आधुनिक भारतीय साहित्य | Modern Indian Literature
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आधुनिक भारतीय साहित्य Modern Indian Literature

मुद्रण-यंत्र, अख़बार और नवजागरण — इन तीन शक्तियों ने भारतीय साहित्य को बदल दिया। पद्य के साथ पहली बार गद्य केन्द्र में आया, उपन्यास और कहानी जैसी नई विधाएँ जन्मीं, और साहित्य राष्ट्रीय आंदोलन का सबसे तेज़ हथियार बन गया।

1873 ई.हरिश्चंद्र मैगज़ीन — भारतेन्दु युग
1882 ई.आनंदमठ — वंदे मातरम् का प्रकाशन
1913 ई.गीतांजलि — एशिया का प्रथम नोबेल
1936 ई.प्रगतिशील लेखक संघ · गोदान

01पृष्ठभूमि — मुद्रण, गद्य एवं नवजागरण Print, Prose and Renaissance

आधुनिक साहित्य की जन्म-कथा तकनीक से शुरू होती है। मुद्रण-यंत्र ने पाठक बनाए, अख़बार ने गद्य को रोज़ की भाषा बनाया, और नई शिक्षा ने ऐसा लेखक-वर्ग तैयार किया जो परंपरा और आधुनिकता — दोनों से संवाद कर रहा था।

क · पुराने से नए का अंतर What Changed

नया क्या आया
  • गद्य का प्राधान्य — निबंध, उपन्यास, कहानी, नाटक, आत्मकथा।
  • पाठक — श्रोता की जगह अकेला पढ़ने वाला मध्यवर्ग।
  • विषय — समाज-सुधार, राष्ट्र, स्त्री-प्रश्न, किसान।
  • लेखक — दरबार या मठ से मुक्त, प्रेस एवं पाठक पर निर्भर।
  • साहित्य पहली बार जनमत-निर्माण का माध्यम बना।
निरंतरता क्या रही
  • भक्ति-काव्य की लोकप्रिय उपस्थिति बनी रही।
  • संस्कृत-फ़ारसी की शास्त्रीय शिक्षा प्रारंभिक लेखकों की पूँजी थी।
  • नई विधाएँ प्रायः पुरानी कथा-परंपराओं पर खड़ी हुईं।
  • अनुवाद-परंपरा जारी रही — अब यूरोपीय भाषाओं से।

प्रारंभिक आधार-बिंदु याद रखें: फ़ोर्ट विलियम कॉलेज (1800, कलकत्ता) ने प्रशासकों को भाषा सिखाने के लिए गद्य-पुस्तकें तैयार करवाईं — यहीं से लल्लूलाल (प्रेमसागर) जैसे लेखकों का खड़ी बोली गद्य सामने आया। श्रीरामपुर मिशन प्रेस ने बांग्ला मुद्रण को गति दी, और 1826 में उदन्त मार्तण्ड (जुगल किशोर शुक्ल, कलकत्ता) हिन्दी का प्रथम समाचार-पत्र बना।

02बांग्ला नवजागरण साहित्य The Bengal Renaissance

आधुनिक भारतीय साहित्य का पहला बड़ा प्रयोगशाला बंगाल था — यहीं पहला आधुनिक उपन्यास, पहला महाकाव्य-विद्रोह और पहला विश्व-स्तरीय कवि सामने आया।

लेखकप्रमुख कृतियाँमहत्त्व
ईश्वरचन्द्र विद्यासागरबर्णपरिचय; विधवा-विवाह पर पुस्तिकाएँआधुनिक बांग्ला गद्य के शिल्पी; सुधार-लेखन का आदर्श।
माइकल मधुसूदन दत्तमेघनादवध काव्य (1861)अमित्राक्षर छंद (blank verse) का प्रयोग; रावण-पक्ष से महाकाव्य — परंपरा का साहसिक पुनर्पाठ।
बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्यायदुर्गेशनंदिनी (1865), आनंदमठ (1882)आधुनिक भारतीय उपन्यास के जनक माने जाते हैं; आनंदमठ में वंदे मातरम्। पत्रिका — बंगदर्शन।
दीनबंधु मित्रनील दर्पण (1860)नील-बागान शोषण पर नाटक; अनुवाद-प्रकाशन पर रेव. जेम्स लॉन्ग पर मुक़दमा चला।
शरतचंद्र चट्टोपाध्यायदेवदास, श्रीकांत, पथेर दाबीकरुणा एवं सामाजिक यथार्थ; पथेर दाबी (1926) राजद्रोह के आरोप में प्रतिबंधित।
काज़ी नज़रुल इस्लामविद्रोही (1922), अग्निवीणा"विद्रोही कवि"; औपनिवेशिक सत्ता एवं रूढ़ि दोनों पर प्रहार।

