मध्यकालीन भारतीय साहित्य | Medieval Indian Literature
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मध्यकालीन भारतीय साहित्य Medieval Indian Literature

यह वह युग है जब भारत की आधुनिक भाषाएँ जन्मीं और साहित्य पहली बार संस्कृत के आँगन से निकलकर जन-भाषाओं में उतरा। दरबार में फ़ारसी तवारीख़ लिखी जा रही थी, और गली-चौपाल में कबीर, तुलसी, मीरा और नानक की वाणी गूँज रही थी — दोनों धाराएँ इस अध्याय में साथ चलेंगी।

लगभग 1000 ई.अपभ्रंश से आधुनिक भाषाओं का उदय
1440–1518 ई.कबीर — निर्गुण धारा का शिखर
1574–76 ई.रामचरितमानस की रचना
1604 ई.गुरु ग्रंथ साहिब (आदि ग्रंथ) का संकलन

01पृष्ठभूमि — भाषाओं का नया संसार The New World of Languages

मध्यकाल में साहित्य की सबसे बड़ी घटना कोई एक ग्रंथ नहीं, बल्कि भाषा का लोकतंत्रीकरण है। लगभग 1000 ई. के आसपास अपभ्रंश से आधुनिक भारतीय भाषाएँ — हिन्दी, बांग्ला, मराठी, गुजराती, पंजाबी, उड़िया, असमिया — आकार लेने लगीं, और कुछ ही शताब्दियों में इन नई भाषाओं ने वह कर दिखाया जो संस्कृत सहस्राब्दियों में करती रही थी।

क · तीन समानांतर धाराएँ Three Parallel Streams

दरबारी धारा

  • भाषा — मुख्यतः फ़ारसी, आंशिक संस्कृत।
  • विधा — तारीख़ (इतिहास), आत्मकथा, प्रशस्ति।
  • संरक्षक — सल्तनत एवं मुग़ल दरबार।
  • उद्देश्य — शासन का अभिलेख एवं वैधता।

लोक-धारा

  • भाषा — जन-भाषाएँ: अवधी, ब्रज, पंजाबी, मराठी, बांग्ला।
  • विधा — पद, दोहा, कीर्तन, अभंग।
  • संरक्षक — कोई नहीं; संत स्वयं जन के बीच।
  • उद्देश्य — भक्ति, समता एवं सामाजिक आलोचना।

शास्त्रीय धारा

  • भाषा — संस्कृत की अविच्छिन्न परंपरा।
  • विधा — दर्शन-भाष्य, स्मृति-टीका, काव्यशास्त्र।
  • उदाहरण — मिताक्षरा, दायभाग, मधुराविजय।
  • विजयनगर एवं मिथिला प्रमुख केन्द्र।

परीक्षा की दृष्टि से इस अध्याय का मूल सूत्र यह है कि मध्यकालीन साहित्य एक-दूसरे से बात करता हुआ साहित्य है — फ़ारसी में उपनिषद अनूदित हो रहे हैं, अवधी में सूफ़ी प्रेमाख्यान लिखे जा रहे हैं, और गुरु ग्रंथ साहिब में हिंदू-मुस्लिम दोनों परंपराओं के संत संकलित हैं। यही समन्वय (synthesis) इस युग की पहचान है।

02फ़ारसी इतिहास-साहित्य Persian Historical Literature

फ़ारसी तवारीख़ मध्यकालीन इतिहास का आधार-स्तंभ है — तिथि-सजग, गद्यात्मक और पेशेवर। पर स्मरण रहे: यह दरबार की आँख से लिखा गया साहित्य है।

