भारतीय समाज सुधार आंदोलन एवं राष्ट्रीयता का उदय Social Reform Movements and the Rise of Nationalism
उन्नीसवीं सदी में भारत ने पहली बार स्वयं से पूछा — हमारे समाज में क्या गलत है, और उसे बदलने का अधिकार किसे है? इसी प्रश्न से सुधार आंदोलन जन्मे, और इन्हीं से आगे चलकर राष्ट्रीय चेतना का ढाँचा बना।
इस पृष्ठ में
- 01पृष्ठभूमि — उन्नीसवीं सदी का भारत
- 02बंगाल — ब्रह्म समाज एवं यंग बंगाल
- 03पश्चिम भारत — प्रार्थना एवं सत्यशोधक समाज
- 04आर्य समाज एवं शुद्धि आंदोलन
- 05वेदांत, रामकृष्ण मिशन एवं थियोसॉफी
- 06मुस्लिम, पारसी एवं सिख सुधार
- 07जाति-विरोधी एवं दक्षिण भारतीय आंदोलन
- 08स्त्री-प्रश्न एवं विधिक सुधार
- 09सुधार आंदोलनों का मूल्यांकन
- 10राष्ट्रीयता के उदय के कारक
- 11राजनीतिक संगठन एवं कांग्रेस की स्थापना
- 12स्वयं जाँच
01पृष्ठभूमि — उन्नीसवीं सदी का भारत The Nineteenth-Century Context
सुधार आंदोलन अचानक नहीं उठे। इनके पीछे तीन दबाव एक साथ काम कर रहे थे — औपनिवेशिक शासन की उपस्थिति, पश्चिमी शिक्षा एवं मुद्रण का प्रसार, और मिशनरी आलोचना, जिसने भारतीय समाज को अपनी ही प्रथाओं का उत्तर देने पर विवश किया।
क · सुधार का प्रश्न कैसे उठा How the Question Arose
अंग्रेज़ी शिक्षा ने एक ऐसा वर्ग तैयार किया जो एक साथ दो दुनियाओं में रहता था — घर में परंपरा, कॉलेज में तर्कवाद। यही वर्ग जब सती, बाल विवाह, बहुविवाह, विधवा की दशा और अस्पृश्यता को बाहरी नज़र से देखने लगा, तो असहजता ने विचार का रूप लिया। इसमें मुद्रण-यंत्र की भूमिका निर्णायक थी: पहली बार बहस अख़बारों और पुस्तिकाओं के माध्यम से सार्वजनिक हुई, न कि किसी सभा या दरबार तक सीमित।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि सुधारकों का लक्ष्य प्रायः परंपरा को नकारना नहीं, बल्कि उसके भीतर से प्रमाण खोजना था। राममोहन राय ने सती के विरुद्ध पश्चिमी नैतिकता नहीं, शास्त्र का हवाला दिया; विद्यासागर ने विधवा पुनर्विवाह के पक्ष में पराशर संहिता उद्धृत की। यही रणनीति इन आंदोलनों की सबसे बड़ी ताक़त भी थी और सबसे बड़ी सीमा भी।
ख · दो प्रवृत्तियाँ — सुधारवाद एवं पुनरुत्थानवाद Reformism and Revivalism
सुधारवादी धारा
- आधार — तर्क, मानवतावाद एवं आधुनिक ज्ञान।
- पश्चिमी शिक्षा एवं विज्ञान को स्वीकार्य माना।
- उदाहरण — ब्रह्म समाज, प्रार्थना समाज, अलीगढ़ आंदोलन।
- दृष्टि — भविष्योन्मुखी; परंपरा में संशोधन।
पुनरुत्थानवादी धारा
- आधार — अतीत की श्रेष्ठता एवं मूल स्रोत की वापसी।
- पश्चिमी प्रभाव के प्रति सतर्क एवं प्रायः आलोचनात्मक।
- उदाहरण — आर्य समाज, देवबंद आंदोलन।
- दृष्टि — अतीतोन्मुखी; विकृतियों को हटाकर "शुद्ध" रूप की स्थापना।
परीक्षा-सूत्र: यह विभाजन उपयोगी है, पर निरपेक्ष नहीं। दयानंद सरस्वती वेदों की ओर लौटने की बात करते हुए भी जाति के जन्मगत आधार एवं बाल विवाह का कड़ा विरोध करते थे — अर्थात् पुनरुत्थानवादी भाषा में सुधारवादी कार्यक्रम।
- यूरोपीय पुनर्जागरण चर्च की सत्ता से मुक्ति था; भारतीय सुधार प्रायः धर्म के भीतर रहकर हुआ।
