पुनःसंयोजक DNA (rDNA) प्रौद्योगिकी: अवधारणा, प्रक्रिया एवं अनुप्रयोग
UPSC GS-3: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी – जैव प्रौद्योगिकी
परिचय
पुनःसंयोजक DNA (Recombinant DNA – rDNA) प्रौद्योगिकी, जैव प्रौद्योगिकी की आधारशिला है। इसमें दो भिन्न प्रजातियों के DNA अणुओं को इन विट्रो (कृत्रिम परिवेश) में संयोजित कर एक नया संकर (hybrid) DNA अणु बनाया जाता है। इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह प्रजातीय अवरोध (species barrier) को तोड़ती है, जिससे असंबंधित जीवों (जैसे—मानव DNA को जीवाणु में, या पादप DNA को कवक में) के बीच आनुवंशिक पदार्थ का स्थानांतरण संभव हो पाता है।
महत्व: यह तकनीक प्रकृति में नहीं पाई जाने वाली आनुवंशिक रचनाएँ (novel genetic combinations) बनाने की अनुमति देती है, जिसका उपयोग चिकित्सा, कृषि, उद्योग एवं पर्यावरण संरक्षण में क्रांतिकारी योगदान के रूप में हुआ है।
पुनःसंयोजक DNA प्रौद्योगिकी की प्रक्रिया (मूलभूत चरण)
इस प्रक्रिया में निम्नलिखित प्रमुख चरण शामिल हैं:
लक्ष्य जीन का पृथक्करण (Isolation): वांछित विशेषता वाले जीन (उदाहरण—मानव इंसुलिन जीन) को दाता जीव के DNA से प्रतिबंधन एंडोन्यूक्लिएस (restriction endonuclease) एंजाइमों की सहायता से काटकर अलग किया जाता है।
वाहक (Vector) का चयन: एक उपयुक्त वाहक DNA (प्रायः जीवाण्विक प्लास्मिड या बैक्टीरियोफेज) का चयन किया जाता है। इस वाहक में एक विशिष्ट प्रतिबंधन स्थल (restriction site) तथा चयनात्मक चिह्न (selectable marker – जैसे एंटीबायोटिक प्रतिरोधी जीन) होता है।
संयोजन (Ligation): उसी प्रतिबंधन एंजाइम द्वारा वाहक DNA को भी काटा जाता है। फिर DNA लिगेज (ligase) एंजाइम की सहायता से लक्ष्य जीन को वाहक DNA में स्थाई रूप से जोड़ा (inserted) जाता है, जिससे पुनःसंयोजक DNA (rDNA) अणु बनता है। (यह rDNA अणु होस्ट से अलग नहीं किया जाता, बल्कि होस्ट में प्रविष्ट करने के लिए तैयार किया जाता है)
स्थानांतरण (Transformation/Transfection): इस rDNA अणु को उपयुक्त होस्ट जीव (जैसे—E. coli जीवाणु) में प्रविष्ट (introduced) किया जाता है।
स्क्रीनिंग एवं अभिव्यक्ति (Screening & Expression): होस्ट कोशिकाओं को चयनात्मक माध्यम (जिसमें एंटीबायोटिक हो) पर उगाया जाता है। केवल rDNA ग्रहण करने वाली कोशिकाएँ ही जीवित रहती हैं। इन कोशिकाओं को किण्वक (fermenters) में बड़े पैमाने पर उगाकर वांछित प्रोटीन (जैसे—इंसुलिन) का उत्पादन कराया जाता है।
rDNA प्रौद्योगिकी के प्रमुख उपकरण (Tools)
प्रतिबंधन एंजाइम (Restriction Enzymes): DNA को विशिष्ट स्थानों (पैलिंड्रोमिक अनुक्रम) पर काटते हैं। (जैसे—EcoRI, HindIII)
DNA लिगेज (Ligase): कटे हुए DNA खंडों को आपस में जोड़ने (सिलाई) का कार्य करता है।
वाहक (Vectors): प्लास्मिड, बैक्टीरियोफेज, कॉस्मिड, या कृत्रिम गुणसूत्र (YAC, BAC)।
होस्ट जीव: प्रायः E. coli, यीस्ट (Saccharomyces cerevisiae), या स्तनधारी कोशिका रेखाएँ।
प्रमुख अनुप्रयोग (Applications)
चिकित्सा के क्षेत्र में
मानव इंसुलिन (Humulin): प्रथम आनुवंशिक रूप से इंजीनियर दवा, जो E. coli में मानव इंसुलिन जीन प्रविष्ट करके बनाई गई (मधुमेह उपचार)।