ग्रंथलेखककाल एवं महत्त्व
तबक़ात-ए-नासिरीमिन्हाज-उस-सिराजसल्तनत का प्रथम व्यवस्थित इतिहास; इल्तुतमिश-रज़िया काल।
तारीख़-ए-फ़िरोज़शाहीज़ियाउद्दीन बरनीबलबन से फ़िरोज़ तक; बाज़ार-नियंत्रण का मुख्य स्रोत।
तारीख़-ए-फ़िरोज़शाही (द्वितीय)शम्स-ए-सिराज अफ़ीफ़केवल फ़िरोज़शाह तुग़लक़ पर — बरनी से भिन्न ग्रंथ।
फ़तवा-ए-जहाँदारीज़ियाउद्दीन बरनीराजत्व का सिद्धांत; अभिजनवादी दृष्टि।
ख़ज़ाइन-उल-फ़ुतूह एवं नुह सिपिहरअमीर ख़ुसरो"तूती-ए-हिन्द"; ख़ालिक़ बारी में हिन्दवी-फ़ारसी शब्दकोश।
फ़ुतूह-उस-सलातीनइसामीबहमनी संरक्षण में; दक्कन की दृष्टि से सल्तनत का इतिहास।
तारीख़-ए-मुबारकशाहीयाह्या बिन अहमद सरहिंदीसैयद वंश का प्रमुख स्रोत।
अकबरनामा एवं आइन-ए-अकबरीअबुल फ़ज़लआइन तीसरा भाग; आँकड़ों-आधारित प्रशासनिक विवरण का प्रथम उदाहरण।
मुन्तख़ब-उत-तवारीख़अब्दुल क़ादिर बदायूँनीअकबर की धार्मिक नीति का कटु आलोचक।
तबक़ात-ए-अकबरीनिज़ामुद्दीन अहमदअकबर काल का संतुलित वृत्तांत।
पादशाहनामाअब्दुल हमीद लाहौरीशाहजहाँ का आधिकारिक इतिहास।
आलमगीरनामामुहम्मद क़ाज़िमऔरंगज़ेब के प्रथम दशक का इतिहास; उसके बाद सुल्तान ने आधिकारिक इतिहास-लेखन पर रोक लगाई।
मुन्तख़ब-उल-लुबाबख़ाफ़ी ख़ानरोक के बावजूद गुप्त रूप से लिखा गया औरंगज़ेब-कालीन इतिहास।
गुलशन-ए-इब्राहीमी (तारीख़-ए-फ़रिश्ता)मुहम्मद क़ासिम फ़रिश्ताबीजापुर संरक्षण; अखिल भारतीय दृष्टि।

तालिका दाएँ-बाएँ स्क्रॉल की जा सकती है।

अमीर ख़ुसरो · एक व्यक्ति, तीन भूमिकाएँ
  • इतिहासकार — ख़ज़ाइन-उल-फ़ुतूह (अलाउद्दीन के अभियान), तुग़लक़नामा।
  • कवि — पाँच दीवान; "हिन्दवी" में दोहे-पहेलियाँ; स्वयं को "हिन्दुस्तान की तूती" कहा।
  • संगीतज्ञ — परंपरा उन्हें क़व्वाली एवं अनेक रागों से जोड़ती है; निज़ामुद्दीन औलिया के शिष्य।
  • सात सुल्तानों का शासन देखा — बलबन-काल से मुहम्मद बिन तुग़लक़ तक।

03आत्मकथाएँ एवं अनुवाद-परंपरा Autobiographies and Translations

क · शाही आत्म-लेखन Royal Self-Writing

ग्रंथलेखकविशेषता
फ़ुतूहात-ए-फ़िरोज़शाहीफ़िरोज़शाह तुग़लक़सुल्तान की संक्षिप्त आत्म-विवरणिका; कर-व्यवस्था एवं निर्माण-कार्य।
बाबरनामा (तुज़ुक-ए-बाबरी)बाबरमूल तुर्की (चग़ताई) में; भारत की प्रकृति, समाज एवं स्वयं की स्पष्टवादी समीक्षा। अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना ने फ़ारसी अनुवाद किया।
हुमायूँनामागुलबदन बेगमबाबर की पुत्री; मुग़ल अंतःपुर का दुर्लभ स्त्री-दृष्टिकोण।
तुज़ुक-ए-जहाँगीरीजहाँगीरफ़ारसी आत्मकथा; कला-पारखी दृष्टि, प्रकृति-निरीक्षण एवं न्याय की ज़ंजीर।