- यह आंदोलन मुख्यतः नगरीय, अंग्रेज़ी-शिक्षित एवं उच्चजातीय मध्यवर्ग तक सीमित रहा; ग्रामीण भारत लगभग अछूता रहा।
- इसीलिए अनेक इतिहासकार "पुनर्जागरण" के स्थान पर "जागरण" या "सुधार आंदोलन" शब्द को अधिक शुद्ध मानते हैं।
- फिर भी इसका ऐतिहासिक महत्त्व निर्विवाद है — इसी ने आत्म-आलोचना एवं आत्म-सम्मान दोनों की भाषा दी।
02बंगाल — ब्रह्म समाज एवं यंग बंगाल Bengal — Brahmo Samaj and Young Bengal
बंगाल में सुधार सबसे पहले आरंभ हुआ, क्योंकि औपनिवेशिक प्रशासन, अंग्रेज़ी शिक्षा और मुद्रण — तीनों की जड़ें वहीं सबसे गहरी थीं।
क · राजा राममोहन राय 1772–1833
राममोहन राय को "आधुनिक भारत का जनक" तथा "भारतीय पुनर्जागरण का अग्रदूत" कहा जाता है। वे संस्कृत, फ़ारसी, अरबी, अंग्रेज़ी सहित अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे और उनका एकेश्वरवाद उपनिषदों, इस्लामी तौहीद तथा ईसाई नैतिकता — तीनों से पोषित था। तुहफ़त-उल-मुवाहिदीन (एकेश्वरवादियों को उपहार) उनकी आरंभिक कृति है, जबकि Precepts of Jesus में उन्होंने ईसा की नैतिक शिक्षा को चमत्कारों से अलग करके प्रस्तुत किया।
उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि सती प्रथा का उन्मूलन (1829) है, जो लॉर्ड विलियम बेंटिक के नियमन से संभव हुआ — किन्तु उसकी वैचारिक भूमि राममोहन ने तैयार की थी। उन्होंने बहुविवाह एवं स्त्री की उत्तराधिकार-हीनता का विरोध किया तथा पश्चिमी विज्ञान-शिक्षा का समर्थन करते हुए संस्कृत कॉलेज की परंपरागत योजना पर आपत्ति दर्ज की।
| संस्था / कार्य | वर्ष | विवरण |
|---|---|---|
| आत्मीय सभा | 1815 | कलकत्ता में विचार-गोष्ठी; एकेश्वरवाद एवं मूर्तिपूजा-विरोध। |
| कलकत्ता यूनिटेरियन कमेटी | 1821 | ईसाई एकेश्वरवादियों के साथ संवाद। |
| संवाद कौमुदी एवं मिरात-उल-अख़बार | 1821–22 | क्रमशः बांग्ला एवं फ़ारसी पत्र; प्रेस-स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक। |
| ब्रह्म सभा (आगे ब्रह्म समाज) | 1828 | निराकार एकेश्वरवाद; जाति, मूर्तिपूजा एवं कर्मकांड का निषेध। |
| सती प्रथा का उन्मूलन | 1829 | लॉर्ड विलियम बेंटिक द्वारा विधिक निषेध। |
| "राजा" उपाधि एवं इंग्लैंड यात्रा | 1830 | मुग़ल सम्राट अकबर द्वितीय ने उपाधि दी; 1833 में ब्रिस्टल में निधन। |
ख · ब्रह्म समाज का विकास एवं विभाजन Evolution and Splits
राममोहन के बाद देवेंद्रनाथ टैगोर ने तत्त्वबोधिनी सभा (1839) के माध्यम से आंदोलन को पुनर्जीवित किया और 1843 में ब्रह्म समाज का नेतृत्व सँभाला। उनके बाद केशवचंद्र सेन ने आंदोलन को अधिक कट्टर एवं अखिल भारतीय बनाया, पर मतभेद बढ़े और 1866 में विभाजन हुआ — आदि ब्रह्म समाज (देवेंद्रनाथ) तथा भारतवर्षीय ब्रह्म समाज (केशवचंद्र)। आगे चलकर स्वयं केशव द्वारा अपनी अल्पवयस्क पुत्री का विवाह कराने पर उनके अनुयायी नाराज़ हुए और 1878 में साधारण ब्रह्म समाज (शिवनाथ शास्त्री, आनंद मोहन बोस) बना।
ब्रह्म समाज की एक ठोस विधिक उपलब्धि नेटिव मैरिज एक्ट, 1872 है, जिसने अंतर्जातीय एवं विधवा विवाह को वैधानिक मान्यता दी।
ग · यंग बंगाल एवं विद्यासागर Young Bengal and Vidyasagar