तालिका दाएँ-बाएँ स्क्रॉल की जा सकती है।

03रवीन्द्रनाथ टैगोर Rabindranath Tagore, 1861–1941

टैगोर आधुनिक भारतीय साहित्य के एकमात्र ऐसे व्यक्तित्व हैं जिनसे परीक्षा के प्रश्न साहित्य, संगीत, शिक्षा एवं राजनीति — चारों क्षेत्रों से बनते हैं।

साहित्यिक योगदान

  • गीतांजलि — 1913 का साहित्य नोबेल; एशिया के प्रथम नोबेल विजेता।
  • उपन्यास — गोरा, घरे बाइरे, चोखेर बालि।
  • कहानियाँ — काबुलीवाला, पोस्टमास्टर; नाटक — डाकघर, रक्तकरबी।
  • दो राष्ट्रगान के रचयिता — जन गण मन (भारत) एवं आमार सोनार बांग्ला (बांग्लादेश)।

विचार एवं सार्वजनिक जीवन

  • शांतिनिकेतन (1901) एवं विश्व-भारती (1921) की स्थापना।
  • जलियाँवाला बाग़ (1919) के विरोध में "नाइट" उपाधि का त्याग
  • गांधीजी को "महात्मा" कहने की परंपरा टैगोर से जोड़ी जाती है; टैगोर को गांधीजी ने "गुरुदेव" कहा।
  • राष्ट्रवाद पर आलोचनात्मक निबंध — अंध-राष्ट्रवाद के विरुद्ध मानवता का पक्ष।

जहाँ मन भय से मुक्त हो और मस्तक गर्व से ऊँचा हो — उसी स्वतंत्रता के स्वर्ग में, हे पिता, मेरा देश जागे।

रवीन्द्रनाथ टैगोर · गीतांजलि — भाव-अनुवाद

04हिन्दी — भारतेन्दु एवं द्विवेदी युग Bharatendu and Dwivedi Eras

क · भारतेन्दु युग (लगभग 1868–1893) The Bharatendu Era

भारतेन्दु हरिश्चंद्र (1850–85) को "आधुनिक हिन्दी साहित्य का पितामह" कहा जाता है। मात्र 35 वर्ष के जीवन में उन्होंने हिन्दी को नाटक, निबंध एवं पत्रकारिता — तीनों दिशाओं में खड़ा किया। प्रमुख नाटक — अंधेर नगरी (औपनिवेशिक-सामंती अराजकता पर व्यंग्य) एवं भारत दुर्दशा। पत्रिकाएँ — कविवचन सुधा, हरिश्चंद्र मैगज़ीन। उनका प्रसिद्ध प्रतिपादन — "निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल" — भाषा को राष्ट्रीय प्रश्न बनाता है। इसी मंडल में प्रतापनारायण मिश्र एवं बालकृष्ण भट्ट जैसे निबंधकार सक्रिय थे।

ख · द्विवेदी युग (लगभग 1893–1918) The Dwivedi Era

महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सरस्वती पत्रिका (संपादन 1903 से) के माध्यम से खड़ी बोली को हिन्दी कविता की मानक भाषा बनाया और भाषा-परिष्कार का अभियान चलाया। इसी युग के प्रतिनिधि कवि मैथिलीशरण गुप्त हैं — भारत-भारती (1912) राष्ट्रीय जागरण का घोष-काव्य बनी, और साकेत ने उर्मिला जैसे उपेक्षित पात्र को केन्द्र दिया; उन्हें "राष्ट्रकवि" कहा गया। अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' का प्रिय प्रवास खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य माना जाता है।

