प्रागैतिहासिक एवं प्राचीन काल (पाषाण से गुप्त काल)
मुख्य विषय
पाषाण युगीन साक्ष्य, महाकाव्य कालीन भूगोल, और राष्ट्रीय राजवंशों के अंतर्गत छत्तीसगढ़ की राजनीतिक स्थिति।
स्मरण रखने योग्य स्थल
रामगढ़ की पहाड़ियां, बानाबरद (सिक्के), ऋषभतीर्थ (गुंजी), टेरम और चितवाडोंगरी।
❧1. प्रागैतिहासिक शैलचित्र एवं साक्ष्य
- पूर्व पाषाण काल: सिंघनपुर गुफा (रायगढ़) — छत्तीसगढ़ में मानव इतिहास का प्राचीनतम साक्ष्य। यहाँ सीढ़ीनुमा मानवाकृतियाँ तथा शिकार के लाल रंग के चित्र मिले हैं। खोजकर्ता: सी. डब्ल्यू. एंडरसन (1910)।
- मध्य पाषाण काल: कबरा पहाड़ (रायगढ़) — सर्वाधिक शैलचित्रों वाला स्थल। यहाँ से अर्धचंद्राकार लघु पाषाण औज़ार (Microliths) मिले हैं।
- नव पाषाण काल: चितवाडोंगरी (राजनांदगांव), अर्जुनी (दुर्ग) तथा टेरम (रायगढ़) से छिद्रित पाषाण औज़ार प्राप्त हुए हैं।
- महापाषाण काल (Megalithic): बालोद ज़िले के करहीभदर, सोरर और चिरचारी में विशाल पाषाण घेरे (मृतक स्मारक) मिले हैं।
❧2. महाकाव्य कालीन संदर्भ
रामायण काल: इस क्षेत्र को दक्षिण कोसल और बस्तर को दंडकारण्य कहा जाता था। भानुमंत यहाँ के शासक थे जिनकी पुत्री कौशल्या का विवाह अयोध्या नरेश दशरथ से हुआ। राम के वनवास के प्रमुख स्थल: रामगढ़ (सरगुजा), तुरतुरिया (वाल्मीकि आश्रम) और शिवरीनारायण।
महाभारत काल: इसे प्राक्-कोसल कहा गया। अर्जुन के पुत्र बभ्रुवाहन की राजधानी चित्रांगदपुर (वर्तमान सिरपुर) थी। इसके अतिरिक्त रतनपुर (मणिपुर) और खल्लारी (लाक्षागृह) का सीधा संबंध है।
❧3. मौर्य, सातवाहन और गुप्त साम्राज्य
- मौर्य काल: सरगुजा की जोगीमारा गुफा से मौर्यकालीन लिपि (ब्राह्मी) और भाषा (पाली) का साक्ष्य मिला है, जिसमें नर्तकी सुतनुका और देवदत्त के प्रेम का उल्लेख है। तारापुर, बार और अकलतरा से मौर्यकालीन आहत मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं।
- सातवाहन काल: जांजगीर-चंपा के पास किरारी से काष्ठ स्तंभ (1921) मिला है, जिस पर राजा के मंत्रियों और अधिकारियों के पदनाम अंकित हैं। गुंजी (सक्ती) से राजा अपीलक की मुद्रा मिली है।
- गुप्त काल: हरिषेण रचित प्रयाग प्रशस्ति के अनुसार, समुद्रगुप्त ने कोसल के राजा महेंद्र और महाकान्तार के राजा व्याघ्रराज को पराजित किया था। दुर्ग के बानाबरद से गुप्तकालीन स्वर्ण सिक्के मिले हैं।
प्रीवियस ईयर रडार