हेनरी विवियन डेरोजियो Young Bengal
- हिंदू कॉलेज के युवा शिक्षक; 1826–31।
- कट्टर तर्कवाद — परंपरा, मूर्तिपूजा एवं जाति का खुला विरोध।
- छात्रों को स्वतंत्र चिंतन एवं प्रश्न पूछने की प्रेरणा।
- सीमा — जनता से कटा, अतिवादी एवं अल्पजीवी आंदोलन; कोई स्थायी संगठन नहीं बना।
ईश्वरचन्द्र विद्यासागर 1820–91
- विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856 — लॉर्ड कैनिंग के काल में पारित।
- शास्त्रों से ही प्रमाण जुटाकर सुधार का तर्क खड़ा किया।
- बहुविवाह एवं बाल विवाह का विरोध; स्त्री-शिक्षा के लिए अनेक विद्यालय।
- संस्कृत कॉलेज में सभी जातियों के प्रवेश का मार्ग खोला।
03पश्चिम भारत — प्रार्थना एवं सत्यशोधक समाज Western India
महाराष्ट्र में सुधार दो अलग दिशाओं में गया — एक उच्चजातीय शिक्षित वर्ग का प्रार्थना समाज, दूसरा निम्न जातियों का सत्यशोधक समाज। यह विभाजन आगे के जाति-विमर्श की भूमिका बना।
| संगठन | वर्ष | संस्थापक एवं कार्यक्रम |
|---|---|---|
| परमहंस मंडली | 1849 | महाराष्ट्र; गुप्त संगठन — जाति एवं मूर्तिपूजा का विरोध। |
| प्रार्थना समाज | 1867 | आत्माराम पांडुरंग; ब्रह्म समाज से प्रेरित। एम.जी. रानाडे एवं आर.जी. भण्डारकर ने नेतृत्व दिया। |
| सत्यशोधक समाज | 1873 | ज्योतिबा फुले; ब्राह्मणवादी वर्चस्व एवं पुरोहितवाद का प्रत्यक्ष विरोध, निम्न जातियों की शिक्षा। |
| दक्कन एजुकेशन सोसाइटी | 1884 | तिलक, आगरकर एवं चिपलूणकर; फर्ग्युसन कॉलेज की स्थापना (1885)। |
| SNDT महिला विश्वविद्यालय | 1916 | धोंडो केशव कर्वे; विधवा विवाह एवं स्त्री-शिक्षा के अग्रणी। |
| बहिष्कृत हितकारिणी सभा | 1924 | डॉ. भीमराव आंबेडकर; दलित शिक्षा, संगठन एवं अधिकार। |
ज्योतिबा एवं सावित्रीबाई फुले The Phule Couple
ज्योतिबा फुले का योगदान इसलिए विशिष्ट है कि उन्होंने सुधार को धार्मिक व्याख्या के प्रश्न से हटाकर सामाजिक सत्ता के प्रश्न पर टिका दिया। उनकी कृति गुलामगिरी (1873) जाति-व्यवस्था को धार्मिक विकृति नहीं, एक शोषण-तंत्र के रूप में देखती है। शेतकऱ्याचा आसूड में उन्होंने किसान की दुर्दशा को इसी तंत्र से जोड़ा।
सावित्रीबाई फुले ने 1848 में पुणे में लड़कियों के लिए विद्यालय आरंभ किया और भारत की प्रथम आधुनिक महिला शिक्षिकाओं में गिनी जाती हैं। 1888 में ज्योतिबा को "महात्मा" की उपाधि दी गई।
विद्या के अभाव में बुद्धि गई, बुद्धि के अभाव में नीति गई, और अंततः सब कुछ नष्ट हो गया।
ज्योतिबा फुले — भाव-अनुवाद04आर्य समाज एवं शुद्धि आंदोलन Arya Samaj
दयानंद सरस्वती ने सुधार का आधार पश्चिम में नहीं, वेदों में खोजा — और इसी से उन्हें वह सामाजिक स्वीकृति मिली जो ब्रह्म समाज को कभी नहीं मिल पाई।
मूल नाम मूलशंकर; जन्म गुजरात के टंकारा में (1824)। गुरु विरजानंद से प्रेरणा लेकर उन्होंने आर्य समाज की स्थापना बंबई में (1875) की, बाद में लाहौर इसका प्रमुख केन्द्र बना। उनका आधार-ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश है और उद्घोष — "वेदों की ओर लौटो"।
कार्यक्रम एवं योगदान
- मूर्तिपूजा, अवतारवाद, बहुदेववाद एवं पुरोहितवाद का खंडन।
