महाजनपद काल | The Age of Mahajanapadas
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महाजनपद काल The Age of Mahajanapadas

छठी सदी ई.पू. — भारतीय इतिहास का सबसे घना मोड़। सोलह बड़े राज्य, हज़ार वर्ष बाद लौटे नगर, पहले सिक्के, पहली लिखी जा सकने वाली राजनीति — और इन्हीं सबके बीच बुद्ध एवं महावीर। यह अध्याय उस संक्रमण की राजनीतिक कथा है, जिसके अंत में मगध अकेला खड़ा मिलता है।

छठी सदी ई.पू.सोलह महाजनपद — अंगुत्तर निकाय की सूची
544 ई.पू. (परंपरा)बिम्बिसार — मगध के उत्कर्ष का आरंभ
516 ई.पू.दारा प्रथम — सिंध-पंजाब हख़ामनी क्षत्रपी
326 ई.पू.सिकंदर का आक्रमण — वितस्ता का युद्ध

01पृष्ठभूमि — जनपद से महाजनपद From Janapada to Mahajanapada

उत्तर वैदिक काल के अंत तक लोहे ने गंगा घाटी की कृषि को अधिशेष-उत्पादक बना दिया था। अधिशेष ने कर संभव किया, कर ने स्थायी सेना, और स्थायी सेना ने बड़े क्षेत्रीय राज्य — जन (कबीला) पहले जनपद (जन के बसने की भूमि) बना, फिर विजय एवं विलय से महाजनपद

इस संक्रमण के तीन परस्पर-जुड़े चिह्न परीक्षा-दृष्टि से याद रखें — (1) क्षेत्र अब पहचान का आधार है, कबीला नहीं; राजा "जनपद का स्वामी" है। (2) नियमित कर-प्रणाली प्रकट होती है — उपज का प्रायः छठा भाग (षड्भाग); बलि-भाग-शुल्क जैसे शब्द अब वसूली के पद हैं। (3) दुर्ग, स्थायी सेना एवं प्रशासनिक पद — राज्य अब एक स्थायी मशीन है, अनुष्ठान-समर्थित मुखिया नहीं।

स्रोत-सूची · दो सूचियाँ, एक अंतर
  • सोलह महाजनपदों की प्रसिद्ध सूची बौद्ध ग्रंथ अंगुत्तर निकाय में है।
  • जैन ग्रंथ भगवती सूत्र में भी सोलह की सूची है, पर नाम कुछ भिन्न — यह अंतर ही परीक्षा में पूछा जाता है।
  • महाभारत एवं पाणिनि की अष्टाध्यायी से भी जनपदों की पूरक सूचना मिलती है।

02सोलह महाजनपद — पूरी तालिका The Sixteen Mahajanapadas

इस तालिका से हर परीक्षा में प्रश्न आता है — प्रायः राजधानी पूछी जाती है, या आधुनिक क्षेत्र। दो-राजधानी वाले तीन महाजनपद (मल्ल, पांचाल, अवंति) विशेष ध्यान माँगते हैं।

