🏛️ प्राचीन भारत का इतिहास
सिन्धु घाटी से गुप्त साम्राज्य तक · Exam-Oriented Notes
- नगर योजना (Urban Planning): सड़कें ग्रिड पैटर्न में बनीं, जल निकासी व्यवस्था अत्यंत विकसित थी।
- लिपि (Script): अब तक अपठित है। लगभग 400 चिह्नों वाली पिक्टोग्राफिक लिपि।
- अर्थव्यवस्था: कृषि (गेहूँ, जौ, कपास) और व्यापार (मेसोपोटामिया के साथ)।
- धार्मिक विश्वास: मातृ-देवी (Mother Goddess) और पशुपति (योगी शिव) की पूजा।
- पतन का कारण: संभवतः जलवायु परिवर्तन और सरस्वती नदी का सूखना।
सिन्धु घाटी सभ्यता विश्व की चार प्राचीन सभ्यताओं (मिस्र, मेसोपोटामिया, चीन और भारत) में से एक है। यह सभ्यता सिंधु नदी के किनारे फली-फूली और इसका विस्तार गुजरात से लेकर पंजाब तक था। इसे 'हड़प्पा सभ्यता' भी कहा जाता है क्योंकि इसकी खोज सबसे पहले हड़प्पा (1921) में हुई थी।
🔹 नगर योजना (Town Planning): सिन्धु सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता इसकी नगर योजना थी। सड़कें एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं। घर ईंटों (Burnt Bricks) से बने होते थे और हर घर में नहाने का कमरा (Bathroom) तथा शौचालय (Toilet) की व्यवस्था थी। मोहनजोदड़ो में 'ग्रेट बाथ' (विशाल स्नानागार) मिला है, जो धार्मिक स्नान के लिए प्रयोग किया जाता था।
🔹 अर्थव्यवस्था: यह सभ्यता कृषि प्रधान थी। गेहूँ, जौ, तिल, कपास और मटर उगाए जाते थे। भारतीय उपमहाद्वीप में सबसे पहले कपास यहीं उगाया गया था। उनके पास तौल मापन की सटीक प्रणाली थी। व्यापार में 'मुहरें' (Seals) का उपयोग होता था, जिन पर जानवरों (गैंडा, बैल, हाथी) की आकृतियाँ बनी होती थीं।
🔹 धर्म: सिन्धु सभ्यता के लोग मातृ-देवी (Mother Goddess) की पूजा करते थे, जो उर्वरता (Fertility) का प्रतीक थी। एक मुहर पर 'पशुपति' (तीन मुख वाला, सींग वाला योगी) की आकृति मिली है, जिसे कई विद्वान शिव का प्रारंभिक रूप मानते हैं। वृक्ष (पीपल) और पशु (गाय, बैल) की भी पूजा होती थी।
🔹 पतन के कारण: इस सभ्यता के पतन के कई कारण बताए जाते हैं — जलवायु परिवर्तन, सरस्वती नदी का सूखना, बाढ़ या आक्रमण। वर्तमान शोध से यह माना जाता है कि मानसून में कमी और सूखा (Drought) मुख्य कारण था।
★ उपनिषद: वेदांत दर्शन
- वेद: ऋग्वेद विश्व की प्राचीनतम पुस्तक है। 'आर्य' शब्द का उल्लेख सबसे पहले ऋग्वेद में मिलता है।
- राजनीतिक व्यवस्था: जनपद (जनों का पद) से लेकर राष्ट्र तक। राजा का चुनाव होता था।
- धार्मिक विश्वास: इन्द्र, अग्नि, सूर्य, वरुण प्रमुख देवता। यज्ञ का विशेष महत्व।
- अर्थव्यवस्था: गाय और अश्व महत्वपूर्ण। 'गव' (गाय) धन का मानक।
