केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) – वार्षिक भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट, 2025

केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) – वार्षिक भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट, 2025

(UPSC GS-3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव आकलन)


परिचय

भारत विश्व के सबसे बड़े भूजल-उपयोगकर्ता देशों में शामिल है। पेयजल, कृषि और औद्योगिक आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा भूजल पर निर्भर है—कृषि के लिए 87% भूजल निष्कर्षण होता है तथा ग्रामीण भारत में 80% से अधिक पेयजल भूजल पर आधारित है। ऐसे में इसकी गुणवत्ता का मूल्यांकन अत्यंत महत्वपूर्ण है। केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) द्वारा जारी वार्षिक भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट 2025 देश में भूजल की वर्तमान स्थिति, प्रमुख प्रदूषकों और उनकी भौगोलिक प्रवृत्ति को दर्शाती है।


रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष

समग्र गुणवत्ता स्थिति

यह रिपोर्ट 2024 में पूरे भारत से लगभग 15,000 भूजल नमूनों के परीक्षण पर आधारित है। परीक्षण BIS (IS 10500:2012) पेयजल मानकों के अनुसार किया गया।

  • 71.7% भूजल नमूने BIS द्वारा निर्धारित मानकों के अनुरूप हैं

  • 28.3% नमूनों में एक या अधिक संदूषक मानक सीमा से अधिक पाए गए

UPSC हेतु महत्व: भूजल गुणवत्ता का क्षरण सीधे सार्वजनिक स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और जल संकट को प्रभावित करता है।


प्रमुख संदूषक एवं क्षेत्रीय प्रभाव

नाइट्रेट संदूषण (Nitrate) – सबसे व्यापक समस्या

राष्ट्रीय स्तर: लगभग 20.71% नमूने BIS/WHO की सीमा 45 mg/L से अधिक।

  • राजस्थान – 50.5% नमूने प्रभावित

  • कर्नाटक – 45.5%

  • तमिलनाडु – 36.3%

  • अन्य प्रभावित राज्य: महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश

  • स्रोत: उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग, सीवेज का रिसाव, पशु अपशिष्ट

  • स्वास्थ्य प्रभाव: ब्लू बेबी सिंड्रोम (शिशुओं में), कैंसर जोखिम, थायरॉयड समस्याएँ

महत्वपूर्ण तथ्य: देश के लगभग 56% जिलों में भूजल में नाइट्रेट की मात्रा सुरक्षित सीमा (45 mg/L) से अधिक पाई गई है।


यूरेनियम संदूषण (Uranium)

राष्ट्रीय स्तर:

  • पूर्व-मानसून: 6.71% नमूने सीमा (30 ppb) से अधिक

  • पश्चात-मानसून: 7.91% नमूने सीमा से अधिक

  • पंजाब – 62.5% (पश्चात-मानसून)

  • हरियाणा – 15–23.75%

  • दिल्ली – 13–15%

  • कर्नाटक – 6–8%

  • उत्तर प्रदेश – 5–6%

  • हॉटस्पॉट: उत्तर-पश्चिमी भारत (पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान के कुछ भाग, उत्तर प्रदेश)

  • स्रोत: अधिकांशतः भू-जनित (चट्टानों से निक्षालन), परंतु अत्यधिक भूजल निष्कर्षण से स्थिति और गंभीर

  • स्वास्थ्य प्रभाव: कैंसर जोखिम, गुर्दे की विषाक्तता


फ्लोराइड संदूषण (Fluoride)

राष्ट्रीय स्तर: 8.05% नमूने BIS सीमा (1.5 mg/L) से अधिक

  • राजस्थान – 41.06%

  • हरियाणा – 21.82%

  • अन्य प्रभावित राज्य: तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक

  • स्रोत: अधिकांशतः भू-जनित (चट्टानों से प्राकृतिक रूप से)

  • स्वास्थ्य प्रभाव: दंत और कंकालीय फ्लोरोसिस


लवणता/विद्युत चालकता (Salinity/EC)

राष्ट्रीय स्तर: 7.23% नमूने BIS सीमा (3000 µS/cm) से अधिक

  • राजस्थान – ~47%

  • दिल्ली – 33.33%

  • कारण: अत्यधिक पम्पिंग, कम पुनर्भरण, शुष्क/अर्ध-शुष्क परिस्थितियाँ, तटीय क्षेत्रों में समुद्री जल का अंतःक्षेपण

  • प्रभाव: पेयजल एवं सिंचाई हेतु अनुपयुक्त


भारी धातुएँ एवं अन्य संदूषक

  • आर्सेनिक: गंगा-ब्रह्मपुत्र बेसिन (पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, असम, झारखंड) – भू-जनित

  • सीसा (Lead): दिल्ली (उच्चतम स्तर) – औद्योगिक गतिविधियाँ

  • मैंगनीज/लौह: असम, कर्नाटक, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल – भू-जनित


भूजल संदूषण के कारण

भू-जनित कारक (Geogenic Factors)

  • चट्टानों के प्राकृतिक अपक्षयण से भूजल में फ्लोराइड, यूरेनियम और आर्सेनिक जैसे तत्व मिल जाते हैं

  • क्षारीय मृदा और बाइकार्बोनेट यूरेनियम की घुलनशीलता को बढ़ाते हैं

  • अत्यधिक गहराई तक पम्पिंग करने से भू-जनित संदूषकों का स्थानांतरण बढ़ता है

मानवजनित कारक (Anthropogenic Factors)