महाजनपदराजधानीआधुनिक क्षेत्र · विशेष
अंगचंपाभागलपुर-मुंगेर (बिहार); व्यापार-समृद्ध नगरी — बिम्बिसार ने मगध में मिलाया।
मगधगिरिव्रज / राजगृहपटना-गया क्षेत्र; अंततः सबका विजेता।
काशीवाराणसीवस्त्र एवं व्यापार की नगरी; कोसल से दीर्घ संघर्ष।
कोसलश्रावस्तीअवध क्षेत्र; राजा प्रसेनजित — बुद्ध के समकालीन। अयोध्या-साकेत इसी में।
वज्जि (वृज्जि)वैशालीउत्तर बिहार; आठ कुलों का गण-संघ — लिच्छवि, विदेह, ज्ञातृक आदि।
मल्लकुशीनगर एवं पावागणराज्य; कुशीनगर — बुद्ध का महापरिनिर्वाण, पावा — महावीर का निर्वाण।
चेदिशक्तिमती (सोत्थिवती)बुंदेलखंड क्षेत्र।
वत्सकौशाम्बीइलाहाबाद क्षेत्र; राजा उदयन — वासवदत्ता कथा के नायक।
कुरुइंद्रप्रस्थदिल्ली-मेरठ क्षेत्र; महाभारत-भूमि की स्मृति।
पांचालअहिच्छत्र (उत्तर) एवं काम्पिल्य (दक्षिण)रुहेलखंड-मध्य दोआब।
मत्स्यविराटनगरजयपुर-अलवर-भरतपुर (राजस्थान)।
शूरसेनमथुराब्रज क्षेत्र; यूनानी लेखकों का "शूरसेनोई"।
अश्मकपोतन / पोटिलगोदावरी तट — एकमात्र दक्षिणी महाजनपद।
अवंतिउज्जयिनी (उत्तर) एवं महिष्मती (दक्षिण)मालवा; राजा प्रद्योत — मगध का प्रबल प्रतिद्वंद्वी।
गांधारतक्षशिलारावलपिंडी-पेशावर क्षेत्र; शिक्षा एवं व्यापार का केन्द्र।
कम्बोजहाटक / राजपुरपामीर-हिन्दुकुश क्षेत्र; अश्वों के लिए प्रसिद्ध।

तालिका दाएँ-बाएँ स्क्रॉल की जा सकती है।

स्मरण-सूत्र
  • दो राजधानियों वाले तीन — मल्ल (कुशीनगर-पावा), पांचाल (अहिच्छत्र-काम्पिल्य), अवंति (उज्जयिनी-महिष्मती)।
  • गणराज्य — वज्जि एवं मल्ल; शेष प्रायः राजतंत्र। दक्षिण का अकेला — अश्मक
  • चार महाशक्तियों की अंतिम स्पर्धा — मगध, कोसल, वत्स, अवंति — विजेता मगध।

03गणराज्य एवं राजतंत्र Ganas and Monarchies

इस काल की राजनीतिक विविधता ही उसकी विशेषता है — एक ओर वंशानुगत राजतंत्र, दूसरी ओर गण-संघ, जहाँ सत्ता एक कुल-अभिजात सभा में निहित थी। बुद्ध एवं महावीर दोनों गणराज्यीय पृष्ठभूमि से थे — बुद्ध शाक्य गण से, महावीर वज्जि-संघ के ज्ञातृक कुल से।

गणराज्य की कार्य-पद्धति
  • सत्ता सभा में — कुलों के प्रमुख (राजन् कहलाते) मिलकर निर्णय लेते।
  • संथागार (सभा-भवन) में बैठक; प्रस्ताव, मतदान (शलाका द्वारा), गणपूरक (कोरम) जैसी प्रक्रियाएँ बौद्ध ग्रंथों में वर्णित।
  • प्रमुख गण — वज्जि (वैशाली), मल्ल, शाक्य (कपिलवस्तु), कोलिय, मोरिय, लिच्छवि सर्वाधिक प्रसिद्ध।
  • सीमा — यह कुल-अभिजात तंत्र था, आधुनिक अर्थ का लोकतंत्र नहीं; सत्ता क्षत्रिय कुलों तक सीमित।
राजतंत्र क्यों जीते
  • निर्णय की गति — एक राजा बनाम लंबी सभा-प्रक्रिया।
  • केन्द्रित कर एवं स्थायी सेना — विस्तारवादी युद्ध की क्षमता।
  • गणों की आंतरिक फूट — अजातशत्रु के मंत्री वस्सकार ने वज्जि-संघ इसी से तोड़ा।
  • फिर भी गण-परंपरा शताब्दियों जीवित रही — मौर्योत्तर काल के मालव-क्षुद्रक से गुप्तकाल तक।