हिन्दी गद्य-कविता के युग · एक पंक्ति में
  • भारतेन्दु युग — नवजागरण एवं व्यंग्य · द्विवेदी युग — खड़ी बोली का मानकीकरण एवं राष्ट्रीय-नैतिक कविता।
  • छायावाद (1918–36) — व्यक्ति, प्रकृति, रहस्य · प्रगतिवाद (1936 से) — मार्क्सवादी सामाजिक यथार्थ।
  • प्रयोगवाद (1943, तार सप्तक) → नई कविता — यह क्रम NET में सीधे पूछा जाता है।

05छायावाद से नई कविता तक Chhayavad to Nai Kavita

क · छायावाद (1918–1936) The Chhayavad Quartet

कविप्रमुख कृतियाँपहचान
जयशंकर प्रसादकामायनी (1936), आँसू; नाटक — चन्द्रगुप्त, स्कंदगुप्तछायावाद का शिखर-महाकाव्य कामायनी; ऐतिहासिक नाटकों से राष्ट्रीय अतीत का पुनर्पाठ।
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'राम की शक्तिपूजा, सरोज स्मृति, भिक्षुकमुक्त छंद के प्रवर्तक; करुणा एवं विद्रोह का स्वर।
सुमित्रानंदन पंतपल्लव; चिदम्बराप्रकृति के सुकुमार कवि; चिदम्बरा पर ज्ञानपीठ (1968) — हिन्दी का प्रथम ज्ञानपीठ।
महादेवी वर्मायामा; गद्य — अतीत के चलचित्र, स्मृति की रेखाएँ"आधुनिक मीरा"; यामा पर ज्ञानपीठ (1982)। रेखाचित्र-विधा की शिखर लेखिका।

ख · राष्ट्रीय काव्यधारा एवं आगे के आंदोलन National Stream and Later Movements

कवि / चरणकृतियाँटिप्पणी
माखनलाल चतुर्वेदीपुष्प की अभिलाषा; हिमकिरीटिनी"एक भारतीय आत्मा"; हिमकिरीटिनी पर प्रथम साहित्य अकादमी पुरस्कार — हिन्दी (1955) की परंपरा में गिनती।
सुभद्राकुमारी चौहानझाँसी की रानी"खूब लड़ी मर्दानी..." — राष्ट्रीय स्मृति का सबसे प्रचलित काव्य।
रामधारी सिंह 'दिनकर'कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, उर्वशी"राष्ट्रकवि" परंपरा; उर्वशी पर ज्ञानपीठ (1972)। संस्कृति के चार अध्याय — सांस्कृतिक इतिहास।
हरिवंशराय बच्चनमधुशाला (1935)हालावाद; उमर ख़य्याम की रुबाई-परंपरा का हिन्दी रूपांतरण।
प्रगतिवाद (1936)नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचनप्रगतिशील लेखक संघ (1936, लखनऊ; अध्यक्षता प्रेमचंद) से जुड़ी काव्यधारा।
प्रयोगवाद → नई कवितातार सप्तक (1943) — संपादक अज्ञेयमुक्तिबोध (अंधेरे में), शमशेर, रघुवीर सहाय, धूमिल तक विस्तार।

06प्रेमचंद एवं हिन्दी कथा-साहित्य Premchand and Hindi Fiction

प्रेमचंद (1880–1936, मूल नाम धनपत राय) ने हिन्दी-उर्दू कथा को "तिलिस्म और जासूसी" से निकालकर किसान, गाँव और जाति के यथार्थ पर खड़ा किया — इसीलिए उन्हें "उपन्यास सम्राट" कहा जाता है।

प्रेमचंद · तथ्य जो पूछे जाते हैं

  • प्रारंभ उर्दू में "नवाब राय" नाम से; सोज़े-वतन (1908) अंग्रेज़ों ने जब्त किया — तब "प्रेमचंद" नाम अपनाया।
  • उपन्यास — सेवासदन, रंगभूमि, कर्मभूमि, गोदान (1936, कृषक-जीवन का महाकाव्य), गबन, निर्मला।
  • कहानियाँ — कफ़न, पूस की रात, शतरंज के खिलाड़ी, ईदगाह; पत्रिकाएँ — हंस (1930), जागरण।
  • प्रगतिशील लेखक संघ, 1936 (लखनऊ) के प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता — "साहित्य का उद्देश्य" भाषण।