स्मरण-सूत्र: चार "आत्म-लेखन" में से दो सम्राटों ने स्वयं लिखे (बाबर, जहाँगीर), एक सुल्तान ने (फ़िरोज़शाह) और एक राजकुमारी ने किसी और के बारे में (गुलबदन ने हुमायूँ पर)। अकबर एवं शाहजहाँ ने आत्मकथा नहीं लिखी — उनके इतिहास दरबारी लेखकों ने लिखे।

ख · अनुवाद-परंपरा The Translation Movement

अकबर ने मकतबख़ाना (अनुवाद-विभाग) की स्थापना की, जहाँ संस्कृत ग्रंथों के फ़ारसी अनुवाद हुए। यह केवल भाषा का नहीं, दो ज्ञान-परंपराओं के संवाद का उपक्रम था — और परीक्षा में इसके ठोस उदाहरण पूछे जाते हैं।

मूल ग्रंथफ़ारसी रूपअनुवादक / काल
महाभारतरज़्मनामा ("युद्धों की पुस्तक")अकबर काल; बदायूँनी, नक़ीब ख़ान आदि विद्वानों का दल।
रामायणफ़ारसी रामायणबदायूँनी; अकबर काल।
लीलावती (गणित)फ़ारसी अनुवादफ़ैज़ी; राजतरंगिणी एवं अथर्ववेद के अनुवाद भी इसी काल में।
पंचतंत्रअनवार-ए-सुहैली / अयार-ए-दानिशक्रमशः पूर्व-परंपरा एवं अबुल फ़ज़ल।
52 उपनिषदसिर्र-ए-अकबर ("महान रहस्य")दाराशिकोह, 1657; इसी के लैटिन अनुवाद से उपनिषद यूरोप (शोपेनहावर तक) पहुँचे।
वेदांत-तसव्वुफ़ तुलनामजमा-उल-बहरैन ("दो समुद्रों का संगम")दाराशिकोह; दोनों परंपराओं की मूलभूत एकता का प्रतिपादन।

04निर्गुण भक्ति साहित्य Nirguna Bhakti Literature

निर्गुण संतों ने निराकार ईश्वर की उपासना की और साथ ही जाति, कर्मकांड एवं धार्मिक पाखंड — हिंदू और मुस्लिम दोनों — पर सीधा प्रहार किया। इनका साहित्य मध्यकाल की सबसे मुखर सामाजिक आलोचना है।

संतरचना / संकलनविशेषता
कबीर (1440–1518)बीजक — साखी, सबद, रमैनीजुलाहा पृष्ठभूमि; रामानंद के शिष्य माने जाते हैं। भाषा "सधुक्कड़ी" — पंचमेल खिचड़ी। वाणी गुरु ग्रंथ साहिब में भी संकलित।
रैदास / रविदासपद एवं वाणीचर्मकार पृष्ठभूमि; "बेगमपुरा" — शोक-रहित नगर की कल्पना। मीरा ने इन्हें गुरु माना।
गुरु नानक (1469–1539)जपुजी साहिब एवं वाणीसिख पंथ के संस्थापक; "न कोई हिंदू, न कोई मुसलमान"। लंगर एवं संगत की संस्था।
दादू दयालदादू वाणीराजस्थान; दादूपंथ के प्रवर्तक। शिष्य रज्जब ने वाणी संकलित की।
सुंदरदासज्ञान समुद्रदादू के शिष्य; निर्गुण धारा के सर्वाधिक शास्त्र-शिक्षित कवि।
मलूकदासपद"अजगर करे न चाकरी" — लोक-प्रचलित पंक्ति के रचयिता।

पोथी पढ़-पढ़ कर संसार मरता गया, पंडित कोई न हुआ; जिसने प्रेम का ढाई आखर पढ़ लिया, वही पंडित हुआ।