04मगध का उत्कर्ष — हर्यंक वंश Rise of Magadha — The Haryanka Dynasty

शासककाल (परंपरागत)प्रमुख कार्य
बिम्बिसार (श्रेणिक)544–492 ई.पू.वैवाहिक कूटनीति — कोसलदेवी (कोसल; दहेज में काशी-ग्राम), चेल्लना (लिच्छवि), खेमा (मद्र)। अंग की विजय — मगध की पहली बड़ी विजय। अवंति के प्रद्योत के उपचार हेतु राजवैद्य जीवक को भेजा — शत्रु से भी संतुलन। बुद्ध एवं महावीर दोनों का समकालीन।
अजातशत्रु (कूणिक)492–460 ई.पू.पिता की हत्या कर गद्दी (परंपरा)। कोसल से युद्ध — अंततः प्रसेनजित की पुत्री से विवाह-संधि। वज्जि-संघ से 16 वर्ष का संघर्ष — मंत्री वस्सकार की भेद-नीति तथा दो नए युद्ध-यंत्र: महाशिलाकंटक (पत्थर फेंकने वाला) एवं रथमूसल (घूमते मूसलों वाला रथ)। बुद्ध के महापरिनिर्वाण (483 ई.पू.) के बाद राजगृह में प्रथम बौद्ध संगीति का संरक्षक।
उदयिन (उदयभद्र)460–444 ई.पू.गंगा-सोन संगम पर पाटलिपुत्र की स्थापना — राजधानी राजगृह से स्थानांतरित; आगे की हर बड़ी सत्ता की राजधानी यही।

हर्यंक शासकों की उपाधियों-नामों का घालमेल परीक्षा में आता है — बिम्बिसार = श्रेणिक, अजातशत्रु = कूणिक (जैन ग्रंथों की शब्दावली)। बिम्बिसार को बौद्ध परंपरा बुद्ध का अनुयायी बताती है, जैन परंपरा महावीर का — दोनों दावों की समानांतर उपस्थिति ही उस युग के धार्मिक खुलेपन का संकेत है।

05शिशुनाग एवं नंद वंश Shishunaga and Nanda Dynasties

शिशुनाग वंश (लगभग 412–344 ई.पू.)

  • शिशुनाग — हर्यंकों के बाद (परंपरा में अंतिम हर्यंक नागदशक को हटाकर अमात्य शिशुनाग गद्दी पर)। सबसे बड़ा कार्य — अवंति (प्रद्योत वंश) की शक्ति का अंत; मगध की शताब्दी-पुरानी स्पर्धा समाप्त।
  • कुछ समय वैशाली को दूसरी राजधानी बनाया।
  • कालाशोक — राजधानी स्थायी रूप से पाटलिपुत्र; उसी के काल में द्वितीय बौद्ध संगीति (वैशाली, लगभग 383 ई.पू.)

नंद वंश (लगभग 344–321 ई.पू.)

  • महापद्मनंद — पुराणों में "एकराट्" एवं "सर्व-क्षत्रान्तक" (क्षत्रियों का नाश करने वाला); निम्न कुल से उठकर सम्राट — भारत में बड़े साम्राज्य का प्रथम निर्माता माना जाता है। कलिंग-विजय का उल्लेख परवर्ती हाथीगुम्फा अभिलेख में (नंद द्वारा नहर ले जाने की स्मृति)।
  • धननंद — सिकंदर का समकालीन; यूनानी लेखकों का "अग्रमीज़/ज़ैंड्रमीज़"। विशाल सेना एवं अपार कोष — पर करों की कठोरता से अलोकप्रिय।
  • 321 ई.पू. — चन्द्रगुप्त मौर्य एवं चाणक्य द्वारा नंद-सत्ता का अंत; मगध की विरासत मौर्यों को।

06मगध की सफलता के कारण Why Magadha Won

"चार में से मगध ही क्यों?" — यह मुख्य परीक्षा का शाश्वत प्रश्न है। उत्तर का ढाँचा: भूगोल + संसाधन + नीति