- जाति का आधार जन्म नहीं, कर्म — वर्ण की कर्म-आधारित व्याख्या।
- बाल विवाह का विरोध; विधवा पुनर्विवाह एवं स्त्री-शिक्षा का समर्थन।
- शुद्धि आंदोलन — धर्मांतरितों की पुनर्वापसी।
- अस्पृश्यता का विरोध एवं स्वदेशी भावना का प्रसार।
शिक्षा की दो धाराएँ
- डी.ए.वी. धारा — लाला हंसराज; प्रथम डी.ए.वी. स्कूल लाहौर (1886)। अंग्रेज़ी एवं आधुनिक विषयों सहित।
- गुरुकुल धारा — स्वामी श्रद्धानंद; गुरुकुल कांगड़ी, हरिद्वार (1902)। वैदिक एवं संस्कृत-केन्द्रित।
- दयानंद के निधन (1883) के बाद यही दो व्याख्याएँ समानांतर चलीं।
- शुद्धि एवं संगठन जैसी गतिविधियों ने अनजाने में धार्मिक सीमाओं को कठोर किया, जिससे साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को भी आधार मिला।
- "वेद ही समस्त ज्ञान के स्रोत हैं" वाली स्थापना आधुनिक ज्ञान-मीमांसा की दृष्टि से समस्याजनक मानी जाती है।
- फिर भी आर्य समाज ने शिक्षा, स्त्री-अधिकार एवं जाति-आलोचना को उत्तर भारत के गाँव-कस्बों तक पहुँचाया — यही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।
05वेदांत, रामकृष्ण मिशन एवं थियोसॉफी Vedanta, Ramakrishna Mission and Theosophy
| व्यक्ति / संस्था | वर्ष | विवरण |
|---|---|---|
| रामकृष्ण परमहंस | 1836–86 | दक्षिणेश्वर; सभी धर्मों की मूलभूत एकता का व्यावहारिक प्रतिपादन। |
| स्वामी विवेकानंद · शिकागो धर्म-संसद | 1893 | वेदांत का विश्व-मंच पर प्रस्तुतीकरण; भारतीय आत्म-सम्मान का पुनर्जागरण। |
| रामकृष्ण मिशन | 1897 | बेलूर मठ; सेवा को साधना माना — शिक्षा, चिकित्सा एवं आपदा-राहत। |
| थियोसोफिकल सोसाइटी | 1875 | न्यूयॉर्क में मैडम ब्लावात्स्की एवं कर्नल ऑलकॉट द्वारा; 1882 में मुख्यालय अड्यार (मद्रास) आया। |
| एनी बेसेंट | 1893 से | सेंट्रल हिंदू स्कूल, बनारस (1898) — आगे चलकर काशी हिंदू विश्वविद्यालय की आधारशिला; 1916 होमरूल लीग; 1917 कांग्रेस अध्यक्ष। |
| देव समाज | 1887 | शिव नारायण अग्निहोत्री; लाहौर केन्द्रित नैतिक-सुधारवादी संगठन। |
| राधास्वामी सत्संग | 1861 | शिव दयाल साहब (आगरा); गुरु-केन्द्रित आध्यात्मिक परंपरा। |
विवेकानंद का विशिष्ट योगदान व्यावहारिक वेदांत है — यह विचार कि अद्वैत केवल दर्शन नहीं, सामाजिक कर्तव्य है। यदि सभी में एक ही आत्मा है, तो भूखे की सेवा ही ईश्वर की सेवा है। इसी से "दरिद्रनारायण" की धारणा निकली और आध्यात्मिकता पहली बार सामाजिक सेवा के संगठित रूप में बदली। राष्ट्रीय आंदोलन की एक पूरी पीढ़ी ने इसी से आत्मविश्वास पाया।
उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।
स्वामी विवेकानंद · कठोपनिषद पर आधारित आह्वान — भाव-अनुवाद06मुस्लिम, पारसी एवं सिख सुधार Muslim, Parsi and Sikh Reform
क · मुस्लिम सुधार आंदोलन Muslim Reform
| आंदोलन | वर्ष | नेतृत्व एवं स्वरूप |
|---|---|---|
| फ़राज़ी आंदोलन | 1818 से | हाजी शरीयतुल्लाह, दूदू मियाँ; पूर्वी बंगाल — धार्मिक शुद्धीकरण से आगे बढ़कर किसान-ज़मींदार संघर्ष बना। |
| वहाबी आंदोलन | 1820 के दशक से | सैयद अहमद बरेलवी; शुद्धीकरण एवं औपनिवेशिक सत्ता-विरोध। |
