और उनसे संबंधित काल (जैसे मध्य पाषाण काल = कबरा पहाड़) का सीधा मिलान पूछा जाता है।
❧1. प्रागैतिहासिक काल (पाषाण काल)
- पूर्व पाषाण काल: सिंघनपुर गुफा (रायगढ़) — यहाँ से हस्तचलित कुदाल (Hand Axe) और सीढ़ीनुमा मानवाकृति के शैलचित्र मिले हैं। खोजकर्ता: एंडरसन (1910)।
- मध्य पाषाण काल: कबरा पहाड़ (रायगढ़) — सर्वाधिक शैलचित्र यहीं से प्राप्त हुए हैं (लाल रंग की छिपकली, घड़ियाल, सांभर)। यहाँ से अर्धचंद्राकार लघु पाषाण औज़ार (Microliths) भी मिले हैं।
- उत्तर पाषाण काल: धनपुर (गौरेला-पेंड्रा-मरवाही) और महानदी घाटी क्षेत्र।
- नव पाषाण काल: टेरम (रायगढ़), अर्जुनी (दुर्ग), चितवाडोंगरी (राजनांदगांव) — यहाँ से छिद्रित पत्थर के औज़ार प्राप्त हुए हैं।
- महापाषाण काल (Megalithic): बालोद ज़िले के करहीभदर, चिरचारी, सोरर और कोंडागांव के गढ़धनोरा (500 से अधिक पाषाण घेरे)।
❧2. रामायण एवं महाभारत काल
रामायण काल
- इस क्षेत्र को दक्षिण कोसल (राजधानी: कुशस्थली) और बस्तर क्षेत्र को दंडकारण्य कहा जाता था।
- मान्यता है कि राम ने अपने वनवास का अधिकांश समय दंडकारण्य में बिताया। प्रमुख स्थल: रामगढ़ (सरगुजा), शिवरीनारायण (शबरी आश्रम), वाल्मीकि आश्रम (तुरतुरिया)।
महाभारत काल
- इस क्षेत्र को प्राक्-कोसल और बस्तर क्षेत्र को कांतार कहा गया।
- प्रमुख स्थल: चित्रांगदपुर (सिरपुर - बभ्रुवाहन की राजधानी), रतनपुर (मणिपुर - मोरध्वज की राजधानी), खल्लारी (लाक्षागृह)।
❧3. मौर्य एवं सातवाहन काल
- मौर्य काल: सरगुजा ज़िले की जोगीमारा गुफा से अशोक कालीन (पाली भाषा और ब्राह्मी लिपि) अभिलेख प्राप्त हुए हैं, जिसमें नर्तक देवदत्त और नर्तकी सुतनुका की प्रेम गाथा का वर्णन है। अकलतरा, ठठारी और बार से मौर्यकालीन आहत मुद्राएँ (Punch marked coins) मिली हैं।
- सातवाहन काल:
- शक्ति ज़िले के गुंजी (ऋषभतीर्थ) से कुमारदत्त का शिलालेख मिला है (राजा अपीलक का उल्लेख)।
- सक्ती के किरारी ग्राम से 1921 में एक काष्ठ स्तंभ (Wooden Pillar) प्राप्त हुआ (वर्तमान में महंत घासीदास संग्रहालय, रायपुर में सुरक्षित) जिसमें सातवाहन कालीन अधिकारियों के नाम हैं।
- चकरबेड़ा (बिलासपुर) से रोम के स्वर्ण सिक्के मिले हैं, जो अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को दर्शाते हैं।
❧4. गुप्त काल और वाकाटक वंश
- हरिषेण की प्रयाग प्रशस्ति: इसके अनुसार, गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त ने अपने दक्षिणापथ अभियान के दौरान कोसल के राजा महेन्द्र और महाकान्तार (बस्तर) के राजा व्याघ्रराज को हराया था।