भौगोलिक-आर्थिक आधार

  • दोनों राजधानियाँ रणनीतिक — राजगृह पाँच पहाड़ियों से घिरा दुर्ग, पाटलिपुत्र गंगा-सोन (समीप गंडक-घाघरा) का "जलदुर्ग"।
  • गंगा घाटी की उर्वर जलोढ़ भूमि — धान का अधिशेष = कर = सेना।
  • दक्षिण-पूर्व की पहाड़ियों में लोहे की खानें (आधुनिक झारखंड क्षेत्र) — शस्त्र एवं फाल दोनों का कच्चा माल।
  • नदियाँ = व्यापार-मार्ग एवं जल-परिवहन; वन से हाथी — मगध की सेना में हाथियों का प्रथम बड़ा प्रयोग।

राजनीतिक-सामाजिक कारण

  • महत्वाकांक्षी शासकों की अटूट शृंखला — बिम्बिसार से महापद्मनंद तक; साधन-अनैतिकता की परवाह कम (कुछ इतिहासकार इसे "मगध की अनैतिक राजनीति" कहते हैं)।
  • कूटनीति का पूरा शस्त्रागार — विवाह (बिम्बिसार), भेद (वस्सकार), युद्ध-तकनीक (महाशिलाकंटक, रथमूसल)।
  • गंगा घाटी का किनारा होने से वैदिक कट्टरता की पकड़ ढीली — नई शक्तियों एवं विचारों (बौद्ध-जैन) के प्रति खुलापन; समाज में समावेशी भर्ती।
  • प्रतिद्वंद्वियों की आपसी थकान — काशी-कोसल संघर्ष, अवंति-वत्स संघर्ष का लाभ मगध को।

07ईरानी (हख़ामनी) आक्रमण The Achaemenid Contact

जब पूर्व में मगध बढ़ रहा था, उत्तर-पश्चिम की राजनीतिक बिखराव का लाभ फ़ारस के हख़ामनी साम्राज्य ने उठाया — भारत का पहला दर्ज विदेशी-साम्राज्यिक सम्पर्क।

शासक / स्रोतकालतथ्य
साइरस (कुरुष)558–530 ई.पू.गांधार-सीमा तक अभियान; काबुल-क्षेत्र के कुछ कबीलों से कर।
दारा (दारयवौष) प्रथम516 ई.पू. के आसपाससिंध-पश्चिमी पंजाब का विलय — साम्राज्य की 20वीं क्षत्रपी; बेहिस्तून-पर्सेपोलिस-नक़्श-ए-रुस्तम अभिलेखों में "हिन्दुष" का उल्लेख।
हेरोडोटस का साक्ष्य20वीं क्षत्रपी सबसे अधिक जनसंख्या वाली एवं सर्वाधिक कर (360 टैलेंट स्वर्ण-धूलि) देने वाली — भारत की समृद्धि का बाह्य प्रमाण।
क्ज़र्क्सीज़ (क्षयार्षा)486–465 ई.पू.यूनान-युद्धों में भारतीय सैनिकों (पैदल-अश्वारोही) का प्रयोग।
प्रभाव · परीक्षा-बिंदु
  • ख़रोष्ठी लिपि — अरामाइक से विकसित, दाएँ से बाएँ; उत्तर-पश्चिम में प्रचलित — अशोक के शाहबाज़गढ़ी-मानसेहरा अभिलेख इसी में।
  • व्यापार-मार्ग एवं सिक्के की तकनीक पर प्रभाव; फ़ारसी दरबारी शैली का प्रभाव आगे मौर्य कला (घंटाकार स्तंभ-शीर्ष, पॉलिश) पर देखा जाता है।
  • "क्षत्रप" प्रशासनिक पद्धति की परिचिति — जिसे बाद में शक-कुषाण दोहराएँगे; और यही मार्ग सिकंदर को भारत का पता देता है।

08सिकंदर का आक्रमण Alexander's Invasion, 326 BCE

हख़ामनी साम्राज्य को जीतता हुआ मकदूनिया का सिकंदर 326 ई.पू. में सिंधु पार करता है। भारत में उसका सामना बड़ी शक्ति से नहीं, बिखरे हुए राज्यों से हुआ — और यही बिखराव उसकी सफलता का असली कारण था।

