भारत की प्रागैतिहासिक जातियों के बारे में डॉ. जे. एच. हट्टन के क्या विचार थे?
प्रसिद्ध ब्रिटिश मानवविज्ञानी और 1931 की जनगणना के आयुक्त
डॉ. जे. एच. हट्टन (Dr. J. H. Hutton) ने भारत की प्रागैतिहासिक जातियों और उनके प्रवासन (migration) के संबंध में एक विस्तृत और व्यवस्थित सिद्धांत प्रस्तुत किया था। उनकी पुस्तक
'कौस्ट इन इंडिया' (Caste in India) में भारतीय आबादी के नस्लीय वर्गीकरण और उनकी प्राचीन पृष्ठभूमि का विवरण मिलता है। भारत की प्रागैतिहासिक जातियों के उद्भव और विकास के संबंध में डॉ. हट्टन के मुख्य विचार निम्नलिखित थे:
- नेग्रिटो (Negrito) - भारत के मूल निवासी: डॉ. हट्टन का मानना था कि भारत के सबसे प्राचीन प्रागैतिहासिक निवासी नेग्रिटो नस्ल के लोग थे। यद्यपि वर्तमान भारत में इनके बहुत कम अवशेष बचे हैं (जैसे कि दक्षिण भारत की कुछ पहाड़ी जनजातियों और अंडमान द्वीप समूह में), लेकिन हट्टन के अनुसार, वे ही सबसे पहले दक्षिण-पूर्वी एशिया और भारत में आकर बसे थे।
- प्रोटो-ऑस्ट्रेलॉयड (Proto-Austroloid): नेग्रिटो के बाद भारत में प्रोटो-ऑस्ट्रेलॉयड नस्ल के लोगों का आगमन हुआ। मध्य और दक्षिण भारत की कई आधुनिक जनजातियों के शारीरिक लक्षणों को उन्होंने इसी प्रागैतिहासिक जाति से जुड़ा हुआ माना।
- भूमध्यसागरीय जाति (Mediterranean Race) की प्रारंभिक शाखा: इसके बाद भूमध्यसागरीय क्षेत्र से एक प्रारंभिक नस्ल भारत आई जो एक विशिष्ट (agglutinative) भाषा बोलती थी, जिससे वर्तमान 'ऑस्ट्रो-एशियाई' (Austro-Asiatic) भाषा परिवार का विकास हुआ। हट्टन के अनुसार, इन्हीं लोगों ने भारत में प्रारंभिक कृषि और महापाषाण संस्कृति (Megalithic Cult) की नींव रखी थी।
- भूमध्यसागरीय प्रवासन की उत्तरवर्ती लहर (Later Mediterranean Wave): पूर्वी यूरोप और निकट पूर्व से भूमध्यसागरीय लोगों की एक और अधिक विकसित लहर भारत पहुंची। ये लोग धातुओं के ज्ञान से लैस थे और हट्टन का मानना था कि भारत में शुरुआती नगर राज्यों (City States) और सिंधु घाटी जैसी सभ्यताओं के विकास में इनका महत्वपूर्ण योगदान था।
- अल्पाइन शाखा (Alpine/Armenoid Element): भारत की प्रागैतिहासिक आबादी में जो चौड़े सिर वाले (broad-headed) लक्षण पाए जाते हैं, उनके बारे में हट्टन का विचार था कि इन्हें अल्पाइन नस्ल की आर्मेनॉइड शाखा से जोड़ा जा सकता है, जो बाद के कालखंड में भारत आई थी। [1]
डॉ. हट्टन का यह स्पष्ट मानना था कि भारत की आधुनिक जाति व्यवस्था और जनजातीय संस्कृतियों के मूल बीज इन्हीं प्रागैतिहासिक जातियों के सांस्कृतिक और नस्लीय मिश्रण से उपजे हैं।