वैक्सीन निर्माण: हेपेटाइटिस-B वैक्सीन (यीस्ट-आधारित)।
थेरेप्यूटिक प्रोटीन: एरिथ्रोपोइटिन (EPO), वृद्धि हार्मोन (HGH), क्लॉटिंग फैक्टर्स (हीमोफीलिया के लिए), और इंटरफेरॉन (कैंसर चिकित्सा)।
जीन थेरेपी: दोषपूर्ण जीन को स्वस्थ जीन से प्रतिस्थापित करना।
कृषि के क्षेत्र में
Bt-कपास (Cry प्रोटीन): मृदा जीवाणु Bacillus thuringiensis का जीन पादप में प्रविष्ट कर बोल वर्म (bollworm) प्रतिरोधी फसलें।
ग्लाइफोसेट-सहिष्णु फसलें (Roundup Ready): शाकनाशी (herbicide) प्रतिरोधी सोयाबीन, मक्का।
पोषण-वर्धित फसलें: गोल्डन राइस (विटामिन-A युक्त चावल) – बीटा-कैरोटीन संश्लेषण के लिए डैफोडिल एवं जीवाणु जीन का उपयोग।
उद्योग एवं पर्यावरण में
औद्योगिक एंजाइम: प्रोटीएज, लाइपेज, एमाइलेज (डिटर्जेंट, कागज एवं खाद्य उद्योग)।
जैव-उपचार (Bioremediation): तेल-अपघटक (oil-degrading) जीनों को जीवाणुओं में प्रविष्ट कर पर्यावरण प्रदूषण (जैसे—तेल रिसाव) की सफाई।
जैव-ईंधन उत्पादन: सेल्यूलोज-अपघटक एंजाइमों के कुशल उत्पादन हेतु।
rDNA प्रौद्योगिकी की सीमाएँ एवं चिंताएँ
जैव-सुरक्षा (Biosafety) चिंताएँ: आनुवंशिक रूप से रूपांतरित जीव (GMOs) के प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र में छोड़े जाने के अप्रत्याशित प्रभाव।
आनुवंशिक प्रदूषण (Gene Flow): संशोधित जीन का जंगली प्रजातियों में स्थानांतरण (जैसे—खरपतवारों में शाकनाशी प्रतिरोधी जीन का चले जाना)।
नैतिक एवं सामाजिक मुद्दे: मानव क्लोनिंग, भ्रूणीय जीन संपादन, तथा आनुवंशिक रूप से संशोधित खाद्य पदार्थों (GM फूड) के प्रति उपभोक्ता विरोध।
कार्टाजेना प्रोटोकॉल (Cartagena Protocol): जैव सुरक्षा से संबंधित अंतर्राष्ट्रीय संधि, जिसका भारत अनुपालन करता है (GMOs के अंतर्राष्ट्रीय परिवहन पर नियंत्रण)।
भारत में नियामक ढाँचा (Regulatory Framework)
जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति (GEAC): पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) के तहत GMOs और rDNA उत्पादों को अनुमति देने वाली शीर्ष नियामक संस्था।
आरसीजीएम (RCGM): जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) के तहत, अनुसंधान स्तर पर GMOs की सुरक्षा की निगरानी।
IBSC (Institutional Biosafety Committee): संस्थागत स्तर पर जैव सुरक्षा सुनिश्चित करना।
निष्कर्ष
पुनःसंयोजक DNA तकनीक ने चिकित्सा, कृषि और उद्योग में अभूतपूर्व क्रांति लाई है, तथापि इसके पर्यावरणीय एवं नैतिक प्रभावों को देखते हुए सतर्क नियामक नियंत्रण अत्यावश्यक है। भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह तकनीक खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं की सुलभता और पर्यावरणीय चुनौतियों के समाधान हेतु अत्यधिक लाभकारी है, बशर्ते इसे “जैव-सुरक्षित (biosafe)” वातावरण में, नैतिकता एवं कानूनी दायरे में रहकर लागू किया जाए।
UPSC परीक्षा हेतु नोट: यह तकनीक न केवल GS-3 (विज्ञान प्रौद्योगिकी) के लिए प्रासंगिक है, बल्कि इसके नैतिक पहलू GS-4 (नीतिशास्त्र) में, तथा संबंधित सरकारी योजनाएँ (जैव प्रौद्योगिकी नीति, 2013 आदि) GS-2 (शासन व्यवस्था) के अंतर्गत भी पूछी जा सकती हैं।