घटनाक्रम

  • तक्षशिला के आम्भि ने बिना युद्ध समर्पण किया — पोरस के विरुद्ध सहायता भी।
  • वितस्ता (हाइडेस्पीज़) का युद्ध — झेलम-तट पर पोरस (पुरु) से; पोरस पराजित पर साहस से सिकंदर प्रभावित — राज्य लौटाया और बढ़ाया।
  • आगे बढ़ते हुए व्यास (हाइफ़ैसिस) के तट पर सेना का विद्रोह — थकान एवं नंद-सेना (धननंद) की ख्याति; सिकंदर को लौटना पड़ा।
  • लौटते मार्ग में मालव-क्षुद्रक गणों का कठोर प्रतिरोध; 323 ई.पू. में बेबीलोन में मृत्यु

परिणाम — प्रत्यक्ष कम, परोक्ष अधिक

  • प्रत्यक्ष राजनीतिक प्रभाव अल्पजीवी — यूनानी क्षत्रप शीघ्र उखड़े।
  • चार स्थल-जल मार्गों का खुलना — भारत-पश्चिम व्यापार एवं सम्पर्क की नई गति।
  • यूनानी लेखकों (निआर्कस, ओनेसिक्रिटस, अरिस्टोबुलस) के तिथि-सजग विवरण — भारतीय कालक्रम की पहली पक्की खूँटी।
  • उत्तर-पश्चिम में शक्ति-शून्य — जिसका लाभ उठाकर चन्द्रगुप्त मौर्य ने पहले वहीं पैर जमाए; एवं यूनानी-भारतीय कला-सम्पर्क की भूमिका (आगे गांधार शैली)।

09द्वितीय नगरीकरण — नगर, मुद्रा, व्यापार The Second Urbanization

हड़प्पा नगरों के लगभग 1,400 वर्ष बाद भारत में नगर लौटे — इस बार गंगा घाटी में। इसीलिए छठी सदी ई.पू. को द्वितीय नगरीकरण कहा जाता है; इसका पुरातात्त्विक हस्ताक्षर है उत्तरी काली पॉलिशदार मृद्भांड (NBPW)

नगर एवं व्यापार

  • बौद्ध ग्रंथों में छह महानगर — चंपा, राजगृह, श्रावस्ती, साकेत, कौशाम्बी, वाराणसी।
  • नगर-प्रकार — राजधानी, बाज़ार-नगर (निगम), बंदरगाह (पट्टन)।
  • व्यापारिक मार्ग — उत्तरापथ (तक्षशिला से पूर्व) एवं दक्षिणापथ; सार्थवाह (कारवाँ-नेता) एवं श्रेष्ठि (सेट्ठि) बौद्ध कथाओं के परिचित पात्र।
  • श्रेणियाँ (guilds) — शिल्पियों के संगठित निकाय; 18 श्रेणियों के परंपरागत उल्लेख।

मुद्रा एवं लेखन

  • भारत के प्राचीनतम सिक्के — आहत मुद्राएँ (punch-marked coins), मुख्यतः चाँदी; इकाई कार्षापण। ठप्पे हैं, लेख नहीं।
  • मुद्रा ने कर, वेतन, व्यापार, ब्याज — सबको गति दी; ऋण एवं महाजनी के उल्लेख।
  • लेखन की वापसी — ब्राह्मी (बाएँ से दाएँ) एवं उत्तर-पश्चिम में ख़रोष्ठी; पक्के साक्ष्य अशोक-काल से, आरंभ इसी युग में माना जाता है।
  • यही नगर-वणिक वर्ग बौद्ध-जैन धर्मों का प्रमुख संरक्षक बना — अगले खंड का सूत्र।

10सामाजिक-धार्मिक मंथन की पृष्ठभूमि The Religious Ferment

बौद्ध ग्रंथ इस युग में 62 मत-सम्प्रदायों का, जैन परंपरा 363 का उल्लेख करती है — अर्थात् बुद्ध-महावीर किसी शून्य में नहीं, विचारों के घमासान में खड़े थे। यह खंड उस घमासान के कारण देता है; बौद्ध एवं जैन धर्म का पूरा विवेचन अगले अध्याय का विषय है।