- वर्ण व्यवस्था: चार वर्ण — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र (पुरुष सूक्त में वर्णित)।
वैदिक काल भारतीय इतिहास का वह काल है जब वेद (ज्ञान के ग्रंथ) रचे गए। यह काल आर्यों के भारत आगमन से शुरू होता है। आर्य लगभग 1500 ई.पू. में मध्य एशिया से भारत आए और सप्त सिंधु (सात नदियों) क्षेत्र में बस गए।
🔹 ऋग्वेद: यह सबसे प्राचीन वेद है और 10 मंडलों में विभाजित है। इसमें 1028 सूक्त हैं। ऋग्वेद में 'इन्द्र' को सबसे महान देवता माना गया है (250 सूक्त उन्हें समर्पित)। दूसरे स्थान पर 'अग्नि' (200 सूक्त) और तीसरे पर 'सोम' हैं।
🔹 राजनीतिक व्यवस्था: वैदिक काल की राजनीतिक इकाई 'जन' थी। 'जनपद' का अर्थ है — जनों का पद (क्षेत्र)। राजा को 'गोप' (रक्षक) कहा जाता था, 'स्वामी' नहीं। राजा का चुनाव 'समिति' और 'सभा' नामक दो संस्थाएँ करती थीं। महिलाएँ भी सभा में भाग लेती थीं — 'गर्गी' और 'मैत्रेयी' इसके प्रमाण हैं।
🔹 वर्ण व्यवस्था: पुरुष सूक्त (ऋग्वेद के 10वें मंडल) में चार वर्णों का वर्णन मिलता है — ब्राह्मण (पुरुष का मुख), क्षत्रिय (भुजाएँ), वैश्य (जाँघें), शूद्र (पैर)। प्रारंभ में यह व्यवस्था 'जन्म' पर नहीं, 'कर्म' पर आधारित थी।
🔹 उत्तर-वैदिक काल (1000-500 ई.पू.): इस काल में उपनिषद और पुराण रचे गए। 'कर्म' और 'पुनर्जन्म' का सिद्धांत इसी काल में विकसित हुआ। 'यज्ञ' का स्थान 'उपासना' (भक्ति) ने लेना शुरू किया। यही काल 'महाजनपद' (16 महाजनपद) का उदय काल है, जो बाद में मौर्य साम्राज्य की नींव बना।
★ अशोक: बौद्ध धर्म का प्रसार, धम्म - अहिंसा का संदेश
- चन्द्रगुप्त मौर्य (322-298 ई.पू.): चाणक्य (कौटिल्य) के मार्गदर्शन में मौर्य साम्राज्य की स्थापना की।
- अशोक महान (268-232 ई.पू.): कलिंग युद्ध (261 ई.पू.) के बाद बौद्ध धर्म अपनाया।
- अशोक के स्तम्भ: सारनाथ का सिंह स्तम्भ — भारत का राष्ट्रीय चिह्न। शिलालेख ब्राह्मी लिपि में।
- अर्थशास्त्र: कौटिल्य का ग्रंथ — राजनीति, अर्थव्यवस्था और युद्धकला का विश्वकोश।
- धम्म (धर्म): अशोक ने अहिंसा, करुणा, सत्य का संदेश दिया। बौद्ध धर्म का श्रीलंका, म्यांमार तक प्रसार।
मौर्य साम्राज्य भारत का प्रथम सर्व-भारतीय साम्राज्य था। इसकी स्थापना चन्द्रगुप्त मौर्य ने 322 ई.पू. में की, जब उन्होंने नंद वंश के अंतिम शासक धनानंद को पराजित किया। मौर्य साम्राज्य का विस्तार अफगानिस्तान से लेकर बंगाल तक और हिमालय से लेकर विंध्य पर्वत तक था।
