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  1. केंद्रीय असेंबली में बम फेंकना
  2. अंग्रेजों के खिलाफ अनर्गल भाषण देना
  3. एक पुलिस हेड कांस्टेबल की हत्या
  4. मुजफ्फरपुर के जिला जज की हत्या का प्रयास

Answer (Detailed Solution Below)

Option 4 : मुजफ्फरपुर के जिला जज की हत्या का प्रयास

Detailed Solution

सही उत्तर मुजफ्फरपुर के जिला जज की हत्या का प्रयास है।

  • अलीपुर बॉम्बे केस ट्रायल का तात्पर्य मुजफ्फरपुर के जिला जज की हत्या के प्रयास से है।
  • अलीपुर बम कांड में चित्तरंजन दास द्वारा अरबिंदो घोष का बचाव किया गया था।
  • अलीपुर बम मामले की साजिश वर्ष 1908 में हुई थी
  • इसे मणिकटोला बम षड्यंत्र या मुरारीपुकार षड्यंत्र के रूप में भी जाना जाता है।
  • डगलस किंग्सफोर्ड अलोकप्रिय ब्रिटिश मुख्य न्यायधीश मुजफ्फरपुर (उत्तरी बिहार) में फेंके गए बम का निशाना था।
  • बम फेंकने वाले क्रांतिकारी प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस थे
  • जिस गाड़ी पर बम फेंका गया, उसमें किंग्सफोर्ड नहीं है, बल्कि दो अंग्रेज महिलाएं थीं, जो हमले में मारी गईं
  • प्रफुल्ल चाकी ने आत्महत्या कर ली और खुदीराम बोस को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें मौत की सजा सुनाई गई जब वह केवल 18 वर्ष के थे
  • मामले में जिन अन्य लोगों पर मुकदमा चला, उनमें अरबिंदो घोष, उनके भाई बारिन घोष, सत्येंद्रनाथ बोस, कनाईलाल दत्त और तीस से अधिक लोग थे
  • वे सभी कलकत्ता अब कोलकाता में अनुशीलन समिति के सदस्य थे।

प्रश्न - जर्मनी के एकीकरण की प्रक्रिया का संक्षेप में वर्णन कीजिए।

उत्तर - जर्मनी का एकीकरण-वियना कांग्रेस द्वारा जर्मनी के 39 राज्यों का एक शिथिल जर्मन संघ बनाया गया। एक जर्मन राष्ट्र सभा की स्थापना की गई जिसका अध्यक्ष आस्ट्रिया के सम्राट को बनाया गया। इससे जर्मन लोगों में घोर असन्तोष व्याप्त था। जर्मनी के राष्ट्रवादियों ने 1815 से जर्मनी के एकीकरण के प्रयास शुरू कर दिए जिनका वर्णन निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत किया जा सकता है-

(1) जॉलवेराइन की स्थापना- 1834 ई. में प्रशा की पहल पर जॉलवेराइन नामक एक शुल्क संघ की स्थापना की गई जिसमें अधिकांश जर्मन राज्य सम्मिलित हो गए। इस संघ ने शुल्क अवरोधों को समाप्त कर दिया तथा मुद्राओं की संख्या केवल दो कर दी जो उससे पहले तीस से ऊपर थी। इसके अलावा रेलवे के जाल ने गतिशीलता बढ़ाई और आर्थिक हितों को राष्ट्रीय एकीकरण का सहायक बनाया। इस प्रकार जॉलवेराइन से जर्मन राज्यों में राष्ट्रीयता की भावना का विकास हुआ। इसने भविष्य में प्रशा के नेतृत्व में जर्मनी के राजनीतिक एकीकरण का मार्ग प्रशस्त कर दिया।