- बानाबरद (दुर्ग) और पिटाईवल (रायपुर) से गुप्तकालीन सिक्के प्राप्त हुए हैं।
- वाकाटक वंश: इनकी राजधानी नंदीवर्धन (नागपुर) थी। प्रवरसेन, महेंद्रसेन और पृथ्वीसेन प्रमुख शासक थे। वाकाटकों और गुप्तों के बीच वैवाहिक संबंध थे (प्रभावती गुप्त का विवाह रुद्रसेन द्वितीय से हुआ)।
- कवि कालिदास ने वाकाटक नरेश प्रवरसेन द्वितीय के दरबार में यात्रा की थी और सरगुजा के रामगढ़ की पहाड़ियों में मेघदूतम् की रचना की थी।
PYQ रडार
- CGPSC Pre: किस गुफा में सुतनुका और देवदत्त की प्रेम कथा का वर्णन है? (उत्तर: जोगीमारा गुफा)
- CGPSC Mains: छत्तीसगढ़ में प्रागैतिहासिक कालीन शैलचित्रों की विशेषताओं का वर्णन करें। (8 अंक)
प्रमुख क्षेत्रीय राजवंश (4थी–12वीं सदी)
मुख्य विषय
स्थानीय शक्तियों का उदय, सिरपुर का एक प्रमुख सांस्कृतिक और धार्मिक केंद्र के रूप में विकास, और पांडुवंश के अधीन छत्तीसगढ़ का स्वर्ण युग।
प्रमुख शब्दावली
आरंग ताम्रपत्र · शरभपुर · प्रसन्नमात्र · महाशिवगुप्त बालार्जुन · लक्ष्मण मंदिर · किया-को-लो (Kiao-Kio-Lo)।
परीक्षक इसे क्यों पसंद करते हैं
महासमुंद (सिरपुर) और बिलासपुर (मल्हार, तालागांव) के पुरातात्विक महत्व को समझने के लिए क्षेत्रीय राजवंशों का ज्ञान अत्यंत महत्वपूर्ण है। शासकों का सही क्रम अक्सर पूछा जाता है।
❧1. राजर्षितुल्य कुल वंश (5वीं - 6ठी शताब्दी)
- यह छत्तीसगढ़ का पहला ज्ञात स्थानीय राजवंश माना जाता है।
- राजधानी: संभवतः आरंग (रायपुर)।
- आरंग ताम्रपत्र (भीमसेन द्वितीय): इस ताम्रपत्र से इस वंश के 6 शासकों के नाम मिलते हैं: शूर, दयित प्रथम, विभीषण, भीमसेन प्रथम, दयित द्वितीय, और भीमसेन द्वितीय।
- उपाधि: ये संभवतः गुप्तों के अधीन थे, क्योंकि वे 'महाराज' की उपाधि धारण करते थे।
❧2. शरभपुरीय वंश (5वीं - 6ठी शताब्दी)
- संस्थापक: शरभराज। राजधानी: शरभपुर (वर्तमान सिरपुर या सारंगढ़ के पास)।
- प्रसन्नमात्र: इस वंश का प्रतापी शासक। इसने निडिला नदी (लीलागर) के तट पर प्रसन्नपुर (वर्तमान मल्हार) शहर बसाया और गरुड़, शंख, चक्र युक्त सोने व चांदी के सिक्के चलाए।
- जयराज और सुदेवराज: सुदेवराज ने इंद्रबल (पांडुवंशी) को सर्वाधिकारी नियुक्त किया था, जिसने बाद में सत्ता पलट दी।
- धर्म: ये परम भागवत (वैष्णव धर्म) के अनुयायी थे। इनके ताम्रपत्रों पर गज़लक्ष्मी का चित्र अंकित होता था।
