छत्तीसगढ़ी भाषा का इतिहास एवं विकास

छत्तीसगढ़ी भाषा का इतिहास एवं विकास

छत्तीसगढ़ी भाषा का इतिहास एवं विकास एक समृद्ध और रोचक यात्रा है, जो भारतीय उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक विविधता का एक अहम हिस्सा है। नीचे इसके इतिहास और विकास को क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत किया गया है:

हीरालाल काव्योपाध्याय जी ने छत्तीसगढ़ी का पहला व्याकरण सन् 1885 में लिखा था, जिसे जार्ज  ग्रियर्सन ने सन् 1890 में अंग्रेजी में अनुवाद कर बंगाल एशियाटिक सोसायटी के जर्नल में प्रकाशित करवाया था।

प्राचीन काल

  • छत्तीसगढ़ी भाषा की जड़ें प्राचीन मगधी अपभ्रंश में मानी जाती हैं, जो प्राकृत भाषाओं से विकसित हुई।
  • यह भाषा प्राचीनकाल में दक्षिण कोशल (वर्तमान छत्तीसगढ़) में बोली जाती थी।

मध्यकाल (10वीं – 18वीं सदी):

  • इस काल में छत्तीसगढ़ी का रूप अधिक स्पष्ट हुआ और यह एक विशिष्ट बोली के रूप में उभरने लगी।
  • लोकगीत, कथा-कहानियाँ और किस्सों के माध्यम से इस भाषा का उपयोग ग्रामीण समाज में व्यापक रूप से होने लगा।
  • भक्तिकाल में छत्तीसगढ़ी में कई भक्ति रचनाएँ हुईं, जिनमें भक्त कवि संत नामदेव, कबीर और स्थानीय संतों की रचनाएँ शामिल थीं।

ब्रिटिश काल:

  • 19वीं सदी में ब्रिटिश प्रशासन के दौरान छत्तीसगढ़ी को एक “लोकभाषा” के रूप में दर्ज किया गया।
  • 1900 के आसपास छत्तीसगढ़ी व्याकरण पर कुछ पुस्तकें प्रकाशित होने लगीं। लोक साहित्य और गीतों का संग्रह प्रारंभ हुआ।
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