कबीर · प्रचलित दोहे का भाव-अनुवाद

निर्गुण धारा की एक और विशेषता सूफ़ी-संत समन्वय है — कबीर एवं नानक दोनों की वाणी में सूफ़ी शब्दावली मिलती है, और आगे चलकर गुरु ग्रंथ साहिब में शेख़ फ़रीद की वाणी का संकलित होना इसी संवाद का प्रमाण है।

05सगुण भक्ति — राम एवं कृष्ण काव्य Saguna Bhakti — Rama and Krishna Poetry

क · रामभक्ति शाखा The Rama Stream

कविरचनाविशेषता
रामानंदपरंपरा-प्रवर्तकभक्ति को उत्तर भारत में लाए; शिष्य-परंपरा में कबीर एवं रैदास भी गिने जाते हैं — "भक्ति द्राविड़ ऊपजी, लाए रामानंद"।
तुलसीदास (1532–1623)रामचरितमानस, विनयपत्रिका, कवितावली, गीतावली, दोहावलीमानस अवधी में, रचना 1574–76 के आसपास; अकबर के समकालीन।

ख · कृष्णभक्ति शाखा The Krishna Stream

कविरचनाविशेषता
विद्यापतिपदावलीमैथिली; राधा-कृष्ण शृंगार — भक्ति एवं शृंगार का संगम।
सूरदाससूरसागर, सूरसारावली, साहित्य लहरीब्रजभाषा; वल्लभाचार्य के शिष्य, अष्टछाप के प्रमुख कवि। वात्सल्य एवं भ्रमरगीत।
अष्टछापआठ कविवल्लभ-संप्रदाय (पुष्टिमार्ग); सूरदास, कुंभनदास, नंददास आदि — कीर्तन-साहित्य।
मीराबाई (1498–1547)पदराजस्थानी-ब्रज; कृष्ण को "गिरधर गोपाल" रूप में वरण — स्त्री-स्वर की सबसे मुखर अभिव्यक्ति।
रसखानप्रेमवाटिका, सुजान रसखानमुस्लिम पृष्ठभूमि के कृष्णभक्त — "मानुष हौं तो वही रसखानि"।
चैतन्य महाप्रभु (1486–1533)शिक्षाष्टक (परंपरा)बंगाल; गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय एवं संकीर्तन। जीवनी — कृष्णदास कविराज कृत चैतन्य चरितामृत
शंकरदेव (1449–1568)कीर्तन घोषा, बरगीतअसम; एकशरण नामधर्म, सत्र-संस्था एवं अंकिया नाट।
परीक्षा-दृष्टि · शाखा-भेद एक पंक्ति में
  • निर्गुण-ज्ञानाश्रयी — कबीर, नानक, दादू, रैदास। निर्गुण-प्रेमाश्रयी (सूफ़ी) — जायसी, कुतुबन, मंझन।
  • सगुण-रामाश्रयी — तुलसीदास। सगुण-कृष्णाश्रयी — सूरदास, मीरा, रसखान।
  • यह चतुर्विध वर्गीकरण आचार्य रामचन्द्र शुक्ल कृत "हिन्दी साहित्य का इतिहास" की देन है — NET में सीधे पूछा जाता है।

06सूफ़ी साहित्य एवं प्रेमाख्यान Sufi Literature and Premakhyan

सूफ़ी कवियों ने एक अनूठा प्रयोग किया — अवधी जैसी लोक-भाषा में, भारतीय कथाओं के माध्यम से, इश्क़-ए-हक़ीक़ी (ईश्वर-प्रेम) की बात कही। लौकिक प्रेम-कथा यहाँ अलौकिक प्रेम का रूपक है।