❧3. सिरपुर का पांडुवंश (6ठी - 7वीं शताब्दी)
- संस्थापक: उदयन (कालिंजर शिलालेख के अनुसार), लेकिन वास्तविक सत्ता इंद्रबल ने स्थापित की। राजधानी: श्रीपुर (सिरपुर)।
- महाशिव तीवरदेव: इसने सकलकोसलाधिपति की उपाधि धारण की। इसने वैष्णव धर्म को संरक्षण दिया।
- हर्षगुप्त: इसका विवाह मगध के मौखरी राजा सूर्यवर्मा की पुत्री महारानी वसाटा देवी से हुआ था।
- महारानी वसाटा देवी: हर्षगुप्त की मृत्यु के बाद, उसकी स्मृति में सिरपुर में लाल ईंटों से प्रसिद्ध लक्ष्मण मंदिर (वैष्णव मंदिर) का निर्माण करवाया, जो पंचायतन शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है।
महाशिवगुप्त बालार्जुन का स्वर्ण युग
- यह पांडुवंश का सबसे प्रतापी शासक था। यह शैव धर्म का अनुयायी था (उपाधि: परम महेश्वर), लेकिन सभी धर्मों (बौद्ध, जैन) के प्रति सहिष्णु था।
- इसके शासनकाल में चीनी यात्री ह्वेनत्सांग (639 ई.) ने सिरपुर (किया-को-लो) और मल्हार की यात्रा की थी।
- बालार्जुन के काल को छत्तीसगढ़ (दक्षिण कोसल) के इतिहास का स्वर्ण युग कहा जाता है क्योंकि इस समय कला, वास्तुकला और धर्म का अभूतपूर्व विकास हुआ।
❧4. अन्य छोटे राजवंश
- नल वंश (बस्तर): संस्थापक: वराहराज। प्रतापी शासक: भवदत्त वर्मन, विलासतुंग (राजीव लोचन मंदिर का निर्माण 8वीं सदी में करवाया)। इनका पांडुवंशियों और वाकाटकों से निरंतर संघर्ष चलता रहा।
- बाण वंश (पाली): शासक विक्रमादित्य ने कोरबा के पाली में शिव मंदिर का निर्माण करवाया। कलचुरि शासक शंकरगण द्वितीय ने इन्हें पराजित किया।
- सोमवंश (कांकेर): सिंहराज इसके संस्थापक थे।
PYQ रडार
- CGPSC Pre: सिरपुर के लक्ष्मण मंदिर का निर्माण किसने करवाया था? (उत्तर: रानी वसाटा देवी)
- CGPSC Mains: महाशिवगुप्त बालार्जुन के काल को छत्तीसगढ़ का स्वर्ण युग क्यों कहा जाता है? (10 अंक)
कलचुरि राजवंश एवं बस्तर के वंश (1000–1741)
मुख्य विषय
छत्तीसगढ़ में सबसे लंबे समय तक शासन करने वाला राजवंश (कलचुरि), उनकी प्रशासनिक व्यवस्था (गढ़ प्रणाली), और बस्तर क्षेत्र का स्वतंत्र ऐतिहासिक विकास।
प्रमुख शब्दावली
त्रिपुरी · तुम्माण · रतनपुर · गढ़ (Garh) · लहूरी शाखा · छिंदक नागवंश · काकतीय · दंतेश्वरी माता।
परीक्षक इसे क्यों पसंद करते हैं
कलचुरियों की "गढ़" व्यवस्था ने ही संभवतः इस क्षेत्र का नाम "छत्तीस-गढ़" रखा। उनके द्वारा बनवाए गए मंदिर और तालाब आज भी प्रमुख पर्यटन स्थल हैं।
❧1. रतनपुर के कलचुरि (1000 ई. - 1741 ई.)