🔹 चाणक्य और अर्थशास्त्र: चन्द्रगुप्त मौर्य के मुख्य सलाहकार 'आचार्य विष्णुगुप्त' (चाणक्य) थे, जिन्हें 'कौटिल्य' भी कहा जाता है। इन्होंने 'अर्थशास्त्र' नामक पुस्तक लिखी, जो राजनीति, अर्थव्यवस्था, युद्धनीति और समाजशास्त्र का विश्वकोश है। इसमें 'सप्तांग सिद्धांत' (सात अंग) — स्वामी (राजा), मंत्री, जनपद, दुर्ग, कोष, दंड, मित्र — का वर्णन है।
🔹 अशोक महान: अशोक मौर्य वंश का सबसे महान शासक था। 261 ई.पू. में कलिंग (आधुनिक उड़ीसा) पर विजय प्राप्त की, लेकिन युद्ध में लाखों लोगों की मृत्यु ने उसे 'शोक' में डाल दिया। इस घटना के बाद उसने बौद्ध धर्म अपना लिया और 'अहिंसा' का संदेश दिया।
🔹 अशोक के अभिलेख (Edicts): अशोक ने पूरे साम्राज्य में स्तम्भ (Stambh) और शिलालेख (Rock Edicts) स्थापित किए। ये ब्राह्मी लिपि और खरोष्ठी (उत्तर-पश्चिम में) लिपि में लिखे गए हैं। सारनाथ का सिंह स्तम्भ आज भारत का राष्ट्रीय चिह्न है। इन अभिलेखों में 'धम्म' (धर्म) की शिक्षा दी गई है — माता-पिता का सम्मान, गुरुओं की सेवा, प्राणियों के प्रति दया, और सत्य बोलना।
🔹 पतन: अशोक की मृत्यु (232 ई.पू.) के बाद मौर्य साम्राज्य का पतन शुरू हो गया। 'पुष्यमित्र शुंग' ने 185 ई.पू. में अंतिम मौर्य शासक 'वृहद्रथ' की हत्या करके शुंग वंश की स्थापना की।
★ कला-साहित्य: कालिदास, आर्यभट्ट, दशावतार मन्दिर
- चन्द्रगुप्त प्रथम (320 ई.): गुप्त वंश की स्थापना। 'महाराजाधिराज' की उपाधि।
- समुद्रगुप्त (335-375 ई.): 'भारत का नपोलियन' कहलाते हैं। कवि, संगीतज्ञ और महान योद्धा।
- साहित्य: कालिदास ने 'अभिज्ञानशाकुन्तलम्' और 'मेघदूत' लिखी। विशाखदत्त ने 'मुद्राराक्षस' लिखी।
- विज्ञान: आर्यभट्ट ने 'आर्यभटीय' लिखी — शून्य की खोज, पाई का मान। वराहमिहिर — ज्योतिष शास्त्री।
- कला: अजंता एवं एलोरा की चित्रकारी। दशावतार मंदिर (देवगढ़) — गुप्तकालीन स्थापत्य।
गुप्त साम्राज्य भारतीय इतिहास का 'स्वर्णिम युग' (Golden Age) कहलाता है। इस काल में कला, साहित्य, विज्ञान और अर्थव्यवस्था अपने चरम पर थी। गुप्त वंश की स्थापना 'श्रीगुप्त' ने की, लेकिन वास्तविक साम्राज्य चन्द्रगुप्त प्रथम (320 ई.) से शुरू होता है।
🔹 समुद्रगुप्त: समुद्रगुप्त को 'भारत का नपोलियन' कहा जाता है क्योंकि उसने कई राजाओं को पराजित किया और 'अश्वमेध यज्ञ' किया। उसके शासनकाल का विवरण 'प्रयाग प्रशस्ति' (इलाहाबाद स्तम्भ) में मिलता है, जो उसके राजकवि 'हरिषेण' ने लिखा था। वह एक कवि और संगीतज्ञ भी था।
🔹 चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य (380-415 ई.): चन्द्रगुप्त द्वितीय 'विक्रमादित्य' नाम से प्रसिद्ध है। उसने शकों को पराजित किया और उज्जयिनी को अपनी दूसरी राजधानी बनाया। उसके दरबार में 'नवरत्न' (9 रत्न) थे — कालिदास (महाकवि), आर्यभट्ट (गणितज्ञ), वराहमिहिर (ज्योतिषी), अमरसिंह (शब्दकोशकार) इत्यादि।