प्रेमाख्यानकविवर्ष / विशेषता
चंदायनमुल्ला दाऊदलगभग 1379; अवधी प्रेमाख्यान परंपरा का प्रारंभिक ग्रंथ — लोरिक-चंदा कथा।
मृगावतीकुतुबनलगभग 1503; सूफ़ी रूपक-काव्य।
पद्मावतमलिक मुहम्मद जायसी1540; पद्मिनी-रत्नसेन कथा — रूपकात्मक व्याख्या सहित। अवधी का शिखर-प्रेमाख्यान।
मधुमालतीमंझनलगभग 1545; प्रेम की आध्यात्मिक यात्रा।
अखरावट एवं आख़िरी कलामजायसीवर्णमाला-आधारित रहस्यवादी रचना एवं परलोक-वर्णन।

सूफ़ी गद्य — मलफ़ूज़ात परंपरा Sufi Prose

सूफ़ी ख़ानक़ाहों से एक विशिष्ट विधा निकली — मलफ़ूज़ात, अर्थात् शेख़ की बातचीत का शिष्य द्वारा किया गया अभिलेखन। सबसे प्रसिद्ध है फ़वाइद-उल-फ़ुआद — निज़ामुद्दीन औलिया की वाणी, जिसे अमीर हसन सिज्ज़ी ने संकलित किया; साथ में ख़ैर-उल-मजालिस (नसीरुद्दीन चिराग़-ए-दिल्ली की वाणी, हमीद क़लंदर द्वारा) भी उल्लेखनीय है। ये ग्रंथ दरबार से बाहर के सामान्य जीवन, बाज़ार, स्त्रियों एवं ग़रीबों की ऐसी सूचना देते हैं जो तवारीख़ों में नहीं मिलती।

07दक्षिण भारतीय साहित्य South Indian Literature

भक्ति आंदोलन का जन्म दक्षिण में हुआ — आलवारों एवं नयनारों से — और मध्यकाल में दक्षिण की चारों भाषाओं में साहित्य का स्वर्ण-काल आया।

भाषा / परंपराप्रमुख कवि-ग्रंथविशेषता
तमिल — वैष्णव12 आलवार · दिव्य प्रबंधम्नाथमुनि द्वारा संकलित 4,000 पद — "तमिल वेद" की प्रतिष्ठा। अंडाल एकमात्र स्त्री आलवार।
तमिल — शैव63 नयनार · तेवारम, तिरुवाचकम्अप्पार, संबंदर, सुंदरर के तेवारम; माणिक्कवाचकर का तिरुवाचकम्। शेक्किळार के पेरियपुराणम् में नयनार-चरित।
तमिल — महाकाव्यकम्बन · कम्ब रामायणम्चोल काल; रामकथा का तमिल शिखर।
कन्नड़पंप, पोन्न, रन्न — "रत्नत्रय"दसवीं सदी; पंप का विक्रमार्जुन विजय। बसवण्णा एवं अक्क महादेवी के वचन — वीरशैव आंदोलन।
तेलुगुनन्नय, तिक्कन, एर्रन — "कवित्रय"महाभारत का तेलुगु अनुवाद तीन कवियों ने पीढ़ियों में पूरा किया।
तेलुगु — विजयनगरकृष्णदेवराय · आमुक्तमाल्यदस्वयं सम्राट द्वारा; दरबार में अष्टदिग्गज — अल्लसानि पेद्दन "आंध्र कविता के पितामह"।
मलयालमएष़ुत्तच्छन · अध्यात्म रामायणम्सोलहवीं सदी; मलयालम भाषा के जनक माने जाते हैं।
संस्कृत — विजयनगरगंगादेवी · मधुराविजयकुमार कम्पन की मदुरै-विजय पर रानी द्वारा रचित संस्कृत काव्य — स्त्री-लेखन का दुर्लभ उदाहरण।