| वैज्ञानिक सोसाइटी | 1864 | सर सैयद अहमद ख़ान; पश्चिमी वैज्ञानिक ग्रंथों का उर्दू अनुवाद। |
| अलीगढ़ आंदोलन · MAO कॉलेज | 1875 | सर सैयद; आधुनिक अंग्रेज़ी शिक्षा द्वारा मुस्लिम समाज का उत्थान। 1920 में यह अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बना। |
| देवबंद आंदोलन | 1866 | मुहम्मद क़ासिम ननौतवी एवं रशीद अहमद गंगोही; परंपरागत धार्मिक शिक्षा। आगे चलकर महमूद-उल-हसन के नेतृत्व में स्पष्ट राष्ट्रवादी रुख। |
| अहमदिया आंदोलन | 1889 | मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद (क़ादियान); उदार व्याख्या एवं सार्वभौमिक धर्म की धारणा। |
सर सैयद की दो कृतियाँ विशेष रूप से पूछी जाती हैं — असबाब-ए-बग़ावत-ए-हिन्द (1857 के कारणों का विश्लेषण) एवं पत्रिका तहज़ीब-उल-अख़लाक़। उनकी शिक्षा-नीति प्रगतिशील थी, किन्तु कांग्रेस से दूरी की उनकी सलाह आगे चलकर पृथकतावादी राजनीति के लिए भी उद्धृत की गई।
ख · पारसी एवं सिख सुधार Parsi and Sikh Reform
पारसी सुधार
- रहनुमाई माज़्दयासनन सभा (1851) — नौरोजी फ़र्दूनजी, दादाभाई नौरोजी, एस.एस. बंगाली।
- पत्र रास्त गोफ़्तार ("सत्यवक्ता") के माध्यम से प्रचार।
- कार्यक्रम — स्त्री-शिक्षा, विवाह-सुधार एवं कर्मकांड का सरलीकरण।
- पारसी समुदाय सामाजिक सुधार में सर्वाधिक तीव्र गति से आगे बढ़ा।
सिख सुधार
- निरंकारी — दयाल दास; मूर्तिपूजा एवं कर्मकांड का विरोध।
- नामधारी (कूका) — बाबा राम सिंह; सामाजिक शुद्धि एवं औपनिवेशिक-विरोध।
- सिंह सभा (1873, अमृतसर) — शिक्षा एवं धार्मिक शुद्धीकरण; खालसा कॉलेज, अमृतसर (1892)।
- अकाली आंदोलन (1920–25) — गुरुद्वारों को महंतों से मुक्त कराना; परिणाम सिख गुरुद्वारा अधिनियम, 1925।
07जाति-विरोधी एवं दक्षिण भारतीय आंदोलन Anti-Caste and South Indian Movements
इन आंदोलनों का प्रश्न भिन्न था। ऊपर के सुधारक पूछ रहे थे "धर्म को कैसे शुद्ध किया जाए"; ये पूछ रहे थे — "सत्ता किसके पास है और वह किस आधार पर है"।
| आंदोलन / व्यक्ति | वर्ष | क्षेत्र एवं योगदान |
|---|---|---|
| श्री नारायण गुरु · SNDP योगम | 1903 | केरल, एझवा समुदाय; उद्घोष — "एक जाति, एक धर्म, एक ईश्वर"। मंदिर-प्रवेश एवं शिक्षा। |
| अय्यनकाली · साधुजन परिपालन संघम | 1907 | केरल, पुलय समुदाय; सार्वजनिक मार्ग एवं विद्यालय में प्रवेश का अधिकार। |
| जस्टिस पार्टी (साउथ इंडियन लिबरल फेडरेशन) | 1916 | तमिलनाडु; गैर-ब्राह्मण आंदोलन एवं प्रतिनिधित्व की माँग। |
| वैकोम सत्याग्रह | 1924–25 | त्रावणकोर; मंदिर के निकटवर्ती मार्गों पर सबके चलने का अधिकार। के. केलप्पन एवं गांधी की भूमिका। |
| आत्मसम्मान आंदोलन | 1925 | ई.वी. रामास्वामी नायकर 'पेरियार'; ब्राह्मणवाद, कर्मकांड एवं पुरोहित-आधारित विवाह का निषेध। |
| महाड़ सत्याग्रह (चवदार तालाब) | 1927 | डॉ. आंबेडकर; सार्वजनिक जल-स्रोत के उपयोग का अधिकार। इसी वर्ष मनुस्मृति का प्रतीकात्मक दहन। |
| कालाराम मंदिर सत्याग्रह | 1930 | नासिक; मंदिर-प्रवेश आंदोलन। |
| पूना पैक्ट | 1932 | गांधी एवं आंबेडकर; पृथक निर्वाचन के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन में आरक्षित सीटें। |