🔹 विज्ञान की उपलब्धियाँ: आर्यभट्ट ने 'शून्य' (Zero) की खोज की और 'दशमलव प्रणाली' (Decimal System) विकसित की। उसने सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण के कारणों को वैज्ञानिक रूप से समझाया। 'पाई' (π) का मान 3.1416 निकाला। 'सुश्रुत' और 'चरक' ने आयुर्वेद को आगे बढ़ाया।
🔹 कला और साहित्य: कालिदास गुप्त काल के सबसे महान कवि थे। उनकी रचनाएँ — 'अभिज्ञानशाकुन्तलम्' (नाटक), 'रघुवंशम्' (महाकाव्य), 'मेघदूत' (खंडकाव्य) — विश्व साहित्य की अमूल्य निधि हैं। अजंता की गुफाएं और उनकी चित्रकारी गुप्तकाल की कला का उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
★ प्रमुख ग्रंथ: तिरुक्कुरल, एट्टुतोगै, पत्तुप्पाट्टु
- तीन संगम: प्रथम संगम (मदुरै), द्वितीय संगम (कपाटपुरम्), तृतीय संगम (मदुरै)।
- तीन प्रमुख राजवंश: चेर, चोल, पांड्य — 'मुवेंदर' (Three Kings)।
- व्यापार: रोमन साम्राज्य के साथ व्यापार — मसाले, मोती, हाथी दांत। 'मुजिरिस' (कालीकट) — प्रमुख बंदरगाह।
- साहित्य: तिरुवल्लुवर का 'तिरुक्कुरल' — 1330 दोहे (नीतिशास्त्र, प्रेम, अर्थशास्त्र)।
- धर्म: जैन धर्म और बौद्ध धर्म का प्रभाव। भक्ति आंदोलन की शुरुआत।
संगम काल दक्षिण भारत के इतिहास का वह काल है जब तमिल साहित्य अपने चरम पर था। 'संगम' का अर्थ है — 'कवियों की सभा' (Assembly of Poets)। कुल तीन संगम हुए — पहला संगम मदुरै में, दूसरा कपाटपुरम् में और तीसरा पुनः मदुरै में। तीसरे संगम का साहित्य ही आज उपलब्ध है।
🔹 मुवेंदर (Three Kings): संगम काल में तीन प्रमुख राजवंश थे — चेर (पश्चिमी घाट, केरल), चोल (पूर्वी तट, तंजावुर), और पांड्य (दक्षिण, मदुरै)। ये तीनों आपस में युद्ध करते थे लेकिन साहित्य और कला को बढ़ावा देते थे। 'चेरन सेनगुट्टुवन' और 'करिकाल चोल' इस काल के प्रसिद्ध शासक हैं।
🔹 तिरुक्कुरल: तिरुवल्लुवर द्वारा रचित 'तिरुक्कुरल' विश्व साहित्य की महानतम कृतियों में से एक है। इसमें 1330 दोहे (Couplets) हैं, जो तीन विभागों — 'अरम' (धर्म), 'पोरुल' (अर्थशास्त्र), 'इनबम' (प्रेम) — में विभाजित हैं। यह पुस्तक 'विश्व का सर्वश्रेष्ठ नीतिशास्त्र' मानी जाती है।
🔹 व्यापार: संगम काल में समुद्री व्यापार बहुत फल-फूल रहा था। रोमन साम्राज्य के साथ मसालों, मोतियों, रत्नों और हाथी दांत का व्यापार होता था। 'मुजिरिस' (केरल का बंदरगाह) रोमनों के लिए एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र था। 'पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी' (यूनानी पुस्तक) में इस व्यापार का वर्णन मिलता है।