08पूर्वी एवं पश्चिमी भारत का साहित्य Eastern and Western India

बांग्ला, उड़िया एवं असमिया

  • चर्यापद — बांग्ला (एवं कई पूर्वी भाषाओं) का प्राचीनतम साक्ष्य; बौद्ध सिद्धों की रचनाएँ।
  • श्रीकृष्णकीर्तन — बड़ु चंडीदास; प्रारंभिक बांग्ला कृष्ण-काव्य।
  • कृत्तिवास ओझा — बांग्ला रामायण; काशीराम दास — बांग्ला महाभारत।
  • मंगलकाव्य — चंडीमंगल (मुकुंदराम), मनसामंगल; लोक-देवताओं का आख्यान।
  • उड़िया — सरलादास की महाभारत; जगन्नाथ दास की भागवत — "पंचसखा" परंपरा।
  • असमिया — शंकरदेव का कीर्तन घोषा; माधवदेव का नामघोषा; अहोम दरबार की बुरंजी

मराठी, गुजराती एवं राजस्थानी

  • ज्ञानेश्वरी (1290) — ज्ञानेश्वर; गीता की मराठी टीका, वारकरी परंपरा का आधार।
  • नामदेव — अभंग; वाणी गुरु ग्रंथ साहिब में भी संकलित।
  • एकनाथ — एकनाथी भागवत; तुकाराम — अभंग-गाथा (शिवाजी के समकालीन)।
  • रामदास — दासबोध; शिवाजी के गुरु माने जाते हैं।
  • गुजराती — नरसी मेहता; "वैष्णव जन तो तेने कहिए" — गांधीजी का प्रिय भजन।
  • राजस्थानी — ढोला-मारू रा दूहा; चारण-परंपरा की ख्यात एवं वंशावली। पृथ्वीराजरासो (चन्दबरदाई) — ऐतिहासिकता विवादित।

09सिख साहित्य Sikh Literature

सिख परंपरा में ग्रंथ केवल पाठ नहीं, गुरु है — यह विश्व धर्म-इतिहास की विरल घटना है, और इसका बनना भी एक सुविचारित संपादन-परियोजना थी।

ग्रंथ / चरणसंबद्ध गुरु / लेखकविवरण
जपुजी साहिबगुरु नानकमूल वाणी; गुरु ग्रंथ साहिब का आरंभिक पाठ।
गुरुमुखी लिपि का प्रसारगुरु अंगदवाणी के लेखन हेतु लिपि का व्यवस्थित प्रयोग।
आदि ग्रंथ का संकलनगुरु अर्जुन देव · 1604भाई गुरदास ने लिपिबद्ध किया; हरमंदिर साहिब में स्थापना। इसमें कबीर, नामदेव, रैदास, शेख़ फ़रीद सहित संतों-भगतों की वाणी भी।
गुरु ग्रंथ साहिब — गुरु-पदगुरु गोबिंद सिंह · 1708ग्रंथ को ही अंतिम एवं शाश्वत गुरु घोषित किया गया।
दसम ग्रंथगुरु गोबिंद सिंह से संबद्धजफ़रनामा (औरंगज़ेब को फ़ारसी पत्र), बचित्तर नाटक आदि।
वारेंभाई गुरदाससिख सिद्धांत की व्याख्या; "गुरु ग्रंथ साहिब की कुंजी" कही जाती हैं।
परीक्षा-दृष्टि · गुरु ग्रंथ साहिब
  • संकलन — गुरु अर्जुन देव, 1604; गुरु-पद — गुरु गोबिंद सिंह, 1708
  • इसमें हिंदू संत (कबीर, नामदेव, रैदास) एवं मुस्लिम सूफ़ी (शेख़ फ़रीद) दोनों की वाणी — समन्वय का जीवित प्रमाण
  • लिपि गुरुमुखी; संकलन रागों के अनुसार व्यवस्थित है।

10रीतिकाव्य एवं दरबारी साहित्य Riti Poetry and Courtly Literature

सत्रहवीं सदी से हिन्दी काव्य का केन्द्र भक्ति से हटकर शृंगार एवं काव्यशास्त्र की ओर गया — यही रीतिकाल है, जो मुग़ल-राजपूत दरबारों की रुचि का साहित्य है।