| त्रावणकोर मंदिर प्रवेश उद्घोषणा | 1936 | दशकों के आंदोलन का ठोस परिणाम; सभी हिंदुओं को मंदिर-प्रवेश। |
| वीरेशलिंगम पंतुलु | 19वीं सदी उत्तरार्ध | आंध्र; विधवा पुनर्विवाह एवं स्त्री-शिक्षा — "आंध्र का विद्यासागर"। |
08स्त्री-प्रश्न एवं विधिक सुधार The Woman Question and Legal Reform
उन्नीसवीं सदी में स्त्री प्रायः सुधार की विषय-वस्तु थी, कर्ता नहीं। बीसवीं सदी में यह बदला — तब स्त्रियाँ स्वयं संगठन बनाकर अपने प्रश्न उठाने लगीं।
| अधिनियम / प्रयास | वर्ष | विवरण |
|---|---|---|
| सती प्रथा निषेध नियमन | 1829 | लॉर्ड विलियम बेंटिक; वैचारिक भूमिका राजा राममोहन राय की। |
| हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम | 1856 | ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के प्रयासों से; लॉर्ड कैनिंग के काल में। |
| कन्या-वध निवारण अधिनियम | 1870 | शिशु-कन्या हत्या पर विधिक रोक। |
| नेटिव मैरिज एक्ट | 1872 | अंतर्जातीय एवं विधवा विवाह को वैधानिक मान्यता; ब्रह्म समाज की उपलब्धि। |
| आयु सहमति अधिनियम | 1891 | बेहरामजी मालाबारी के प्रयास; विवाह-सम्बन्ध की न्यूनतम आयु 10 से 12 वर्ष। |
| शारदा अधिनियम (बाल विवाह निरोधक) | 1929 | हरबिलास शारदा; विवाह की न्यूनतम आयु — लड़की 14, लड़का 18 वर्ष। |
| भारत स्त्री महामंडल | 1910 | सरलादेवी चौधुरानी; प्रथम अखिल भारतीय महिला संगठन। |
| वीमेन्स इंडियन एसोसिएशन | 1917 | एनी बेसेंट एवं मार्गरेट कज़िन्स; मताधिकार की माँग। |
| अखिल भारतीय महिला सम्मेलन (AIWC) | 1927 | शिक्षा एवं विधिक सुधार के लिए सर्वाधिक प्रभावी मंच। |
- तिलक ने विधेयक की अंतर्वस्तु से अधिक इस बात का विरोध किया कि विदेशी सरकार को भारतीय समाज में हस्तक्षेप का अधिकार नहीं।
- यहीं से "पहले सामाजिक सुधार या पहले राजनीतिक स्वराज्य" वाली बहस खड़ी हुई — रानाडे-गोखले बनाम तिलक।
- इस विवाद के बाद कांग्रेस ने सामाजिक प्रश्नों से दूरी बनाई और सामाजिक सम्मेलन उससे अलग हो गया।
- महत्त्वपूर्ण स्त्री-स्वर — पंडिता रमाबाई (शारदा सदन, 1889), ताराबाई शिंदे (स्त्री पुरुष तुलना, 1882) एवं बेगम रुक़ैया सख़ावत हुसैन।
09सुधार आंदोलनों का मूल्यांकन An Assessment
उपलब्धियाँ
- व्यक्ति की गरिमा एवं तर्क को सामाजिक विमर्श का आधार बनाया।
- स्त्री-प्रश्न पहली बार सार्वजनिक एवं विधिक एजेंडे में आया।
- शिक्षा-संस्थाओं का विशाल जाल — डी.ए.वी., अलीगढ़, खालसा, फर्ग्युसन, बी.एच.यू.।
- अतीत के पुनर्खोज से आत्म-सम्मान मिला, जो राष्ट्रीय आत्मविश्वास की जड़ बना।
- जाति-विरोधी आंदोलनों ने समानता को केवल आदर्श नहीं, अधिकार बनाया।
सीमाएँ
- सामाजिक आधार संकीर्ण — नगरीय, उच्चजातीय, अंग्रेज़ी-शिक्षित मध्यवर्ग।
- अधिकांश तर्क धर्म के भीतर से आए, जिससे धार्मिक पहचानें और स्पष्ट हुईं।
- शुद्धि एवं संगठन जैसी गतिविधियों ने अनजाने में साम्प्रदायिक दूरी बढ़ाई।
- पुनरुत्थानवाद ने प्रायः अतीत का महिमामंडन किया और आलोचना को कमज़ोर किया।
- उच्चजातीय सुधार एवं दलित-बहुजन आंदोलन प्रायः समानांतर चले, मिलकर नहीं।
