विलायती बबूल का उन्मूलन

विलायती बबूल का उन्मूलन

चर्चा में क्यों?

राजस्थान के पंचायती राज मंत्री ने पंचायती राज एवं वन विभाग को ‘विलायती बबूल’ (Prosopis Juliflora) का जड़ सहित पूरी तरह उन्मूलन के लिये निर्देश दिये हैं।

मुख्य बिंदु 

  • विलायती बबूल के बारे में: 
    • इसे स्थानीय रूप से विलायती कीकर अथवा गांडो बावल कहा जाता है। यह एक आक्रामक विदेशी वनस्पति प्रजाति है, जिसका मूल स्थान मैक्सिको, दक्षिण अमेरिका और कैरेबियन क्षेत्र है।
    • वर्तमान में यह भारत के शुष्क और अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में व्यापक रूप से पाई जाती है।
  • प्रभाव :
    • इसका तीव्र प्रसार स्थानीय वनस्पतियों की वृद्धि को बाधित करता है और मृदा की उर्वरता को नष्ट कर कृषि उत्पादकता को कम कर देता है।
    • इसका विस्तार चरागाहों को नष्ट कर देता है, जिससे पशुधन के लिये चारा उपलब्ध कराना कठिन हो जाता है और अन्य अवांछित पौधों के फैलाव को बढ़ावा मिलता है।

आक्रामक विदेशी प्रजातियाँ (Invasive Alien Species – IAS)

  • आक्रामक विदेशी प्रजातियाँ वे गैर-देशज जीव (पौधे, जंतु, कवक अथवा सूक्ष्मजीव) हैं जिन्हें उनके प्राकृतिक क्षेत्र से बाहर लाया गया है और जो वहाँ स्थायी रूप से फलते-फूलते हुए अपनी जनसंख्या स्थापित कर लेते हैं।
  • ये प्रजातियाँ स्थानीय प्रजातियों को पीछे छोड़कर प्रतिस्पर्द्धा में आगे निकल जाती हैं, पारितंत्र को बाधित करती हैं तथा पारिस्थितिकीय, आर्थिक और सामाजिक स्तर पर गंभीर प्रभाव डालती हैं।
  • जैवविविधता पर कन्वेंशन (CBD) के अनुसार, IAS वे प्रजातियाँ हैं जो नए क्षेत्र में “पहुँचने, जीवित रहने और फलने-फूलने” की क्षमता रखती हैं तथा प्रायः संसाधनों के लिये स्थानीय प्रजातियों को प्रतिस्पर्द्धा से बाहर कर देती हैं।
  • भारत में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के अंतर्गत IAS को ऐसी गैर-देशज प्रजातियों के रूप में परिभाषित किया गया है, जो वन्यजीव अथवा उनके आवास के लिये खतरा उत्पन्न करती हैं।
  • भारत में अन्य आक्रामक विदेशी प्रजातियाँ: अफ्रीकी कैटफिश, नील तिलापिया, लाल-बेलदार पिरान्हा, एलीगेटर गार, रेड-ईयर स्लाइडर (उत्तरी अमेरिकी कछुआ) जैसी पशु प्रजातियाँ तथा लैंटाना और जलकुंभी जैसे पौधे भारत में सबसे व्यापक आक्रामक प्रजातियों में से हैं।
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