परवर्ती कथा-साहित्य

  • जैनेन्द्र — त्यागपत्र; मनोवैज्ञानिक धारा।
  • यशपाल — झूठा सच (विभाजन का वृहत् आख्यान); क्रांतिकारी पृष्ठभूमि।
  • फणीश्वरनाथ रेणु — मैला आँचल (1954); आंचलिक उपन्यास की प्रतिष्ठा।
  • अज्ञेय — शेखर: एक जीवनी; धर्मवीर भारती — गुनाहों का देवता, अंधा युग (नाट्य-काव्य)।
  • निर्मल वर्मा — वे दिन; नई कहानी आंदोलन (राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर, मोहन राकेश)।
  • मोहन राकेश — आषाढ़ का एक दिन; आधुनिक हिन्दी नाटक का नया चरण।

07उर्दू साहित्य Urdu Literature

लेखक / कविकृतियाँ / पहचानटिप्पणी
मीर तक़ी मीरदीवान; ग़ज़ल के "ख़ुदा-ए-सुख़न"अठारहवीं सदी; दिल्ली से लखनऊ की साहित्यिक यात्रा।
मिर्ज़ा ग़ालिबदीवान-ए-ग़ालिब; पत्र-संग्रह1797–1869; अंतिम मुग़ल दरबार के साक्षी। उनके पत्र 1857 के दिल्ली-विध्वंस का मार्मिक दस्तावेज़ हैं।
अल्ताफ़ हुसैन हालीमुसद्दस-ए-हाली (1879)"मद्द-ओ-जज़्र-ए-इस्लाम"; अलीगढ़ आंदोलन की साहित्यिक भुजा। सर सैयद की जीवनी हयात-ए-जावेद भी।
मुहम्मद इक़बालतराना-ए-हिन्द (1904), बांग-ए-दरा, शिकवा"सारे जहाँ से अच्छा"; बाद का चिंतन ख़ुदी-दर्शन एवं मुस्लिम राजनीतिक विचार की ओर।
प्रगतिशील उर्दू धाराफ़ैज़ अहमद फ़ैज़, जोश, फ़िराक़फ़ैज़ — "बोल कि लब आज़ाद हैं"; फ़िराक़ गोरखपुरी को गुल-ए-नग़्मा पर ज्ञानपीठ (1969)।
सआदत हसन मंटोटोबा टेक सिंह, ठंडा गोश्तविभाजन की त्रासदी का सबसे निर्मम कथाकार; अश्लीलता के मुक़दमे झेले।
इस्मत चुग़ताईलिहाफ़, टेढ़ी लकीरस्त्री-जीवन का साहसी लेखन; प्रगतिशील आंदोलन की प्रमुख लेखिका।