असंतोष के कारण

  • यज्ञ-व्यवस्था का बोझ — व्यय-साध्य कर्मकांड एवं पशुबलि; नई कृषि-अर्थव्यवस्था में पशुधन का वध अलाभकर।
  • वर्ण-कठोरता — क्षत्रिय शासक एवं समृद्ध वैश्य ब्राह्मण-श्रेष्ठता के दावों से असहज; नए धर्मों के दोनों प्रवर्तक क्षत्रिय।
  • नगर-वणिक वर्ग — ब्याज-व्यापार को हीन बताने वाली धर्मशास्त्रीय दृष्टि से असंतुष्ट; अहिंसा एवं सादगी वाले नए मत व्यापार-अनुकूल।
  • बौद्धिक वातावरण — उपनिषदों ने प्रश्न पूछना सिखा दिया था; अब उत्तर बहुवचन में आ रहे थे।

प्रमुख समकालीन विचारक (श्रमण परंपराएँ)

  • अजित केशकम्बलिन् — उच्छेदवाद/भौतिकवाद (चार्वाक-पूर्वज भावना)।
  • पकुध कच्चायन — अणु-सिद्धांत की दिशा; पूरण कस्सप — अक्रियावाद।
  • मक्खलि गोसाल — आजीविक सम्प्रदाय; नियतिवाद (सब पूर्व-निर्धारित)। आजीविकों को आगे मौर्य-संरक्षण भी मिला (बराबर गुफाएँ)।
  • संजय बेलट्ठिपुत्त — संशयवाद (अनिश्चिततावाद)।
  • इन्हीं के बीच वर्धमान महावीर (ज्ञातृक, वैशाली-क्षेत्र) एवं गौतम बुद्ध (शाक्य, कपिलवस्तु) — दोनों की विस्तृत कथा अगले अध्याय में।

11स्रोत, महत्त्व एवं परीक्षा-सूत्र Sources and Significance

इस काल के स्रोत
  • बौद्ध — अंगुत्तर निकाय (16 की सूची), दीघ निकाय, विनय पिटक, जातक।
  • जैन — भगवती सूत्र (सूची), परिशिष्टपर्वन्।
  • ब्राह्मण-परंपरा — पुराण-वंशावलियाँ (नंदों पर), पाणिनि की अष्टाध्यायी।
  • यूनानी-फ़ारसी — हेरोडोटस, सिकंदर-लेखक; हख़ामनी अभिलेख।
  • पुरातत्त्व — NBPW स्तर, आहत मुद्राएँ, नगर-दुर्गों के उत्खनन (राजगृह, कौशाम्बी, उज्जयिनी)।
सावधानियाँ
  • तिथियाँ प्रायः परंपरागत — बुद्ध-निर्वाण आधारित गणना; शासक-वर्षों में स्रोत-भेद।
  • बौद्ध-जैन ग्रंथ अपने संरक्षकों (बिम्बिसार, अजातशत्रु) के प्रति पक्षधर; पुराण नंदों के प्रति प्रतिकूल — वर्ग-दृष्टि पहचानें।
  • गणराज्यों को आधुनिक लोकतंत्र न कहें — कुल-अभिजात संघ कहें।
परीक्षा-दृष्टि · निष्कर्ष
  • इस काल का सार तीन शब्दों में — राज्य, नगर, मुद्रा — तीनों एक साथ लौटे/जन्मे; इसी त्रिकोण पर बौद्ध-जैन आंदोलन खड़े हुए।
  • मगध-उत्कर्ष का उत्तर-ढाँचा — भूगोल (दुर्ग-नदी) + संसाधन (लोहा-धान-हाथी) + नीति (विवाह-भेद-युद्ध) + खुला समाज
  • आगे का सूत्र — नंदों का केन्द्रीकृत ढाँचा + सिकंदर-जनित शून्य = मौर्य साम्राज्य (321 ई.पू.) — अगली कड़ी।

12स्वयं जाँच Self Test — 15 Questions

प्रत्येक प्रश्न का एक ही प्रयास मिलेगा। अंक 0 / 15
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