संत कबीर दास जयंती

संत कबीर दास जयंती

चर्चा में क्यों?

हाल ही में, संत कबीरदास की जयंती के उपलक्ष्य में 24 जून , 2021 को संत कबीरदास जयंती मनाई गई ।

  • हिंदू चंद्र कैलेंडर के अनुसार , कबीरदास जयंती ज्येष्ठ पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है।

प्रमुख बिंदु

  • के बारे में:
    • संत कबीर दास का जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर में हुआ था । वे 15 वीं शताब्दी के रहस्यवादी कवि, संत और समाज सुधारक तथा भक्ति आंदोलन के प्रणेता थे।
      • कबीर की विरासत आज भी कबीर पंथ नामक एक संप्रदाय के माध्यम से चल रही है , जो एक धार्मिक समुदाय है जो उन्हें अपना संस्थापक मानता है।
    • शिक्षक: उनका प्रारंभिक जीवन एक मुस्लिम परिवार में बीता, लेकिन वे अपने शिक्षक, हिंदू भक्ति नेता रामानंद से बहुत प्रभावित थे।
    • साहित्य: कबीर दास की रचनाओं का भक्ति आंदोलन पर बहुत प्रभाव पड़ा और इसमें कबीर ग्रंथावली, अनुराग सागर, बीजक और साखी ग्रंथ जैसे शीर्षक शामिल हैं।
      • उनके पद सिख धर्म के धर्मग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब में पाए जाते हैं।
      • उनके कार्यों का बड़ा हिस्सा पांचवें सिख गुरु, गुरु अर्जन देव द्वारा एकत्रित किया गया था।
      • वह अपने दो पंक्तियों वाले दोहे के लिए प्रसिद्ध थे, जिन्हें ‘कबीर के दोहे’ के नाम से जाना जाता है।
    • भाषा: कबीर की रचनाएँ हिंदी भाषा में लिखी गईं जो समझने में आसान थी। वे लोगों को ज्ञान देने के लिए दोहे लिखते थे।
  • भक्ति आंदोलन:
    • शुरुआत: यह आंदोलन संभवतः छठी और सातवीं शताब्दी के आसपास तमिल क्षेत्र में शुरू हुआ और अलवार (विष्णु के भक्त) और नयनार (शिव के भक्त), वैष्णव और शैव कवियों की कविताओं के माध्यम से काफी लोकप्रियता हासिल की ।
      • अलवर और नयनार अपने देवताओं की स्तुति में तमिल में भजन गाते हुए एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा करते थे 
      • नलयिर दिव्यप्रबंधम् आलवारों द्वारा रचित एक ग्रन्थ है  इसे अक्सर तमिल वेद कहा जाता है।
    • वर्गीकरण: एक अलग स्तर पर, धर्म के इतिहासकार अक्सर भक्ति परंपराओं को दो व्यापक श्रेणियों में वर्गीकृत करते हैं: सगुण (गुणों सहित) और निर्गुण (गुण रहित)।
      • सगुण में वे परंपराएं शामिल थीं जो विशिष्ट देवताओं जैसे शिव, विष्णु और उनके अवतारों और देवी के रूपों की पूजा पर केंद्रित थीं, जिन्हें अक्सर मानवरूपी रूपों में अवधारणागत किया जाता था।
      • दूसरी ओर निर्गुण भक्ति ईश्वर के अमूर्त रूप की पूजा थी।
    • सामाजिक व्यवस्था:
      • यह आंदोलन भारतीय उपमहाद्वीप के हिंदुओं, मुसलमानों और सिखों द्वारा ईश्वर की आराधना से जुड़े कई रीति-रिवाजों और अनुष्ठानों के लिए ज़िम्मेदार था । उदाहरण के लिए, किसी हिंदू मंदिर में कीर्तन, किसी दरगाह पर कव्वाली (मुसलमानों द्वारा), और किसी गुरुद्वारे में गुरबानी गायन।
      • वे प्रायः प्रतिष्ठान और सभी सत्तावादी मठवासी व्यवस्था के विरोधी थे।
      • उन्होंने समाज में सभी प्रकार के सांप्रदायिक कट्टरता और जातिगत भेदभाव की भी कड़ी आलोचना की ।
      • उच्च और निम्न दोनों जातियों से आने वाले इन कवियों ने साहित्य का एक ऐसा विशाल भंडार तैयार किया, जिसने लोकप्रिय आख्यानों में अपनी जगह बना ली।
      • उन सभी ने सामाजिक जीवन में, वास्तविक मानवीय आकांक्षाओं और सामाजिक संबंधों के क्षेत्र में धर्म की प्रासंगिकता का दावा किया।
      • भक्ति कवियों ने ईश्वर के प्रति समर्पण पर बल दिया।
      • इस आंदोलन की प्रमुख उपलब्धि मूर्ति पूजा का उन्मूलन थी।
    • महिलाओं की भूमिका:
      • आण्डाल एक आलवार महिला थी और वह स्वयं को भगवान विष्णु की प्रेमिका मानती थी।
      • कराईकल अम्मैयार शिव की भक्त थीं और उन्होंने अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए घोर तप का मार्ग अपनाया। उनकी रचनाएँ नयनार परंपरा में संरक्षित हैं।
    • महत्वपूर्ण व्यक्तित्व:
      • कन्नड़ क्षेत्र: इस क्षेत्र में आंदोलन 12 वीं शताब्दी में बसवन्ना (1105-68) द्वारा शुरू हुआ।
      • महाराष्ट्र: भक्ति आंदोलन 13 वीं शताब्दी के अंत में शुरू हुआ। इसके समर्थकों को वारकरी के नाम से जाना जाता था।
        • इसके सबसे लोकप्रिय व्यक्तित्वों में ज्ञानदेव (1275-96), नामदेव (1270-50) और तुकाराम (1608-50) थे।
      • असम: श्रीमंत शंकरदेव (एक वैष्णव संत जिनका जन्म 1449 ई. में असम के नागांव जिले में हुआ था। उन्होंने नव-वैष्णव आंदोलन शुरू किया था)।
      • बंगाल: चैतन्य बंगाल के एक प्रसिद्ध संत और सुधारक थे जिन्होंने कृष्ण पंथ को लोकप्रिय बनाया।
      • उत्तरी भारत: 13 वीं से 17 वीं शताब्दी तक बड़ी संख्या में कवियों का उदय हुआ, जो सभी भक्ति शैली के महत्वपूर्ण व्यक्ति थे।
        • जबकि कबीर, रविदास और गुरु नानक ने निराकार ईश्वर (निर्गुण भक्ति) की बात की, वहीं राजस्थान की मीराबाई (1498-1546) ने कृष्ण की स्तुति में भक्ति पद रचे और गाए।
        • सूरदास, नरसिंह मेहता और तुलसीदास ने भी भक्ति साहित्य के क्षेत्र में अमूल्य योगदान दिया और इसकी गौरवशाली विरासत को बढ़ाया।
See also  डोंगरिया कोंध जनजाति

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