CGPSC Pre: किरारी का काष्ठ स्तंभ किस काल से संबंधित है? (उत्तर: सातवाहन काल)। जोगीमारा गुफा की लिपि क्या है? (उत्तर: ब्राह्मी)।
प्रमुख क्षेत्रीय राजवंश (4थी से 12वीं शताब्दी)
ऐतिहासिक महत्व
इस काल में छत्तीसगढ़ में स्थानीय शक्तियों का अभूतपूर्व विकास हुआ। कला, स्थापत्य और धार्मिक सहिष्णुता के दृष्टिकोण से पांडुवंश का शासनकाल सिरपुर के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ।
❧1. राजर्षितुल्य कुल एवं शरभपुरीय वंश
- राजर्षितुल्य कुल: छत्तीसगढ़ का प्रथम स्थानीय राजवंश। राजधानी: आरंग (रायपुर)। राजा भीमसेन द्वितीय के आरंग ताम्रपत्र से इस वंश का परिचय मिलता है।
- शरभपुरीय वंश: संस्थापक शरभराज थे। इस वंश के प्रतापी राजा प्रसन्नमात्र ने लीलागर (निडिला) नदी के तट पर 'प्रसन्नपुर' (वर्तमान मल्हार) नगर बसाया और गरुड़, शंख चक्र अंकित सोने के सिक्के चलाए।
- स्थापत्य साक्ष्य: तालागांव का प्रसिद्ध देवरानी-जेठानी मंदिर (बिलासपुर), जो छत्तीसगढ़ का सबसे प्राचीन मंदिर माना जाता है, इसी काल की देन है।
❧2. सिरपुर का पांडुवंश (स्वर्ण काल)
- महारानी वसाटा देवी: इन्होंने अपने पति हर्षगुप्त की स्मृति में सिरपुर में लाल ईंटों से निर्मित सुप्रसिद्ध लक्ष्मण मंदिर का निर्माण कराया, जो नागर/पंचायतन शैली का अद्भुत नमूना है।
- महाशिवगुप्त बालार्जुन: यह पांडुवंश का सर्वाधिक प्रतापी राजा था। इसके 57 वर्षों के दीर्घकालीन शासन को छत्तीसगढ़ का स्वर्ण युग कहा जाता है। बालार्जुन स्वयं परम महेश्वर (शैव) थे, परंतु उनके काल में बौद्ध विहारों और जैन मंदिरों का समान रूप से विकास हुआ।
- ह्वेनत्सांग की यात्रा: चीनी बौद्ध भिक्षु ह्वेनत्सांग ने 639 ईस्वी में सिरपुर ('किया-को-लो') की यात्रा की थी और बौद्ध धर्म के फलने-फूलने का विस्तृत वर्णन अपनी पुस्तक सी-यू-की में किया।
❧3. नल वंश एवं बाण वंश
नल वंश: बस्तर (चक्रकोट) क्षेत्र में सक्रिय। वाकाटकों के साथ इनका भीषण संघर्ष हुआ। राजा बिलासतुंग ने राजीव (राजिम) में सुप्रसिद्ध राजीव लोचन मंदिर (8वीं सदी) का निर्माण करवाया था, जो स्थापत्य कला का उत्कृष्ट केंद्र है।
बाण वंश: पाली (कोरबा) क्षेत्र में इनका नियंत्रण था। राजा विक्रमादित्य ने पाली के भव्य शिव मंदिर का निर्माण कराया, जिसका जीर्णोद्धार बाद में कलचुरी राजा जाजल्लदेव प्रथम ने किया।
कलचुरि राजवंश एवं बस्तर के काकतीय (1000 ई.–1741 ई.)