यह त्रिपुरी (जबलपुर) के कलचुरियों की एक शाखा थी। छत्तीसगढ़ में इन्होंने लगभग 750 वर्षों तक शासन किया।
- कलिंगराज (1000 - 1020 ई.): छत्तीसगढ़ में कलचुरि वंश का वास्तविक संस्थापक। राजधानी: तुम्माण (वर्तमान कोरबा क्षेत्र)। महिषासुरमर्दिनी मंदिर का निर्माण करवाया।
- कमलराज: त्रिपुरी के गांगेयदेव के ओडिशा अभियान में सहायता की।
- रत्नदेव प्रथम (1045 - 1065 ई.): 1050 ई. में रतनपुर नगर बसाया और उसे अपनी राजधानी बनाया। वहाँ महामाया मंदिर का निर्माण करवाया।
- पृथ्वीदेव प्रथम (1065 - 1090 ई.): सकलकोसलाधिपति की उपाधि। रतनपुर का विशाल तालाब और तुम्माण में पृथ्वीदेवेश्वर मंदिर बनवाया। लाफागढ़ का किला बनवाया।
- जाजल्लदेव प्रथम (1090 - 1120 ई.): सबसे प्रतापी शासक। इसने बस्तर के सोमेश्वर देव (नागवंशी) को हराया। जांजगीर (जाजल्लपुर) शहर बसाया और विष्णु मंदिर (अपूर्ण) बनवाया। स्वतंत्र रूप से सोने और तांबे के सिक्के चलाए।
- कल्याण साय (16वीं सदी): ये मुग़ल सम्राट अकबर के समकालीन थे। ऐसा माना जाता है कि ये 8 वर्षों तक दिल्ली दरबार में रहे (जहांगीर/अकबर का विवादित कालक्रम, लेकिन राजस्व पुस्तिका जमाबंदी प्रणाली शुरू की)।
❧2. रायपुर के कलचुरि (लहूरी शाखा)
- 14वीं शताब्दी के अंत में रतनपुर शाखा से अलग होकर स्थापित।
- संस्थापक: केशवदेव या रामचंद्र देव (ब्रह्मदेव राय के पिता)।
- ब्रह्मदेव राय: 1409 ई. में रायपुर नगर बसाया (अपने पुत्र ब्रह्मदेव के नाम पर रामचंद्र ने बसाया, या ब्रह्मदेव ने खुद, स्रोतों में मतभेद है)। दूधाधारी मठ का निर्माण बलभद्र दास द्वारा इन्हीं के काल में हुआ।
- अंतिम शासक: अमरसिंह (जिसे मराठों ने पदच्युत कर दिया)।
प्रशासनिक व्यवस्था (गढ़ प्रणाली)
कलचुरि साम्राज्य गढ़ों में बंटा था। शिवनाथ नदी के उत्तर में 18 गढ़ (रतनपुर शाखा) और दक्षिण में 18 गढ़ (रायपुर शाखा) थे। प्रत्येक गढ़ में 84 गाँव (चौरासी) होते थे। गढ़ का प्रमुख दीवान, और 12 गाँवों (बरहों) का प्रमुख दाऊ कहलाता था। गाँव का प्रमुख गोटिया होता था।
❧3. बस्तर के राजवंश
छिंदक नागवंश (1023 - 1324 ई.)
- राजधानी: बारसूर (दंतेवाड़ा)। ये चक्रकोट (बस्तर) के स्वामी कहलाते थे।
- धारावर्ष: इसका सेनापति चंद्रादित्य था, जिसने बारसूर में चंद्रादित्येश्वर मंदिर, मामा-भांजा मंदिर, और बत्तीसा मंदिर बनवाया।
- सोमेश्वर देव: जाजल्लदेव प्रथम (कलचुरि) से पराजित हुआ था।
काकतीय वंश (1324 ई. से 1948 तक)
- संस्थापक: अन्नमदेव (वारंगल से आए)। इन्होंने दंतेवाड़ा में इष्टदेवी दंतेश्वरी माता का मंदिर बनवाया।
- पुरुषोत्तम देव: जगन्नाथ पुरी की यात्रा की और 'रथपति' की उपाधि प्राप्त की। बस्तर में गोंचा पर्व (रथ यात्रा) की शुरुआत की।
- दलपत देव: मराठों (नीलू पंडित) का आक्रमण 1770 में हुआ जिसे दलपत देव ने विफल कर दिया। राजधानी जगदलपुर स्थानांतरित की।