08क्षेत्रीय भाषाओं का साहित्य Literature in Regional Languages

भाषाप्रमुख लेखक — कृतिटिप्पणी
मराठीज्योतिबा फुले — गुलामगिरी; केशवसुत; वि.स. खांडेकर — ययाति; कुसुमाग्रजययाति पर मराठी का प्रथम ज्ञानपीठ (1974)। केशवसुत आधुनिक मराठी कविता के प्रवर्तक।
तमिलसुब्रह्मण्य भारती — स्वदेश गीतांगल; भारतीदासनभारती राष्ट्रीय आंदोलन के अग्रणी कवि; पत्रिका "इंडिया" के संपादक।
तेलुगुगुरजाडा अप्पाराव — कन्यासुल्कम; वीरेशलिंगम पंतुलुकन्यासुल्कम (1892) — बाल-विवाह/कन्या-विक्रय पर प्रहार करने वाला युगांतरकारी नाटक।
कन्नड़कुवेम्पु — श्री रामायण दर्शनम्; शिवराम कारंत; यू.आर. अनंतमूर्ति — संस्कारकन्नड़ को सर्वाधिक ज्ञानपीठ मिले हैं; कुवेम्पु को 1967 में।
मलयालमकुमारन आशान; वल्लत्तोल; तकष़ी शिवशंकर पिल्लै — चेम्मीनकुमारन आशान — नारायण गुरु परंपरा के कवि; सामाजिक समता का स्वर।
गुजरातीनर्मद — जय जय गरवी गुजरात; गोवर्धनराम त्रिपाठी — सरस्वतीचंद्र; झवेरचंद मेघाणीगांधीजी की आत्मकथा "सत्य के प्रयोग" मूलतः गुजराती में; मेघाणी को गांधीजी ने "राष्ट्रीय शायर" कहा।
पंजाबीभाई वीर सिंह; अमृता प्रीतम — अज्ज आखाँ वारिस शाह नूँ, पिंजरअमृता प्रीतम — विभाजन-पीड़ा की सबसे मार्मिक कवयित्री; ज्ञानपीठ (1981)।
बांग्ला (परवर्ती)जीवनानंद दास — वनलता सेन; ताराशंकर, विभूतिभूषण — पथेर पांचालीपथेर पांचाली पर सत्यजित राय की कालजयी फ़िल्म।
उड़ियाफकीरमोहन सेनापति — छह माण आठ गुंठआधुनिक उड़िया कथा-साहित्य के जनक; औपनिवेशिक भू-व्यवस्था का यथार्थ।
असमियालक्ष्मीनाथ बेजबरुआआधुनिक असमिया साहित्य के स्तंभ; "ओ मोर आपोनार देश"।

09राष्ट्रीय आंदोलन का साहित्य Literature of the National Movement

औपनिवेशिक सरकार साहित्य से इतना डरती थी कि उसने उसके लिए अलग क़ानून बनाए — यही इस साहित्य की शक्ति का प्रमाण है।

कृति / प्रसंगलेखकऐतिहासिक भूमिका
आनंदमठ एवं वंदे मातरम्बंकिमचन्द्र1882; स्वदेशी आंदोलन (1905) का युद्ध-घोष बना। 1896 के कांग्रेस अधिवेशन में टैगोर ने गाया।
नील दर्पणदीनबंधु मित्रनील-विद्रोह की साहित्यिक अभिव्यक्ति; अनुवादक-प्रकाशक पर मुक़दमा।
वर्नाकुलर प्रेस एक्ट— (लिटन, 1878)देशी भाषा-प्रेस पर अंकुश; रिपन ने 1882 में निरस्त किया।
सोज़े-वतनप्रेमचंद (नवाब राय)1908 में जब्त — राष्ट्रवादी कथा-साहित्य पर प्रत्यक्ष दमन का उदाहरण।
भारत-भारतीमैथिलीशरण गुप्त1912; "हम कौन थे, क्या हो गए" — जागरण का घोष।
गीता रहस्यबाल गंगाधर तिलकमांडले जेल (1910–14) में; कर्मयोग की राष्ट्रवादी व्याख्या।
The Discovery of India; Glimpses of World Historyजवाहरलाल नेहरूअहमदनगर किला एवं पूर्व जेल-प्रवासों की देन — "जेल-साहित्य" की परंपरा।
सत्य के प्रयोग (आत्मकथा)महात्मा गांधीनवजीवन में धारावाहिक; हिन्द स्वराज (1909) पहले ही प्रतिबंध झेल चुका था।
Why I am an Atheistभगत सिंह1930, लाहौर जेल; क्रांतिकारी धारा का वैचारिक दस्तावेज़।
झाँसी की रानीसुभद्राकुमारी चौहान1857 की स्मृति को जन-कविता में अमर किया।
परीक्षा-दृष्टि · प्रतिबंधित-जब्त साहित्य
  • सोज़े-वतन (प्रेमचंद, 1908) — जब्त · पथेर दाबी (शरतचंद्र, 1926) — प्रतिबंधित · हिन्द स्वराज (गांधी) — प्रतिबंधित।
  • वंदे मातरम् गाना ही स्वदेशी आंदोलन में प्रतिरोध की क्रिया बन गया — साहित्य एवं आंदोलन के विलय का उदाहरण।
  • जेल-साहित्य की त्रयी याद रखें — गीता रहस्य (तिलक), Discovery of India (नेहरू), Why I am an Atheist (भगत सिंह)।

10स्वातंत्र्योत्तर साहित्य एवं संस्थाएँ Post-Independence Literature and Institutions