(2) फ्रेंकफर्ट की संसद-सम्पूर्ण जर्मनी के लिए एक नवीन संविधान बनाने के लिए 18 मई, 1848 को फ्रेंकफर्ट संसद के 831 निर्वाचित सदस्यों की एक बैठक हुई । उन्होंने एक जर्मन राष्ट्र के लिए एक संविधान का प्रारूप तैयार किया। इस राष्ट्र की अध्यक्षता एक ऐसे राजा को सौंपी गई जिसे संसद के अधीन रहना था। जब प्रतिनिधियों ने प्रशा के राजा फ्रेडरीक विल्हेम चतुर्थ को ताज पहनाने की कोशिश की तो प्रशा के सम्राट् द्वारा जर्मन राज्यों का राजमुकुट धारण करना स्वीकार न करने के कारण वेधानिक तरीकों से जर्मनी के एकीकरण के प्रयासों पर पानी फिर गया।

(3) बिस्मार्क का योगदान-सन् 1862 में प्रशा के सम्राट् विलियम प्रथम तथा उसके प्रधानमंत्री ऑंटो वॉन विस्मार्क ने जर्मनी के एकीकरण के आन्दोलन का नेतृत्व सम्भाल लिया। बिस्मार्क ने प्रशा की सेना तथा नौकरशाही की सहायता ली। उसने लौह और रक्त की नीति अपनाते हुए सात वर्ष की अवधि में 1864 में डेनमार्क को, 1866 में आस्ट्रिया को तथा 1870 में फ्रांस को युद्धों में पराजित कर दिया और जर्मनी के एकीकरण की प्रक्रिया पूरी की । 18 जनवरी, 1871 को बिस्मार्क ने वर्साय के शीश महल में प्रशा के सम्राट विलियम प्रथम को नवीन जर्मन साम्राज्य का सम्राट् घोषित किया। 

उत्तर : बिस्मार्क जर्मनी के महान पुत्रों में से एक था। जर्मनी के एकीकरण में बिस्मार्क का महत्त्वपूर्ण योगदान था। इसे जर्मनी के एकीकरण का जनक भी कहा जाता है। उसने प्रशा के प्रधानमन्त्री के रूप में जर्मनी का एकीकरण किया। बिस्मार्क ने 'रक्त और लौह' की नीति अपनाकर सर्वप्रथम श्लेसविग तथा होलस्टीन के प्रशासन पर नियन्त्रण स्थापित किया, फिर ऑस्ट्रिया को सेडोवा के युद्ध (सन् 1866) में पराजित करके उसने जर्मन राज्यों को उसके प्रभाव से मुक्त करा लिया। तत्पश्चात् बिस्मार्क ने सीडान के युद्ध में फ्रांस के सम्राट नेपोलियन तृतीय को पराजित करके जर्मनी का एकीकरण पूर्ण कर दिया। 18 जनवरी 1871 को प्रशा सम्राट विलियम प्रथम महान को जर्मन साम्राज्य का प्रथम सम्राट घोषित किया गया। सन् 1871 में बिस्मार्क जर्मन साम्राज्य का प्रधानमन्त्री बना। सन् 1890 में जर्मन सम्राट कैसर विलियम द्वितीय से मतभेद हो जाने के कारण बिस्मार्क ने त्यागपत्र दे दिया। 31 जुलाई, 1898 को 83 वर्ष की आयु में बिस्मार्क की मृत्यु हो गई।

उत्तर - बिस्मार्क 1832 में ऑस्ट्रिया का चान्सलर बना और अपनी कूटनीति, सूझबूझ रक्त एवं लौह की नीति के द्वारा जर्मनी का एकीकरण पूर्ण किया।

1871 ई. के बाद बिस्मार्क की विदेश नीति का प्रमुख उद्देश्य यूरोप में जर्मनी की प्रधानता को बनाए रखना था। जर्मनी को संगठित व शक्तिशाली बनाने के उपरांत बिस्मार्क ने ‘युद्ध आधारित विदेश नीति’ त्यागकर और कूटनीतिज्ञ रणनीतियों को अपनाकर यूरोप में शांति स्थापित करने काप्रयत्न किया।

बिस्मार्क की विदेश नीति के आधारभूत सिद्धान्त थे- व्यावहारिक अवसरवादी कूटनीति का प्रयोग कर जर्मन विरोधी शक्तियों को अलग-थलग रखना एवं फ्रांस को मित्र विहीन बनाना, उदारवाद का विरोध एवं सैन्यवाद में आस्था रखना।