- प्रवीर चंद्र भंजदेव: बस्तर रियासत के अंतिम शासक, जिन्होंने भारतीय संघ में विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए।
मराठा शासन प्रणाली (1741–1854)
मुख्य विषय
कलचुरि सत्ता का पतन, मराठों द्वारा नागपुर से नियंत्रण, नई प्रशासनिक प्रणालियों (सूबेदारी, परगना) की शुरुआत, और ब्रिटिश हस्तक्षेप का पहला दौर।
प्रमुख शब्दावली
बिम्बाजी भोंसले · सूबेदार · परगना पद्धति · कमाविसदार · कैप्टन एग्न्यू · व्यपगत का सिद्धांत (Doctrine of Lapse)।
परीक्षक इसे क्यों पसंद करते हैं
मराठा प्रशासन की राजस्व प्रणाली और ब्रिटिश अधीक्षकों द्वारा किए गए सुधार (जैसे राजधानी परिवर्तन) CGPSC के पसंदीदा विषय हैं।
❧1. मराठा आक्रमण और अप्रत्यक्ष शासन (1741 - 1758)
- 1741 में नागपुर के भोंसले शासक रघुजी प्रथम के सेनापति भास्कर पंत ने रतनपुर पर आक्रमण किया। कलचुरि शासक रघुनाथ सिंह ने बिना लड़े आत्मसमर्पण कर दिया।
- प्रारंभ में मराठों ने कलचुरि शासकों (रघुनाथ सिंह और मोहन सिंह) को करद (tributary) राजा के रूप में शासन करने दिया।
❧2. बिम्बाजी भोंसले का प्रत्यक्ष शासन (1758 - 1787)
- रघुजी प्रथम के पुत्र बिम्बाजी ने रतनपुर को राजधानी बनाकर प्रत्यक्ष मराठा शासन शुरू किया।
- उन्होंने रतनपुर में रामटेकरी मंदिर का निर्माण कराया और रायपुर-रतनपुर का एकीकरण किया।
- राजस्व के लिए परगना पद्धति की रूपरेखा तैयार की। वे स्थानीय जनता में बहुत लोकप्रिय थे। (यूरोपीय यात्री फॉरेस्टर 1790 में इनके बाद आया, लेकिन उसने इनके प्रशासन की प्रशंसा की)।
❧3. सूबेदारी प्रथा (1787 - 1818)
- बिम्बाजी की मृत्यु के बाद व्यंकोजी भोंसले ने नागपुर से ही शासन चलाने का निर्णय लिया और छत्तीसगढ़ में सूबेदार (प्रतिनिधि) नियुक्त किए। यह एक अत्यधिक शोषक और अस्थिर प्रणाली थी।
- महीपतराव दिनकर: प्रथम सूबेदार। इसके काल में यूरोपीय यात्री फॉरेस्टर आया।
- विट्ठल दिनकर: इसने परगना पद्धति को लागू किया और छत्तीसगढ़ को 27 परगनों में विभाजित किया। परगना का प्रमुख कमाविसदार होता था। इसके काल में मि. ब्लंट (1795) आया।
- बीकाजी गोपाल: इसके समय पिंडारियों का भारी उपद्रव हुआ।
- यादवराव दिवाकर: अंतिम सूबेदार।
❧4. ब्रिटिश अधीक्षकों का शासन (1818 - 1830)
- तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1818) और अप्पा साहब की हार के बाद, रघुजी तृतीय के अल्पवयस्क होने के कारण ब्रिटिश रेजिडेंट रिचर्ड जेनकिंस ने प्रशासन अपने हाथ में ले लिया।
- कैप्टन एडमंड: प्रथम ब्रिटिश अधीक्षक। डोंगरगढ़ का जमींदार विद्रोह इसी के समय हुआ।
- कैप्टन एग्न्यू (Major Agnew): सबसे महत्वपूर्ण सुधारक। 1818 में राजधानी रतनपुर से रायपुर स्थानांतरित की। परगनों की संख्या 27 से घटाकर 8 कर दी।