क · संस्थाएँ एवं पुरस्कार Institutions and Awards

संस्था / पुरस्कारवर्षतथ्य
साहित्य अकादमी1954राष्ट्रीय साहित्य संस्था; 24 भाषाओं में वार्षिक पुरस्कार (1955 से)।
ज्ञानपीठ पुरस्कार1961 स्थापित; प्रथम 1965प्रथम विजेता — जी. शंकर कुरुप (मलयालम, ओटक्कुष़ल)। हिन्दी में प्रथम — सुमित्रानंदन पंत (1968)।
प्रथम हिन्दी साहित्य अकादमी1955माखनलाल चतुर्वेदी — हिमतरंगिनी।
राष्ट्रभाषा-सम्बन्धी प्रावधान1949–50संविधान के अनुच्छेद 343 — देवनागरी लिपि में हिन्दी संघ की राजभाषा; 14 सितम्बर हिन्दी दिवस।

ख · प्रमुख स्वातंत्र्योत्तर स्वर Major Post-1947 Voices

विभाजन इस दौर का केन्द्रीय घाव है — मंटो (टोबा टेक सिंह), यशपाल (झूठा सच), अमृता प्रीतम (पिंजर), भीष्म साहनी (तमस, 1974) — चार भाषाओं में एक ही पीड़ा। दूसरी बड़ी धारा दलित साहित्य है, जो मराठी से उभरी — दलित पैंथर आंदोलन (1972) के साथ नामदेव ढसाल की कविता, तथा आत्मकथा-विधा में दया पवार (बलुतं) एवं हिन्दी में ओमप्रकाश वाल्मीकि (जूठन)। स्त्री-लेखन में महादेवी वर्मा की "शृंखला की कड़ियाँ" से लेकर महाश्वेता देवी (हज़ार चौरासी की माँ, अरण्येर अधिकार) तक की परंपरा — महाश्वेता का लेखन आदिवासी-प्रश्न को साहित्य के केन्द्र में लाया।

11ऐतिहासिक महत्त्व एवं सीमाएँ Significance and Limitations

ऐतिहासिक महत्त्व
  • राष्ट्रीय चेतना का निर्माता एवं वाहक — नारे से उपन्यास तक।
  • सामाजिक इतिहास का स्रोत — किसान (गोदान), नील-बागान (नील दर्पण), विभाजन (तमस, पिंजर)।
  • भाषाई आधुनिकीकरण — खड़ी बोली, मानक गद्य, नई विधाएँ।
  • हाशिये के स्वर — दलित एवं स्त्री-लेखन ने इतिहास के नए स्रोत रचे।
  • औपनिवेशिक दमन (जब्ती-प्रतिबंध) स्वयं ऐतिहासिक साक्ष्य है।
सीमाएँ एवं सावधानियाँ
  • साहित्यिक कृति तथ्य नहीं, प्रतिनिधित्व है — उपन्यास से तिथि-प्रमाण नहीं निकलता।
  • प्रारंभिक आधुनिक साहित्य पर नगरीय-शिक्षित मध्यवर्ग की छाप।
  • राष्ट्रवादी काव्य में अतीत का आदर्शीकरण — इतिहास-लेखन से भिन्न विधा।
  • अनुवाद पर निर्भरता — मूल भाषा की व्यंजना छूटने का जोखिम।
परीक्षा-दृष्टि · निष्कर्ष
  • आधुनिक साहित्य की केन्द्रीय घटना — गद्य एवं उपन्यास का उदय; इसका इंजन — प्रेस
  • तीन "प्रथम" याद रखें — प्रथम हिन्दी समाचार-पत्र उदन्त मार्तण्ड (1826), प्रथम ज्ञानपीठ जी. शंकर कुरुप (1965), हिन्दी का प्रथम ज्ञानपीठ पंत (1968)
  • साहित्य-त्रयी का सूत्र — प्राचीन साहित्य धर्म-केन्द्रित, मध्यकालीन भक्ति-केन्द्रित, आधुनिक राष्ट्र एवं समाज-केन्द्रित

12स्वयं जाँच Self Test — 15 Questions

प्रत्येक प्रश्न का एक ही प्रयास मिलेगा। अंक 0 / 15
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