प्रशासनिक ढांचा
कलचुरियों ने इस क्षेत्र पर सबसे लंबे समय तक शासन किया। उनकी गढ़ व्यवस्था ने ही छत्तीसगढ़ को उसका भौगोलिक नाम और एक संगठित राजनीतिक पहचान प्रदान की।
❧1. रतनपुर के कलचुरि (मुख्य शाखा)
- कलिंगराज (1000 ई.): त्रिपुरी के कलचुरियों से अलग होकर इन्होंने छत्तीसगढ़ के तुम्माण में कलचुरि वंश की आधारशिला रखी।
- रत्नदेव प्रथम (1050 ई.): इन्होंने रतनपुर नगर की स्थापना की और इसे नई राजधानी बनाया। रतनपुर को 'तालाबों का शहर' और 'कुबेरपुर' भी कहा जाता था। यहाँ उन्होंने प्रसिद्ध महामाया मंदिर का निर्माण कराया।
- जाजल्लदेव प्रथम (1090 ई.): अत्यंत पराक्रमी शासक। इन्होंने बस्तर के छिंदक नागवंशी राजा सोमेश्वर देव को बंदी बनाया। अपने नाम पर जाजल्लपुर (वर्तमान जांजगीर) नगर बसाया तथा वहाँ के भव्य विष्णु मंदिर का निर्माण आरंभ कराया।
- कल्याण साय: मुग़ल प्रशासन प्रणाली के संपर्क में आए। इन्होंने राजस्व व्यवस्था के लिए जमाबंदी प्रणाली की शुरुआत की।
❧2. रायपुर शाखा (लहूरी शाखा)
14वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में कलचुरि वंश दो भागों में विभाजित हो गया। रामचंद्र देव ने रायपुर शाखा की स्थापना की तथा अपने पुत्र ब्रह्मदेव राय के नाम पर 1409 ई. में रायपुर नगर बसाया। रायपुर शाखा के अंतिम स्वतंत्र शासक अमरसिंह थे।
❧3. बस्तर के राजवंश
छिंदक नागवंश (1023-1324 ई.): बस्तर (चक्रकोट) में शासन। राजधानी बारसूर थी। राजा धारावर्ष के सेनापति चंद्रादित्य ने बारसूर में प्रसिद्ध बत्तीसा मंदिर और मामा-भांजा मंदिर का निर्माण कराया था।
काकतीय वंश (1324 ई. से): वारंगल के प्रतापी राजा प्रताप रुद्रदेव के भाई अन्नमदेव ने बस्तर में काकतीय वंश की स्थापना की। इन्होंने दंतेवाड़ा में शंखिनी-डंकिनी नदी के संगम पर इष्टदेवी दंतेश्वरी माता मंदिर की स्थापना की। राजा पुरुषोत्तम देव ने पुरी के राजा से 'रथपति' की उपाधि प्राप्त की और बस्तर में प्रसिद्ध गोंचा पर्व (रथ यात्रा) की शुरुआत की।
मराठा शासन प्रणाली एवं ब्रिटिश नियंत्रण (1741–1854)
❧1. मराठा आक्रमण एवं बिम्बाजी भोंसले
- आक्रमण (1741): नागपुर के भोंसले राजा रघुजी प्रथम के सेनापति भास्कर पंत ने रतनपुर पर आक्रमण कर कलचुरि सत्ता का अंत किया। प्रारंभ में यहाँ अप्रत्यक्ष मराठा शासन रहा।
- बिम्बाजी भोंसले (1758-1787): छत्तीसगढ़ के प्रथम प्रत्यक्ष मराठा शासक। इन्होंने रतनपुर को अपना केंद्र बनाया। रतनपुर का प्रसिद्ध रामटेकरी मंदिर इन्हीं की देन है। उन्होंने रायपुर और रतनपुर के प्रशासनों का व्यावहारिक एकीकरण किया।
❧2. सूबेदारी व्यवस्था (अत्यधिक शोषक काल)
व्यंकोजी भोंसले ने नागपुर से शासन करते हुए छत्तीसगढ़ में सूबेदारी प्रथा की शुरुआत की। सूबेदार पूरी तरह एक रेवेन्यू एजेंट की तरह काम करते थे, जिससे जनता का भारी उत्पीड़न हुआ।
- महीपतराव दिनकर: प्रथम सूबेदार। इनके समय यूरोपीय यात्री फॉरेस्टर ने छत्तीसगढ़ की यात्रा की थी।