- कैप्टन क्रॉफर्ड: अंतिम ब्रिटिश अधीक्षक, जिसने 1830 में शासन रघुजी तृतीय को सौंप दिया।
बस्तर के जनजातीय विद्रोह (1774–1910)
| वर्ष | विद्रोह का नाम | नेतृत्वकर्ता | शासक |
|---|---|---|---|
| 1774-77 | हलबा विद्रोह | अजमेर सिंह | दरियादेव |
| 1825 | परलकोट विद्रोह | गेंद सिंह | महिपाल देव |
| 1842-54 | तारापुर विद्रोह | दलगंजन सिंह | भूपाल देव |
| 1842-63 | मेरिया विद्रोह | हिड़मा मांझी | भूपाल देव |
| 1876 | मुरिया विद्रोह | झाड़ा सिरहा | भैरम देव |
| 1910 | भूमकाल विद्रोह | गुंडाधुर | रुद्रप्रताप देव |
मुख्य विषय
बाहरी हस्तक्षेप (मराठा, ब्रिटिश, ठेकेदार), जल-जंगल-ज़मीन के अधिकारों का हनन, और आदिवासी संस्कृति (जैसे नरबलि प्रथा) पर रोक के खिलाफ तीव्र प्रतिरोध।
परीक्षक इसे क्यों पसंद करते हैं
CGPSC का सबसे पसंदीदा विषय। सीधे जोड़ी मिलान (नेतृत्वकर्ता-विद्रोह-वर्ष) या मुख्य परीक्षा में किसी एक विद्रोह के कारण और परिणाम पूछे जाते हैं।
❧विद्रोहों का विस्तृत विवरण
- हलबा विद्रोह (1774): यह बस्तर का पहला जनजातीय विद्रोह था। अजमेर सिंह ने बस्तर को मराठा और अंग्रेजों के प्रभाव से बचाने के लिए क्रांति की। इसे 'बस्तर की क्रांति का मसीहा' कहा जाता है। दरियादेव ने मराठों की मदद से इसे कुचल दिया (कोटपाड़ की संधि 1778, जिससे बस्तर मराठों के अधीन हो गया)।
- परलकोट विद्रोह (1825): आदिवासियों के शोषण (अबूझमाड़ियों पर मराठा कर) के खिलाफ। प्रतीक: धावड़ा वृक्ष की टहनी। नेता गेंद सिंह को 20 जनवरी 1825 को फांसी दे दी गई (बस्तर के प्रथम शहीद)।
- तारापुर विद्रोह (1842): मराठा दीवान द्वारा करों में वृद्धि (टकोली) के विरोध में। दलगंजन सिंह ने नेतृत्व किया।
- मेरिया विद्रोह (1842-63): ब्रिटिश अधिकारियों (कैंपबेल, मैकफर्सन) द्वारा दंतेश्वरी मंदिर में मानव बलि (मेरिया प्रथा) को रोकने के प्रयास के खिलाफ। हिड़मा मांझी ने इसका नेतृत्व किया।
- मुरिया (मुड़िया) विद्रोह (1876): दीवान गोपीनाथ कापरदास के अत्याचारों के खिलाफ। झाड़ा सिरहा के नेतृत्व में आदिवासियों ने जगदलपुर को घेर लिया था। ब्रिटिश अधिकारी मैकजॉर्ज ने इसे शांत किया।
- भूमकाल विद्रोह (1910): बस्तर का सबसे व्यापक विद्रोह। कारण: वनों का आरक्षण, शराब (सल्फी) बनाने पर प्रतिबंध, और बेगारी। प्रतीक: लाल मिर्च और आम की टहनी। नेता: नेतानार के गुंडाधुर (बस्तर का रोबिनहुड)। 1910 में कैप्टन गियर ने इसे क्रूरता से दबा दिया।
स्वतंत्रता संग्राम एवं राज्य निर्माण (1857–2000)
मुख्य विषय
1857 की क्रांति में क्षेत्रीय योगदान, राष्ट्रीय आंदोलनों (विशेषकर सविनय अवज्ञा और जंगल सत्याग्रह) का स्थानीय स्वरूप, और पृथक राज्य की मांग का राजनीतिक सफर।
प्रमुख शब्दावली
सोनाखान · हनुमान सिंह · पं. सुंदरलाल शर्मा · जंगल सत्याग्रह · डॉ. खूबचंद बघेल · MP Reorganization Act 2000।