बिस्मार्क की कूटनीतिज्ञ रणनीतियों को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है-

आस्ट्रो-जर्मन द्विगुटः यह बिस्मार्क की कूटनीति की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी। इस संधि के अंतर्गत युद्ध अवस्था में एक-दूसरे की सहायता का संकल्प लिया गया।

पुनराश्वासन संधिः 1883 ई. में जर्मनी और ऑस्ट्रिया ने रूमानिया के साथ संधि की जो रूस के विरुद्ध थी। अतः रूस, फ्राँस से संधि न करे, इस कारण बिस्मार्क ने रूस से 1887 में पुनराश्वासन संधि की।

तीन सम्राटों का संघः विदेशनीति के क्षेत्र में सन्धि प्रणाली के तहत बिस्मार्क का पहला कदम था। बिस्मार्क ने जर्मनी, ऑस्ट्रिया व रूस को मिलाकर तीन सम्राटों के संघ का गठन किया जो कि कुछ समय बाद बाल्कन की समस्या के परिणामस्वरूप विघटित हो गया।

त्रिगुट संगठन का निर्माणः तत्पश्चात् बिस्मार्क ने इटली, जर्मनी व ऑस्ट्रिया का त्रिगुट संगठन बनाया। उल्लेखनीय है कि इटली व ऑस्ट्रिया शत्रु देश थे।

ब्रिटेन के प्रति नीतिः ब्रिटेन की नाविक शक्ति की श्रेष्ठता के कारण बिस्मार्क ने उसे चुनौती नहीं दी। इस प्रकार उसने ब्रिटेन को यूरोपीय व्यवस्था से दूर रखा।

रूस के साथ पुनराश्वासन संधि के उपरांत बिस्मार्क को 1890 में त्यागपत्र देना पड़ा। जर्मनी का एकीकरण पूरा होने के उपरांत उसने नए साम्राज्य की सुरक्षा नीति के अंतर्गत एक सशक्त विदेश नीति का अवलंबन किया। बिस्मार्क ने नई संधियों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में एक सर्वथा नवीन पद्धति का सूत्रपात किया और इस व्यवस्था को सफलतापूर्वक लागू किया।

इतिहासकारों का मानना है कि बिस्मार्क की समस्त संधियाँ अंतर्विरोधों से परिपूर्ण थीं जो आगे चलकर विभिन्न युद्धों का कारण भी बनी।

ऑस्ट्रिया, इटली व रूस के हित कई मामलों में टकराते थे तथा इनका समन्वय एक जटिल कार्य था जो बिस्मार्क जैसा कूटनीतिज्ञ ही कर सकता था। उसके पदत्याग के 4 वर्ष के भीतर संपूर्ण पद्धति का अंत हो गया। बिस्मार्क की पद्धति में इंग्लैंड सम्मिलित नहीं था जो एक दोष था। अपने कार्यकाल के दौरान बिस्मार्क ने फ्राँस को यूरोपीय राजनीति से अलग-थलग व मित्रविहीन तो रखा परंतु उसे न तो निर्बल बना सका और न ही उसके असंतोषों को दूर कर सका। यही कारण था कि बिस्मार्क की नीतियाँ लघुकालीन थीं।

क्योंकि बिस्मार्क के उपरांत जर्मनी में ऐसा कोई कूटनीतिज्ञ नहीं था जो गुप्त संधियों के सूक्ष्म संतुलन को बनाए रख सके अतः बिस्मार्क के उपरांत फ्राँस को यूरोपीय राजनीति में लौटने का अवसर प्राप्त हो गया जिसकी परिणति प्रथम विश्व युद्ध के रूप में हुई। साथ ही अंतर्विरोधों पर टिकी इस व्यवस्था को अत्यंत सफल कहना सर्वथा उचित न होगा।

निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि बिस्मार्क के चांसलर बने रहने तक तो उसकी नीतियाँ सफल थीं किंतु यह सफलता दीर्घकालिक नहीं थी।

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