- विट्ठल दिनकर: इन्होंने प्रशासनिक सुधार करते हुए परगना पद्धति लागू की। छत्तीसगढ़ के 36 गढ़ों को समाप्त कर उन्हें 27 परगनों में पुनर्गठित किया। परगना का सर्वोच्च अधिकारी 'कमाविसदार' कहलाता था।
- यादवराव दिवाकर: छत्तीसगढ़ के अंतिम सूबेदार।
❧3. ब्रिटिश अधीनता एवं ब्रिटिश अधीक्षक (1818 - 1830)
तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध के बाद, नागपुर रियासत पर ब्रिटिश नियंत्रण स्थापित हुआ और छत्तीसगढ़ को ब्रिटिश अधीक्षकों (Superintendents) के सुपुर्द किया गया।
- कैप्टन एडमंड: प्रथम ब्रिटिश अधीक्षक। इनके कार्यकाल में डोंगरगढ़ के जमींदार का विद्रोह हुआ।
- मेजर एग्न्यू (Major Agnew): सबसे महत्वपूर्ण अधीक्षक। इन्होंने 3 मई 1818 को छत्तीसगढ़ की राजधानी रतनपुर से बदलकर रायपुर स्थानांतरित की। इन्होंने परगनों की संख्या 27 से घटाकर 8 कर दी, जिससे प्रशासनिक दक्षता बढ़ी।
- कैप्टन क्रॉफर्ड: अंतिम अधीक्षक, जिन्होंने 1830 में सत्ता पुनः मराठों (भोंसले राजा रघुजी तृतीय) को सौंप दी। इसके बाद भोंसले राजाओं ने 'जिलेदारी व्यवस्था' के तहत शासन चलाया। अंततः 1854 में लॉर्ड डलहौजी के हड़प नीति (व्यपगत सिद्धांत) के तहत छत्तीसगढ़ पूर्ण रूप से ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा बन गया।
बस्तर के ऐतिहासिक जनजातीय विद्रोह (1774–1910)
ब्रिटिश और मराठों की नीतियों, जल-जंगल-ज़मीन पर कब्ज़े और बाहरी ठेकेदारों के शोषण के विरुद्ध आदिवासियों का ऐतिहासिक संघर्ष।
❧क्रांति की प्रमुख ज्वालाएँ
- हलबा विद्रोह (1774-77): बस्तर का प्रथम जनजातीय विद्रोह। राजा दरियादेव और उनके भाई अजमेर सिंह के बीच बस्तर के सिंहासन के लिए संघर्ष। अजमेर सिंह ने हलबा आदिवासियों का नेतृत्व किया। परिणामतः कोटपाड़ की संधि (1778) हुई और बस्तर स्वतंत्र अस्तित्व खोकर मराठों के अधीन आ गया।
- परलकोट विद्रोह (1825): अबूझमाड़ियों को बाहरी शोषकों से मुक्त कराने के लिए। जमींदार गेंद सिंह इसके महानायक थे। विद्रोह का प्रतीक धावड़ा वृक्ष की टहनी थी। 20 जनवरी 1825 को गेंद सिंह को फांसी दे दी गई। वे बस्तर के प्रथम शहीद कहलाते हैं।
- तारापुर विद्रोह (1842-54): दलगंजन सिंह के नेतृत्व में, मराठों द्वारा आदिवासियों पर लगाए गए अतिरिक्त कर (टकोली) के विरोध में हुआ।
- मेरिया विद्रोह (1842-63): आदिवासियों की धार्मिक परंपरा 'मेरिया प्रथा' (मानव बलि प्रथा) पर अंग्रेजों द्वारा प्रतिबंध लगाए जाने के विरोध में हिड़मा मांझी के नेतृत्व में यह दीर्घकालिक विद्रोह हुआ।
- मुरिया विद्रोह (1876): ब्रिटिश परस्त दीवान गोपीनाथ कापरदास के अत्याचारों के विरुद्ध झाड़ा सिरहा के नेतृत्व में आदिवासियों ने 'जगदलपुर घेराव' किया। बाद में जॉर्ज मैकजॉर्ज ने मध्यस्थता कर मुरिया दरबार (1876) का आयोजन किया।
- भूमकाल विद्रोह (1910): बस्तर का सबसे व्यापक, संगठित और हिंसक विद्रोह। कारण: वन नीतियों द्वारा आदिवासियों को उनके अधिकारों से वंचित करना। विद्रोह का प्रतीक लाल मिर्च और आम की टहनी थी। इसके महानायक नेतानार के गुंडाधुर थे, जिन्हें 'बस्तर का रॉबिनहुड' भी कहा जाता है।