निष्कर्षतः सुधार आंदोलन एक अधूरी किन्तु अपरिहार्य प्रक्रिया थे। इन्होंने समाज को पूरी तरह नहीं बदला, पर बदलने की भाषा, संस्थाएँ और वैधता — तीनों तैयार कर दीं। जब आगे चलकर राष्ट्रीय आंदोलन ने "स्वराज्य" की माँग की, तो उसके पीछे यही आत्मविश्वास काम कर रहा था कि हम अपने समाज को स्वयं सुधार सकते हैं, इसलिए स्वयं शासित भी हो सकते हैं।
10राष्ट्रीयता के उदय के कारक Factors in the Rise of Nationalism
भारतीय राष्ट्रवाद औपनिवेशिक शासन के विरोध में उठा, पर विडंबना यह है कि उसकी अनेक पूर्व-शर्तें स्वयं औपनिवेशिक व्यवस्था ने ही तैयार कीं।
प्रशासनिक एवं तकनीकी एकीकरण
- सम्पूर्ण देश में एक ही विधि, प्रशासन एवं मुद्रा-व्यवस्था।
- रेलवे, डाक एवं तार — विचार एवं नेता दोनों तेज़ी से आवागमन करने लगे।
- अंग्रेज़ी शिक्षित भारतीयों की साझा सम्पर्क-भाषा बनी।
- परिणाम — पहली बार "अखिल भारतीय" स्तर पर संगठन संभव हुआ।
आर्थिक शोषण की चेतना
- धन-निष्कासन सिद्धांत — दादाभाई नौरोजी, आर.सी. दत्त।
- हस्तशिल्प का विनाश एवं भारत का कच्चा-माल आपूर्तिकर्ता बनना।
- बार-बार पड़ने वाले अकाल एवं किसान की बढ़ती दरिद्रता।
- इसी से यह समझ बनी कि निर्धनता दैवी नहीं, नीतिजन्य है।
शिक्षा, प्रेस एवं विचार
- पश्चिमी उदारवाद — मिल, बर्क, रूसो, मैत्सिनी एवं गैरीबाल्डी का प्रभाव।
- प्रेस — केसरी एवं मराठा (तिलक), बंगाली (सुरेंद्रनाथ), अमृत बाजार पत्रिका, हिंदू, स्वदेशमित्रन।
- अतीत का पुनर्खोज — प्राच्यवादी शोध एवं राष्ट्रवादी इतिहासलेखन।
- साहित्य — बंकिमचन्द्र, भारतेन्दु, टैगोर, सुब्रह्मण्य भारती।
नस्लीय भेदभाव एवं प्रतिक्रियावादी नीतियाँ
- इल्बर्ट बिल विवाद (1883) — यूरोपीय विरोध ने भारतीयों को संगठन का पाठ पढ़ाया।
- लिटन की नीतियाँ — वर्नाकुलर प्रेस एक्ट एवं आयुध अधिनियम (1878)।
- ICS परीक्षा की अधिकतम आयु घटाना; सुरेंद्रनाथ बनर्जी की सेवा-समाप्ति।
- 1877 का भव्य दिल्ली दरबार, जबकि देश अकाल से जूझ रहा था।
- इल्बर्ट बिल — 1883, वायसराय रिपन; भारतीय न्यायाधीशों को यूरोपीयों पर विचारण का अधिकार। यूरोपीय विरोध के कारण संशोधित।
- वर्नाकुलर प्रेस एक्ट एवं आयुध अधिनियम — दोनों 1878, वायसराय लिटन; प्रेस एक्ट 1882 में रिपन ने निरस्त किया।
- राष्ट्रवाद के उदय में प्रेस की भूमिका पर प्रायः पूछा जाता है — 1875 तक भारत में सैकड़ों देशी भाषा-पत्र प्रकाशित हो रहे थे।
11राजनीतिक संगठन एवं कांग्रेस की स्थापना Political Associations and the Congress
क · कांग्रेस-पूर्व संगठन Pre-Congress Associations
| संगठन | वर्ष | संस्थापक एवं विशेषता |
|---|---|---|
| बंगभाषा प्रकाशिका सभा | 1836 | राममोहन के अनुयायी; प्रथम राजनीतिक स्वर। |
| लैंडहोल्डर्स सोसाइटी | 1838 | ज़मींदार-हितों तक सीमित प्रथम संगठित निकाय। |
| ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन | 1851 | कलकत्ता; चार्टर नवीनीकरण से पूर्व माँगपत्र प्रस्तुत किया। |
| ईस्ट इंडिया एसोसिएशन | 1866 | दादाभाई नौरोजी, लंदन; ब्रिटिश जनमत को प्रभावित करने का प्रयास। |