🔹 सामाजिक जीवन: संगम साहित्य में स्त्रियों की स्थिति बहुत अच्छी थी। महिलाएँ शिक्षित थीं और 'अव्वैयार' जैसी महान कवियित्री थीं। प्रेम और वीरता — ये दो मुख्य भावनाएँ संगम साहित्य में पाई जाती हैं। 'अकम' (आंतरिक/प्रेम) और 'पुरम' (बाहरी/युद्ध) — ये दो प्रकार की कविताएँ थीं।
★ कन्नौज: दूसरी राजधानी
★ ह्वेन त्सांग: चीनी यात्री — 7 वर्ष भारत में
- हर्षवर्धन (606-647 ई.): अपने भाई राज्यवर्धन की मृत्यु के बाद 16 वर्ष की आयु में शासक बने।
- ह्वेन त्सांग का आगमन (630-644 ई.): चीनी यात्री ने 'सियो-यू-की' लिखी, जिसमें हर्ष के शासन का विवरण मिलता है।
- कन्नौज का महान सम्मेलन (643 ई.): बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए 5,000 भिक्षुओं का आयोजन।
- साहित्य: हर्ष ने स्वयं तीन नाटक लिखे — 'रत्नावली', 'प्रियदर्शिका', 'नागानन्द'।
- धार्मिक सहिष्णुता: हर्ष स्वयं शैव थे लेकिन बौद्ध धर्म को भी समर्थन देते थे। नालंदा विश्वविद्यालय को दान।
हर्षवर्धन उत्तर भारत का अंतिम महान हिंदू सम्राट था, जिसने 606 ई. से 647 ई. तक शासन किया। वह पुष्यभूति वंश का शासक था, जिसकी राजधानी थानेश्वर (हरियाणा) थी। बाद में उसने कन्नौज को अपनी दूसरी राजधानी बनाया।
🔹 साम्राज्य विस्तार: हर्ष ने पूर्वी पंजाब से लेकर बंगाल तक और हिमालय से लेकर नर्मदा नदी तक का साम्राज्य स्थापित किया। उसका चालुक्य शासक 'पुलकेशिन द्वितीय' से युद्ध हुआ, जिसमें हर्ष को पराजय का सामना करना पड़ा।
🔹 ह्वेन त्सांग (Xuanzang): चीनी यात्री ह्वेन त्सांग 630-644 ई. तक भारत में रहा। उसने हर्ष के दरबार में 7 वर्ष बिताए और 'सियो-यू-की' (Record of the Western Regions) नामक पुस्तक लिखी। उसने भारत की समृद्धि, न्याय व्यवस्था, और नालंदा विश्वविद्यालय का वर्णन किया है।
🔹 कन्नौज का महान सम्मेलन (643 ई.): हर्ष ने बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए कन्नौज में एक विशाल सम्मेलन आयोजित किया, जिसमें 5,000 बौद्ध भिक्षु और 20 से अधिक राजा शामिल हुए। इस सम्मेलन में 'महायान' बौद्ध धर्म का प्रचार किया गया।
🔹 साहित्यिक योगदान: हर्ष स्वयं एक प्रतिभाशाली लेखक था। उसने तीन नाटक लिखे — 'रत्नावली' (प्रेम-प्रसंग), 'प्रियदर्शिका' (हास्य-प्रधान), और 'नागानन्द' (धार्मिक-नाटक)। उसके दरबार में 'बाणभट्ट' ने 'हर्षचरित' (हर्ष की जीवनी) लिखी।
🔹 पतन: 647 ई. में हर्ष की मृत्यु के बाद उसका साम्राज्य बिखर गया। उसके बाद 'यशोवर्मन' और फिर 'ललितादित्य' ने शासन किया। हर्ष के बाद राजपूत युग की शुरुआत हुई, जो मुस्लिम आक्रमणों तक चला।