स्वतंत्रता आंदोलन एवं पृथक छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण
❧1. 1857 की क्रांति का स्थानीय स्वरूप
- सोनाखान का विद्रोह: अकाल के समय जनता की भूख मिटाने के लिए कसडोल के व्यापारी माखनलाल के गोदाम से अनाज निकालकर बांटने के कारण सोनाखान के जमींदार वीर नारायण सिंह को ब्रिटिश सेना ने गिरफ्तार किया। 10 दिसंबर 1857 को रायपुर के जयस्तंभ चौक पर उन्हें फांसी दे दी गई। वे छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी व शहीद हैं।
- रायपुर का सैन्य विद्रोह (1858): तीसरी रेजिमेंट के मैगज़ीन लश्कर हनुमान सिंह ने ब्रिटिश सार्जेंट सिडवेल की हत्या कर दी। हनुमान सिंह को 'छत्तीसगढ़ का मंगल पांडे' कहा जाता है। उनके 17 सहयोगी सिपाहियों को सरेआम फांसी दे दी गई।
❧2. गांधीवादी आंदोलन एवं जंगल सत्याग्रह
- कंडेल नहर सत्याग्रह (1920): धमतरी के कंडेल ग्राम में अंग्रेजों द्वारा लगाए गए जबरन सिंचाई कर के विरुद्ध बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव, पं. सुंदरलाल शर्मा और नारायणराव मेघावाले ने सत्याग्रह शुरू किया। इस आंदोलन में शामिल होने के लिए 20 दिसंबर 1920 को महात्मा गांधी पहली बार छत्तीसगढ़ (रायपुर) आए। गांधीजी के आगमन की खबर मिलते ही ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा और टैक्स वापस लिया गया।
- जंगल सत्याग्रह (1930): सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान छत्तीसगढ़ में कई ऐतिहासिक जंगल सत्याग्रह हुए। महासमुंद के तमोरा जंगल सत्याग्रह में ब्रिटिश अधिकारियों की चेतावनी को दरकिनार कर एक अल्पायु बालिका दयावती ने ब्रिटिश अधिकारी को तमाचा जड़ दिया था। इसके अतिरिक्त रुद्री-नवागांव, गट्टासिली और पोनड़ी सत्याग्रह अत्यंत उग्र रहे।
- रायपुर षड्यंत्र केस (1942): भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान परसराम सोनी के नेतृत्व में युवकों ने गुप्त रूप से बम और हथियार बनाने का प्रयास किया, परंतु मुखबिरी के कारण वे पकड़े गए।
❧3. पृथक छत्तीसगढ़ राज्य का गठन
- प्रथम वैचारिक प्रयास: 1906 में सुंदरलाल शर्मा द्वारा 'छत्तीसगढ़ संकल्पना'। 1924 में रायपुर जिला परिषद द्वारा पृथक राज्य का आधिकारिक प्रस्ताव पारित किया गया।
- संगठन और संघर्ष: 1956 में डॉ. खूबचंद बघेल ने राजनांदगांव में 'छत्तीसगढ़ महासभा' का गठन किया। 1967 में उन्होंने ही 'छत्तीसगढ़ भ्रातृत्व संघ' (Brotherhood Association) की स्थापना की। 1970 के दशक में शंकर गुहा नियोगी ने 'छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा' के माध्यम से श्रमिक और जन आंदोलन खड़ा किया।
- अंतिम परिणति: भारतीय संसद द्वारा मध्य प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम 2000 पारित किया गया। 1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ भारत के 26वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। स्वर्गीय अजीत जोगी राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री बने और महामहिम दिनेश नंदन सहाय पहले राज्यपाल नियुक्त हुए।