❧1. 1857 की क्रांति और छत्तीसगढ़
- सोनाखान विद्रोह: अकाल के दौरान ज़मींदार वीर नारायण सिंह ने माखनलाल व्यापारी के गोदाम से अनाज लूटकर जनता में बांट दिया। कैप्टन स्मिथ ने उन्हें गिरफ्तार किया और 10 दिसंबर 1857 को रायपुर के जयस्तंभ चौक पर फांसी दे दी गई। वे छत्तीसगढ़ के प्रथम शहीद माने जाते हैं।
- रायपुर सिपाही विद्रोह (जनवरी 1858): मैगजीन लश्कर हनुमान सिंह ने अपने अधिकारी सार्जेंट सिडवेल की हत्या कर दी। हनुमान सिंह फरार हो गए (इन्हें छत्तीसगढ़ का मंगल पांडे कहा जाता है), लेकिन उनके 17 साथियों को फांसी दे दी गई।
❧2. राष्ट्रीय आंदोलन (1920 - 1930)
- कंडेल नहर सत्याग्रह (जुलाई 1920): धमतरी ज़िले में सिंचाई कर (जल कर) के विरोध में। नेतृत्व: पं. सुंदरलाल शर्मा, नारायणराव मेघावाले, बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव। इसी आंदोलन के लिए पं. शर्मा ने कलकत्ता जाकर महात्मा गांधी को आमंत्रित किया (20 दिसंबर 1920 को गांधीजी का प्रथम आगमन)। गांधीजी के पहुँचने से पहले ही कर माफ कर दिया गया था।
- जंगल सत्याग्रह (1930): सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान छत्तीसगढ़ में वनों के ब्रिटिश कानूनों को तोड़ने के लिए व्यापक सत्याग्रह हुए।
- रुद्री-नवागांव (धमतरी): छोटेलाल श्रीवास्तव (पुलिस फायरिंग में सिंधु कुमार शहीद)।
- तमोरा (महासमुंद): यतियतन लाल, शंकरराव गनौदवाले। एक बालिका दयावती ने ब्रिटिश अधिकारी को तमाचा मारा था।
- पोनड़ी-सीपत (बिलासपुर), मोहाबना (दुर्ग) अन्य प्रमुख केंद्र थे।
❧3. छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण का सफर
- प्रारंभिक मांग: 1924 में रायपुर ज़िला परिषद द्वारा पृथक छत्तीसगढ़ की पहली औपचारिक मांग। 1939 में त्रिपुरी अधिवेशन में पं. सुंदरलाल शर्मा ने मांग रखी।
- प्रमुख संगठन:
- 1956: छत्तीसगढ़ महासभा (डॉ. खूबचंद बघेल) - राजनांदगांव।
- 1967: छत्तीसगढ़ भ्रातृत्व संघ (Brotherhood Association) (डॉ. खूबचंद बघेल) - रायपुर।
- 1976: छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा (शंकर गुहा नियोगी)।
- 1983: छत्तीसगढ़ संग्राम मंच (शंकर गुहा नियोगी) और पृथक पार्टी (पवन दीवान)।
- राज्य गठन (2000): मध्य प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम 2000 को लोकसभा (31 जुलाई), राज्यसभा (9 अगस्त) और राष्ट्रपति के.आर. नारायणन (25 अगस्त) की मंजूरी मिली।
- 1 नवंबर 2000 को देश के 26वें राज्य के रूप में छत्तीसगढ़ का निर्माण हुआ। (प्रधानमंत्री: अटल बिहारी वाजपेयी, प्रथम मुख्यमंत्री: अजीत जोगी)।
PYQ रडार
- CGPSC Pre: गांधीजी पहली बार छत्तीसगढ़ कब आए थे? (20 दिसंबर 1920)
- CGPSC Mains: छत्तीसगढ़ के जंगल सत्याग्रहों में महिलाओं की भूमिका का मूल्यांकन करें। (8 अंक)