  • कृषि: 87% भूजल निष्कर्षण; उर्वरकों एवं कीटनाशकों का बहाव → नाइट्रेट संदूषण

  • औद्योगिक: भारी धातुओं (सीसा, कैडमियम, क्रोमियम) का निर्मुक्त होना

  • नगरीय: सीवेज का रिसाव; पक्की सतहों के कारण पुनर्भरण क्षमता में कमी

  • पशु अपशिष्ट: ग्रामीण क्षेत्रों में संदूषण का महत्वपूर्ण स्रोत


सरकारी पहल

  • जल जीवन मिशन (JJM): BIS:10500 मानकों को पेयजल गुणवत्ता का बेंचमार्क; रासायनिक संदूषक-प्रभावित क्षेत्रों के लिए 10% धनराशि का आवंटन; पेयजल गुणवत्ता निगरानी ढाँचा, 2021

  • परीक्षण अवसंरचना: देश भर में 2,180 प्रयोगशालाएँ कार्यरत; प्रत्येक समुदाय में 5 ग्रामीण महिलाओं को फील्ड टेस्ट किट (FTKs) के उपयोग का प्रशिक्षण

  • सामुदायिक शुद्धिकरण: दूषित बस्तियों में सामुदायिक जल शुद्धिकरण संयंत्र (CWPPs) स्थापित

  • CGWB निगरानी: वार्षिक रिपोर्ट, बुलेटिन और अलर्ट के माध्यम से डेटा का प्रसार; असुरक्षित/संवेदनशील क्षेत्रों में बार-बार नमूनाकरण हेतु नई SOP

  • आर्सेनिक में कमी: 525 आर्सेनिक-मुक्त कुओं के लिए सीमेंट सीलिंग तकनीक (उत्तर प्रदेश: 294, पश्चिम बंगाल: 191)

  • पुनर्भरण कार्यक्रम: जल शक्ति अभियान, जल संचय जन भागीदारी, अटल भूजल योजना (विश्व बैंक सहायता प्राप्त), प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY), MGNREGS – जल संरचनाओं के निर्माण हेतु

  • सतही जल की सफाई: राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG), राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (NRCP); STPs और ETPs हेतु वित्तीय आवंटन; जल अधिनियम, 1974 एवं पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 का प्रवर्तन


केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) – परिचय

  • स्थापना: 1970 (Exploratory Tube Wells Organization का पुनर्नामकरण); 1972 में भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के भूजल प्रभाग का समामेलन

  • अधीनस्थ मंत्रालय: जल शक्ति मंत्रालय, जल संसाधन विभाग

  • मुख्यालय: फरीदाबाद, हरियाणा

  • क्षेत्रीय कार्यालय: 18

  • प्रमुख कार्यक्रम: राष्ट्रीय जलभृत मानचित्रण और प्रबंधन कार्यक्रम (NAQUIM)

  • विनियामक प्राधिकरण: केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (CGWA) – 1997 में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत गठित

CGWB के प्रमुख कार्य:

  • भूजल संसाधनों का अन्वेषण, मानचित्रण, निगरानी एवं मूल्यांकन

  • राज्य एवं जिला स्तरीय भूजल रिपोर्ट, वार्षिक पुस्तिकाएँ एवं एटलस का प्रकाशन

  • भूजल विकास एवं प्रबंधन का विनियमन (CGWA के माध्यम से)


UPSC परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण बिंदु

  • पर्यावरण-स्वास्थ्य-कृषि संबंध: भूजल प्रदूषण स्वास्थ्य (नाइट्रेट, फ्लोराइड, आर्सेनिक), पेयजल पहुँच और खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करता है

  • जलवायु परिवर्तन का प्रभाव: सूखाग्रस्त क्षेत्रों में कम पुनर्भरण से संदूषकों की सांद्रता बढ़ती है

  • अत्यधिक भूजल निष्कर्षण: लगभग 14% ब्लॉक “अति-दोहन” श्रेणी में, जिससे भू-जनित संदूषकों का स्थानांतरण बढ़ता है

  • मानसून का द्वैत प्रभाव: वर्षा कुछ क्षेत्रों में संदूषकों को तनुकृत करती है, जबकि गहन कृषि वाले क्षेत्रों में सतही संदूषकों के निक्षालन को बढ़ाती है

  • नीति अनुशंसाएँ:

    • नाइट्रेट प्रबंधन: उर्वरक विनियमन, जैविक कृषि को बढ़ावा, उचित सीवेज उपचार

    • यूरेनियम/फ्लोराइड: विफ्लोराइडीकरण और धातु निष्कासन

    • पुनर्भरण बढ़ाना: वर्षा जल संचयन, तालाबों का पुनर्जीवन


निष्कर्ष

वार्षिक भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट 2025 भारत के भूजल संकट की गंभीरता को रेखांकित करती है। यद्यपि 71.7% भूजल BIS मानकों के अनुरूप है, फिर भी 28.3% नमूनों में संदूषण—विशेषकर नाइट्रेट, यूरेनियम, फ्लोराइड, लवणता और भारी धातुओं का—सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं जल सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती है। राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, कर्नाटक और तमिलनाडु सर्वाधिक प्रभावित राज्य हैं। भू-जनित एवं मानवजनित दोनों कारक इस संकट के लिए उत्तरदायी हैं। इसके समाधान हेतु नियमित निगरानी, स्थानीय स्तर पर शमन उपाय, जल पुनर्भरण को बढ़ावा, टिकाऊ कृषि पद्धतियाँ तथा सरकारी योजनाओं (JJM, अटल भूजल योजना, MGNREGS आदि) का प्रभावी क्रियान्वयन आवश्यक है।


स्रोत: केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) – वार्षिक भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट, 2025; BIS मानक IS 10500:2012; जल शक्ति मंत्रालय

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