कविरचनाविशेषता
केशवदासरसिकप्रिया, कविप्रिया, रामचंद्रिकाओरछा दरबार; रीति-परंपरा के प्रवर्तक माने जाते हैं।
बिहारीबिहारी सतसईजयपुर के मिर्ज़ा राजा जयसिंह के दरबारी; 700+ दोहे — "गागर में सागर"।
भूषणशिवराज भूषण, शिवा बावनीरीतिकाल में वीर रस का अपवाद; शिवाजी एवं छत्रसाल के प्रशंसक।
मतिरामरसराज, ललित ललामरीति-निरूपण के प्रमुख आचार्य-कवि।
देवभावविलास, रसविलासरीतिकाल के सर्वाधिक ग्रंथ-प्रसू कवियों में।
घनानंदसुजान हित"रीतिमुक्त" धारा — प्रेम की स्वच्छंद अभिव्यक्ति।
अब्दुर्रहीम ख़ानख़ानारहीम दोहावली, बरवै नायिका-भेदअकबर के नवरत्न; बाबरनामा के फ़ारसी अनुवादक — भक्ति, नीति एवं रीति तीनों में उपस्थित।

साहित्य-इतिहास का मानक काल-विभाजन (आचार्य रामचन्द्र शुक्ल): आदिकाल / वीरगाथा काल (लगभग 1050–1375) → भक्तिकाल (1375–1700, "स्वर्ण युग") → रीतिकाल (1700–1900)। NET एवं राज्य परीक्षाओं में यह क्रम सीधे पूछा जाता है।

11ऐतिहासिक महत्त्व एवं सीमाएँ Historical Significance and Limitations

ऐतिहासिक महत्त्व
  • भक्ति साहित्य से सामाजिक इतिहास — जाति-व्यवस्था की भीतरी आलोचना; जुलाहा-चर्मकार-किसान वर्गों का स्वर।
  • तवारीख़ से राजनीतिक-प्रशासनिक इतिहास — तिथि, कर, बाज़ार, सेना।
  • मलफ़ूज़ात एवं लोक-काव्य से दरबार के बाहर का जीवन
  • आधुनिक भारतीय भाषाओं एवं उनकी साहित्यिक परंपराओं की नींव इसी काल में पड़ी।
  • अनुवाद-परंपरा — दो ज्ञान-प्रणालियों के संवाद का दस्तावेज़।
सीमाएँ एवं सावधानियाँ
  • तवारीख़ दरबार-केन्द्रित — किसान, स्त्री एवं जनजातीय समाज लगभग अनुपस्थित।
  • भक्ति-वाणी का पाठ प्रायः मौखिक परंपरा से आया — प्रक्षेप की समस्या; कई पद परवर्ती जोड़ हैं।
  • संत-जीवनियाँ (परचई, भक्तमाल) श्रद्धा-साहित्य हैं — तिथियाँ एवं चमत्कार आलोचनात्मक परीक्षण माँगते हैं।
  • वीरगाथा-काव्य (रासो) में अतिरंजना — पृथ्वीराजरासो की ऐतिहासिकता विवादित।
  • दरबारी प्रशस्ति में संरक्षक की छवि-निर्माण की प्रवृत्ति।
परीक्षा-दृष्टि · निष्कर्ष
  • मध्यकालीन साहित्य के दो ध्रुव — फ़ारसी तारीख़ (राज्य की दृष्टि) एवं भक्ति-वाणी (जन की दृष्टि); पूरा इतिहास दोनों को मिलाकर बनता है।
  • भक्ति आंदोलन का सबसे स्थायी साहित्यिक परिणाम — जन-भाषाओं का साहित्यिक भाषा बनना
  • समन्वय के तीन प्रतीक-ग्रंथ याद रखें — सिर्र-ए-अकबर (उपनिषद फ़ारसी में), पद्मावत (सूफ़ी कथा अवधी में), गुरु ग्रंथ साहिब (संत-सूफ़ी वाणी एक साथ)।

12स्वयं जाँच Self Test — 15 Questions

प्रत्येक प्रश्न का एक ही प्रयास मिलेगा। अंक 0 / 15
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