| पूना सार्वजनिक सभा | 1870 | एम.जी. रानाडे; जनता एवं सरकार के बीच सेतु। |
| इंडियन एसोसिएशन | 1876 | सुरेंद्रनाथ बनर्जी एवं आनंद मोहन बोस; अखिल भारतीय जनाधार की प्रथम गंभीर कोशिश। |
| मद्रास महाजन सभा | 1884 | दक्षिण भारत का प्रमुख मंच। |
| बंबई प्रेसीडेंसी एसोसिएशन | 1885 | फ़िरोज़शाह मेहता, के.टी. तेलंग एवं बदरुद्दीन तैयबजी। |
ख · कांग्रेस की स्थापना Founding of the Congress
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना ए.ओ. ह्यूम की पहल पर हुई। प्रथम अधिवेशन 28 दिसम्बर 1885 को बंबई के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज में हुआ, जिसकी अध्यक्षता व्योमेश चन्द्र बनर्जी ने की और जिसमें 72 प्रतिनिधि सम्मिलित हुए। पहले इसे पुणे में होना था, पर वहाँ हैजा फैल जाने के कारण स्थान बदला गया।
- यह धारणा कि ह्यूम ने कांग्रेस असंतोष निकालने के "सुरक्षा वाल्व" के रूप में बनाई — इसका स्पष्ट उल्लेख सर्वप्रथम लाला लाजपत राय ने "यंग इंडिया" (1916) में किया।
- आर.पी. दत्त ने इसे सिद्धांत का रूप दिया — कांग्रेस "ऊपर से" जन्मी संस्था थी।
- बिपन चन्द्र ने इसका खंडन किया — कांग्रेस भारतीय राजनीतिक चेतना की स्वाभाविक परिणति थी; ह्यूम ने केवल "बिजली-चालक" (lightning conductor) की भूमिका निभाई, संस्था के जनक नहीं थे।
- स्मरण रखें — ह्यूम ने स्वयं कहीं यह नहीं लिखा कि यह सुरक्षा वाल्व है।
ग · उदारवादी चरण The Moderate Phase, 1885–1905
प्रारंभिक कांग्रेस का तरीका था — प्रार्थना, याचना एवं विरोध (petition, prayer, protest)। उदारवादी नेता ब्रिटिश न्यायप्रियता में विश्वास रखते थे और संवैधानिक उपायों से क्रमिक सुधार चाहते थे। प्रमुख नेता — दादाभाई नौरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले, फ़िरोज़शाह मेहता, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, डब्ल्यू.सी. बनर्जी एवं आर.सी. दत्त।
उपलब्धियाँ
- धन-निष्कासन सिद्धांत से औपनिवेशिक शोषण का आर्थिक पर्दाफ़ाश।
- भारतीय परिषद अधिनियम, 1892 — सीमित प्रतिनिधित्व एवं बजट पर चर्चा का अधिकार।
- अखिल भारतीय राजनीतिक मंच एवं वार्षिक अधिवेशन की परंपरा।
- प्रशासनिक माँगें — ICS परीक्षा भारत में, सैन्य व्यय में कटौती, न्यायपालिका का पृथक्करण।
सीमाएँ एवं आलोचना
- सामाजिक आधार अत्यंत संकीर्ण — किसान एवं मज़दूर लगभग अनुपस्थित।
- ब्रिटिश न्यायप्रियता में अतिशय विश्वास।
- तिलक की तीखी आलोचना — इसे "राजनीतिक भिखारीपन" कहा गया।
- बंगाल विभाजन (1905) ने इस पद्धति की सीमाएँ उजागर कीं और उग्रवादी चरण का द्वार खोला।
- प्रथम अध्यक्ष — व्योमेश चन्द्र बनर्जी (1885, बंबई)। प्रथम मुस्लिम अध्यक्ष — बदरुद्दीन तैयबजी (1887, मद्रास)।
- प्रथम अंग्रेज़ अध्यक्ष — जॉर्ज यूल (1888, इलाहाबाद)। प्रथम महिला अध्यक्ष — एनी बेसेंट (1917, कलकत्ता); प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष — सरोजिनी नायडू (1925, कानपुर)।
- दादाभाई नौरोजी तीन बार अध्यक्ष रहे (1886, 1893, 1906); 1906 कलकत्ता अधिवेशन में ही मंच से "स्वराज्य" शब्द का प्रयोग हुआ।
- गोखले को गांधीजी ने अपना राजनीतिक गुरु माना।